आकाश में दरार - भाग 2 (चार अंकों में समाप्य, धारावाहिक कहानी)

प्रभु जोशी

- प्रभु जोशी

4, संवाद नगर, नवलखा, इन्दौर 452001 मध्यप्रदेश
ईमेल: prabhu.joshi@gmail.com

स्टील के उस चमकते चाकू को अपने दाहिने हाथ में लेने के बाद मैंने बहुत हौले से उसे अपने बायें हाथ की अंगुलियों पर घुमाया और पाया कि उसकी धार वाकई बहुत तेज है, जिसके चलते वह एकबारगी ही में पेट की त्वचा को पूरी चीर डालेगा। बिलकुल सीधी रेखा में। मेरे हाथों में उसे थामते ही एक अजीब-सी उत्तेजना भर आयी, जो अंगुलियों के पोरों में हस्ब-मामूल-सी सनसनी भर रही थी। यह शायद इसलिए भी था कि ऐसी हिंसा का मेरे लिए यह पहला मौका था, जबकि घर के संस्कारों ने तिलचट्टों या छिपकलियों तक को भी मारने पर मन में गहरे तक पाप-बोध भर जाने की पूरी व्यवस्था करवा दी थी।

इस समय वह मेरी आँखों के ठीक सामने बिना हिले-डुले चित्त-सा असहाय लेटा था। मैं यह सोचकर थोड़ा-सा सिहर गया कि इस निरीह को इस बात का कहाँ अहसास होगा कि किसी भी क्षण एक तीखा चाकू चलेगा और उसके पेट को ऊपर से नीचे तक खोल देगा। नतीजतन खून की धारें छूट पड़ेंगी। और मुझे उसके धड़कते दिल को देखने की एक थ्रिल महसूस होगी।

मैंने चाकू को पुख्ता एहतियात के साथ पकड़ा और उसके मोटे और चपटे पेट की चिकनी और पतली त्वचा पर उसकी तीखी नोंक को धंसाने वाला ही था कि अचानक मेरी पीठ पर किसी का हाथ आ गया।

क्षण भर के लिए मैं अकबका गया। सामने प्रकाश था। अरे ये यहाँ कैसे आ गया अभी बारह बजे के मेटिनी शो में धर्मेन्द्र की, एक नई हीरोइन राखी के साथ आयी फिल्म देख कर निकलने के बाद गुमटी पर चाय पीते हए यह तय किया गया था कि अब हम रविवार को ही मिल पायेंगे क्योंकि, उसे सेंधवा जा कर आक्ट्रॉय नाके के लफड़े में फंसे भाई को पुलिस से छुड़वाना है। फिर क्या नयी बात हो गयी? मैंने देखा उसकी आँखों में ऐसी हवाइयाँ उड़ रही थीं, जैसे वह किसी खौफनाक दृश्य को पीछे छोड़ कर दौड़ता-भागता मेरे पास आया हो।
 उसकी साँस बेतरह “फूल रही थी।

“बंद कर ये सब और चल जरा बाहर आ तो।” उसने लगभग मुझे खींचते हुए कहा। उसकी आवाज के ऊँचे स्वर और चेहरे की बदहवासी ने एकाएक वहाँ मौजूद लोगों को चैंका दिया और वे सब के सब मेरी तरफ देखने लगे।
दरअसल, बदहवासी के बीच प्रकाश बिना किसी किस्म की औपचारिकता का ध्यान रखते हुए लगभग धड़धड़ाता-सा सीधे-सीधे हमारी बायोलॉजी की उस लैब में घुस आया था, जहाँ हम सब बी.एस.सी. के प्रथम वर्ष के छात्र पहली बार मेंढक का डायसेक्शन करने जा रहे थे। क्योंकि इस सप्ताह के प्रैक्टिकल का यह आखिरी पीरियड था और साढ़े चार बजने को आये थे। मैंने हाथ का चाकू अपने डायसेक्शन-बॉक्स में जस का तस रखा। सामने की ट्रे जिसमें क्लोरोफार्म दे कर बेहोश किया गया मेंढक चित्त पड़ा हुआ था, लेब-अटैण्डेण्ट श्यामू को सौंपी, और बाद इसके अपनी रिकॉर्ड-बुक और डायसेक्शन-बॉक्स टेबिल की दराज में रख कर लैब से बाहर आ गया।

“देख तू बिल्कुल घबराना मत यार।” उसने मुझे किसी अप्रत्याशित सूचना से पैदा होने वाले झटके को झेल सकने के लिए तैयार करने के इरादे से कहा फिर मेरे कंधे को अपनी बाँह से घेरते हुए आगे बोला, “दरअसल, ऐसा है कि यार तेरे पिताजी बीमार हैं और उन्हें गाँव से ट्रैक्टर में डाल कर जिला-अस्पताल में लाया गया है। साथ में तेरी माँ भी है। हालत थोड़ी गंभीर जरूर है, लेकिन मैंने उन्हें भर्ती करवा दिया है।” बाद इसके थोड़ा रूक कर कहने लगा-” हुआ ये कि मैं अस्पताल में अपनी माँई की बीमारी का सर्टिफिकेट बनवाने गया था तो वहाँ मुझे तुम्हारी माँ दिखी। वे जाने कैसे पहचान गयीं और बोली, “कंई तम परकास भइया हो? परभू का गोंई? जराक मदद करई दो तो इणके डाक्तर साब भरती करी ले-- फिर कहा कि मैं तुमको खबर भी कर दूँ।”

सुनते ही लगा, जैसे मेरी टांगों की नब्जों में बहता खून एकाएक जम गया है और वहाँ पिण्डलियों पर बर्फ के चाकू से ढेरों ठण्डी लकीरें खींच दी गयी हैं। लगने लगा अब मुझ से एक कदम भी नहीं चला जा सकेगा। ये कतई समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि पिताजी को गाँव से सौ किलोमीटर दूर के जिला अस्पताल में इलाज के लिए लाना पड़ा है? क्षण भर में आँखों के नीचे पिता जी की लहीम-शहीम सी लहूलुहान देह घूम गयी, जिसे जगह-जगह चाकुओं से गोद दिया गया है। मुझे सहसा एक महीने पहले डाक से आया हरिगुरू से लिखवा कर भिजवाया गया, माँ का वह खत भी याद हो आया, जिसमें उसने ताऊजी द्वारा पटवारी को पटा कर कुँए वाले खेत पर जबरन अपना नामान्तरण करा लिये जाने की बात लिखी थी, और यह भी लिखा था कि कुँए में पानी की आवक बढ़ाने के लिए वह उसे गहरा करवा रही थी तो ताऊजी ने इस पर रापटरौल्या मचा कर काम रूकवा दिया है। तो मैंने उसे लिखा भी था कि कोई बात नहीं, फिलहाल वह अपनी तरफ से कुछ भी न कहें। मैं पढ़ाई पूरी कर के लौटूंगा और हम अपनी एक-एक इंच जमीन वापस ले लेंगे।

बहरहाल, इस समय तो मेरे भीतर अविलम्ब सिर्फ पिताजी को देखने की बेसब्री भर चुकी थी और मैंने इसी कोशिश में प्रकाश की खड़खड़िया हरक्यूलिस साइकिल चलाने के लिए आगे बढ़कर, जैसे ही हेण्डिल पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, उसने तत्परता से कहा, “नहीं यार, तू साइकिल नहीं चला पायेगा। बस तू तो फटाकदनी से पीछे केरियर पर बैठ जा। मैं तुझे लेकर चलता हूँ।” मैंने कहा कि कुछ देर के लिए मैं अपने किसी क्लासमेट की साइकिल मांग लेता हूँ तो उसने डपट दिया। “ये सब मांगने-धूंगने का पचड़ा छोड़ यार और मैं कह रहा हूँ, तू चुपचाप बस केरियर पर लद जा।”

और, अब हम कॉलेज परिसर से निकल कर सर्राटे से साइकिल से अस्पताल रोड की ओर जा रहे थे।
प्रकाश तेजी से अपनी खटारा साइकिल के पैडिल मारे जा रहा था और पीछे केरियर पर बैठा हुआ मैं न जाने कितनी-कितनी आशंकाओं-कुशंकाओं के बीच डूबने-उतराने लगा था। मेरी आँखों के नीचे सहसा दो वर्ष पहले का, मन में रह-रह कर टीस मारते रहने वाला वह दृश्य घूम गया, जब मुझे शहर में पढ़ाये जाने के लिए घर में बात उठी थी। तब पिताजी के सबसे बड़े वाले भाई, जिन्हें घर में लगभग धर्मराज का-सा ओहदा और आदर प्राप्त था, ने ठेठ मालवी में धुर्रे बिखेरती, कलेजा-फोड़ गालियों का ऊँची आवाज में धारावाहिक प्रयोग करते हुए फैसला सुनाया था कि ये बात तो तू कान खोल के सुन ले आनन्दी, छोरे को बायर भणाने की जुगत में जमीण बेचणे की बात कर रिया है, पण ये समझ लेणा कि बंटवारा तो एक बिस्वा जमीन का भी नीं होणे दूंवा। ....जा तेरे से बणे वो करी ले... जमीन बाप दादाओं के समय से शामलात खाते की है और इसी खाते में रहेगी और यदि किसी ने भी बंटवारे की बात की तो खून से कपाल भेरू हुइ जायगा, समझे! याद कर जरा पाँच साल पहले जब तेरी, छोरी धापूड़ी के ब्याव की बखत पाँच बीघे बेंची थी और फिर दायजी के नुक्ते में दो बीघे। अब तो अंगुल भर नहीं बेचेंगे। बाद इसके उन्होंने पिताजी को हड़काते हुए कहा था, “आनन्दीलाल, तू बता तेरी बईरां ने अपने पेट से ऐसी कौन सी ऋषि-संतान पैदा कर दी है, जिसके दिमाग के लिए यहाँ का इस्कूल छोटा पड़ गया है? और जिस्के वास्तू तू छोरे को भणने के लिए सौ कोस दूर जिले भेज रिया है? वां पढ़ के वो कोई अहलकार नंई हो जायगा, समझे! पोपसिंह पटेल के लौण्डे को देखा नंई क्या? वहाँ सेरगाम जा के वो आक्खा लम्पट और लबार हो गया और लौटा तो जेब में धर रखा था, हेमा मालनी का फोटू और कंधे पे था, ट्रांजिस्टर! हाँ ऊ ने पैजामा छोड़ के पतलून पेन्ह के खडे खडे बेसरमी से मूतना जरूर सीख लिया पण बता तू कि वो खाकी पतलून पहना बेज-बिल्ला वाला कोतवाल हो गया क्या?” बाद इसके अपने फेफड़े में ढेर सारी सांसें खींच कर और अधिक पिन्नाटे के साथ बोले थे- “अरे ओ घुन्ने मिथारे औन्दाड़े “आनन्दी! अक्कल से काम ले रे, अक्कल से... और अपनी इस घाघरा-पल्टण के केणे में आ के घर बाळ के तीरथ करने की सिड़ल्ई मत कर। जादे-से-जादे येई होगा नी कि तेरा ये सपूत चार अच्छर कम सीखेगा, लेकिन, घर की खेती-बाड़ी देखेगा तो भी इस्की जिनगी चैन से कट जायगी। अरे मालक के तो पाँव का भी खेत में खाद लगता है, रे, समझे! टिल्लू पम्प लगा के पीवत की खेती करेगा तो उसको पिराणे से बैलों के पोंद गोदणे की जरूरत नी पड़ेगी। बीघे भर में भी क्विंटलों से मेक्सिकन गेहूँ उतरेगा। समझा के नी?”

पिता के वे बड़े भाई लाल-बरंग चेहरा बनाये जोर-जोर से चीखे जा रहे थे और पिताजी थे कि एकदम चुप। उन दोनों का यह अपने-अपने स्तर पर किया जा रहा एकदम मानीखेज-सा शक्ति प्रदर्शन था। वो एक तरह से चुप और चीख के बीच बिरोबर की भिडन्त थी, जिसे मैं असहाय-सा ओटले की आड़ में दुबका हुआ देख रहा था। तभी शायद माँ मेरे भीतर के भय को पहचान गयी थी तो घूंघट काढ़े-काढ़े आगे आ कर बोली थी, “ हाँ, हमने तो नेठूई धार ली है कि चाहे हमारी बोटी-बोटी बिकी जाय, पे हम तो छोरा के डाग्तरी भणने भेजांगा ज।”

बड़े ताऊजी और पिताजी के बीच चल रही इस ले-दे के ठीक चरम पर माँ की इस संवाद के साथ एकाएक हुई प्रविष्टि से चौतरफा एक विचित्र-सा सन्नाटा खिंच गया था। पिता एकदम चुप थे, जैसे उन्होंने अपने कान किसी दूसरी तरफ खोल लिये हैं और वे उस वक्त अपने बड़े भाई की बक-बक से कोसों दूर खड़े हुए वहाँ हैं, जहाँ जलसे में मुझे “डॉक्टरी” की पढ़ाई पूरी कर लेने पर डिग्री दी जा रही है और लोग तालियाँ बजा रहे हैं।
बाद इसके दोनों भाइयों की चलती चख-चख के कारण आसपास भेळे हो चुके गाँव के लोगों और भई-बन्धों को लगभग सम्बोधित करते हुए ताउजी कुछ ऐसे नौटंकिया स्वर में बोलने लगे थे, जैसे कोई बहुत बड़ा और गहरा रहस्य था और वे उसे खोल पाने में अभी तक नाकामयाब होते चले आ रहे थे और अब अचानक वह स्वतः सामने आ गया है।

वे बमक कर बोले थे, "येल्लो देखी लो! अई गई नी सच्ची बात सबका सामने। अरे यो हमारो छोटो भई आनन्दीलाल, आनन्दी नी है, भैया! ये तो आक्खो को आक्खो पाँव से पूंछ तक नन्दी है, नंदी! और ई की पीठ पे या छेड़ो काढ़ी ने उब्बी पारबती सवार है। हाँ, भइया, ई की लाड़ी। यो बिच्चारों गूंगो कंई बोले? बिना बाचा को जीव है और हूँ तो कहूँ कि यो नन्दी भी नी, पूरो को बैल है, बैल। हाँ बैल। अने, ऊ भी पड़ेलो! ई की तो हालत भी या है कि जदे इके ललकारे लाड़ी, तदे खींचणे लगे यो गाड़ी। अरे यो तो घरवाळी का घेरणे से चले है।” इसके पश्चात् उन्होंने वही अपना धर्मराज वाला अटल फैसला सुनाया था कि जमीन एक तो क्या आधा बिस्वा भी नी बंटेगी। और अपणे छोरे को भणाना ही है, तो बेच दो अपणे हिस्से का घर और फिर दोई धणी-बईरां करता री जो जगेह-जगेह डाण्डा काळा।!”

तभी अचानक साइकिल रूकी तो देखा सामने जिला अस्पताल था। हम उसके परिसर के भीतर।

इस बीच कब नाहर दरवाजा गया, कब नया पुरा, कब जवाहर चौक और कब अस्पताल रोड। इसका कहीं कोई भान ही नहीं रहा। मैं साइकिल के केरियर से जमीन पर नीचे कूद पड़ा। प्रकाश साइकिल को स्टैण्ड पर लगा कर आने की कह कर पैडल मारता हुआ आगे बढ़ गया।

मैं वहीं ठिठका हुआ उसका इंतजार करने लगा। बहरहाल, मेरे लिए गाँव से जिले में पढ़ने आने के दो बरसों के अर्से में यह दूसरा मौका था, जब मैं इतने बड़े किसी अस्पताल के परिसर में दाखिल हो रहा था। वर्ना गाँव में तो हर बीमारी में वैद्यजी ही थे, जिनकी पुड़िया तक पहुँच थी, हमारी। जाने क्यों मुझे लग रहा था गालिबन, थाने के बाद यह दूसरा परिसर है, जिसमें घुसते ही दहशत दबोचने लगती है। और लगने लगता है, जैसे आप असहाय और अकेले हैं और अब कोई नियति ही आपको यहाँ से मुक्ति दिला सकती है।

जहाँ प्रकाश मुझे साइकिल स्टेण्ड पर रख कर लौटने तक के लिए खड़ा कर गया था, वहाँ हवा में फार्मेलिन की तीखी गंध के साथ न जाने कितनी तरह की दुर्गंध निर्द्वंद्व टहल रही थी। और कुछ दूरी पर नीम का एक पेड़ बिल्कुल अकेला खड़ा था, जिसकी फुनगियों पर कौवे किसी प्रतीक्षा में बैठे थे और जिसके नीचे अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों के शरीर में अपने भीतर का सारा ग्लूकोज उड़ेलने के बाद खाली हो चुकी काँच की बोतलों का एक बड़ा ढेर था, जिस पर रूई के बड़े-बड़े गंदे गुच्छे बिखरे पड़े थे। वे सूख चुके खून तथा दवाइयों के धब्बे से भरे थे, जिन्हें देख कर मेरे शरीर में झुरझुरी भर आयी। उन्हीं के दरमियान यहाँ-वहाँ हाथों या पाँवों से काट कर उतारे गये प्लास्टर ऑव पेरिस के पट्टे भी पड़े थे। दो तीन कुत्तों का एक छोटा-सा असंगठित दल उस सारे के बीच सूंघता हुआ अपने मतलब का कुछ खोजने में काफी एकाग्रता से जुटा था।..... वहीं, उससे थोड़ी दूर एक एम्बुलेंस खड़ी थी, जिसके टायर सड़ कर जमीन में धंस गये थे। वह अस्पताल की सरकारी सुविधाओं और साधनों की विडम्बना का बखान कर रही थी।

मैं भीतर से घबराहट से भरता जा रहा था और चाह रहा था कि प्रकाश जल्दी से जल्दी आये ताकि मैं तुरन्त उस वार्ड में पहुँच सकूँ, जहाँ गाँव से गंभीर हालत में पिताजी को ला कर भर्ती कर दिया गया है। मन में ढेरों ऊँच-नीच के खयाल उठ रहे थे। पता नहीं किस हालत में उन्हें लाया गया है और यदि अचेतावस्था हुई तो मैं कैसे जान पाऊंगा कि उनकी हालत ऐसी किसने की या कैसे हो गयी है? घबराहट बढ़ कर मन को भेदती हुई मेरी समूची चेतना को शरीर के किसी इन्द्रिय शून्य हिस्से में ले जाती जान पड़ रही थी। मुझे प्रकाश के द्वारा किये जा रहे विलम्ब को लेकर बैचेनी भरने लगी, जो धीरे-धीरे खीझ की तरफ बढ़ने लगी थी।

तभी वह वापस सायकिल चला कर लौटता दीखा।

पास आते ही सीट से उतर कर बोला, “स्साला, स्टैण्ड वाला सायकिल ही नहीं रख रहा है, यार! कह रहा है, इसमें ताला नहीं है और हम बिना ताले वाली सायकिल स्टैण्ड पर नहीं रखते। खैर, चलो हम साइकिल उधर ही लिये चलते हैं। सर्जिकल वार्ड की तरफ, अस्पताल के पिछले वाले भाग में ही है। चल तू फिर से केरियर पर लद जा। साइकिल को वहीं कहीं रख देंगे।” उसने एक ही साँस में इतनी सारी बातें कह डालीं और साइकिल पर बैठ गया। मैं भी उचक कर फिर से केरियर पर लद गया।

सायकिल से हमने परिसर स्थित दो तीन बिल्डिंगें पार कीं और अंत में अहाते के बिलकुल कोने वाली इमारत के सामने पहुँच कर रूक गये। सायकिल में ताले के साथ ही साथ उसे खड़ी करने के लिए शायद स्टैण्ड भी नहीं था। अतः उसने साइकिल को वार्ड की दीवार के सहारे लगा दी और बोला “चल आ मेरे पीछे! वे इधर के ही वार्ड में है।” और वह तेजी से बरामदे की सीढ़ियाँ चढ़ गया।

मैं प्रकाश के पीछे-पीछे चल रहा था। अब हम जहाँ से गुजर रहे थे, वह ऐसी जगह थी, जहाँ स्ट्रेचर पर मरीज लेटे हुए थे और उनके साथ कोई न कोई तीमारदार। मरीजों में से अधिकांशतः आसपास के गाँवों के ही लग रहे थे, जो मालवी में बोल रहे थे। यहाँ तक कि जो कराह रहे थे, उनकी कराह के भीतर से भी उनका ग्रामीणत्व बाहर आ रहा था।

तभी दरवाजे के भीतर से धप्प के साथ लाल रंग का एक बड़ा-सा पोटला बाहर की ओर फर्श पर फेंका गया, जो कत्थई छींट के कपड़े का था। भीतर से हड़काती आवाजें आ रही थीं, निश्चय ही वे नर्स की थीं। वह मरीज के किसी तीमारदार पर बुरी तरह नाराज हो रही थी- “समझ में बिल्कुल ही नहीं आता तुम गँवारों को, बताओ तुम तो गाड़ी भर सामान लाद के वार्ड में घुसे चले आते हो- सुनों ये कोई धरमशाला नहीं हैं कि उठाया अपना लाव-लश्कर और आ धमके। ये अस्पताल है, समझे अस्पताल”। बाद इतना झिड़कने के वह अस्पताल के कड़े कानूनों को बताने लगी थी। वे बीमारी से कहीं ज्यादा डराने वाले थे।

मेरे आगे-आगे चलता हुआ प्रकाश अचानक तेजी के साथ बायीं ओर के दरवाजे की तरफ मुड़ गया तो लगे हाथ तेज कदमों से मैं भी उसके और अपने बीच की दूरी पूरी करते हुए लगभग समानान्तर हो गया। भीतर घुसते ही दृश्य से एक झटका-सा लगा। वहाँ लाल कम्बलों के नीचे अपनी बीमार देहों को ढाँप कर इतने सारे लोग लेटे हुए थे, जैसे कि वे जीवन नहीं, बल्कि अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं और जो उन्हें पता नहीं कब से तिल-तिल कर तरसा रही है। लगभग हरेक पलंग के सिरहाने लोहे के सफेद पुते स्टैण्ड पर वैसी ही बोतलें लटक रही थी, जो खाली होने के बाद बाहर अस्पताल के अहाते में ढेर बन कर नीम के दरख्त के नीचे पड़ी हुई थी। मैं अपनी निगाहों से जल्दी से जल्दी से खोज लेना चाहता था कि कफन के रंग के कौन से लाल कम्बल के नीचे मेरे पिता हैं, जो बहुत गंभीर हालत में है।

अचानक प्रकाश कोने के बीस नम्बर के पलंग के सामने जाकर ठिठक गया, जो खाली था। उस पर बिछे बिस्तर को समेट कर घड़ी कर दिया गया था। प्रकाश ने प्रश्नाकुल चेहरों से चारों तरफ देखा। आकुलता के पीछे वहाँ उसकी आँखों में एक अजीब-सी उलझन भी थी, जो छुप नहीं पा रही थी।

मैं क्षण भर के लिए भयभीत हो उठा। यदि पिता यहाँ भर्ती थे तो फिर कहाँ गये? और ये बिस्तर लपेट कर घड़ी क्यों कर दिया गया है? भीतर कहीं कोई बेकाबू होती हुई चीख थी, जो बाहर आने की हुई। मेरा गला एक अज्ञात भय से अवरूद्ध-सा हो गया और जैसे मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा पूरे दृश्य का एक हिस्सा भर बन गया हूँ।

प्रकाश ने आसपास के पलंग के मरीजों और उनके तीमारदारों से कुछ पूछने की कोशिश की, लेकिन शायद उसे कोई संतोषदायक उत्तर नहीं मिल रहा था। इसलिए वह आगे बढ़ा और सामने का दरवाजा पार करके दूसरे एक हालनुमा कमरे में घुस गया।

तभी अचानक मेरी नजर पड़ गयी। सामने माँ थी। उसने पिता की पुरानी धोतियों को रंग कर बनाया गया लुगड़ा पहन रखा था। उसके पाँवों के पास एक बड़ा-सा पोटला पड़ा था, जिसकी लाल छींट के रंग को ही देखकर मैं पहचान गया कि यह वही पोटला है, जिसे किसी ने कुछ देर पहले दरवाजे से बाहर फेंक दिया था। मैं समझ गया उसमें निश्चय ही माँ आटा-दाल, नमक-मिर्ची.... जैसी खाना पकाने सम्बन्धी चीजें बांध कर लायी होगी। चूंकि, इसके पूर्व जब वह पहली दफा मेरे पास आयी थी तो ऐसे ही सामान के साथ आयी थी। और अकेली ही आयी थी। पिताजी पता नहीं तब किन कारणों से माँ के साथ नहीं आये थे। हो सकता हो, बड़े ताऊजी की किसी कटाक्षपूर्ण मारक टिप्पणी की ही कोई घातक पृष्ठभूमि रही हो जिसने कोई अज्ञात प्रतिज्ञा पैदा कर दी हो, मुझसे न मिलने के लिए। क्योंकि, बाद में माँ ने ही बताया था कि पिताजी को ताऊजी ने यह बात अच्छी तरह गले बैठा दी है, कि मुझे पढ़ाई के लिए जिला स्कूल भेजने का निर्णय गलत है। एक दिन हाड़्या खा के माफी मांगेंगे।

वह इस समय दूर खिड़की से बाहर पता नहीं क्या देख रही थी। माँ का चेहरा देख कर लगा, जैसे दुःख और अपमान झेलती स्त्री का कहीं कोई संचित और शाश्वत प्रारूप है, ईश्वर के पास, जिसमें उसने माँ का नाम भर कर उसे इस संसार में भेज दिया। माँ के चेहरे की वे बाहर देखती आँखें अपने दुर्भाग्य को व्यक्त करती आँखें थीं, जिसमें पीड़ा और प्रश्न भी थे, जिनके उत्तर खोज पाने वाली मेरी उम्र अभी ठीक से नहीं आयी थी।

मैं प्रकाश के पीछ पीछे जाने का इरादा छोड़कर सीधा माँ के पास पहुँच गया। मुझे लगा कि मेरी आँखों से आँखें मिलते ही वह फूट-फूट कर रो पड़ेगी। मैंने झुक कर पैर छूने की मुद्रा बनायी ही थी कि उसने रोक लिया और मेरे सिर और चेहरे पर हाथ फिराने लगी। माँ हाथ फेरते हुए ऐसी जान पड़ रही थी, जैसे उसकी याददाश्त में दर्ज अपने बेटे की कहीं कोई शिनाख्त है, जिसकी वह अपनी अंगुलियों के जरिये केवल तसल्ली कर रही है। शायद यह उसका ममत्व था।

“पिता जी कहाँ है?” मेरी आवाज भय से भरभचक और थरथरायी हुई थी। मुझे देख कर मेरे प्रश्न का उत्तर देने की प्राथमिकता को छोड़ कर माँ पहले मुस्करायी। वह एक धीमी, कमजोर और मटमैली मुस्कान थी, जो मुझ से नजर मिलते ही सहसा फैली तो सही पर चेहरे के चप्पे-चप्पे पर नहीं फैल पायी। मुस्कान के आखिरी कोने पर साफ-साफ और पहचानी जाने वाली व्यथा लटक रही थी।

“तू डरे मत रे, घबराणे की बात बिल्कुलज नी है। अस्पताळ आया और थोड़ीक देर बाद ही पलंग मिळी गयो। तभी संजोग से यो परकास भइयो दिखी गयो तो म्हने ई के कही दी कि ई थारे खबर करी दे। पर भोत भलो है यो थारो दोस्त। इनी ने तो ज भर्ती करवाया और दवई भी खुदज लई दी- अब सब ठीक हुई जायगा।” माँ ने अपने स्तर पर उत्तर और आवाज को इतना सहज और समाधानों से ऐसो भर दिया जो शायद मेरे लिये ही था कि मैं चिन्ता मुक्त रहूँ। “बड़ा डाक्टर साब “रौण्ड” पर आया है, ई का वास्ते वहाँ “नरस बई” कोई के भीतरे जाने नी दी रई है।”

मैं थोड़ा-सा संभलने को हो आया। शायद, यह किंचित, माँ की चिंता रहित ममतालु-सी पुरानी आवाज का ही असर था। लेकिन, भीतर, विज्ञान-विषय पढ़ रहे लड़के के लिए यह कोई प्रामाणिक तसल्ली देने वाली सूचना का आधार नहीं बन सकती थी। पलंग मिल जाने भर की सूचना पिता के ठीक हो जाने की संभावना को गारंटी मान लेने वाली माँ को लेकर मेरा मन भीतर तक एक अदीप्त-सी व्यथा से भर गया। हो सकता हो, उसका यह कथन मुझ से कहीं ज्यादा स्वयं के साहस को ही खड़ा करने का आधार हो। जबकि मैं पिताजी की हालत को अपनी आँख से स्वयं ही देख लेना चाहता था। लेकिन, पता नहीं क्यों दोनों वार्डों को जोड़ने वाला दरवाजा उढ़का दिया गया था।

“जद हम थारा दायजी के गाँव से देवास के वास्ते ली ने चल्या तो चौघड़ियो ज लाभ को थो-उणके कंई नी होयगा। तू काय बल्ले घबराय? मत फिकर कर रे। “ मैंने मार्क किया माँ ने आवाज में और अधिक निर्भयता भर ली थी। इसके बाद उसने विस्तार में जाते हुए बताना शुरू किया कि वैद्यजी ने जैसे ही दवा की बस एक खुराक दी तो पिताजी ने तुरन्त आँखें खोल ली थीं और पिताजी को उन्होंने कहा था, “आनंदी भाई, ये सब भाभी की पुण्यई ही है कि तुम बच गये हो। समझ लो बस कि वही आड़े आ गयी। वर्ना तब तो चौघड़िया ही काल का चल रहा था। उसके बाद उन्होंने दुर्गा माँ के चरणों में से लाल फूल उठा कर दिया और कहा कि बस इसको अपने सिरहाने रख लेना। बस समझ लो कि ये ही तुम्हारी रक्षा करेगा। इसे देवी-दुर्गा का दिया कवच मान लेना। अब्भी ये भाभी जरूर गीली आँखों से जा रही है, लेकिन देखना ये हँसते होठों से लौटेगी। समझे?"

मैं बेचैन हो रहा था कि दरवाजा बंद है और मैं अस्पताल में होकर भी पिताजी के पास नहीं पहुँच पा रहा हूँ। मैं माँ के पास खड़ा हुआ माँ की बातों में आते रहे उन पुराने ढेरों हवालों से घिर गया, जो जिन्दा लोगों के थे। जिनमें पाप का फल भोगते लोग थे। और पुण्यों का प्रताप प्राप्त लोग भी थे। पुण्यों की किस्में अलग थीं, जिसमें घर के पड़ोस में मंदिर का होना, थोड़ी दूर पर ही नदी का घाट का होना और निर्जला एकादशी और प्रदोष के उपवास को एक साथ निभा ले जाने की कुव्वत भी। यहाँ तक कि अधिकमास में कड़ाके की सर्दी में पूरे माह सुबह पाँच बजे उठकर ठण्डे पानी से नहा लेने की शक्ति भी किसी पुराने पुण्य का ही प्रताप थी। और यह भी किसी प्रारब्ध का ही फल था कि पिताजी बच गए हैं।

तभी बीच का दरवाजा खुला और उसमें प्रकाश बाहर निकल आया। बोला “अंदर आ जा! डॉक्टर अटैण्डेण्ट को बुलवा रहे हैं। पिताजी को अंदर इस सर्जिकल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है।”

मेरी जैसे साँस में साँस लौट आयी हो। मैं माँ को वहीं छोड़ कर लगभग लपकता सा अंदर दाखिल हो गया।
मैंने देखा पिताजी की अतुलित बलधामा वाली भारी भरकम देह लोहे के पलंग के सिरहाने से पैताने तक चित्त लिटायी हुई थी। दाहिने हाथ में ग्लूकोज की बोतल से जुड़ी सीरींज लगी हुई थी, जिससे बूंद-बूंद द्रव उनके भीतर जा रहा था। पलंग से बंधी मजबूत प्लास्टिक की एक पारदर्शी थैली लटक रही थी, जो निश्चय ही पेशाब को इकट्ठा करने के लिए होगी। दायें गाल पर सफेद पट्टी लगा दी गई थी और डॉक्टर झुक कर कान में लगे अपने आले से उनके सीने की जाँच कर रहा था। जाँच के बाद वह ज्यों ही सीधा खड़ा हुआ तो मेरी तरफ देख कर बोला, “तो आप इनके साथ हैं?” मैंने हामी में सिर हिलाकर उसकी अगली टिप्पणी को सुनने के लिए अपने समूचे वजूद को कानों में एकत्र कर लिया। वैसे खामोशी अपनी पूरी निर्ममता के साथ समूचे वार्ड पर कब्जा किये हुए थी। अलबत्ता, वहाँ उसका ही चारों-ओर स्वामित्व था। शायद, यह वही खामोशी होगी, जो अक्सर अस्पताल के बड़े डॉक्टर के वार्ड में आने के पहले से ही अपना वर्चस्व कायम कर लेती होगी। उस खामोशी में डॉक्टर की भारी आवाज एकदम फैसलाकुन जान पड़ती थी। डॉक्टर ने कहा, “फिलहाल ये डीप-सेडेशन में हैं, लेकिन लकीली इनकी जनरल कण्डीशन ठीक है, फिर भी छत्तीस घण्टे के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।” मैंने कुछेक इंजेक्शन लिखे हैं, बाहर से मंगवा लीजिएगा। चलने की मुद्रा बनाते हुए उसने आखिरी टिप्पणी अंग्रेजी में की। पेशेंण्ट इज यट नॉट आऊट आफ डेंजर! मैं सोचने लगा जीवन की संभावना और मृत्यु की आशंका के बीच के वक्त का आँकड़ा हरदम छत्तीस का ही क्यों होता है?

डॉक्टर चल कर अगले पलंग पर लेटे मरीज की जानकारी लेने के लिए बढ़ गये थे। मैंने प्रकाश की तरफ देखा। उसकी आँखों में दोस्तों के द्वारा दिये जाने वाले दिलासे की एक गाढ़ी भाषा थी, जिसकी लिपि सिर्फ वे लोग ही पढ़ पाते हैं, जो दोस्ती में सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार रहते हैं।

“दवाइयों का बंदोबस्त मैं और किये देता हूँ। ताजा पर्चा मैने नर्स से ले लिया है। अभी छह बजे मुझे एक ट्यूशन लेने के लिए पहुँचना है। तू फिकर मत कर यार।” प्रकाश ने कहा तो, मुझे लगा, उसके पास उम्मीदों के ढेरों रफ ड्राफ्ट्स है, जिन्हें वह हमेशा से ही मुझे थमा देता है और मैं धीरे-धीरे उसे फेयर करने में लग जाता हूँ। प्रकाश पहले एक दवाई की दुकान पर काम करता था। उसी की वजह से उसने शायद दवाइयों का बंदोबस्त कर दिया था। उसी दुकान से वह दवाई कम्पनियों के मेडिकल-रिप्रेज़ेण्टेटिव द्वारा दिया गया, लिट्रेचर उठा लाता था, जिसे मैं यही सोच कर ब़ड़े मनोयोग से पढ़ता रहता था कि भविष्य में डॉक्टर बनने का स्वप्न संजोने वाले छात्र के लिए अभी से इनका अध्ययन जरूरी है।

“अच्छा अब मैं चलता हूँ। और माँ को अंदर भेजता हूँ। तू यहीं ठहर।” उसने कहा और मेरा कंधा थपथपाकर तेज कदमों से वार्ड को पार कर गया। मैंने फिर से पलंग पर लेटे पिता की तरफ देखा।

लगभग दो बरस के एक लम्बे अर्से के बाद मैं पिता को देख रहा था, वे दर्द निवारक दवाइयों के गहरे असर में थे। मैंने देखा, इतने दिनों में उनकी कनपटियों के आसपास के बाल सफेद हो गये थे। शायद वे दुःख में ही हुए होंगे और वार्ड की सफेद रोशनी में चमक रहे हैं। मैंने सोचा, चमक बाल की नहीं, शायद दुःख की है। मेरी आँखें चुंधियाने लगीं। चुंधियाते हुए झिलमिलाने को होने आयीं।

दरअसल, जब मैं पढ़ने के लिए गाँव से देवास आ रहा था, तो पिता जी को पता नहीं था कि मैं एक अज्ञात अवधि के लिए गाँव छोड़ रहा हूँ। माँ ने उस रोज ऐन भुनसारे से उठ कर दूध में आटा गूंथ कर रोटियाँ और मैथी की सूखी साग बनाकर अपनी पुरानी साड़ी के टुकड़े में बांध दी थी और वह मुझे अकेली गाँव की आखिरी सीमा, जहाँ से कांकड़ शुरू होता था, छोड़ने आयी थी। घर का कोई भी आदमी नहीं आया था। विदा देने के पहले माँ ने अपने आँचल में से निकाल कर एक मोटे सफेद लट्ठे की हाथ से सिल कर बनायी गयी छोटी-सी पुट्टल मुझे थमायी थी, जिसमें उसके द्वारा पिताजी की नजर से बचा-बचाकर धीरे-धीरे जमा किये गये रूपये थे। माँ ने वह पुट्टल सौंपते हुए कहा था, “ बेटा, खूब मन लगई ने भणजे और तभी इना घर में आजे, जदे तू बैठो-बैठो कलदार से कागला उड़ई सकणे वालो होई जाय।”

मुझे लगा था, बस अगले ही क्षण में माँ रो पड़ेगी, लेकिन उसकी आवाज में कहीं कोई कमजोर करने वाली कारूणिकता नहीं थी। और मेरे लिये तो वह आवाज नहीं थी, बस जैसे आकाश की तरफ ऊँचा और तन कर खड़ा किसी दरख्त का कोई तना है, जिसके सहारे मैं मनचाही ऊँचाइयाँ नाप सकता हूँ। चलते समय आखिरी बार उसने एक ही वाक्य कहा था, “मरद को सपनो आक्खो अकास, अने डरी जावे तो जीणो भंकास! तू डर जे मत बेटा! काठी छाती राखजे।”

मैंने माँ के पैर छुए थे और चलते हुए सोचता रहा था कि जिन कौव्वों को सिर्फ ताली बजा कर उड़ाया जा सकता है, क्या डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद वाकई मेरे पास इतना पैसा हो सकेगा कि अपनी काँव-काँव से परेशान करते कौव्वों को कंकड़ के बजाय कलदार रूपया फेंक कर भगा सकूंगा? थोड़ी देर के लिए इस पर सोचते हुए मैं उदास हो आया था। ऐसी बातें साकार होने में कितनी-कितनी सदियाँ लग जायेंगी।

कांकड़ पार करने के बाद जब पूरब से थोड़ी रोशनी फूटने लगी थी, तो मैंने वह पुट्टल खोल कर देखी थी, उसमें खजूर छाप नोटों की एक गड्डी-सी ही थी। जीवन में पहली बार मैं अपने हाथों में सौ-सौ के इतने सारे नोट पकड़ रहा था। उस क्षण में पहली बार पूरब से फूटती रोशनी इतनी सुनहरी लगी थी। मैं डर से माथ छेक भर गया था कि यदि बीच रास्ते में मुझे कहीं कंजर मिल गये तो सब कुछ छीन लेंगे। कंजरों के डेरे रास्ते में ही पड़ते थे, इसलिए रास्ते भर जो भी आदमी मिलता रहा, मैं उसको खुद आगे रह कर बहुत विनम्रता के साथ अपनापे के स्वर में राम-राम करता रहा था। अपने चेहरे से बहुत खूंखार से लगने वाले एक बिना ओळखाण वाले आदमी को तो मैंने कहा था “पांय लागी काका! मुझे आज भी याद है, मेरे द्वारा काका सम्बोधन ने उस आदमी के चेहरे की कठोरता को छीन लिया था।

“आहऽऽ!” तभी एक कराह उठी। कराह में भी पिताजी की उसी पाटदार आवाज की एक गहराई थी। वही गहराई, जिसमें मैं जब छोटा था तो निश्चिन्त होकर छुप जाता था। जैसे वह कोई कवच हो। तभी पीछे से लाख की चूड़ियों की आवाज आयीं। माँ थी और वह वार्ड को पार करती हुई, पिताजी के पलंग की ओर ही आ रही थी। शायद बड़े डॉक्टर के जाते ही वार्ड में मरीजों के तीमारदारों का अंदर आने की अनुमति दे दी गई थी। माँ के आने में एक उतावली थी, जिसका पता पास आते उसके कदमों से नहीं, उसके हाथों के चूड़े की खनक से लगा था। बचपन में माँ के हाथ की चूड़ियाँ भी बहुत अजीब थीं। माँ लाड़ करती तो जैसे वे कलाइयों में चहक-चहक कर माँ का प्यार बतातीं, मारती तो उसकी झल्लाहट बताती। उनकी खनक में जैसे कोई लिपि हो। हम बच्चे उसको तभी पढ़ लेते थे, जब हमें लिपि लिखना और पढ़ना दोनों नहीं आता था।

“म्हने कही थी नी! उणके कंई नी हुओ है। सवेर तक तो ई ठीकज हुई जायगा और सांझ तक अपणे डाक्तर छुट्टी दई देगा।” माँ ने पिताजी के पलंग के निकट आकर कहा तो मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा। मुझे लगा, कुछ चेहरों की बनावट में ही ऐसी गुंजाइशें होती हैं, जहाँ बहुत सरलता से कुछ भी छुपाया जा सकता है। माँ के चेहरे के चप्पे-चप्पे में ऐसी ढेरों गुंजाइशें थीं। छुपाने की। खासकर दुख को। लेकिन, बावजूद इसके दुःख का कोई न कोई हिस्सा उसकी आँखों से दिख जाता है। मैंने माँ के भीतर की दहशत को पहचान लिया था, जिसे उसने भाषा की सहजता के पीछे छुपाने की कोशिश की थी। लाख के चूड़े से कोहनी से बस कुछ नीचे तक भरे हाथ मुझे डराने लगे।

[अगले अंक में जारी]

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