काव्य: चन्द्रकान्त राय

चलो चाय पीते हैं 

प्रभात की आशा में
रातें जग रही थी
साँसों की गिनती भूलकर
सभी अंधेरे को गिन रहे थे
देश के नक्शे में
विस्तार पाते काले काले धब्बे
एक छोर से दूसरे छोर तक
डाकिया बने फिर रहे थे
झोली खाली थी
पर चिट्ठियाँ बट रही थीं।

होते हाहाकार के बीच किसी ने कहा
मौसम बदलने वाला है
उसे अनसुना करते हुए
किसी और ने कहा
देखते हैं क्या होता है
फिर तीसरे ने कहा
अपनी रोशनी खुद से बनानी होगी
एक चौथा भी था
जो अभी तक चुप था
अचानक वह ठठाकर हँसने लगा
उसकी हँसी, हँसी कम
रूदन ज्यादा लग रही थी
लेकिन तभी पाँचवा
जो अभी अभी शामिल हुआ था
(वह बराबर अंत में ही आता था )
बोला, "चलो चाय पीते हैं।"
***

सूने घर में अगरबत्ती की सुगंध 

आज फिर सुबह हुई है
जैसे रोज होती है
रात जमकर बारिश हुई है
सुबह की धूप
फिर भी उजली नहीं है ।

आज फिर चाय की तलब हुई है
जैसे कि रोज होती है
पर आज रसोई शान्त है ।

आज बिल्ली भी नहीं आयी है
जबकि सुबह सुबह वह
एक चक्कर जरूर लगाती थी
आज चिड़ियों ने भी
मुँह फेर लिया है ।

आज पता नहीं मेरा मन
आँखो से क्यों बह रहा है
लगता है आज फिर से
कहीं कोई रोया है ।

घर उदास है
आज मोबाइल की घंटी
एक बार भी नहीं बजी है
सबकुछ शान्त है
हमारा सूना घर
हमें डरा रहा है
घर धीरे-धीरे मर रहा है ।

सूरज बादलों में
फिर से छिप गया है
बारिश फिर से हो रही है
शायद इस बार
धूप उजली निकले ।

मैं एक अगरबत्ती जलाता हूँ
और खिड़की से बाहर झाँकता हूँ
अगरबत्ती की सुगंध
बारिश में
हवा के सहारे तैर रही है
मुझे अच्छा लगता है
यह खेल मैं
बार-बार खेलता हूँ ।
***
                 
हम आदमी बनने से कतराते हैं

पहले जब कभी
बिल्ली काटती थी रास्ता
तो हम थुकथुका कर
 बढ़ जाते थे आगे
अब करते हैं इंतजार कि
कोई और बढ़े आगे
सारे झंझट वही झेले अकेले

पहले जब कभी चोके से
दिख जाते थे नीलकंठ
तो बिना किसी लोभ लालच के
बताते थे सभी को
बना लो तुम भी
अपना शुभ जतरा
पर आजकल देखते ही नीलकंठ को
उड़ा देते हैं झट से कि
कोई और न देखे

उदाहरण तो बहुत सारे हैं
सभी बकें तो
कविता लम्बी हो जायेगी
और लम्बी बातें हो जाती है हल्की
कविता भी
जब मतलब साफ हो तो
साफ़ ही कहना ठीक है कि
यह कौन सा समय है
जो आदमी को
आदमी होने से रोकता है!
***

उन्हें गुलाब से भी डर लगता है

वह रविवार की सुबह होती थी
जब हमलोग निकल जाते थे उधर
उस बांध पर
जहाँ बबूल के जंगल खूब होते थे

काँटों से बचते बचाते
काँटों को छीलते
सप्ताह भर के लिए करते थे
दतमन तैयार

बबूल के कांटे
बड़े और बहुत पैने होते थे
थोड़ा सा लगे नहीं कि
लहू छर्र से बह जाता
बिना घायल हुए
बबूल से काँटे हटाने की क्रिया
सुनने में भले ही छोटी
और आसान लगती हो
पर यह कठिनाइयों और मुश्किलों के बीच
एक सबक की तरह होता था
जहाँ बबूल के काँटे
हमें मुश्किलों से लड़ने का हुनर
सिखा जाते थे

यह उस समय की बातें हैं
जब मंजन बहुत चलन में नहीं था

हमारे बच्चों ने उस बांध को नहीं देखा है
और न ही देखा है
कांटों भरे बबूल के जंगल को

आज वे इतने डरपोक हैं कि
उन्हें गुलाब से भी परहेज होता है ।
***

उनका हँसना

नदी में बोहा आया है
यह तो आना ही था
परमेसर ने बीड़ी का सुट्टा मारते हुए कहा
रात पहाड़ पर जमकर पानी जो पड़ा है

खेत डूबना ज़रूरी है,
नहीं तो सूखा पड़ जायेगा
हरखु ने बीच में कहा


अब देखो नदी उफनेगी तब न
अभी तो पहले नदी भरेगी
फिर खेतों में पानी फैलेगा
वैसे इस बार समय पर पानी पड़ा है
जिच्छु ने अपना विचार दिया

यदि खेत न डूबे तो
फसल अच्छी नहीं होगी
खेतों में नयी मिट्टी पड़ना ज़रूरी है
कातिक तक नमी बनी रहती है
कलेसर ने अपनी उंगलियों पर
हिसाब लगाते हुए कहा

चलो एक बार नदी हो आवें
परमेसर ने बीड़ी फेकते हुए कहा

सभी साथ हो लिये

पानी तो घटने लगा
जितनी तेजी से उतरा
उतनी ही तेजी से
भाग भी रहा है

सभी उदास हो आकाश को ताकते
थके थके लौट रहे थे कि
मंदिर के पुजारी जी
भागे भागे जाते हुए
बीच रास्ते में मिल गये

हरखु ने टोक दिया

पंडित जी को टोक लग गया
वे कान पर जनेऊ चढ़ाकर
वहीं पास ही बैठ गए

पंडित जी की हड़बड़ी देख
चारों को हँसी आनी चाहिए थी

लेकिन उन्हें हँसी नहीं आयी थी
शायद वे कल हँसें
या फिर दो चार दिन बाद
या फिर कभी नहीं

उनका हँसना
पहाड़ से उतरते पानी पर निर्भर होता है

संपर्क: लेन नंबर 7, सिपाही टोला पूर्णिया-854301 (बिहार)
चलभाष: +91 947 101 2045

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