पुस्तक समीक्षा: नव अर्श के पाँखी

ताज़गीभरी उड़ान की कवितायें  

समीक्षक: प्रभुदयाल मिश्र
35, ईडन गार्डन, चूनाभट्टी, कोलार रोड 16 (+91 9425079072)

कृति: नव अर्श के पाँखी
कवयित्री: अनुपमा श्रीवास्तव ‘अनुश्री’
प्रकाशक: संदर्भ प्रकाशन, भोपाल
मूल्य: ₹ 250.00 रुपए


अनुपमा श्रीवास्तव ‘अनुश्री’ के कविता संग्रह ‘नव अर्श के पांखी’ के आकाश में उड़ते हुये एक पाठक को तब तक अपनी गति और दिशा का पता पाना कठिन लगेगा जब तक वह इस संग्रह के शीर्षक की कविता के इस अंश को नहीं पढ़ लेता है-
‘मैं आत्मा, किसी बंधन में नहीं
दूर आसमां में मेरी परवाज़
अपनी गति से गतिमान
सबसे जुदा अपना अंदाज़।’ (पृष्ठ 122)

अनुपमा 'अनुश्री'
अब यह अनुमान आसानी से किया जा सकता है कि अपनी गति और अपने पैमाने से उड़ने वाले किसी आकाशचर को किसी नपी-तुली बंधी-बंधाई गति से असीम चढ़ाई पार करना कठिन ही है । चूंकि इस संग्रह की करीब 90 कविताओं को किसी यात्रा के पग या एक चढ़ान की सीढियाँ मानकर चलने में समस्या आ सकती है अत: अनुश्री ने इस श्रंखला के छ: प्रकोष्ठ- खोज, नारी अस्मिता, प्रकृति, मातृ भाषा, आदमी और नव अर्श के पांखी बना दिये हैं जिनमें पाठक अपनी पसंदगी के मुताबिक निश्चित ही कुछ देर ठहर सकता हैं ।

यह स्वाभाविक है की एक रचनाकार विविध मन:स्थितियों और भावधाराओं से गुजरते हुये अलग-अलग कोटि और भूमिकाओं की रचनाएँ लिखता है । अत: इन्हें पुस्तकाकार देते हुये यह वह प्राय: किसी विशिष्ट भूमिका और भाव को केंद्र में रखकर  चलता है । ऐसा करने में वाधा के रूप में दो दबाव प्राय: काम करते हैं – पहला यह कि एक पुस्तक के आकार के लिए अपनी अधिकतम रचनाओं का संग्रहण और दूसरे अपनी रचना धारा की किसी भी लहर को रचनाकार को अस्वीकृत कर छोड़ पाना कठिन जाता है । ऐसे में इसमें गहरी आत्मानुभूति के साथ ही साथ समकालिकता, तात्कालिकता और सामाजिकता की दखलंदाज़ी हो जाना स्वाभाविक हो जाता है ।
अपनी भूमिका में मैंने यह बात इसलिए लिख दी क्योंकि अनुश्री की रचना का केंद्रीय स्वर जहां गहन अंतश्चेतना है वहीं संग्रह की विशेष अवसरों लिखी कुछ कवितायें जैसे मातृत्व दिवस, नव वर्ष का आगमन, तो होली है आदि पाठक को उस गहरे बोध से प्रतिच्युत करती हैं जिसे लेकर वह उन्हें पढ़ना आरंभ करता है । एक ओर असुविधा भरा एहसास मेरा यह भी है कि कविता संग्रह पढ़ते हुये  किसी पाठक का अनुभव एक यात्री की भांति उसे अधिक दूर तक बांध चलता है । किन्तु जब संग्रह की प्रत्येक कविता दूसरी कविता से एकदम भिन्न भाव भूमिका को लेकर लिखी और संग्रहित हो, तो वह प्रत्येक कविता के बाद ठहर जाने को जैसे बाध्य हो जाता है और इस प्रकार उसे अपने रसास्वादन और पढ़ने के समग्र बोध संकलन में कठिनाई खड़ी हो जाती है ।
इसी बात को दूसरे शब्दों में मैं इस प्रकार कहूंगा कि अनुश्री की प्रत्येक कविता एक पृथक और परिपूर्ण संसार गढ़ने की क्षमता रखती है । एक कविता की यह निरपेक्षता उसे अनुभव की उस संपूर्णता में पहुंचा देती है जो बहुत बड़े जीवन चेताओं की सिद्धि का पर्याय हुआ करती है । अत: मेरे पूर्व कथन को मात्र एक आलोचना ही न मानकर संग्रह की सभी कविताओं को पढ़ने के भी लिए एक आवश्यक भूमिका माना जाना चाहिए । 

एक जागृत कवि की सही पहचान उसके आत्मावलोकन से ही की जा सकती है । अनुश्री को अपने भीतर झाँकने की चेष्टा करते लगातार देखा जा सकता है ।

‘अस्तित्व’ (पृष्ठ 15) कविता में कवयित्री धरती, आसमान, सूरज, किरण, हिमशिखर और मानवता आदि अनेक पड़ावों से गुजरकर जब आत्मसाक्षात्कार करती है तो वह शुद्ध वैदिक आध्यात्म- पूर्णमद: पूर्णमिदम्’ की अनुभूति में ही ठहरती है –
‘पूर्णत्व से प्रगट
पूर्णत्व में समाहित
सृष्टि के पुरातन
नवरूपों में झाँकता
मेरा अभिन्न अस्तित्व
कहीं भी अधूरा- अपूर्ण नहीं।’
              (पृष्ठ 16)

‘अपना देश’ कविता में इस कवयित्री का यह संदेश देश के भीतर और बाहर के सभी राष्ट्र प्रेमियों को सनातन भारतीय संस्कृति के शाश्वत-स्वर की वही प्रभावी अनुगूँज पहुंचाता है –
‘अंधानुकरण न करके हम क्यों न वो अपनाएँ
जो निर्मित करे हमारा सुनहरा कल
हम अपनी जड़ों से जुड़कर रहें अटल
मोती चुने हंस की तरह न करें व्यर्थ नकल।’
                         (पृष्ठ 90)

प्रत्येक रचना कार्य एक रचनाकार की परमधर्मिता है । इस परम प्रस्थान में प्रवृत्त होते हुये भी उसकी अंतश्चेतना उसे आत्मानुशीलन में भी ले जाती है । उसके सामने इस प्रश्न का उत्तर खोजना भी जरूरी हो जाता है कि वह औरों के साथ ही साथ अपने आपका भी इस बात का समाधान करे कि वह आखिर लिखता क्यों है । इस कवयित्री का इस प्रश्न का नितांत अपना और एक सहज उत्तर है –
‘चहकती है कभी चिड़िया सी
गुनगुनाती है कविता
खुशबू सी बिखरती, लरजती
कभी शर्माती है कविता।’

और इससे भी महत्वपूर्ण है कवयित्री द्वारा सम्पूर्ण साहित्य में कविता की भूमिका और महत्वपूर्ण स्थान का निर्धारण –
‘साहित्य के भाल पर
सुबासित अबीर सी
इंद्रधनुषी रंगों से सजी
रसभरी गागर सी
झर-झर, उन्मुक्त
झरती है कविता।’
 (‘कविता’ कविता से पृष्ठ 132-133)

भाषा की दृष्टि से एक जिस विशेषता की ओर मेरा ध्यान गया वह कवयित्री द्वारा व्यापक बहुलता से प्रयोग किए गए उर्दू शब्द हैं । भाषागत बहुलता और भावगत विस्तार की व्यापकता की दृष्टि से यह उचित प्रतीत है । किसी भी स्फूर्त कृति में भाषायी आग्रह उचित नहीं कहा जा सकता, किन्तु प्रत्येक भाषायी प्रकृति प्रवाह और प्रेषणीयता की दृष्टि से एक रचना अपने निकट उपजे और पले बड़े शब्द संसार में विचरण अधिक स्वाभाविकता से करती है, यह विचारणीय है ।

अंत में मैं अपनी उस आरंभ की टिप्पणी को यहाँ उद्धृत करता हूँ जो मैंने पुस्तक को पढ़ना शुरू करते ही अनुश्री को भेजी थी, "नव अर्श के पांखी’ पढ़ना शुरू किया है । प्रसन्नता है । इतनी सावधानी और ताजगी नई किताबों, कविताओं  में प्राय: कम ही देखने को मिलती है ।... बधाई अग्रिम!"

1 comment :

  1. पुस्तक प्रकाशन पर अनुपमा जी को हार्दिक बधाई तथा निष्पक्ष बेबाक समीक्षा हेतु समीक्षक श्री प्रभूदयाल मिश्र जी को साधुवाद।

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