अंगदान महादान

अंजली खेर

चलभाष: +91 942 581 0540; पता: सी-206, जीवन विहार अन्‍नपूर्णा बिल्डिंग के पास पी एंड टी चौराहा, कोटरा रोड भोपाल- 462 003 मध्य प्रदेश


दस-बारह वर्ष पूर्व अपने पापा को हमेशा-हमेशा के लिए खो चुकी एक बेटी अपने जीवन के सबसे यादगार क्षण यानि विवाह के समय चर्च के बाहरी गेट से अंदर जाने के वक्‍त अपने पापा को याद कर जार-जार रो पड़ी तभी भीड़ को चीरते हुए एक बुजुर्ग व्‍यक्ति आनन-फानन में उसके पास आएँ और उसका हाथ थाम उसे चर्च के अंदर ले जाकर विवाह की रस्मों में जो भी भूमिका पिता को निभाना होती हैं उन्होंने ही निभाई। उस लड़की के साथ ही वहाँ उपस्थित लोगों को यह जानकर हैरानी हुई कि ये व्‍यक्ति वहीं है जिन्हें उसके पिता की मृत्यु के पश्चात उनका हृदयदान किया गया था। जाने-अनजाने उस बिटिया को पिता का प्यार वापस मिल गया। जी हाँ, यह कोई मनगढंत कहानी नहीं वरन् विदेश में घटी एक सच्‍ची घटना है।

हमारी देह ईश्वर प्रदत्‍त एक अनमोल उपहार हैं, इसका अंदाजा हम इस बात से भी लगा सकते हैं कि हमारी मृत्यु पश्चात भी हमारे आंतरिक अंग घंटों जीवित रहते हैं और वैज्ञानिक अविष्‍कारों के चलते किसी व्‍यक्ति की मृत्योपरांत दूसरे जरुरतमंद व्यक्ति को अंगदान करके, न केवल उसे जीवनदान कर सकते हैं वरन् उस पर आश्रित परिजनों का सहारा यथावत् बनाये रखकर उनके दिल से निकली दुआएँ अपने नाम करा सकते हैं।
किसी ने सच ही कहा हैं कि कई बार हमारे जीवन में ऐसी घड़ी जाती हैं जब दवाओं से नहीं बल्कि दुआओं से काम हो जाया करता हैं।

बेशक कुछ पुरातनपंथी मानसिकता के चलते लोगों के मनोमस्तिष्‍क में इस हेतु धार्मिक व सामाजिक भ्रांतियाँ बनी हुई हैं मसलन यदि इस जन्म में हम आँखें दान करेंगे तो अगले जनम में हम सूरदास बन जाएंगे। किंतु ऐसी सोच आज के कंप्‍यूटराइज युग में हमारी कूपमंडूप मानसिकता को प्रदर्शित करती। बेशक ना केवल हमारा मानव जन्‍म, बल्कि हमारे हिस्‍से के सुख-दुख हमारे कर्मों की ही देन होती हैं। यदि किसी के साथ कुछ अप्रत्याशित सुखद घटना घटित होती हैं तब हम कहा करते हैं कि ये सब उस व्यक्ति या तो उसके माता-पिता के सद्कर्मो की वजह से ही हुआ, तो फिर हम इस बात को मानने से क्‍यों इंकार करते हैं कि यदि मृत्‍यु पश्‍चात कोई व्यक्ति अपने शरीर को राख में मिलाने के स्थान पर कम से कम 7-8 मृत्‍यु के आगोश में जकड़े व्‍यक्तियों को नवजीवन प्रदान करेगा तो क्‍या उसकी और उसके परिजनों की लाखों दुआओं से दानकर्ता के परिजनों का जीवन सुखमय नहीं होगा।

इस बात से आप भी सहमत होंगे कि हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्‍य अपने हृदय के टुकड़ों का जीवन सुखमय बनाना हैं और बेशक हम अपने सद्कर्मो से इसे संभव बना सकते हैं। इस हेतु में मेरे विचार से अन्‍य किसी भी प्रकार से दान के तुलना में “अंगदान को एक महादान” की श्रेणी में गिना जाना कोई अतिश्‍योक्तिपूर्ण कथन नहीं है।

मिथकों के अतिरिक्‍त अंगदान प्रक्रिया की सही और सटीक जानकारी के अभाव में भी हम जन-सामान्‍य अंगदान जैसे एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण कार्य को अंजाम देने में पीछे हट जाते हैं पर विदित हो यह कोई जटिलतम प्रक्रिया नहीं वरन् एक अत्‍यंत सरलतम विधि हैं जिसमें कई एन जी ओ के साथ ही भारत सरकार की साइट ‘नेशनल ऑर्गन एंड टिश्‍यू ट्रांसप्‍लांट ऑर्गेनाइजेशन’ पर डब्‍लयू डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू डॉट एन ओ टी टी ओ डॉट निक डॉट इन (www.notto.nic.in) से 7 नंबर का फार्म डाउनलोड कर उसमें अपनी जानकारी के साथ ही परिवार के दो वयस्‍कों के विटनेस साइन लेकर डाक द्वारा नोटो संस्था को भेजना हैं। फार्म भेजने के तकरीबन एक माह बाद ही नोटो संस्था से हमें डोनर कार्ड के साथ रजिस्ट्रेशन नंबर मिलेगा। इस कार्ड को हमें हमेशा अपने पास ही रखना होगा और हाँ अपने अंगदान की इच्‍छा की जानकारी हमें परिवार के सदस्यों को देना बहुत आवश्यक हैं क्‍योंकि अंगदान की अग्रिम कार्यवाही को हमारे निकटस्‍थ और परिजन ही पूरा करेंगे। इसके अतिरिक्‍त देहदान करने के लिए आवेदन पत्र मान्‍यता प्राप्त कॉलेज के एनॉटामी विभाग से ही प्राप्‍त किये जा सकते हैं, याद रखें उक्‍त फार्म कहीं और उपलब्ध नहीं होगा।

”आर्गेन डोनेशन एक्‍ट 1994” के नियमों के अनुसार अंगदान सिर्फ उसी अस्‍पताल में किया जा सकता हैं जहाँ प्रत्‍यारोपण की सुविधा उपलब्ध हो। हमें यह जानकारी होना भी आवश्‍यक हैं कि मृत्‍यु के पश्चात कौन सा अंग कितने समय तक जीवित रहता हैं। विदित हो कि मृत्‍यु के पश्‍चात लिवर 8-12 घंटे, किडनी 24-36 घंटे, हार्ट एवं लंग्‍स 4-6 घंटे, पेन्क्रियाज 12-18 घंटे और आँखें 3 घंटे तक जीवित रहती हैं। ये जानकारी होना इसलिए भी आवश्यक हैं क्‍योंकि परिजनों को अग्रिम कार्यवाही करने हेतु दानकर्ता की मृत्‍यु के पश्‍चात भावनात्मकता की भंवरों में बहने के बजाएँ प्रेक्टिकल सोच रखते हुए त्वरित कार्यवाही करने हेतु मानसिक रुप से सदैव तैयार रहने की आवश्‍यकता हैं।

नि:संदेह हम यही सोचा करते हैं कि अंगदान जैसे महती कार्य को बड़े यानि वयस्‍क लोग ही कर सकते हैं, किंतु हमें यह जानकर हैरानी होगी कि इस कार्य को कुछ घंटों के नवजात शिशुओं से लेकर वयोवृद्ध तक किसी के भी अंगों को दान किया जा सकता है, बशर्ते संबंधित व्‍यक्ति किसी गंभीर या बड़ी बीमारी से ग्रस्‍त ना हो जैसे कि कैंसर, शुगर आदि क्योंकि इन बीमारियों से शरीर के अंदरूनी अंग प्रभावित होते हैं।

इस संबंध में यदि कोई विस्‍तृत जानकारी प्राप्‍त करनी हो तो टोल फ्री नंबर 1800114770 पर प्राप्‍त की जा सकती है।

अभी तक तो हमने मृत्योपरांत अंगदान करने वालों के बारे में हम सुनते आये हैं पर समाचार पत्र में डॉक्‍टर दंपत्ति जो कि संभवत: भारत के पहले लाइव डोनर हैं, इनके बारे में पढ़ा तो उत्‍सुकता और भी बढ़ गई। जी हाँ, नागपुर के पैथोलॉजिस्‍ट डॉक्टर मोहरिल चिकित्‍सक दंपत्‍ती ने जरुरतमंद लोगों को किडनी दान कर न केवल नवजीवन प्रदान किया वरन समाज के समक्ष एक अनुकरणीय मिसाल कायम कर “अंगदान” हेतु आगे आने का संदेश भी दिया हैं।

हम सभी जानते हैं कि विदेशों की तुलना में, इस कार्य में आगे आने वालों की संख्‍या हमारे भारत में बहुत ही कम हैं, जिसके चलते लाखों की संख्‍या में प्रतिवर्ष लोग असमय ही काल का ग्रास बन जाते हैं। एक सुविचार के अनुसार “अंगों की आवश्यकता स्‍वर्ग में नहीं धरती पर है। तो फिर क्‍यों इन्हें जलाया या खाक में मिलाया जाएँ। क्यों न इन्‍हें दान करें”

मैने तो अंगदान की प्रक्रिया पूर्ण कर ली हैं और नोटो संस्‍था से मेरा डोनर कार्ड भी मुझे हाल ही में प्राप्‍त हो गया हैं। यदि मेरे लेख ने आपको किंचित मात्र भी प्रेरित किया हो तो इस पावन कार्य में तुरंत भागीदारी दर्ज करें।

अब ज्‍यादा मत सोचिए, बस नोटो साइट से 7 नं- फार्म डाउनलोड कर आज ही पहली फुर्सत में फार्म सबमिट कर अपने कर्मवाक्‍य को फलीभूत करें

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