कविताएँ: ज्ञानप्रकाश 'पीयूष'

ज्ञानप्रकाश 'पीयूष'
'समन्वय-सेतु'

जीवन है
दो भागों में विभाजित,
एक तरफ  है मौज-मस्ती
धूमधाम-गहमागहमी
भौतिकता का नंगा नाच ।
दूसरी तरफ आत्म चिंतन
मौन-ध्यान,साधना,पूर्ण-प्रबोध
हो अगर दोनों में समन्वय-सेतु
लोकमंगल सध जाए
सृष्टि का सौंदर्य निखर आए।।
                 *

'पानी'

पंच भौतिक तत्वों में
पानी है एक
प्रमुख तत्व
जिसमें है अंतर्निहित
परितृप्ति का आनन्द
परितुष्टि का भाव
परिपुष्टि का अहसास
और परिपूर्णता का बोध
है अन्तर्निहित इसमें
जीवन का सार।
           *

'बूंद'

बूंद है
पानी की
एक लघु इकाई
खंडित होने का संत्रास
अतृप्ति का अहसास
अपूर्णता का बोध
और अपर्याप्तता का भाव
फिर भी है एक
स्वतंत्र अस्तित्व का
आभास।
            *

'न जाने क्यों'

न जाने क्यों
बदल लिया
पथ अपना नदी ने
जब वह गुजरती थी इधर से
जल-स्तर कुँए का
रहता था बहुत ऊँचा
लबालब रहती थी बावड़ी
जीव-जंतु,पशु-पक्षी,नर-मादा
रहते थे सभी आनन्द विभोर
छाई रहती थी खुशी चहुँओर।
                   *

'बहती थी नदी'

बहती थी जब नदी इधर से
रहती थी हर तरफ चहल-पहल
स्नान-ध्यान,जप-दान।
होता सूर्य को अर्घ्यदान
ताजा जल से अमृतवेले ।
सुहागिनें गाती मंगलगान
तीज-त्यौहार अमावस-पूनम
करती दीप-दान,कार्तिक स्नान
उत्सव-सा छाया रहता।
                *

'भूल गई रास्ता'

नदी तुम भूल गई क्यों
चिर-परिचित रास्ता अपना
इधर से अब गुजरती क्यों नहीं
क्या चूक हुई ,लक्ष्य तो अब भी है
वही पुराना समुद्र से मिलना
देखो, वियोग में तुम्हारे सूख गए हैं सरोवर
भूमि उर्वर हो गई है बंजर
जोहड़-तालाब उड़ गए सब भाप बन कर
गर्दिश में हैं दिन सबके
सूखी रेत-सी हो गई है ज़िन्दगी।
                      *

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