काव्य: रंजना शरण सिन्हा (नागपुर)

रंजना शरण सिन्हा
वह चली गई
जीवन की यात्रा में
एक अनजाना -सा प्रदेश
लाल दहकते गुलमोहर
जमीन पर बिखर जाते हैं -
शरत का मौन एहसास

पृथ्वी के बदलते
साल और महीने
मुझे क्षुब्ध कर देते हैं
बीते दिनों की यादें
तेज हवा के झोंके बन
मन में सागर की
शांत पड़ी लहरों को
उद्वेलित कर देती हैं:
एक गहरा विषाद
जन्म ले लेता है

निरंतर बदलते
चेहरे और शरीर के पीछे
 दूर होता हुआ
अपना वजूद तलाशती हूँ --
एक सुंदर और जीवंत काया
मेरे सामने खड़ी हो जाती है

उसकी बाँहों में बाँहें डाल
कुछ दूर और चलना चाहती हूँ
पर वह रुकती ही नहीं-
तेज़ कदमों से चलती हुई
आँखों से ओझल हो जाती है
मैं कल की बारिश में भींगे
पत्थरों के ढेर की तरह
महसूस करती हूँ --
आह! वह सोंधी-सी खुशबू
अभी भी बनी हुई है

मेरे बीते हुए दिन
पीले-भूरे चमकदार शैम्पेन की तरह
बढ़ती उम्र के प्याले में
जादुई बुलबुलों से
फुसफुसाकर कुछ कहते हैं
     ************

मौन समुद्र-तट

जीवन के अंतहीन जुलूस के बीच
कभी-कभी दिल के किसी कोने में
एक गुनगुनाहट का एहसास होता है
सुंदर लहज़ा
बारिश में भीगे पत्तों से होकर
गुजरती हुई सुहानी हवा की
सरसराहटों की तरह
मुझे छू जाता है
भीगे, अधूरे शब्द
कस्तूरी-गंध की तरह
ठहर जाते हैं

कौतूहल और सम्मोहन से वशीभूत होकर
यादों के जंगलों को काटती हूँ
दुनिया-भर के चेहरे और आकृतियाँ
मुझे घेर लेती हैं
ओह! इन जाने-अनजाने
चेहरों के समुद्र से मैं
बाहर आना चाहती हूँ

अचानक एक अनजान चेहरा
पहचाना-सा लगता है--
गहन, असाधारण!
भावनाओं के उतार -चढा़व के बीच
समय के ज़िद्दी पैर रुक जाते हैं

विचारों में लीन
शांतचित्त सुनती हूँ
सागर-तट से टकराती
लहरों की आवाज़ --
नीलम सा पानी
लगातार हिलोरें मारता है

लहरों का कोमल स्पर्श
अभिभूत कर देता है
आकाश की ओर देखती हूँ
गोधूलि का थका सूरज
क्षितिज की ओर
कदम बढ़ा रहा है--
लहरों के नीलेपन में सहसा
शाम का साँवलापन
छलकने लगता है

एक पल को ठहरा समय
उड़ान भरता है
खुशबू की परिधि में
सुख-दु:ख, आशा-निराशा
सभी,
प्रेम और पश्चाताप के
गहरे गोदने बन
हृदय के सागर -तट पर
अमिट हो जाते हैं
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