प्रशासन और अनुशासन

अनुराग शर्मा
यदि मैं आपसे पूछूँ कि विकसित और विकासशील देशों के बीच का सर्वप्रमुख अंतर बताइये तो आप क्या कहेंगे? (आप चाहें तो अपना उत्तर नीचे टिप्पणी के रूप में साझा कर सकते हैं)

मेरी दृष्टि में इस प्रश्न का उत्तर है "प्रभावी प्रशासन।"

भारत छोड़ने से पहले मैं भारत के अनेक राज्यों में रहा हूँ और जो एक कमी पूरे देश मे एक सी पायी वह यही थी कि सरकारी कर्मियों, अधिकारियों, मंत्रिमण्डलों, समितियों, संस्थानों आदि का संसार का सबसे बड़ा तामझाम होने के बावजूद भारत में प्रशासन व्यवस्था अति अक्षम, बल्कि अनेक मामलों में लगभग अनुपस्थित है। कानून अशक्त है और जनता का एक वर्ग कानून का उल्लंघन करना और हाथ में लेना सामान्य ही नहीं बल्कि कई बार तो शान समझता है। कोई कह सकता है कि यदि ऐसा होता तो अपराधों के मामले में भारत में अन्य देशों की अपेक्षा आधिक्य क्यों नहीं दिखता? इस बारे में मेरा अवलोकन यह है कि भारत में धार्मिक और नैतिक मूल्यों की प्राचीन और दीर्घ परम्परा रही है जो सामान्यजन को अवसर होने पर भी अपराधी नहीं बनने देती। जिन-जिन वर्गों या क्षेत्रों में भारतीय परम्परा का ह्रास हुआ है, वहाँ आर्थिक भ्रष्टाचार, हत्या, अपहरण, बलात्कार, लूट और आतंकवाद समेत अनेक अपराध अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कई गुणा अधिक हैं। वर्षों से मैं भारत में प्रशासन के अभाव पर ध्यान दिलाता रहा हूँ, इस विषय में समय-समय पर लेख भी लिखे हैं और मेरी कविता-कहानियों में भी यत्र-तत्र ऐसे संदर्भ आये हैं। दुर्भाग्य यह है कि प्रशासन का अभाव अनुशासन और प्रशासन की सनातन भारतीय परम्परा पर लगातार चोट कर उसे क्षीण करता जा रहा है। सत्य यह है कि हत्याओं के मामले में भी भारत अग्रणी है और महिला आत्महत्याओं के मामले में भी।

तीसेक वर्ष पहले दिल्ली में अपने घर से कार्यालय जाते समय पेशवा मार्ग पर लगे एक ट्रैफ़िक सिग्नल की लाल बत्ती पर लगभग प्रतिदिन ही रुकता था। मंदिर मार्ग से कुछ पहले ही लगी उस लाल बत्ती के अस्तित्व का कारण मुझे भी कभी समझ नहीं आया, लेकिन बत्ती थी इसलिये मैंने सदा उसका आदर किया। मेरे अतिरिक्त वहाँ से जाने वाला लगभग हर व्यक्ति हर रोज़ उसका उल्लंघन करता रहा। तीन वर्ष तक इस नियमित व्यवहार को देखते समय मेरे मन में यही विचार आता था कि आज उल्लंघन करने वालों में कुछ लोग अवश्य ऐसे भी रहे होंगे जो आरम्भ में मेरी तरह यहाँ रुके हों लेकिन कानून तोड़ने वालों से पीछे छूटने के कारण बाद में खुद भी उसी धारा में सम्मिलित हो गये। सच है कि जहाँ नियमों के उल्लंघन का दण्ड और नियमों के आदर का पारितोषिक नहीं होता वहाँ अव्यवस्था और उसकी सामाजिक स्वीकृति बढ़ती जाती है।

दिल्ली नगर का उदाहरण लें तो वहाँ देश भर के सांसदों के अलावा नगर की अपनी विधान सभा और अनेक पालिकाएँ भी हैं। इसके अलावा आईएऐस, आईपीएस, एवम अन्य सरकारी कर्मियों के लाव-लश्कर वाले, देश के सबसे प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण नगर होने के बावजूद भी वह अपने आसपास के पिछड़े देशों के किसी सामान्य पिछड़े नगर जैसा ही है जहाँ एक बड़ी जनसंख्या पीने के पानी जैसी मूलभूत और मामूली सुविधा से भी वंचित है। ट्रैफ़िक सिग्नल पर रुकना तो दूर की बात है, पेयजल की आपूर्ति, सड़कों के निर्माण और रखरखाव, कूड़े का निस्तारण या नदी-नालों की सफाई, हम आज तक एक नगर, देश की राजधानी को भी रहने लायक नहीं बना सके, बाकी भागों की तो बात ही जाने दीजिये। सरकार की ओर से प्रशासन, और जनता की ओर से अनुशासन का अभाव ऐसी समस्याएँ हैं जिनपर हम सबको कार्य करने की आवश्यकता है। लेकिन यह होता क्यों नहीं है?

मेरे विचार से यथास्थिति बने रहने का एक कारण यह है कि बहुसंख्य नागरिक (प्रशासक, और नेता भी) ढर्रे से हटकर नहीं सोचते। जिस देश में ड्राइविंग लाइसेंस देने वालों को ही 'स्टॉप' चिह्न का अर्थ नहीं पता वहाँ के सामान्य चालक से उसके सम्मान की आशा कैसे की जाये? जिन लोगों को कभी यह बताया ही नहीं गया कि वाहन चालन एक (लाइसेंसयाफ़्ता) विशेषाधिकार है जबकि पैदलयात्रा एक जन्मसिद्ध अधिकार, वे अपनी गाड़ी किसी पैदल के लिये धीमी क्यों करने लगे? खासकर जब उन्हें यह पता है कि इस उद्दंडता के लिये उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं।

पिछले दिनों ही एक विदुषी मित्र की फ़ेसबुक वाल पर एक पोस्ट देखी जिसे इस संदर्भ में साझा करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। मित्र ने अपनी शाला का एक उदाहरण सामने रखा था।

"इसने मेरी भी पेंसिल चुराई है।"
"किसी का भी सामान नीचे गिरता है, तो यह उठाकर अपने बैग में डाल लेता है।"
पहली कक्षा के बच्चे एक अन्य बच्चे पर चोरी के आरोप प्रतिदिन लगा रहे थे। उसकी क्लास टीचर बच्चों का सामान बरामद कर, उन्हें वापस करवाती रही और स्थिति न बदलने पर अंततः खुद उस बच्चे का हाथ पकड़कर प्रधानाचार्या के पास ले आईं, "मैम, आप समझाइये इसे। बहुत चोरी करता है।"
प्रधानाचार्या ने बच्चे को अपनी बगल में खड़ा किया। बच्चा निर्लिप्त भाव से ऑफिस का सामान देख रहा था। चोरी की बात पूछने पर बच्चे ने इनकार किया। आरोपों और शिकायतों का कारण पूछने पर बताया, "मैम, जब जो बच्चा पेंसिल नहीं लाता, मैं उसे पेंसिल दे देता हूँ क्योंकि मेरे पास एक डिब्बा पेंसिल है। मैं जब अपनी पेन्सिल वापस मांगता हूँ तो कोई देता ही नहीं है, तो फिर मैं अपनी पेंसिल उनके पेंसिल बॉक्स से निकाल लेता हूँ।"
प्रधानाचार्या ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा "चोरी की असलियत मेरी समझ में आ गयी थी। मदद के एवज़ में इल्ज़ाम कमा रहा था बच्चा।"
अन्य बच्चों का गिरा हुआ सामान उठाकर बैग में डालने की बात पर बच्चे ने सफ़ाई दी, "मैम बच्चे लोग अपनी बेंच पर से सामान गिरा देते हैं तो मैं उठा लेता हूँ, और सबसे पूछता हूँ, कि किसका है ये? कोई नहीं बोलता तो बैग में डाल लेता हूँ। लेकिन अगले दिन फिर पूछता हूँ।"
प्रधानाचार्या ने लिखा कि उस बच्चे के चेहरे पर न डर था न अफ़सोस। उन्होंने लिखा कि क्लास में जाकर अन्य बच्चों से कड़ाई से पूछताछ करने पर उसकी बातों को सही पाया। पोस्ट के अंत में उन्होंने लिखा, "फिलहाल उस बच्चे द्वारा बांटी गयीं चार पेंसिलें उसे वापस दिलवा के आई हूँ।"
उस पोस्ट में चोरी के आरोपी बच्चे की प्रशंसा भी थी, और दूसरे बच्चों से कड़ाई से पूछताछ की बात भी। लेकिन आरोपी बच्चे द्वारा दूसरों के डब्बों से पेंसिल निकाल लेने और क्लास भर के गिरे हुए सामान को अपने बस्ते में डालने पर किसी ऐक्शन का कोई ज़िक्र नहीं था।

उस पोस्ट पर शताधिक टिप्पणियों का विमर्श हुआ। अधिकांश में प्रधानाचार्या द्वारा आरोपी बच्चे के पक्ष को पहचानने की समुचित प्रशंसा की गयी थी लेकिन किसी भी टिप्पणी या उसके प्रत्युत्तर में भी आरोपी बच्चे द्वारा अन्य बच्चों की निजता के उल्लंघन का संदर्भ नहीं था। अन्य छात्रों तथा शिक्षिकाओं के होते हुए भी आरोपी बच्चे द्वारा स्वयं ही उधार-वसूली और खोया-पाया विभाग का प्रमुख बन जाने पर भी कोई बात नहीं हुई, न ही किसी ने यह ध्यान दिलाया कि यदि कुछ बच्चे नियमित रूप से पेंसिलें नहीं ला रहे हैं तो शिक्षक को इसकी जानकारी क्यों नहीं है और वे इसके लिये कोई व्यवस्था क्यों नहीं करते। जिन बच्चों से चार पेंसिलें वापस दिलाई गयीं, वे फिर पेंसिलविहीन होकर कैसे लिखेंगे? क्या अब वे इसी छात्र के उधारी-वसूली कार्यक्रम में पुनः भागीदारी करेंगे?

भारत में व्याप्त अराजकता के संदर्भ में मुझे इस घटना का एक दुष्प्रभाव यह भी लगा कि जिन बच्चों ने इस कच्ची वय में शिक्षिका से शिकायत का साहस किया था आरोपी पर कोई कार्यवाही होने के बजाय उन्हीं से 'कड़ाई से पूछताछ' होने और आरोपों को असत्य माने जाने, बल्कि खुद को ही आंशिक दोषी समझे जाने के बाद वे भविष्य में प्रशासन को सूचित करने का साहस नहीं जुटायेंगे। ऐसी घटनाओं के बाद इन सब बच्चों को एक ही प्रभावी संदेश मिलता है कि अपने मामले खुद ही निबटाओ, प्रशासन कुछ करने लायक नहीं। असंतोष के उत्तर में बड़ा असंतोष, और छुरे के जवाब में त्रिशूल बाँटने वाली मानसिकताएँ यूँ ही प्रभाव पाती हैं।

अपने-अपने देश के, और इस धरती के प्रबुद्ध नागरिक होने के कारण अराजकता के संदेश को बदलना हम सबका सामूहिक दायित्व है। हम एक सामान्य नागरिक हों, या कोई प्रशासनिक अधिकारी, हमें ढर्रे से हटकर अपने हर कार्य के दूरगामी परिणामों पर ध्यान देना चाहिये। विशेषकर, यदि हम बच्चों के बीच कार्य कर रहे हैं तो विशेष चेतना की आवश्यकता है।

आपका

2 comments :

  1. अनुराग जी,
    संपादकीय में देश के हालात से जुड़े जो सामयिक एवं ज्वलंत प़श्न आपने उठाये हैं
    उनके लिये इससे अधिक उपयुक्त समय नहीं हो सकता था। इन हालात के लिये प्रशासन की नाकामी और अक्षमता सबसे अहम है इसमें कोई संदेह नहीं। और जैसा आपने स्वयं जिक्र किया है प्रशासन की नाकामी के बावजूद पहले इतने बुरे हालात नहीं थे जैसे कि अब हैं. मुझे तो लगता है एक राष्ट्र के नागरिक के रूप में हम अपनी जिम्मेदारियों पर खरे नहीं उतर पाये। प्रबुद्ध नागरिक किसी लोकतंत्र के दिशाबोध को प्रभावित करने में जो भूमिका निभाते हैं उसका भी नितांत अभाव हमारे यहां दिखाई देता है हमेशा की तरह वे भी खेमों में बंटे हैं धर्म और जाति के अलावा और भी बातें हैं जो बांटती हैं – वामपंथी, दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी, चरमपंथी – सभी अपने अपने घेरों में कैद लगते हैं कुछ अपवाद स्वरूप लोगों को छोड़. यह शायद हमारा दुर्भाग्य ही है कि इतिहास से हम कुछ सीखना नहीं चाहते। वैसे भी विश्वगुरु को सिखा कौन सकता है ?
    जिस अनुशासन की कमी का जिक्र आपने किया है बात अंतत: वहां आकर अटक जाती है। एक सामान्य नागरिक आपनी ओर से सार्थक प्रयास कर सकता है पर जब तक अधिकांश लोग सजग नहीं होते कुछ कह सकना मुश्किल है। मुझे कुछ समय पहले सेतु मे ही प्रकाशित कविता का मिलता-जुलता संदर्भ याद आता है:
    अंतर्विरोध के साये कहां तक छुपायेंगे?
    इतिहास के पन्ने दिखायेंगे हजार बार
    विकृत छायाऐं, बहता दर्द का लावा
    शिराओं कोशिकाओं तक उतर आता;
    आंखों में अपना ही विकृत प्रतिबिम्ब
    आवर्धित हजार बार तिरता चला आता।

    है कैसा यह मोहभंग?
    क्या देख रहा मैं अपनी ही
    पराजित आस्था का लहूलुहान प्रतिबिम्ब?
    अपनी कमियों को छिपाता वैचारिक द्वन्द।
    सारी उपलब्धियों के बावजूद सुनायी दे रहीं
    गौरव गाथाओं के घोष में दबी-दबी
    बेजुबानों की मासूम चीखें;
    इतिहास के धुंधलके को चीर
    सुनायी देता करुण क्रन्दन,
    उदारता, सहिष्णुता की गाथाओं के साथ
    निर्मम क्रूर कदमों की पैशाचिक थिरकन;
    बर्बरता को क्षितिज तक पहुंचाता
    असहाय एवं मासूम की ग्रीवा तक पहुंचता
    संकुचित होती मानवता का उद्दाम नर्तन।

    ये तो न था देश मेरा
    मेरी कल्पना का हिन्दुस्तान
    वो विराट ह्रदय, सर्वस्वीकारी
    वसुधैव कुटुम्बकम का हिमायती
    कैसे मान लूं सीमित है वह छवि
    मात्र कथाओं तक ही?
    इस ज्वलंत प्रश्न को हमें बार-बार उठाना होगा और उसका सामना करना होगा.
    इसे एक बार फिर सामने लाने के लिये और कुछ सार्थक कदम उठाने के लिये
    इस संपादकीय ने प्रेरित किया। धन्यवाद।

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  2. YOU HAVE ADVOCATED TO THINK OUT OF BOX TO HAVE BETTER ADMINISTRATION FOR THE DEVELOPMENT OF THE COUNTRY AND TO BE DISCIPLINED WITHOUT WHICH BETTER ADMINISTRATION IS HARDLY POSSIBLE. THANKS FOR THE THINKING FOR THE CONCERN OF THE COUNTRY.-B.P.PANDEY

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