आकाश में दरार - भाग 3 (चार अंकों में समाप्य, धारावाहिक कहानी)

प्रभु जोशी

- प्रभु जोशी

4, संवाद नगर, नवलखा, इन्दौर 452001 मध्यप्रदेश
ईमेल: prabhu.joshi@gmail.com

मैंने खुले डिब्बे से निकाल कर ज्यों ही रोटी का एक कौर तोड़ा कि अचानक एक स्त्री की लगभग आर्तनाद की-सी चीख सुनाई दी। “अरे नरस बई देखो तो ई के यो कंई हुई ग्यो।” ...देखो तो सई.....
मैं चौंक पड़ा। हाथ का कौर और डिब्बा फर्श पर रख कर खड़ा हो गया। देखा वार्ड के दायीं तरफ के पलंग का मरीज लाल कम्बल के नीचे जोर-जोर से काँपने लगा है। वार्ड में उसकी गोगो की आवाज आने लगी थी, जैसे किसी ने उसका गला दबोच लिया हो। “तू यहीं रूक, मैं आया।” मैंने माँ से कहा और दौड़ कर उस पलंग के पास पहुँच गया। औरत जो उस मरीज की शायद माँ थी, रोती-धोती अब जोर-जोर से विलाप करने लगी थी। “बचाव रे कोई बचाव! म्हारा लाड़ला के, बचाव। विधवा माँ की एकली औलाद है। ई के कंई हुई गयो तो म्हारो तो जीणो भाण्ड हुई जायगा। हूँ राण्डी राण्ड कां रोती फिरूंगा रे।”

“चुप रहो और हटो वहाँ से।” नर्स ने पलंग के पास आकर उस औरत को झिड़का जो ऊँचे स्वर में पागलों की तरह विलाप करने लगी थी। औरत ने नर्स की झिड़की से रोना रोका और बड़ी-बड़ी आँसुओं से भरी कातर आँखों से देखने लगी। वे इकलौते बेटे की माँ की ही आँखें थी मुझे लगा, शायद अब उसकी घिग्घी बंध गयी है। और यदि उससे कुछ पूछा गया तो वह एक शब्द भी नहीं बोल पायेगी। लड़के की पूरी की पूरी देह बहुत जोर जोर से धूज रही थी। धूजणी इतनी अधिक बढ़ी कि उसके झटके से स्टैण्ड पर लटक रही ग्लूकोज की बोतल स्टैण्ड सहित जमीन पर आ गिरी। इस पर नर्स की खीझ आसमान पर पहुँच गयी। उसने कहा, लगभग दुतकारते हुए कहा, “सबसे पहले तुम वार्ड से बाहर जाओ।” फिर इसके बाद उसने वार्ड बॉय को आवाज दी। वार्ड बाय पास ही के बरामदे में था, दौड़ता हुआ आया और उसने आते ही पहले पूरे वार्ड की सारी बत्तियाँ जला दी। और फिर उन दोनों ने मिलकर मरीज को लगभग दबोचा और उसका वह हाथ जिसमें ड्रिप लगी थी, एक सफेद पट्टी से पलंग से बांध दिया। तब तक वार्ड-बॉय दौड़कर गया और एक ट्रे ले आया, जिसमें दो तीन सिरिंज, स्प्रिट वाले रूई के गाज और डिस्टिल वॉटर के छोटे-छोटे एम्पूल थे। नर्स ने तेजी से सिरिंज में रबर की काग वाली शीशी से दवाई खींची और पेशेंट के हाथ में लगा दी। नर्स वार्ड-बॉय से कह रही थी, बॉटल गिर कर टूटने की घटनाओं से एयर-बबल अंदर चला जाता है। एट टाइम्स इट्स वेरी डेंजरस। खैर तुम जाओ और नया आई-वी फ्लुइड ले आओ, अभी इसका तो रात भर ही चलेगा।

थोड़ी ही देर में मरीज की कँपकँपी थम गयी। वार्डबॉय बॉटल लेने चला गया।

मैं उसके पलंग से हट कर वापस पिताजी के पास आ गया।

माँ शायद इस सारे हडकम्प से बेतरह डर गयी थी। इसीलिए उसने अपने ही भय को भीतर से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए मुझसे कहा, “नाना, तू डरे मती। थारा दाय जी के असी कोई डरने जस्सी कोई बेमारी नी है,रे। अने, छोटी-मोटी के तो ई कदी दाद भी नी दे। म्हारी समझ में, ऊना पलंग वाला के तो मिरगी होयगा। ओ को ही दौरो पड़्यो होगा। इण के तो जिंदगी में नख में भी रोग नी हुयो।” माँ ने इस बीच, प्रकाश द्वारा लाया गया टिफिन का वह डिब्बा, जिसे मैंने खाने के लिए खोल लिया था, वापस बंद कर दिया था। वह स्टूल से उठी और फिर से डिब्बा खोल कर बोली, “नाना, दो-चार कोळया जीमी ले। तू खायगा नी तो बेमार हुई जायेगा”। मैंने कहा कुछ नहीं। दो चार ग्रास उगले-निगले और टिफिन का डिब्बा बंद करके पलंग के नीचे सरका दिया गड़ू से गिलास उठा कर भरपेट पानी पीया। पानी पीते हुए लगा, जैसे भूख से ज्यादा तो प्यास बड़ी थी। दोपहर के बाद से पहली बार पानी पीाया गया था।

मैं चुप ही बना रहा। और अभी-अभी गुजरे घटनाक्रम पर न ही माँ की ऐसी निष्कर्षात्मक बात पर अपनी कोई टिप्पणी दी। हाँ, अलबत्ता हुआ यह जरूर कि वार्ड में अभी-भी अचानक उठे उस अप्रत्याशित लेकिन दहशत भरे तह-ओ-बाल ने एक ऐसा मौत का सा सन्नाटा भर दिया था, जैसे मौत वार्ड के ही अंधेरे में किसी कोने में छुपी हुई थी और लोगों के बेफिक्र और उनींदी होती चेतना की स्थिति का लाभ ले कर अपनी भूख बुझाने के लिए किसी नरभक्षी की तरह उसने एक कमउम्र मरीज को धर-दबोचा, लेकिन तीमारदार माँ की चीख पुकार और नर्स की तत्परता से वह भाग खड़ी हुई।

वार्ड बॉय ने वार्ड की बत्तियाँ बुझा दी। बत्तियाँ, ज्यों ही बुझायीं लगा, जैसे रात ने फिर से अपना काम सम्पन्न करना शुरू कर दिया है। वार्ड में मौजूद मरीजों और तीमारदारों में से कोई भी ठीक से नहीं बता सकता था कि उस कम-उम्र के मरीज की माँ की आँखें कितना-कितना रो रही हैं। सन्नाटे में बीच-बीच में उसकी साँस और सिसकियाँ उठकर जागने वाले का कलेजा कँपकँपा देती थी। बाद इसके सबको धमकाता-सा एक हिंस्र मौन चौतरफा छाने लगा।

माँ को मैंने प्रकाश के द्वारा लाये गये झोले से शाल निकाल के दी और कहा कि वह वार्ड के कोने के पलंग पर जाकर थोड़ी-सी कमर सीधी कर ले और अपने लिए वह हाफ स्वेटर निकाल लिया, जो शायद प्रकाश के छोटे भाई का रहा होगा। पहना तो वह बदन से एकदम चिपक-सा गया। वार्ड को अपने शिकंजे में लेती जा रही सर्दी से बचाने में मुझे वह स्वेटर अपर्याप्त ही लगा।

माँ शाॅल लपेट कर उस खाली पलंग की तरफ चली गयी। वार्ड के अंधेरे और सर्द खालीपन के बीच जाती माँ के बारे में सोच कर मैं अपेक्षाकृत एक असहाय सी कातरता से भरने लगा। फिर पोटले को कमर के पास सहारे की तरह लगा कर पैर लम्बे किये और पीठ दीवार से टिका ली। थोड़ी ही देर में लगा कि दिन भर से पाँवों में फंसे जूतों ने पंजों में दर्द भर दिया है। अतः जूतों के तस्मे ढीले कर के उन्हें उतारा ओर पिर पलंग के नीचे सरका दिया।

पिता दवाइयों के द्वारा लायी गयी नींद में थे और अब उनकी नाक बजने लगी थी।

वे लम्बी-लम्बी साँसें खींचने लगे थे। मुझे ऐसा लगने लगा था, जैसे उनके लिए वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन कम पड़ रही है। कहीं ये एयर-हंगर के लक्षण तो नहीं? हो सकता हो, ऐसा नहीं भी हो। एक दफा मन में विचार भी आया कि अपनी आशंका नर्स पर प्रकट कर दूं, कि पिताजी को कहीं कार्डियक अस्थमा तो नहीं हो रहा है, क्योंकि, जब मैं गाँव में था उनको अचानक बिना कफ की खांसी और श्वांस उठ आता था, लेकिन न जाने क्यों खुद को रोक लिया और अपनी आँखें मूंद लीं। आँखें मूंदने के बाद भीतर मैंने पाया जैसे वहाँ दिन से भी ज्यादा रोशनी है और अतीत की चिलचिलाती धूप गिर रही है। दरअसल, बाहर, वार्ड में फैले डराते अंधेरे से बचकर मैं आँख मूंद कर भीतर एक आत्मीय अंधेरा ढूंढने गया था, जिसमें लिपट कर मैं छोटी-सी झपकी ले लूंगा और पूरे समय शिकारी पशु की तरह पीछा करने वाला दुःख इससे चकमा खाएगा और किसी दूसरी ओर निकल जायेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। तमी पलंग के पास किसी के कदमों की आहट हुई। मैंने आँख खोल ली। नर्स थी। हाथ में एक छोटी-सी पर्ची लिए हुए। पहले उसने चलती ड्रिप को देखा। देख कर बूंदों के गिरने की गति तेज कर दी।
“जाग रहे हैं?” उसने पूछा नहीं जैसे सिर्फ तथ्य की पुष्टि की हो। फिर मुझे जागा हूआ देख कर बोली, देखिए, “ड्रिप खत्म हो रही है। सोचती हूँ, आप ये इंजेक्शन और ले आइये। टु बी ऑन सेफर साइड-यह लाइफ सेविंग है। इसलिए ला कर रख लेते हैं। अभी बाहर सिन्धी की वह “डे एण्ड नाइट” नामक मेडिकल स्टोर खुला होगा। उसके यहाँ मिल जायेगी। पहले थोड़ी खीझ हुई कि व्यर्थ का व्यवधान डाल रही है। लेकिन पर्ची लेकर बाहर खुली हवा में आसमान के नीचे आने के बाद अच्छा लगा कि नींद इस बहाने ही सही उड़ गयी है और एक न एक अटैण्डेण्ट को तो पूरे समय बहुत मुस्तैद रह कर जागते ही रहना चाहिए। अफसोस हुआ कि प्रकाश को रात में यहाँ आने के लिये कह देता तो ही ठीक था। रात और उसमें छुपी दहशत का सामना करने का साहस तो बना रहता।

बाहर धीरे-धीरे बढ़ती ठण्ड और गहराता अंधेरा था।

अंधेरा ऐसा और इतना घना था, जैसे सारे शहर का अंधेरा अपने उपचार के लिए अस्पताल के परिसर में ही एकत्र हो गया है। उस ठण्डे और गाढ़े अंधेरे में मैंने परिसर की दीवार के पार देखा, वहाँ आखिरी कोने में रोशनी का एक थरथराता हुआ चौकोर आयताकार टुकड़ा था। जैसे भीतर बहुत सी रोशनी भरी हो, लेकिन उसने बाहर आने से खुद को रोक रखा हो। मैंने तेज कदमों से परिसर पार किया और दुकान की सीढ़ियाँ चढ़ कर रोशनी के उस चौखटे पर दस्तक दी। काँच की छोटी-सी खिड़की खुली। उसमें एक गरदन दिखाई दे रही थी। मैंने हाथ में थमी पर्ची और पैसे बढ़ाये। उसने पहले अपना उनींदापन उतारा और फिर दवाइयाँ ढूंढ कर वापसी में दो-एक नोट और कुछेक सिक्कों के साथ एक छोटा-सा पैकेट पकड़ा दिया और लगे हाथ फिर से खिड़की बन्द कर ली।
दुकान की सीढ़ियाँ उतरते समय मैंने निगाह घुमा कर बगल में दाहिनी ओर देखा। वहाँ घासलेट पर चल-चल कर शिकस्ता हो चुके इंजनों वाले दो एक टेम्पो खड़े थे, जिनमें उनके चालक पुराने फटे स्वेटरों और शालों में नींद और सवारियों का इंतजार करते हुए ऊंघ रहे थे।

लौट कर वार्ड में आया तो देखा नर्स स्वयं कुर्सी की पीठ से टिक कर ऊंघ रही थी। टेबिल लैम्प की रोशनी का पीला वृत्त उसके चेहरे पर नहीं शरीर के सामने वाले भाग से पड़ता हुआ गरदन तक पहुँचकर रूक गया था। जहाँ जा कर रूक गया था, नींद वहीं थी और जमी हुई भी। मुझे ऊंघती हुई उस नर्स को देखते हुए लगा कि वे भी नींद के लिए कितनी-कितनी तरस जाती होंगी। पहली बार मुझे उसे पुकारने के लिए सिस्टर शब्द बहुत गरिमामय और प्रीतिकर जान पड़ा। लगा, जैसे वे मरीजों से उफनते इस रूग्ण संसार में चहलकदमी करती हुई, सफेद वस्त्रों में लिपटी हुई आशायें हैं। आठवीं की कक्षा में अंग्रेजी की किताब का नाइटिंगेल का पाठ याद हो आया।

मुझे उसे देखते हुए सहसा अपनी बड़ी बहन धापू की याद आ गयी। वही थी, जो घर में हर बार बीमार होने पर पिताजी की इस तरह की टहल-चाकरी करती थी। खास कर जब पिताजी को दमा उठ आता तो वही रात भर जाग-जाग कर उनकी पीठ पर अजवाइन और लहसुन का कड़कड़ाया हुआ तेल मला करती थी। और रात के जागरण के कारण बीच दोपहर में यदि छोटी-सी भी झपकी ले लेती तो फिर भी माँ की डांट खा जाती कि- लो बताव, ये तो दिन में नींद के फसड़के काढ़ने लगती है। मुझे इस विडम्बना पर खयाल आया कि वह माँ की पहली कोख की थी और उसका धापू नाम ही इस टोटके के लिए ही रख दिया गया था कि एक ही लड़की के जन्म से घर धाप गया है और अब और लड़की नहीं चाहिए। यह नाम नहीं लड़कियों के जनमने के विरूद्ध एक कोई प्राचीन-सा अचूक उपाय था।

“सिस्टर!” मैंने कहा तो उसने चौंक कर आँखें खोल लीं।

“ओह! सॉरी।” उसने अपनी उस झपकी के लिए क्षमा मांगी। हालांकि, उसके लिये यह कोई जरूरी नहीं था फिर मेरे हाथ में दवाइयों का पैकेट देखा तो तपाक से बोली-”ठीक है रख दीजिए।” मन में उसके प्रति सहृदयता के चलते लगा कि कह दूँ, “ धन्यवाद धापू बेन।”

मैं दवाइयों का वह पैकेट वहीं नर्स की टेबिल पर रख कर पिता के पलंग के पास लौट आया।

मैंने मार्क किया कि उनके खर्राटे उसी गति से चल रहे हैं। मैंने एकदफा पिता के हाथ और बाद में सिर को छुआ। वह गर्म था। वे शायद एक निर्विघ्न-सी नींद में थे। नतीजतन मैंने जूतों के फ़ीते खोलकर उन्हें फिर से उतारे और सरका कर पलंग के नीचे कर दिये। दिन भर से जूतों में फंसे पाँवों में कुलन होने लगी थी।

मैं पोटले को कमर के सहारे की तरह ले कर पसर गया। फिर दीवार से पीठ टिका ली। बाद इसके अपने भविष्य के स्वप्नों और दुःस्वप्नों के बीच डूबते उतराते हुए इसका बात का पता ही नहीं चल पाया कि कब नींद ने अपना जाल मेरे ऊपर फैला कर मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया।

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पथरीले फर्श पर नालदार जूतों और पहियों वाले लोहे के स्ट्रेचर की खड़खड़ाती ध्वनि से अचानक अचकचा कर आँख खुली तो मैंने देखा कि वार्ड में अच्छी खासी हबड़-तबड़ मची हुई है। बदहवास लोगों की बातचीत के टुकड़ों को पकड़ने से पता चला कि ठीक देवास नाके के पास आगरा-बॉम्बे रोड पर किसी भारी ट्रक और एम्बेसेडर कार के बीच एक्सीडेण्ट हो गया है। एक्सीडेण्ट इतना जबरदस्त हुआ कि कार की लगभग सभी सवारियाँ खून से नहा गयीं। उन्हीं घायलों को स्ट्रेचर पर लाद कर, वार्ड से लगे छोटे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था। नर्स और वार्ड-बॉय रूई के गॉज, बेण्डेज और ग्लूकोज की बोतलों के साथ दौड़-भाग कर रहे थे।

कुछ क्षणों तक तो मुझे सम्पट ही नहीं बैठ पायी कि आखिर यह सब क्या हो रहा है? कोई दुःस्वप्न चल रहा है या वाकई यह खुली आँखों के सामने घट रही एक नंगी हकीकत है।

ऐसे में वार्ड में चारों ओर निगाहें घुमाकर मैंने माँ को देखना चाहा, लेकिन वह कहीं भी दिखायी नहीं दे रही थी। मैं अचरज में पड़ गया कि मेरी झपकी लगने से पहले वह कोने के पलंग पर बैठी हुई थी फिर भला अभी की अभी इतनी रात गये कहाँ चली गयी? मुझे पहले तो लगा कि हो सकता है, वह पेशाबघर गयी हो, लेकिन, पेशाबघर में इतनी देर? मैं नर्स से पूछता लेकिन, वह घायलों के साथ ऑपरेशन थियेटर के भीतर चली गयी थी। एक बार मैंने पलंग पर लेटे हुए रूग्ण पिताजी की तरफ देखा, वे उसी तरह खर्राटे भर रहे थे। उनके खर्राटों की आवाजें ऐसी लग रही थीं, जैसे काँसे की देगची में कोई गाय को दुह रहा हो।

मैंने झपकी आने से पहले पाँवों से उतार दिये गये जूतों की खींचा और जल्दी जल्दी-उसमें अपने पैरों को फसाया और लगभग दौड़ता-सा वार्ड के बाहर आ गया। माँ की तलाश में इधर-उधर गरदन घुमायी। तभी अचानक अंधेरे से घिरे मंदिर के उस छोटे से अहाते में धीमी और मरजीवी रोशनी के साथ जल रहे बल्ब से बने गोल दायरे में, माँ की हाथ जोड़े खड़ी आकृति दिखायी दे गयी। देखकर भीतर तसल्ली-की एक ठण्डी साँस ली। जैसे अचानक खो दिया गया संसार फिर से मेरे प्राणों के पास लौट आया हो, फिर वहीं ठिठके हुए उसे चुपचाप देखने लगा।

माँ ने अपने जुड़े हुए हाथों से भगवान की तरफ एकटक देखने के बाद सिर झुकाया। फिर कमर में खुँसे अपने लुगड़े के पल्लू की गाँठ खोली और उसमें से शायद उसने कोई सिक्का निकाला। बाद इसके अपने कपाल की सिंदूर की टिकली से भगवान को तिलक लगाने वाली अंगुली से सिंदूर निकाला और सिक्के को लगा कर सिक्के को मंदिर की जाली से शायद मूर्ति की तरफ उछाला। बाहर के अंधेरे में चौतरफा काबिज सन्नाटे की वजह से सिक्के के गिरने की छन्न-सी आवाज मुझ तक आयी। मैंने उस आवाज से अनुमान लगाया कि वह निश्चय ही चवन्नी का सिक्का होगा।

मेरा मन भर आया। पहली बार एक रूलाई-सी फूटने-फूटने को हो आयी यह सोच कर कि क्या एक क्रूर और कुटिल मृत्यु के बर्बर हमले को रोकने के लिये माँ ईश्वर को मात्र एक चवन्नी देकर राजी कर लेगी? क्या सिर्फ चवन्नी के लालच में ईश्वर जीवन और मृत्यु के बीच कोई दीर्घकालिक सन्धि करा सकेगा? करवा देगा युध्द विराम?
बहरहाल उस रूलाई को दबाने के लिए ही मैं वहाँ से हट कर चुपचाप वापस पिता के पलंग के पास आकर स्टूल पर बैठ गया।

आ कर ड्रिप की तरफ देखा, ड्रिप में बूंद-बूंद, दवाइयों का मिश्रित ग्लूकोज टपक कर नली के जरिये पिता के शरीर में जा रहा था। हर बूंद के साथ एक धक्-सी लगती। मुझे लगा कि बंूद की गति अपेक्षाकृत थोड़ी धीमी पड़ गयी है। मैंने नर्स को ढूंढना चाहा। सिर्फ नजरों के जरिये ताकि, इसके बारे में उसे बता सकूँ। परन्तु अभी उसकी कुर्सी खाली थी। वह शायद अभी भी ऑपरेशन थियेटर के भीतर थी। थियेटर से, बावजूद उसका दरवाजा बंद होने के आवाजें बाहर तक आ रही थीं। उसमें रोगियों की कराहें कम, नर्स की आवाजें अधिक थीं। शायद, वह बार-बार घायलों को दिलासा दे रही थी। उसकी आवाज में जाने क्यों मुझे धापू बेन की-सी चिंतातुरता दिखाई दे रही थी।
“तू कहाँ चली गयी थी?” हाथ की चूड़ियों की आवाज कान पर पड़ते ही मैंने पलट कर देखने के बाद माँ को अपने पीछे खड़ा पाया तो उससे बेसाख्ता पूछा। मेरी आवाज में खीझ की हलकी-सी तिक्तता, जो उसके न दिखने पर उभरी थी, वह शायद माँ को मंदिर में असहाय-सी प्रार्थना करता हुआ देखने के बाद भी पूरी तरह झड़ नहीं पायी थी। इसलिए आवाज थोड़ी-सी ऊँची हो गयी थी। भीतर अपनी इस असावधानी पर किंचित् क्षोभ अनुभव हुआ। चूकि, कमोबेश यह एक बदअखलाक़ी तो थी ही।

“नाना, हूँ कां जऊं रे, बस अस्पताल की बास का मारे म्हारो माथो चढ़ी ग्यो थो तो सोच्यो कि थोड़ो बाहर का बायरा में पग-फेरो करी लूँ। मन चणीक सो ही सई,पे सुसमळो हुई जायगा।” माँ ने कहा, लेकिन उसके भीतर का झूठ उससे पूरी तरह छुप नहीं पाया था। उसने कहते हुए अपना चेहरा पलंग पर सोये हुए पिताजी की तरफ कर लिया था, इसलिए मुझे उसका आधा ही चेहरा दिखायी दे रहा था। हालांकि, वह आधा चेहरा भी अंधेरे में था। नतीजतन, मुझे स्पष्ट दिखायी नहीं दे पा रहा था, परन्तु वहाँ भय और दुःख पूरा ही था, जो कम रोशनी में साफ-साफ चमकता हुआ तो नहीं देखा जा सकता था लेकिन आवाज के रेशों में उसे पकड़ा जा सकता था।
“तू ऊ ना पलंग पे जई ने थोड़ोक सोई ले रे नाना!” माँ ने कहा और मुझे स्टूल से उठाने के लिए उसने मेरी बाँह पकड़ ली। मैं खड़ा हो गया। मेरे खड़े होते ही वहाँ उस स्टूल पर माँ बैठ गयी। वह ऐसे बैठी जैसे कटा पेड़ गिरता है, धम्म से। बहुत मुमकिन हो पिताजी की हालात को देख कर कमजोर हो आयी हो। ऐसी भावनात्मक कमजोरी में पाँव इतने निर्बल-से हो आते हैं, जैसे वे अपने ही शरीर का बोझ ढो नहीं पा रहे हैं। खड़ा रह पाना भी मुश्किल हो जाता है। माँ के धम्म से बैठने के पीछे निश्चय ही यही वजह थी।

मैंने एकदफा पिताजी की तरफ बहुत असहाय और कातर होकर देखा। जैसे जोर से उन्हें झिंझोड़ कर कहूँ, कि ये क्या चुप्पी लगाकर लेटे पड़े हो और उठो अपनी गाढ़ी आवाज में मुझसे बात करो। मुझे डाँटो की दो साल से मैं क्यों नहीं आया आपके पास, गाँव?

मैं बोला कुछ नहीं सिर्फ यंत्रवत् वार्ड के कोने में उस खाली पलंग पर आकर बैठ गया, जहाँ कुछ देर पहले माँ बैठी हुई थी। मुझे एक बारगी आशंका उठी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि पिताजी नींद में नहीं, बल्कि किसी गहरी बेहोशी में है, जिसकी गहराई नापने के उपयुक्त उपकरण के अभाव में यहाँ के डॉक्टर सचाई बता पाने में असमर्थ हों। नींद से, और नींद की सीमा से बाहर और दूर शुरू होने वाली ऐसी नींद की तरफ तो नहीं चले गये हों, जो कभी नहीं तोड़ी जा सकती। मैं ऐसे तमाम आशंकाओं और अनुमानों से घिरता हुआ आँखें मूंद कर दीवार से टिक गया। वार्ड में धीरे-धीरे रात के साथ आ घिरने वाला सन्नाटा भरने लगा था, जिसमें कभी अस्पताल के परिसर के बाहर की सड़क से गुजरते किसी दुपहिया वाहन की आवाज कुछ क्षण तैरती फिर डूब जाती थी। उस डूबती आवाज का पीछा करती हुई कुत्तों के भौंकने की आवाजें भी होतीं।

[अगले अंक में जारी]

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