माधवराव सप्रे का नवजागरण कालीन सामाजिक चिंतन

नागेन्द्र प्रसाद सिंह पटेल

- नागेन्द्र प्रसाद सिंह पटेल

शोधार्थी, हैदराबाद विश्वविद्यालय
ईमेल: nagendrasingh9208@gmail.com
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माधवराव सप्रे की एक कहानी 'एक टोकरी भर मिट्टी’ पर तो हिंदी साहित्य में चर्चा होती है पर उनके द्वारा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखित लेखों के संकलन के अभाव में विद्वानों का ध्यान इनके साहित्य की ओर गया ही नहीं। हिंदी जगत को सप्रे जी के पूर्ण साहित्य से पहले-पहल परिचित कराने में देवी प्रसाद वर्मा जी का महत्वपूर्ण योगदान है। इनके द्वारा संपादित ग्रन्थ ‘माधवराव सप्रे: चुनी हुई रचनाएँ’ ने विद्वानों का ध्यान आकृष्ट किया, उसके बाद नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय के संपादन में ‘माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन’ और विजयदत्त श्रीधर द्वारा संपादित ‘माधवराव सप्रे रचना-संचयन’ आया। जिससे हिंदी जगत सप्रे जी के महत्वपूर्ण लेखन और उनके सामाजिक चिंतन से परिचित हुआ। सप्रे जी विभिन्न पत्रिकाओं में लेखन करने के साथ ही साथ स्वयं ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘हिंदी ग्रंथमाला’ और ‘हिंदी केशरी’ का संपादन किया। वे कर्मवीर के संपादक मंडल में मुख्य भूमिका में थे पर इन्होंने इस पत्रिका के संपादन का भार अपने शिष्य माखनलाल चतुर्वेदी को सौपा। सप्रे जी ने महत्वपूर्ण मराठी ग्रंथों का अनुवाद भी किया है जिनमें श्रीसमर्थ रामदासस्वामी कृत ‘दासबोध’ और बालगंगाधर तिलक के ‘गीतारहस्य’ तथा चिंतामणि विनायक वैद्य के ग्रन्थ (‘महाभारत मीमांसा’ नाम से) प्रमुख हैं। सप्रे जी के साहित्यिक और राष्ट्रीय अवदान के सम्मान में भारत सरकार ने भोपाल में ‘माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय’ का निर्माण करवाया है।

माधवराव सप्रे (19 जून 1871 - 23 अप्रैल 1926)
सप्रे जी विषय वस्तु के मामले में गंभीर हैं। किताब चाहे जिस प्रकाशन से छपी हो यह मायने नहीं रखती, मायने उसकी विषयवस्तु रखती है। अच्छे प्रकाशन से निकली किताब में भी यदि विषयवस्तु के तौर पर भद्दा मजाक किया गया है तो उसे वे कतई बर्दाश्त नहीं करते, उसका उत्तर देना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। ऐसी ही रिचर्ड की एक किताब ‘आक्सफोर्ड सर्वे आफ दी ब्रिटिश इम्पायर’ जो तत्कालीन समय के आक्सफोर्ड की नामचीन ‘फैरंडन प्रेस’ से निकली थी। सप्रे जी ने इस किताब की आलोचना करते हुए एक लेख ‘राजभक्ति की विलायती परिभाषा’ लिखा, जिसमें उन्होंने रिचर्ड के ‘राजभक्ति और देश द्रोह’ नामक अध्याय पर कड़ी आपत्ति दर्ज करायी। रिचर्ड ने उन लोगों को राजभक्त कहा है जो अपने देश में विदेशियों की तरह रहते हैं। उनमें भारत के रजवाड़े भी सम्मिलित हैं। भारत के रजवाड़ों के संबंध में सप्रे जी बस इतना लिखते हैं ‘यह हमें ज्ञान नहीं है कि कश्मीर, जयपुर और उदयपुर के महाराज कहाँ तक गृहस्थ हैं’ पर रिचर्ड का पारसियों को विदेशी कहना कि पारसी यहाँ विदेशी हैं और विदेशियों की तरह रहते हैं, असत्य है। सप्रे जी रिचर्ड की जानकारी पर ही सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं कि भारतीय कांग्रेस में अब तक सबसे अधिक अध्यक्ष किसी जाति ने दिया है तो वह पारसी हैं। यदि पारसी रिचर्ड की परिभाषा सुनेंगे तो रिचर्ड से घृणा करेंगे। सप्रे जी को ताज्जुब होता है कि रिचर्ड ने क्या दादा भाई नौरोजी और फिरोजशाह मेहता जैसे भारत के लोकप्रिय नेता का नाम न सुने थे?

 सप्रे जी अपने एक लेख ‘हमारे सामाजिक ह्रास के कारण’ में पाश्चात्य और भारतीय समाज की सामाजिक परिस्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर सामाजिक उन्नति के तीन कारण बताये हैं –

1. मनुष्य को स्वयं अपनी और अपने कुटुंब की रक्षा करने में समर्थ होना चाहिए।

2. सुख की वृद्धि करने और दुःख को दूर करने से मनुष्य की आयु बढ़ती है।

3. अपने कुटुम्ब और जाति की स्थिरता के लिए संतान की वृद्धि करना।


सप्रे जी ने सामाजिक ह्रास के कारणों को भी बताया है-

1. मस्तिष्क का अमर्यादित व्यय

2 . शहरों में रहने की प्रवृत्ति

3 . विदेशी शिक्षा बुद्धि स्वातंत्र्य।

सप्रे जी पूरे लेख में इन्हीं प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया है कि कैसे मस्तिष्क के अमर्यादित व्यय करने का हमारे समाज में होड़ सी मची हुई है? जिनके बाप-दादा ने एक किताब तक नहीं देखी वे आज अंग्रेजी शिक्षा और साहित्य पर एकाधिकार करने की प्रबल कोशिश कर रहे हैं। इससे छात्रों में आत्महत्या, शादी न करने जैसी प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है। सप्रे जी यह बताना भी नहीं भूले हैं कि इस शिक्षा से कुछ लोग बड़े-बड़े सरकारी ओहदे प्राप्त करने में सफल हुए हैं पर उनका क्या जो बड़ी मात्रा में असफल हो रहे हैं?

सप्रे जी ‘जैसा बाप वैसा बेटा’ कहावत को चुनौती देते हैं। वे यह नहीं मानते, अमूमन यह देखा गया है कि सफल बाप के बेटे की मानसिक स्थिति कमजोर ही रहती है। सप्रे जी ऐसे कई उदाहरणों की चर्चा करते हैं और कहते हैं कि आज जो भी बड़े-बड़े नौकरशाह, वकील हैं इनके बाप दादा कभी बहुत सामान्य रहे हैं। सप्रे जी शिक्षा सुधार पर लिखते हैं “ यह बात इतिहास प्रसिद्ध है कि जहाँ-जहाँ यूरोप वालों ने बस्ती की है वहाँ-वहाँ के मूल निवासी नष्ट हो गए हैं। इसमें संदेह नहीं कि इस सुधार और सभ्यता के प्रचार में उन लोगों का हेतु शुद्ध और प्रशंसनीय होता है, परन्तु परिणाम की ओर देखकर उन लोगों को भी आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता।”[1]

सामाजिक ह्रास के दूसरे कारणों का पड़ताल करते हुए सप्रे जी पहले यूरोपीय समाज की स्थिरता और उन्नति के नियमों का स्पष्ट विश्लेषण कर लेना आवश्यक समझते हैं। जहाँ वे पाते हैं कि यूरोप के समाज में विवाह बड़ी उम्र में करने का चलन है, वहाँ संतति उत्पन्न करने को महत्त्व कम दिया जाता है। वहीं गरीब किसान मजदूरों के यहाँ विवाह की प्रबल इच्छा देखी जाती है। इनके यहाँ संतान उत्पन्न करने को महत्त्व दिया जाता है, जिससे संतुलन बना रहता है। यूरोपीय समाज में शक्तिसंतुलन भी सदियों से इसी प्रकार होता आ रहा है जो परिवार कभी भूखा नंगा था बाद में सत्ता पर वही काबिज हुआ है और जो परिवार कभी सत्ता के केंद्र में था वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। सप्रे जी लिखते हैं, “यूरोप समाज की वृद्धि केले के पेड़ के समान है। उसकी जड़ से नये-नये कल्ले फूटते रहते हैं और पेड़ तैयार होकर फल देते हैं। पेड़ में फलों के जो गुच्छे या गहरें लगती हैं वे केवल परोपकार के काम आती हैं। वे बीज के काम की नहीं होती।”[2]

सामजिक ह्रास के कारणों का पड़ताल करते हुए सप्रे जी ने शहरों के विकास को प्रमुख कारण बताया है। गाँव में रहकर लोग खेतों और अन्य उद्योगों में शारीरिक श्रम कर वे एक स्वस्थ्य समाज की नींव रखते हैं। इसी नींव पर समाज की विभिन्न इमारतों का निर्माण होता है। इन्हीं इमारतों की चोटियों का (श्रेष्ठ वर्गों का) नाश हुआ करता है। जैसे जो संतति अधिक सामर्थ्यवान हुई वह शहरों की ओर चल पड़ी वहाँ वह अपनी योग्यता और श्रम से प्रतिष्ठित होता है, तब तक ये शारीरिक श्रम छोड़ चुके होते हैं। दो तीन पीढ़ी के बाद यह श्रेष्ठ परिवार नष्ट हो जाता है। सप्रे जी लिखते हैं “जो लोग देहात से बुद्धि और आरोग्य का संग्रह अपने साथ लेकर शहरों में आए उन लोगों ने अपनी पूर्वार्जित शक्ति की सहायता से शहरों में रहकर विद्या प्राप्त की बड़े-बड़े अधिकारों के पद पर आरूढ़ होकर बहुत सा द्रव्य भी उपार्जित किया। परन्तु ज्यों-ज्यों उनकी बुद्धि का विस्तार होता गया त्यों-त्यों उसका उथलापन भी बढ़ता गया। ... इस प्रकार देहाती जीवन में परिवर्तन हो जाने के कारण वहाँ की संपत्ति नष्ट हो गई और ऊँचे दर्जे के मस्तिष्क का उपयोग करने वालों के कुटुम्बों का भी नाश हो गया।”[3]

सप्रे जी विदेशी शिक्षा और बुद्धि स्वातंत्र्य को ललचाई निगाहों से देखने वाले भारतीय शिक्षित वर्ग को बताते हैं कि जो आपको लगता है कि वहाँ का धर्म उनके उन्नति के मार्ग में बाधक नहीं है जबकि हमारा धर्म है। कारण यह है कि उन्होंने अपने धर्म को आधुनिक रूप में विकसित करने में कई सौ साल लगा दिए। जबकि हम शिक्षित अपने धर्म या समाज को सुधारने के बजाय दूसरे धर्म में दीक्षित होकर अपने कर्तव्यों से भाग रहे हैं। यह काम पढ़ा लिखा नहीं करेगा तो कौन करेगा? सप्रे जी छात्रों के बीच में ईसाई धर्म के आकर्षक के एक और कारण को बताते हैं कि यदि छात्र इसाई धर्म अपना लेता है तो उन्हें सत्ता पक्ष से लाभ की आशा है पर इसका जो परिणाम होगा इस ओर भी सप्रे जी हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं “ऐसी अवस्था में हमारी केवल सामाजिक और औद्योगिक हानि ही न होगी, अपितु राष्ट्रीय हानि भी होने लगेगी। यह हानि हमीं लोगों को नहीं, किन्तु हमारे वंशजों को भी सहनी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त यूरोप निवासी हम लोगों को मूर्ख, अज्ञानी, असभ्य, क्रूर, भीरु, हठी, दुराग्रही आदि अपशब्दों में सदा संबोधन करते रहेंगे। हमारा शिक्षित समाज निंदनीय, उपहासास्पद और केवल अनुकम्पा के योग्य समझा जायेगा।”[4]

सप्रे जी पाश्चात्य शिक्षा के हिमायती हैं साथ ही भारतीय साहित्य और संस्कृति के भी। उन्हें अंग्रेजों की यह नीति कतई पसंद नहीं है कि भारतीय साहित्य को न पढ़ाया जाए। छात्रों को भारतीय साहित्य न पढ़ाने का परिणाम भारतीय समाज के लिए बहुत ही घातक है क्योंकि छात्रों को ऐसा लगने लगता है कि उसके समाज में ऐसा कुछ नहीं है, जिसपर गर्व किया जा सके; इसलिए वह अपने देश की संस्कृति और परम्परा से घृणा करने लगता है। सप्रे जी लिखते हैं “हम लोग हिंदुस्तान में रहते हुए भी अपने देश, समाज,धर्म, नीति,रहन –सहन,भाषा, कुटुंब-वात्सल्य, पूर्वज पूजा आदि के विषय में विदेशियों के समान विचार करने लग गए हैं। धर्मांतर न करने पर भी अपने धर्म पर हमारी श्रद्धा नहीं, जाति में रहकर भी हम लोग विजातीय से हो गए हैं। क्या यह हमारे समाज का भयंकर ह्रास नहीं है?”[5]

सप्रे जी सामाजिक ह्रास से बचने के उपाय कई समाजशास्त्री विद्वानों के यहाँ ढूढ़ते हैं। वे गायो नामक विद्वान् का एक लेख ‘शिक्षा और अनुवांशिक संस्कार’ का उदाहरण देते हैं जहाँ वे पाते हैं कि पिता का पैत्रिक कार्य उसके संततियों को नहीं करना चाहिए, इससे उस परिवार में कोई भी बुद्धिमान संतति पैदा नहीं होगी। अंत में उस परिवार का पतन हो जायेगा।

सप्रे जी का मानना है कि सामाजिक ह्रास से बचने के लिए शिक्षित लोगों को देहातों में बसना चाहिए और उचित शारीरिक श्रम करना चाहिए। सामाजिक ह्रास से बचने के लिए अपने अंत:करण की सात्विक मनोवृत्तियों का विकास करना चाहिए। स्त्रियों को उचित शिक्षा देना चाहिए, जिससे वे अपने बच्चों का लालन पालन ठीक ढंग से कर सके। वे स्त्रियों को ज्यादा शिक्षा देना और कामकाजी बनाना समाज के लिए अच्छा नहीं मानते।

सप्रे जी स्त्री शिक्षा के हिमायती हैं पर समाजशास्त्रीय दृष्टि से वे एक उन्नत समाज में माँ की अहम् भूमिका को मानते हैं। यदि माँ भी कामकाजी हुई तो एक स्वस्थ नागरिक राष्ट्र को न मिल पायेगा। सप्रे जी एक अमेरिकी विद्वान् क्लार्क का उद्धरण यों देते हैं “अमेरिका में स्त्री-शिक्षा का प्रचार इसी तरह और पचास वर्षों तक होता रहेगा तो हमारी स्त्रियाँ बंध्या हो जाएँगी और भावी पीढ़ियों की माताएँ अटलांटिक महासागर के उस पार से (अर्थात असभ्य जातियों में से ) लाई जाएँगी।”[6]

सप्रे जी भारतीय समाज को जागते हुए अपने एक लेख ‘हमारी सहायता कौन करेगा’ में कहते हैं कि जब तक हम अपनी उन्नाति स्वयं न करेंगे तब तक हमारी सहायता कोई नहीं करेगा। इस संदर्भ में कुछ यूरोपीय किवदंतियों का जिक्र करते हैं कि एक गाड़ीवान की गाड़ी फस गयी, उसने निकालने का प्रयास न कर हरकुलिस नामक देवता से सहायता मांगी। हरकुलिस ने कहा कि पहले तुम अपनी सहायता स्वयं करो। भगवान भी प्रयास करने वालों की ही सहायता करता है तो हम क्यों हाथ पर हाथ धरे हुए बैठे हैं? हमें किसका इंतजार है?

जब तक हम स्वयं अपनी उन्नति के लिए खुद न चेतेंगे तब तक सरकार की विभिन्न योजनाओं से कोई लाभ न होगा। सप्रे जी सरकार के कर्तव्य को बताते हुए चलते हैं कि सरकार का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में अपने नागरिकों, धन और स्वाधीनता की रक्षा करे। यदि इन्हें कोई विदेशी ताकत से खतरा हो तो उससे भी रक्षा करे। देश की उन्नति के लिए हमें स्वयं उद्यमी होना होगा। अंग्रेज जाति ने अपनी उन्नति के लिए स्वयं प्रयास किया और राज्य के कानून को अपने हित में पारित भी करवाते रहे। सप्रे जी उद्यमियों के धैर्य को बताते हुए कहते हैं कि देखो गंगा जी को भूलोक में लाने के लिए रघुकुल की कई पीढ़ियों ने प्रयास किया तब जाकर भागीरथ सफल हुए। सप्रे जी लिखते हैं “सफलता की कुंजी हमारे ही हाथों में है। यह बात तो सिद्ध हो चुकी है कि हमारी सहायता कोई नहीं कर सकता। हमको अपनी उन्नति के लिए स्वयं यत्न करना चाहिए। यदि हम अपनी उन्नति का कोई यत्न न करें, तो इसमें हमारा ही दोष है, क्योंकि यह बात सर्वथा हमारे अधीन है कि हम अपनी उन्नति और सहायता करें या न करें।”[7]

सप्रे जी अपने सामाजिक लेख ‘स्त्रियाँ और राष्ट्र’ में स्त्री की उन्नति से ही राष्ट्र की उन्नति संभव है। आर्यों का मानना था कि पुरुष हर स्तर पर महिलाओं से श्रेष्ठ है। भारत में यहीं से स्त्रियों की स्थिति बिगड़ी। महाभारत में श्वेतकेतु और दीघतमा ऋषियों की कथा है। जिससे यह पता चलता है कि प्राचीन समय में स्त्रियों और पुरुषों का संबंध अनियमित था। इसे स्वास्थ्य और नियमित करने के लिए विवाह और कुटुंब की मर्यादा की स्थापना की।

विवाह व्यवस्था जब अपने संक्रमण अवस्था में गुजर रहा था तब स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार हुआ। विवाह व्यवस्था की लोकप्रियता स्त्रियों को समाज के केंद्र में ला खड़ा किया। स्पेंसर विवाह के तीन उद्देश्य माना है जिसमें पहला उद्देश्य मनुष्य समाज का अस्तित्व चीर काल तक बना रहे, दूसरा उद्देश्य संतान सशक्त और अधिक हों और तीसरा उद्देश्य विवाहित स्त्री और पुरुष अपने माता-पिता की सेवा करेंगे।

इतिहास में स्त्रियों की स्थिति का विश्लेषण कर सप्रे जी ने पाया कि वही साम्राज्य उन्नति कर सका है जिसने अपने यहाँ स्त्रियों को स्वतंत्रता दे रखी थी। रोमन अपनी स्त्रियों को यूनानियों की अपेक्षा ज्यादा स्वतंत्रता दे रखी थी, जिससे रोमन विजयी हुए।

सप्रे जी बालविवाह को भारत की समृद्धि और उसके पिछड़ेपन का बहुत बड़ा कारण माना। वे बाल विवाह के उत्पन्न की परिस्थितियों पर विचार करते हुए लिखते हैं कि “पहले पहल स्त्रियाँ पुरुषों की मिल्कियत समझी जाती थीं अर्थात उन्हें दासत्व में रहना पड़ता था। इसके बाद उन्हें कुछ स्वतंत्रता मिली और स्वयंवर तथा एक पत्नीत्व के हक भी मिले। इसी समय स्त्रियों में ऐसे अनेक सद्गुणों का विकास हुआ कि जो राष्ट्रीय जीवन के लिए अत्यंत हितकारी हैं। अनंतर स्त्री पुरुषों का संबंध धार्मिक नियमों से मर्यादित कर दिया गया। इससे स्रियों के स्वत्वों की बहुत हानि हुई और हिंदुस्तान में बालविवाह की कुरीति जारी हुई।”[8]

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ के कृषकों की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। सप्रे जी अंग्रेजी सरकार में, कृषकों की बढ़ती दुर्दशा को लेकर गंभीर हैं। उन्होंने पाया कि भारत में पड़ रहे अकाल और अच्छी पैदावार न मिलने के पीछे किसानों का खेती के ज्ञान से अशिक्षित होना है। कुछ साल पहले नॉर्वे भी ऐसी ही समस्या से जूझ रहा था इसलिए उसने अपने यहाँ हर गाँव के स्कूलों में किसानों को खेती से संबंधित शिक्षा देना और लेना दोनों अनिवार्य कर दिया। जिससे बहुत जल्द ही नॉर्वे कृषि संबंधी उत्पादों में आत्मनिर्भर बन गया। यदि हमारी सरकार और पढ़े लिखे छात्र किसानों को शिक्षित करने में सहायक होते तो हमारे किसान भाइयों की उन्नति हो सकती है। सप्रे जी लिखते हैं “बिना त्याग के देश संपन्न न हो सकेगा, बांधव ज्ञानवान न होंगे और दरिद्रता का दूरीकरण न होगा। इसलिए दूसरों के सुख को ही अपना सुख मानकर, इस उद्योग में किसानों की शिक्षा में हाथ लगाना चाहिए, जिससे देश में सुख की सरिताएँ बहें, राजा-प्रजा सुखी होकर इहलोक तथा परलोक का कर्तव्य पालने में समर्थ हों।”[9]

सप्रे जी यूरोप की ‘नेपल्स की कासानोवा नामक औद्योगिक शाला’की प्रशंसा करते हैं क्योंकि इसमें बहुत कम फीस लेकर छात्रों को उद्यमी बनाने का सफल प्रयास किया जा रहा है। वे इसी नाम से अपने लेख में औद्योगिक शिक्षा की आवश्यकता पर बात करते हैं। इस लेख में सप्रे जी ने यूरोप की प्रारम्भिक स्थिति के बारे में बताते हैं कि मजदूरों के बच्चे म्युनिसिपालिटी के स्कूलों से प्राथमिक विद्यालय तक पढ़ाई करके मजदूरी करने लगते थे, न उनमें पढ़ने की ललक होती थी न अभिभावक पढ़ा ही सकता था। इन बच्चों में इस शिक्षा से न लेखन कला विकसित हो पाती थी न ही कोई रोजगार परक शिक्षा ही दिया जा रहा था। इटली के नेपल्स नगर के एक परोपकारी व्यक्ति सिनोर आलफ्रान्जो डिला वेलींडि कासानोवा ने 1864 में म्युनिसिपालिटी के प्राथमिक विद्यालयों से निकले बच्चों को औद्योगिक शिक्षा देने के लिए ‘कासानोवा आद्योगिक शाला’ की स्थापना की। इस औद्योगिक शाला में शुरू में कारखाना और घर की शिक्षा देने का प्रबंध किया जो ज्यादा लोकप्रिय न हुई इसलिए उन्होंने आद्योगिक शाला और गृह संबंधी शिक्षा एक ही स्थान में देने की व्यवस्था की जो बहुत लोकप्रिय हुआ।

नेपल्स की म्युनिसिपालिटी ने औद्योगिक शाला के लिए अपना एक भवन दान किया। इस प्रकार विधिवत रूप से औद्योगिक शाला की शुरुआत 1869 में हुई। 1880 तक इस शाला के छात्रों ने विभिन्न प्रतियोगिताओं में सफल हुए जिससे सरकार ने इस शाला की प्रशंसा की और सब प्रकार की मदद देने का आश्वासन भी दिया। इस शाला के फीस के बारे में सप्रे जी लिखते हैं “फीस बहुत ही कम ली जाती है, अर्थात प्रत्येक छात्र से प्रतिमास केवल दस आने। यदि किसी छात्र का पिता यदि जीवित न हो या किसी का भाई शाला में पढ़ता हो, तो उससे आधी फीस ली जाती है। और यदि किसी के माँ बाप दोनों जीवित न हो तो उससे कुछ भी फीस नहीं ली जाती। शाला में छात्रों को हर महीने दस आने फीस देने के सिवा और किसी प्रकार का खर्च नहीं करना पड़ता।”[10]

सप्रे जी नेपल्स की कासानोवा की औद्योगिक शाला का इसलिए भी परिचय करवाते हैं जिससे कोई भारतीय ऐसा सामाजिक कार्य करने में अपना उत्साह दिखाए। जो हमारे समाज के लिए बहुत आवश्यक है। सप्रे जी का मानना था कि भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली को सरकारी बाबू बनाने में हितकर है जो कि गलत है। हमारी शिक्षा व्यवस्था भी औद्योगिक रूप से विकसित किया जाये तो भारतीयों का लाभ हो।

सप्रे जी अपने एक लेख ‘भौतिक प्रतिभा का फल’ में स्पष्ट विश्लेष्ण किया है कि नवजागरण काल में यूरोपीय देशों ने मानवता स्थापित करने का प्रयास नहीं किया बल्कि अपना वर्चस्व स्थापित करने की होड़ में लगे रहे। गैर यूरोपीय जन-समुदाय गुमराह होते रहे कि वे उनके यहाँ मानवता को स्थापित करने, उन्हें सभ्य बनाने आये हैं। यदि प्रथम विश्वयुद्ध न हुआ होता तो कोई न मनाता की यूरोप की मानवतावादी दर्शन में कोई जान नहीं है। सप्रे जी लिखते हैं “महायुद्ध के पहले जर्मनी एक अत्यंत सभ्य देश माना जाता था। परन्तु उसके सब सुधारों का निरीक्षण करने से मालूम हुआ है कि इस देश ने अपनी सभ्यता और उन्नति के विकास के लिए केवल प्रभुता को ही अपना अंतिम साध्य समझा है। उसका जितना सामर्थ्य, वैभव और प्रभाव है वह सब शस्त्रास्त्रों और यंत्र-कलाओं की शक्ति पर अवलंबित है। उसकी सभ्यता से आध्यात्मिक विचारों का और उदात्त नीतिमत्ता का कोई संबंध नहीं।”[11]

यही हाल तमाम यूरोपीय और अमेरिकी देशों का भी है। जब तक युद्ध नहीं हुआ था पूरे विश्व में (एशिया और अफ्रीका में) विद्वान इनके उदाहरण देते नहीं थकते थे। डार्विन ने जीवन उत्पत्ति और उसके बने रहने पर एक सिद्धांत दिया था कि जो बलवान है वही पृथ्वी पर जीवित रह सका। पर यह सिद्धांत तो पशुओं के लिए था लेकिन इस महायुद्ध से यह सिद्धांत मानव योनियों में भी लागू हो गया।

किसी भी देश की राष्ट्रीयता की हानि तब तक होती रहेगी जब तक वहाँ के लोगों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा न दिया जायेगा। किसी भी सभ्य देश में वहाँ के नागरिकों को अपने देश के साहित्य और संस्कृति से निश्चय ही परिचय करवाया जाता है। भारत में राष्ट्रीयता की उन्नति के लिए यहाँ के स्कूलों, कालेजों, यहाँ तक कि, विश्वविद्यालय की पढ़ाई भी मातृभाषा में होनी चाहिए। सप्रे जी को लगता है कि यह कार्य उतना मुश्किल नहीं है जितना की हमारे लोग मान बैठे हैं। सप्रे जी का मानना था कि अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा देने के लिए लार्ड हार्गिज के जारी अध्यादेश को कि भारतीय शासन में वही नौकरी पा सकता है जो अंग्रेजी जानता है को रद्द किए बिना देश भाषाओँ का उद्धार नहीं हो सकता। इस संदर्भ में सप्रे जी एक जगह रूस की शिक्षा व्यवस्था पर लिखते हैं कि पहले रूस में विज्ञान की पढ़ाई फ्रेंच या जर्मन में ही संभव थी, पर वहाँ के प्रोफेसरों की दृढ़ इच्छा शक्ति ने विज्ञान को भी रूसी भाषा में पढ़ाना आसान कर दिया। पहले-पहल एक प्रोफ़ेसर ने फिर उनके देखा-देखी अन्य प्रोफेसरों ने भी रूसी भाषा में पढ़ाना शुरू किया, अब वहाँ पढ़ने-पढ़ाने की भाषा मातृभाषा है, जो सब विषयों के अभिव्यक्तियों का माध्यम है।

राष्ट्रीयता की हानि में भाषा का कितना महत्त्व है यह गाँधी जी के इस कथन से मालूम होता है कि ‘देशी भाषाओं की अवहेलना करने का यदि कुछ अर्थ हो सकता है तो वह केवल अपने हाथों से अपना राष्ट्रीय आत्मघात करना।’ फिर भी भारतीयों में अपने नेताओं की बात पर न ध्यान देने का चलन बढ़ता जा रहा है। सप्रे जी कहते हैं कि जहाँ आवश्यकता नहीं अर्थात मुनीम या मालिक अपने निजी काम को भी अंग्रेजी में करते हैं। आज का भारत अपने ही देश में विदेशी बना फिर रहा है। गाँधी जी ने कांग्रेस की सभाओं में अपने खुद के भाषण हिंदी में देने की बात करते हैं कि जो लोग हिंदी न सीख पायेंगे वे मेरे भाषण से लाभ न उठा पाएंगे।

सप्रे जी देशी भाषाओं के अभाव के कारण हो रही भारतीय एकता हानि को कुछ बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट किया है –

1. हम लोगों में देशी भाषा के अभाव में व्यक्तित्व, आत्मत्व और स्वाभिमान की जागृत नहीं हो पाती है, उलटा उसका नाश हो जाता है।

2. मातृभाषा और राष्ट्रीयता के विकास में परस्पर संबंध होता है

3. प्राचीन समय में भारत में सुने हुए ज्ञान में ही शिक्षा दी जाती थी जो विदेशी भाषा के कारण संभव नहीं है।

4. अंग्रेजी भाषा में शिक्षित भारतीय ही अपनी मातृभाषा की गर्दन पर छुरी चलाने के लिए उद्धत हैं।

5. अंग्रेजी भाषा को महत्त्व देने के कारण हमारे देशी भाषाविद्, संस्कृत के विद्वान, मौलवी और पंडित बेकार हुए फिर रहे हैं।

6. मिश्रित भाषा बोलने के लिए बंबई में पारसी, गुजराती और बंगाली अधिक बदनाम हैं।

सप्रे जी ने गोपाल गणेश आगरकर की जीवनी पर एक लेख लिखा जो अभाव में बसर करने वालों छात्रों को निश्चय ही प्रेरणादायक है। क्योंकि स्वयं आगरकर ने भी अभाव से संघर्ष करते हुए एक उच्च जीवन दर्शन को प्राप्त किया। वे अपने जीवन काल में ही कितनों युवाओं के आदर्श हुए। आगरकर जी समाज में परिवर्तन लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। आगरकर ‘सुधारक’ नामक पत्रिका में भारतीय परंपराओं कुरीतियों के बारे में लिख लिखकर बदलाव लाने की ज़रूरत महसूस कर रहे थे। उन्हें यह पता था कि सदियों से चली आ रही परम्परा इतनी जल्दी नहीं टूटेगी पर एक जागरुक शिक्षक, संपादक होने के नाते वे उस कार्य में लगे रहे। कई रुढ़िवादियों ने उनका खून कर देने संबंधी चिट्ठियाँ तक भेजीं, पर आगरकर के मनोबल को कोई तोड़ न सका। सप्रे जी लिखते हैं “आगरकर एक निर्भय लेखक थे। इसलिए उनके धर्म विषयक लेखों से जनता में खलबली मच जाती थी। कभी-कभी यह खलबली इतनी अधिक हो जाती थी कि लोग उनके पास धमकी के पत्र भेज देते, जिनमें लिखा होता कि हम तुम्हारा खून कर देंगे।”[12]

माधवराव सप्रे अपने लेख ‘पूर्वी और पश्चिमी सभ्यताओं में विभिन्नता तथा स्वदेशी साहित्य के महत्त्व’ में यूरोपीय अमेरिकी सभ्यता के हौवा को तोड़ते हुए अपने देश और उसके साहित्य पर भरोसा जताया है। किसी भी जाति की जिजीविषा उसकी भाषा और साहित्य में होती है जहाँ से वह उर्जा प्राप्त करता हैं। यहाँ तो अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से भारतीय भाषा और साहित्य को शिक्षा व्यवस्था में स्थान न देते हुए अंग्रेजी भाषा और साहित्य को स्थापित कर दिया है। सप्रे जी लिखते हैं “किसी भी राष्ट्र अथवा देश की सभ्यता का ज्ञान होने के लिए उसके साहित्य, आचार-विचार, शिक्षा-पद्धति, धर्मतत्व, गृहजीवन, नेता, समाज, आदर्श आकांक्षा आदि बातों का जान लेना परम आवश्यक है।”[13]

भारत की एक राष्ट्रीयता पर पाश्चात्य विद्वानों की राय दुराग्रहपूर्ण ही रही है, लगभग सभी पाश्चात्य विचारकों का यह मानना है कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। ऐसे निष्कर्षों पर सप्रे जी खेद प्रगट करते हुए बताते हैं कि ऐसे निष्कर्ष, लेख तभी प्रकाशित होने लगते हैं; जब भारतीय एक होकर अपनी उन्नति का मार्ग बना रहे होते हैं। इससे साफ पता चलता है कि ये निष्कर्ष कितने ख्याली हैं और हमें एक न होने देने की साजिश भी।

भारतीयता के प्रति प्रतिबद्ध विचारक इसलिए भी इनका विरोध नहीं कर पाते क्योंकि हमारे इतिहास ग्रन्थ भी आज के हैं और सभी निष्कर्ष इन्हीं अंग्रेज विचारकों के हैं। भारतीयों में इतिहास के प्रति लगाव नहीं था ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि भारत का इतिहास कई सौ सालों तक आक्रान्ताओं की आग में झुलसा है, हो सकता है कि उपलब्ध इतिहास ग्रन्थ उन्हीं आक्रान्ताओं की क्रूरता की भेट चढ़ गया हो। सप्रे जी बताते हैं कि भारतीय सम्राट भी अपने इतिहास लिखने और लिखवाने के प्रति बहुत उदासीन रहे। इनमें ऐसे भी थे जिन्होंने अपने शासन काल में इतिहास ग्रन्थ प्रकाशित करने की मनादी ही कर दी थी। ऐसी प्रवृत्ति औरंगजेब के यहाँ मिलती है, हो सकता है कि यह प्रवृत्ति इसके पूर्वर्ती सम्राटों में भी रही हो।

सप्रे जी समाज में राष्ट्र के प्रति फैलाये जा रहे भ्रम को दूर करते हुए इतिहास लेखन की विभिन्न विधियों और उनके उपयोग से इतिहास लिखने के तरीकों जैसे विषय पर स्वतंत्र लेख लिखकर लोगों को जागरूक करते हैं। सप्रे जी को अंग्रेज़ों के इतिहास लेखन पर विश्वास नहीं है। इसलिए कहते हैं कि लोगों में इतिहास को लेकर फैलाये जा रहे भ्रम को इतिहास लेखन से ही दूर किया जा सकता है। वे इतिहास लिखने में दो तरह से तथ्यों को जुटाने की बात करते हैं पहला अलिखित जिसमें सामाजिक परम्पराएँ, संस्कृति किंवदंतियाँ आदि आती है तो दूसरे में लिखित सामग्री जिसमें अभिलेख, धार्मिक ग्रन्थ साहित्य और ऐतिहासिक ग्रन्थ आते हैं। सप्रे जी एक राष्ट्र के रूप में भारत को सदियों से एक मानते हैं, वे लिखते हैं, “ यह बात तो सिद्ध ही है कि शरीर के भिन्न-भिन्न अवययों में कुछ न कुछ विशेषता या भिन्नता होती ही है; परन्तु उन सबके मेल से ही हमारा शरीर बनता है। उसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्रान्तों के हमारे हिन्दू-राष्ट्र-रूपी शरीर के अवयव हैं और उन सबसे मिल कर यह हिन्दू राष्ट्र बना है। क्या आक्षेप करने वाले कोई विद्वान महाशय आतंरिक एकता-सूचक इन सब बातों को समझ लेने पर यह कहने का साहस कर सकते हैं कि हिन्दुओं में एकता नहीं है अथवा वे ‘राष्ट्र’ संज्ञा के पात्र नहीं।”[14]

ऐसा कतई नहीं है कि सप्रे जी मुस्लिम विरोधी हैं, यहाँ देश की एकता पर बात करते हुए प्राचीन समय की बात करते हैं हुए हिन्दूराष्ट्र कहा है। सप्रे जी अपने विभिन्न लेखों में भारत और उसकी भारतीयता को बचाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं। यहाँ मुझे एक उद्धरण देना अनिवार्य लगता है कहीं कोई सप्रे जी को हिंदूवादी न कह दे। मुसलमानों के विषय में स्वदेशी आन्दोलन और बायकाट’ में लिखते हैं “मुसलमानों के समय में जब यह देश पराधीन हुआ था, तब सिर्फ हमारी राजसत्ता छीन ली गयी थी - तब हमारा व्यापार हमारे ही हाथ में था, वह नष्ट नहीं हुआ था; परन्तु अंग्रेजों के राज में हमारी राजसत्ता के साथ ही व्यापार का भी सर्वथा नाश हो गया।”[15]

सप्रे जी ब्रिटिश सरकार के प्रमुख अंग न्यायलय की स्वायत्तता पर सवाल खड़ा करते हुए उसके विलम्ब से आते न्याय पर किसीको भरोसा नहीं रहा क्योंकि आजकल न्याय उन्हीं को मिल पाता है जो अमीर हैं। सप्रे जी एक अंग्रेज अधिकारी मिस्टर फील्डिंग के अनुभव को साझा करते हैं “अदालतों की पद्धति सिर से पैर तक दूषित है। उनका मूलतत्व ही गलत है। उनके अन्वेषण और तहकीकात का सिद्धांत क्या है? क्या वे सत्य का पता लगतीं हैं? क्या जो कुछ हुआ हो उसकी खोज निष्पक्ष रीति से करती है? कभी नहीं।”[16]

सप्रे जी के ‘आत्मा का अमरत्व’ और ‘मन को मापन’ नमक ये दो लेख विशुद्ध मनोवैज्ञानिक हैं। इन लेखों का उद्देश्य समाज की आने वाली पीढ़ियों को पढ़ने और याद रखने के तरीकों के बारे में बताया गया है। सप्रे जी इस भ्रम को तोड़ते हैं कि इंसान एक खास उम्र तक ही कुछ सीख सकता है। सप्रे जी का मानना है कि इंसान जब तक स्वास्थ्य है तब तक कुछ न कुछ सीखा सकता है बसर्ते उसमें सीखने की लालसा हो।

सप्रे जी अपने ‘आत्मा का अमरत्व’ लेख में मनोविज्ञान की विभिन्न क्रियाओं का विश्लेषण मनोविज्ञान के बड़े-बड़े आचार्यों जैसे, लाक, कैट और गायो के आलोक में विश्लेषण किया है। सप्रे जी मनोविज्ञान का बीज रूप साक्रेटीस और शंकराचार्य के यहाँ देखते हैं – साक्रेटीस का वाक्य           Know Theyself (स्वयं को पहचानो) और शंकराचार्य का उपदेश – ‘आत्मानं बिद्धि’ एक ही अर्थ बताते हैं। सप्रे जी के एक लेख में मनुष्य के विभिन्न अवस्थाओं पर विचार किया है – जब कोई मनुष्य उन्माद अवस्था में होता है तब उसकी नित्य और पूर्व की चेतना कि मैं कौन हूँ? उस समय याद नहीं रहता। उन्माद –अवस्था में मनुष्य अपने पूर्व अनुभव भूल जाता है और कुछ अपूर्व अनुभव ग्रहण और व्यक्त करता है। मनुष्य का शरीर भिन्न-भिन्न अवस्था में भिन्न-भिन्न क्रिया करता है। ‘पाईपर’ नामक स्त्री पर घटित किसी एक घटना का अध्ययन करके कुछ विद्वानों ने यह माना कि आत्मा या भूत जैसी कुछ चीज होती है तभी तो वह औरत जिनसे कभी न मिली थी उनके बारे में सब कुछ बता देती थी। और बेहोशी की अवस्था में लिख भी देती थी।

सप्रे जी पाश्चात्य शिक्षा की जरूरतों पर लिखते हैं, “अब तक हम लोग अपने पूर्वजों की कमाई पर अपना निर्वाह करते रहे हैं। इस समय पश्चिमी देशों में ज्ञान की प्राप्ति, वृद्धि और उन्नति के लिए अनेक यत्न किए जा रहे हैं। यदि हम लोगों को इस दुनिया में अपना भी नाम कायम रखना है तो केवल प्राचीन पूंजी की कीर्ति पर ही संतोष न करके हमें भी कुछ काम कर दिखाना चाहिए। प्राचीन ज्ञान के कोरे अभिमान से काम न चलेगा।”[17]

निष्कर्षत: हम यह कह सकते हैं कि सप्रे जी अपने समय के उन बहुत कम लेखकों में थे जो अंग्रेजी भाषा में छपी किताबों और लेखों से अपने हिंदी भाषी पाठकों को परिचित करा रहे थे और उनका समुचित ज्ञान बढ़ाने में सक्रिय थे। सप्रे जी समाज की विविध अवस्थाओं को समाजशास्त्रियों के माध्यम से लोगों को परिचित कराते हैं तो साथ ही सामाजिकता में आने वाली बाधाओं से लोगों को सजग भी करते हैं। सप्रे जी के सामाजिक चिंतन में भाषा, साहित्य, विज्ञान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और औद्योगिक शिक्षा का बहुत ही महत्त्व है।

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संदर्भ

[1] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 114
[2] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 117
[3] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 120
[4] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 124
[5] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 127
[6] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 127
[7] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 140
[8] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 146
[9] माधवराव सप्रे प्रतिनिधि संकलन: सं. मैनेजर पाण्डेय पृष्ठ संख्या 154
[10] माधवराव सप्रे रचना संचयन सं. विजय दत्त श्रीधर पृष्ठ संख्या 96
[11] माधवराव सप्रे रचना संचयन सं. विजय दत्त श्रीधर पृष्ठ संख्या 217
[12] माधवराव सप्रे रचना संचयन सं. विजय दत्त श्रीधर पृष्ठ संख्या 241
[13] माधवराव सप्रे रचना संचयन सं. विजय दत्त श्रीधर पृष्ठ संख्या 247
[14] माधवराव सप्रे रचना संचयन सं. विजय दत्त श्रीधर पृष्ठ संख्या 263 -64 
[15] माधवराव सप्रे : चुनी हुई रचनाएँ सं. देवी प्रसाद वर्मा पृष्ठ संख्या  54
[16] माधवराव सप्रे रचना संचयन सं. विजय दत्त श्रीधर पृष्ठ संख्या 279  
[17] माधवराव सप्रे रचना संचयन सं. विजय दत्त श्रीधर पृष्ठ संख्या 112

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