राष्ट्रपिता और राष्ट्रभाषा

शकुन्तला बहादुर

- शकुन्तला बहादुर


राष्ट्रपिता गाँधी जी के अनुसार कोई भी  स्वतन्त्र राष्ट्र  राष्ट्रभाषा के बिना गूँगा है। भारत जैसे स्वतन्त्र राष्ट्र के लिये भी राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के साथ ही राष्ट्रभाषा भी अत्यन्त आवश्यक है, जो राष्ट्रीयता की भावना के साथ ही राष्ट्र को गौरव भी प्रदान करती है। कतिपय ऐसी घटनाएँ हैं, जो  इस सन्दर्भ में बापू के विचारों को स्पष्टरूप से उजागर करती हैं।

यह घटना सेवाग्राम की है। वर्ष 1938 में एक बार "स्काउट्स परेड" के बाद बापू को ध्वजारोहण करना था। झंडे  को फहराते हुए उन्होंने देखा कि झंडे के प्रतीक के साथ अंग्रेज़ी में कुछ लिखा हुआ है। यह देख उनको गहरा दुःख हुआ। अतः उसी समय विरोध प्रगट करते हुए बापू बोले, "ये मेरी समझ से परे की चीज़ है कि स्काउटों के इस झंडे में प्रतीक को अंग्रेज़ी भाषा में क्यों लिखा गया है? अंग्रेज़ी भाषा ने हमारे दिलो-दिमाग़ पर ऐसा क़ाबू पा लिया है कि हम अपने झंडे के मामले में भी उसके बिना काम नहीं चला सकते। ये यदि हिन्दी में लिखा जाता, तो क्या उसका महत्त्व कम हो जाता? मुझे पता होता कि  झंडे पर अंग्रेज़ी में लिखा गया है, तो मैं इस समारोह में भाग ही नहीं लेता। मेरी बात यदि समझ में आ गयी हो, तो अभी भी भूल सुधरवा लो और उसे हिन्दी मे लिखवा लो।"  तब उनकी बात से सभा में सन्नाटा छा गया था।

एक बार वॉयसराय की सभा में उनको बोलना था, तो उन्होंने हिन्दी / हिन्दुस्तानी में बोलने की इजाज़त माँगी। इजाज़त मिलने पर हिन्दी में बोलने के लिये लोगों ने उन्हें "धन्यवाद" दिया, क्योंकि वॉयसराय की सभा में यह पहला उदाहरण था। इस पर गाँधी जी ने कहा, "मेरे लिये ये फ़क्र (गर्व) की नहीं, दुःख और शर्म की बात है। मैं "धन्यवाद" और "पहिले उदाहरण" की बात से दुःखी हुआ और शर्मिन्दा भी। अपने ही देश में, अपने देश से सम्बन्ध रखने वाली सभा में देश की भाषा का बहिष्कार  अथवा उसकी अवमानना (तिरस्कार) कितने दुःख की बात है? और मेरे जैसा कोई हिन्दुस्तानी में एक दो वाक्य बोले, तो उसमें "धन्यवाद" किस बात का? ऐसे प्रसंग तो हमारी गिरी हुई दशा को बताने वाले हैं।"

गाँधी जी ने लिखा है, "दक्षिण अफ़्रीका में मेरे और मेरे  मित्र पोलक  के बीच इस बात पर कितनी ही बार गरमागरम बहस हुई कि भारतीय बच्चों की शिक्षा वहाँ  अंग्रेज़ी में हो या कि भारतीय भाषा में? भाषा के प्रति उनका दृष्टिकोण सांस्कृतिक था। बापू के विचार से  "बालक जिस समुदाय का है, उसी की भाषा में शिक्षा पाने से अपनी संस्कृति के साथ उसका सम्बन्ध मज़बूत होता है। अपनी भाषा के प्रयोग से उसमें  आत्मगौरव, स्वाभिमान और देश-प्रेम की भावना जागती है।"  मातृभाषा का  स्थान  उनके लिये सर्वोपरि था, इसीलिये उनका अधिकांश महत्त्वपूर्ण लेखन गुजराती में ही था और बाद में उसका अनुवाद हिन्दी, अंग्रेज़ी  तथा  अन्य भाषाओं में किया गया था।

मातृभाषा के बाद वे राष्ट्रभाषा को महत्त्व देते थे। हिन्दी ही राष्ट्रभाषा बन सकती है- इसका उल्लेख  बापू अवसर पाते ही करते थे। "हिन्दी / हिन्दुस्तानी बहुसंख्यक भारतीयों के द्वारा समझी और बोली जाती है। उत्तर में बद्री-केदार से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में जगन्नाथपुरी से पश्चिम में द्वारका तक हिन्दी का विस्तार है। तीर्थयात्रियों  और पर्यटकों (टूरिस्ट) के आवागमन से हिन्दी जनभाषा हो गयी है।"

उनके लिये यह अत्यन्त दुःख की बात थी कि " हम स्वराज्य की बात भी अंग्रेज़ी में करते हैं। ये तो ग़ुलामी की हद हो गयी कि अपने देश में मुझे इंसाफ़ पाना हो तो मुझे अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग करना होगा। बैरिस्टर होकर भी मैं हिन्दी में नहीं बोल सकता।" हर एक पढ़े लिखे हिन्दुस्तानी को अपनी मातृभाषा और हिन्दी का ज्ञान अवश्य होना चाहिये।उनको सभी भारतीय भाषाओं से प्यार था। वे सभी का सम्मान करते थे। उनका संदेश था कि बालक जब कुछ पुख़्ता उम्र (mature) का  हो जाए, तो भले ही उसे अंग्रेज़ी या दूसरी भाषाएँ सिखाई जाएँ। दक्षिण भारत में सभी अनिवार्य रूप से हिन्दी सीखें  और  इसी प्रकार से उत्तर भारत में सभी के  लिये एक दक्षिण-भारतीय भाषा  अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाए।

बापू अंग्रेज़ी सीखने-सिखाने  के विरुद्ध नहीं थे, लेकिन उसका प्रयोग आवश्यकतानुसार सीमित हो। विदेशियों के साथ, विज्ञान अथवा साहित्य पढ़ने के लिये अथवा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ही हो - जिसका कोई विकल्प न हो। सांस्कृतिक ग़ुलामी के लिये नहीं। जब हमने परतन्त्र होने पर भिन्न लिपि वाली उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी जैसी विदेशी भाषाओं को शासन के ज़ोर से सीख लिया था, तो फिर स्वतन्त्र होकर हम अपनी  भाषा हिन्दी को क्यों नहीं सीख सकते?  बापू अंग्रेज़ी के शासन से भारतीय जनता की मुक्ति चाहते थे।

प्रवासी भारतीयों के नाम एक संदेश में उन्होंने लिखा था, "आप अपने शरीर, मन और  वचन  की पवित्रता  का ख़्याल रक्खें। आपसी बातचीत में हमेशा हिन्दी / हिन्दुस्तानी का इस्तेमाल करें। हिन्दी स्कूल और पुस्तकालय खोलें।"

सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि उनके ये विचार केवल उपदेश के लिये नहीं थे। उन्होंने अपने जीवन में इन्हें उतारा भी था। उनकी सभाओं में, जहाँ भारत के कोने कोने से हज़ारों की संख्या में लोग उनका प्रवचन सुनने आते थे, बापू ने सदा हिन्दी/ हिन्दुस्तानी  का ही प्रयोग किया था। भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम में  विभिन्न भाषा-भाषी  भारतीयों को एकमात्र हिन्दी के द्वारा ही संगठित किया गया था। आइये, आज से हम भी राष्ट्रपिता के राष्ट्रभाषा सम्बन्धी आदर्शों को अपने जीवन में उतार लें। क्या हमारे लिये यह सुखद नहीं होगा कि आज से आपसी बातचीत में हम स्वदेश के लिये  'इंडिया' के स्थान पर गर्व से 'भारत' नाम का प्रयोग करें।
                           हों स्वदेश में या विदेश में,
                                  दृढ़-संकल्प सदा हो मन में।
                                       भारतवासी मिलें जहाँ भी,
                                            संभाषण हिन्दी में ही हो।
                                                  हिन्दी तेरी सदा विजय हो।।

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