सम्पादकीय: बदलता हुआ समय

अनुराग शर्मा
सेतु के नवीन अंक के साथ एक बार फिर आपका स्वागत है।

हम एक रोमांचक समय में जी रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने हमारे देखते-देखते हमारे संसार को रूपांतरित कर दिया है। प्रतिदिन कुछ नया सामने आता है --- इंस्टैंट फ़ोटो, वीसीआर, ज़िप ड्राइव आदि जैसी कितनी तकनीकें तो अत्यल्प समय में आकर चली भी गयीं क्योंकि शीघ्र ही उनसे भी बेहतर तकनीक सामने आ गयी। हमारा और आपका संसार प्रतिक्षण बदल रहा है। लेकिन इस नित नूतन संसार में कुछ विचार ऐसे भी हैं जो कभी नहीं बदलते। महाभारत का 'अहिंसा परमो धर्मः' एक ऐसा ही विचार है जो सदैव ही मानवता के लिये आवश्यक रहेगा। भारतभूमि में जन्म लेकर धीरे-धीरे सारे संसार में छाने वाले अनेक विचारों में एक अहिंसा भी है। आश्चर्य नहीं कि महात्मा गांधी वर्तमान संसार में बुद्ध के बाद सर्वाधिक पहचान पाने वाले भारतीय हैं।  15 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने जब घोषणा की कि गांधीजी के जन्मदिन को हर वर्ष 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में मनाया जायेगा, तो वह दिन भारतीय संस्कृति द्वारा मानवता को प्रदत्त उन्नत विचारों की वैश्विक मान्यता का प्रतीक तो बना ही, साथ ही संसार को श्वेत-श्याम में विभाजित करने वाली विचारधाराओं के विपरीत खड़े 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' के एक अन्य भारतीय विचार का अनुसरण भी था। गांधीजी के डेढ़ सौवें जन्मदिन पर आप सभी को शुभकामनाएँ।

आपका

2 comments :


  1. अनुराग जी,

    संपादकीय में गांधी जी के डेढ़ सौवें जन्मदिवस पर सभी को शुभकामनाओं के साथ संभवत: आपने उनके जीवन व दर्शन से जुड़ी बातों पर गहन मंथन के लिये भी प्रेरित किया है. यह भी सच है के बुद्ध एवं गांधी भारतीयों के सबसे चर्चित नामों में हैं और करुणा एवं अहिंसा से जुड़े उनके विचार व कृत्य विश्व के लिये कठिन दौर में प्रकाश-स्तम्भ की तरह साबित होंगे. निश्चय ही यह हमारे लिये गर्व की बात है. पर हमें यह भी सोचना होगा कि कहीं ऐसा तो नहीं आज के हालात में हम अपने ही देश में उन विचारों की प्रासंगिकता को खोते रहे हैं. जिन संदर्भो व मूल्यों को उन्होंने स्थापित किया वे विरासत में नहीं मिलती; बोध या ज्ञान – हर एक को स्वयं अर्जित करना होता है प्रकाश-स्तम्भ राह जरूर दिखा सकते हैं. गांधी जी के डेढ़ सौवें जन्मदिवस के अवसर पर हम उनके विचारों का पुनर्मंथन एवं पुनर्मूल्यांकन करने का प्रयास कर सकें तो यह एक अच्छी बात होगी क्योंकि अहिंसा के अतिरिक्त भी अन्य मसलों पर उनके विचारों की सार्थकता व प्रासंगिकता निर्विवाद है जिसमें पर्यावरण का मसला शमिल है और आने वाले समय में यह हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा इसके संकेत मिलने लगे हैं. कभी इस विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की जा सकती है.

    ReplyDelete
  2. माननीय अनुराग जी,

    निश्चित ही समय बदल रहा है और बदलाव एक स्वभाविक प्रक्रिया भी है। तकनीकी के, विशेषकर सूचना तकनीकी के क्षेत्र में हुए क्रांतिकारी विकास ने मनुष्य के कार्य को जहाँ आसान बनाया है, वहीं उसे सर्वाधिक व्यस्त भी बना दिया है, इतना व्यस्त की उसके पास न तो औरों लिए समय रहा न सही से स्वयं के लिए। गाँधी जी के विचारों में, स्वदेशी, स्वच्छता आदि भी प्राथमिकता पर रहे। उनके जन्मदिवस को स्वच्छता आंदोलन से जोड़ने का भी हाल ही में प्रयास हुआ है। केवल सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर शासकीय प्रतिबंध से इसको कुछ हद तक ही रोका जा सकता है। स्वच्छता और पर्यावरण सुरक्षा सही मायने में गांधी जी के 'स्वदेशी अपनाएं' के नारे में ही निहित है। जिसके तहत जनता स्वयं के बनाए हुए कपड़े के या जूट के झोलों का उपयोग करने के लिए प्रेरित होते हैं। गांधी जी के जीवन का यह व्यवहार युगों-युगों तक जनमानस का मार्गदर्शन करता रहेगा।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।