वैश्विक सद्भाव की अमर गाथा – रामचरितमानस

दयानिधि सा 

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग प्रमुख, महात्मागांधी स्नातक महाविद्यालय, भूक्ता-768045,
जिला–बरगढ़, (ओड़ीशा)
चलभाष: +91 917 828 1452 ईमेल: sa.dayanidhi2011@gmail.com

शोध सारांश 
विश्ववंद्य संत गोस्वामी तुलसीदास भारतीय काव्य साहित्य के सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय कवि हैं। उनके द्वारा सृजित ‘रामचरित मानस’ भारतीय साहित्य ही नहीं विश्व साहित्य का सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य है। सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में जितनी लोकप्रियता व ख्याति ‘रामचरितमानस’ को मिली, उतनी दूसरी किसी रचना को नहीं। ‘मानस’ ने गोस्वामी जी को विश्व विश्रूत बनाया और तुलसी ने पूरे विश्व को शांति-सद्भाव का पाठ पढ़ाया। ‘मानस’ की लोकप्रियता वेश्विक स्तर पर इतनी बढ़ी कि विश्व की तमाम समृद्ध भाषाओं में यह अनूदित हुआ। यह महकाव्यात्मक कृति विश्व मानवता की सरस सलिला पूरे जगत में प्रवाहित कराने में सक्षम हुआ।

‘रामचरित मानस’ हिन्दी का सर्वोत्कृष्ट राम काव्य है। इस अमर काव्य की रचना चैत्र शुक्ल नवमी मंगलवार संवत् 1631 विक्रमी में हुई थी। यह तुलसी की साहित्यिक मर्मज्ञता, काव्य कुशलता एवं भाव गंभीरता का चरम निदर्शन है।‘मानस’ में राम-जन्म से लेकर राम-राज्यारोहण तक की कथा सरस शैली में वर्णित है। सम्पूर्ण काव्य सात सोपानों में विभाजित है, जो प्रसंगों के शृंखलाबंधन के साथ राम कथा को गतिशील बनाता है। इसके राम-जन्म से लेकर राम-राज्यारोहण तक की कथा को आदि भाग, वन गमन से लेकर सीता हरण तक को मध्य भाग तथा सीता हरण से लेकर रावण वध और राम राज्य की स्थापना को अंतिम भाग में रखा जा सकता है। इस चरित काव्य में क्षत्रिय कुल भूषण मर्यादा पुरुषोत्तम राम मानवीय चारित्रिक विशेषताओं के साथ प्रतिष्ठित हैं।

बीज शब्द – वैश्विक, सद्भाव, अमर, गाथा, रामचरित मानस, विश्व मानवता।

प्रस्तावना
‘रामचरितमानस’ हमारी भारतीय संस्कृति का संवाहक है। यह पूरे विश्व में हमारी उन्नत-सात्विक संस्कृति का जयघोष करनेवाली अमर काव्य कृति है। भारतीय संस्कृति के सत्य, अहिंसा, धैर्य, क्षमा, मैत्री,अनासक्ति, पवित्रता, त्याग, उदारता, निष्ठा, मानवता, प्रेम, शांति, सद्भाव, परोपकार, लोक संग्रह आदि तमाम सात्विक भाव इसमें विद्यमान है। हमारी संस्कृति के इन दिव्य भावों को आत्मसात करके ‘मानस’ महानायक दशरथ नंदन राम अपने संघर्षमय जीवन में तमाम चुनौतियों को पछाड़ते हुए एक ऐसे राम राज्य की प्रतिष्ठा करते हें, जो पूरे संसार के लिए ग्रहणीय है, प्रशंसनीय है। यह संदेश केवल आर्यावर्त के लिए नहीं सम्पूर्ण विश्व ब्रहमान्ड के लिए ग्राह्य है। 

   ‘मानस’ में तुलसी ने राम राज्य की जो अनुपम कल्पना की है वह सभी के लिए आदर्श राज्य है। उन्होंने राम राज्य की कल्पना इसीलिए की, क्यूँकि उस समय का राज्य शासन पूरी तरह से भ्रष्ट हो रहा था। राजाओं की प्रजा विरोधी शासन नीति से आम जन त्रस्त हो रहे थे। समाज में अनाचार, दुराचार, अत्याचार, शोषण, दोहन ज़ोर पकड़ते जा रहे थे। मुग़ल शासक देश की हिन्दू जनता के प्रति कठोर होते जा रहे थे। हिन्दू जनता मुग़ल शासक के शोषण-जाल में बुरी तरह से फँसी हुई थी और अभिशप्त जीवन जीने के लिए विवश हो रही थी। उस समय समाज में धार्मिक प्रपंच बढ़ने  लगे थे। धर्म के नाम पर धर्म के ठेकेदार पाखंडी लोग आम जनता का शोषण कर रहे थे। एसी स्थिति में समाज में क्रांति खड़ा करने तथा आदर्श समाज निर्माण करने का उद्देश्य लिए गोस्वामी जी‘मानस’ के साथ उपस्थित होते हैं। आदर्श समाज या रामराज्य का मूल उत्स भारतीय संस्कृति है और यही रामराज्य का निरूपण पूरे विश्व के लिए ग्राह्य है।

विषय प्रवेश
प्रागैतिहासिक युग से आधुनिक युग तक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के शील, शक्ति और सौन्दर्य विमण्डित अलौकिक व्यक्तित्व के विविध रूपों ने जनमानस को आकृष्ट किया है। भारतीय साहित्य में ‘वाल्मीकि रामायण’ को राम कथा काव्य का मूल स्रोत स्वीकारा गया है। इसका रचना काल श्लेगल, मकोबी, कीथ, वींटरग्रीन सरीखे पाश्चात्य विद्वानों ने ग्यारहवीं शती ई. पू. से लेकर तीसरी शती ई. पू. के बीच माना है। प्राचीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में जीतने भी राम काव्य रचे गए हैं, उनमें गोस्वामी जी का ‘रामचरितमानस’ जनमानस द्वारा जितना समादृत है उतना कोई दूसरा राम काव्य नहीं।

डॉ. विजयेन्द्र स्नातक की यह उक्ति गैरतलब है- “गोस्वामी जी की यह भक्तिभावना मूलतः लोक संग्रह की भावना से अभिप्रेरित है। जिस समय समसामयिक निर्गुण भक्त संसार की असारता का आख्यान कर रहे थे और कृष्ण भक्त कवि अपने आराध्य के मधुर रूप का आलंबन ग्रहण कर जीवन और जगत में व्याप्त नैराश्य को दूर करने का प्रयास कर रहे थे, उस समय गोस्वामी जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के शील, शक्ति और सौन्दर्य से समन्वित अदभुत रूप का गुण गान करते हुए लोक मंगल की साधनावस्था का पथ प्रशस्त किया।”01

“गोस्वामी जी का सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है। उसमें लोक और शास्त्र का ही समन्वय नहीं है- गार्हस्थ्य और वैराग्य का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण और काव्य का, भावावेग और अनसक्त चिंतन का समन्वय ‘रामचरित मानस’ के आदि से अंत तक दो छोरों पर जानेवाली पराकोटियों को मिलाने का प्रयत्न है।”02 तुलसी ने राम के आदर्श चरित्र के माध्यम से भारतीय संस्कृति व सभ्यता का जो आदर्श रूप स्थापित किया है वह विश्व भर में अनुपम व अदभुत है, धर्म- नैतिकता की दृष्टि से सर्वोपरि है। 

  ‘मानस’ में तीन महत्वपूर्ण तथ्य उभर कर सामने आते हैं। तुलसी ने ‘स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा’ कह कर ‘आत्म प्रबोध’ के लिए ‘कीरति भणिति भूति भल सोई, सुर सरि सम सब कर हित होई’ कह कर ‘लोकहित’ के लिए तथा ‘प्रभु सुजस, संगिति भनिति भनि होइहि सुजन मन भावती’ कह कर ‘प्रभु श्रीराम के यश’ के लिए ‘मानस’ का सृजन है। वस्तुतः आत्म प्रबोध, लोक हित और श्रीराम यश तीनों ही ‘लोक हित’ या‘जन कल्याण’ के पर्याय है। इसी लोक हित के बरक्स ‘मानस’ आज भारत वर्ष ही नहीं पूरे चराचर के कलि कलुष का नाश करता हुआ जन हित व विश्व मानवता का मार्ग प्रशस्त करता है। गोस्वामी जी अपनी आंतरिक भावनाएं इन शब्दों में व्यक्त करते हें-
                 “जड़ चेतन जग जीव जत, सकल राम मय जानि।
                 बन्दउँ सब के पद कमल, सदा जोरि जुग पानि।” 03

 पुनः तुलसी ‘मानस’ की ‘चरण वंदना’ में सकल सराचार की विनम्र विनती करते हुए लिखते हैं -
                “देव दनुज नर नाग खग, प्रेत पितर गंधर्व।
                 बन्दउँ  किन्नर रजनि चर, कृपा करहु अब सर्ब।”04

श्रीराम अयोध्या के राज सिंहासन में आरोहण होकर इतना सुगम राज्य संचालन करने लगते हैं कि पूरे राज्य में शांति-सद्भाव स्थापित हो जाता है। अयोध्या नगरी हर्षोल्लास से परिपूरित हो जाती है। तीनों लोकों में अपार हर्ष की लहर छा जाती है। लोगों के दुख- संताप दूर हो जाते हैं। लोगों में मैत्री, शांति, खुशहाली, छा जाती है। सभी लोग वर्णाश्रम धर्म पालन करने लगते हैं। सभी लोगों में परस्परिक प्रेम भाव मजबूत होने लगता है, आपसी संबंध मजबूत होने लगते हैं। समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक परिस्थिति उन्नत व परिमार्जित होने लगती है। लोग शारीरिक-मानसिक-आत्मिक संतापों से मुक्त होने लगते हैं। सभी स्त्री-पुरुष राम भक्ति में लीन रह कर एक दूसरे का आदर करते हुए सांसारिक जीवन जीते हैं। राज्य में गरीबी, भुखमरी, अज्ञानता, उंच-नीच का भेदभाव जैसे अमानवीय प्रवृतियों का नाश हो जाता है।

     रामराज्य का प्रभाव केवल मनुष्य पर पड़ता है सो बात नहीं पशु, पक्षी, वनस्पति सभी प्रभावित हो उठते हैं। राम के राज्य में सभी पशु-पक्षी निर्भय होकर विचरण करते हैं। उन पर मनुष्य का कोई अत्याचार नहीं होता है। जंगल में हाथी और सिंह साथ-साथ विचरण करते हैं। सभी पशु-पक्षी अपना स्वाभाविक बैर भूलाकर आपसी प्रेम से एक साथ रहते हैं। काकभुशुंडि जी गरुड़ के सामने रामराज्य की महिमा गुणगान करते हुये कहते हैं –
  “प्रति दिन अवध आनंद उछाहु, दान दोहीं प्रति दिन नर नाहू।
झूठ प्रपंच दुख नहीं काहू, व्याप न कबहू सुनहु खग नाहु।”05

राम के राज्य में मनुष्य, पशु, पक्षी ही नहीं प्रकृति भी अनुकूल वातावरण निर्माण करने में प्रवीण है। प्रकृति और मनुष्य के बीच एक अटूट रागात्मक संबंध कायम है। उस समय कोई प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करता है। सर्वत्र शीतल हवा प्रवाहित होती है। भ्रमर फूलों का रस लेकर मधुर गुंजार करते हैं और फूल भी अपने चिर प्रेमी भौरे के लिए तुरंत रस टपका देते हैं। नदियां शीतल निर्मल जल के साथ बहती हैं। समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं और अपने-अपने तटों पर असंख्य रत्न डाल देते हैं, जिन्हें लोग सहज ही प्राप्त कर लेते हैं। चंद्रमा अपनी शीतल चाँदनी बिछाकर प्रकृति को मनोहर बनाता है। सूर्य भी आवश्यकतानुसार धूप प्रदान करता है और मेघ मांगने पर मन चाहा बारिश करा देते हैं। उस कल में प्रकृति और मनुष्य के बीच एक संतुलन कायम हुआ था।

उस समय पूरे राज्य में ‘समरसता’ कायम थी। राजा राम प्रजा के लिए सम दृष्टि रखते थे। सभी जनों  को उचित न्याय मिलता था। प्रजावत्सल राम के पास एक बार एक कुत्ता शिकायत लेकर आता है कि एक ब्राह्मण ने उसे मारा है। राजाज्ञा से ब्राह्मण राज सभा में बुलाये जाते हैं और दोषी साबित होते हैं। दोषी को सजा देने के बारे में जब कुत्ते से पूछा जाता है तो वह विनम्रता से कहता है कि उस ब्राह्मण को मठाधीश बना दिया जाय। विप्रवर को पीला वस्त्र पहना कर हाथी पर बिठाकर मठ के लिए रवाना किया जाता है। इस तरह से प्रत्येक प्राणी के साथ समुचित न्याय का प्रावधान राम राज्य में था। तुलसी की वाणी में –
“पूजी चरण गज विप्र चढ़ायो, दुंदुभि बाजत मठ सो आयो।
      कहै परस्पर सब नर-नारी, देखहु श्वान दंड अति भारी।”06

‘मानस’ में भक्ति और ज्ञान दोनों को प्राणी मात्र के लिए अति आवश्यक बताया गया है। तुलसी ने ज्ञान मार्ग का निरूपण करते हुये उसके संपूर्ण अंगों का वर्णन‘ज्ञान दीपक’से किया हैं। क्योंकि अज्ञान और अविद्या का विनाश ज्ञान- दीपक से हो जाता है। पर जब व्यक्ति के अंदर अज्ञान की गांठ छूटने लगती है, तब माया अनेक विघ्न उत्पन्न करती है। कठोर साधन और दृढ़ इच्छा शक्ति से ज्ञान अर्जित किया जा सकता है एवं ज्ञान से ही मोक्ष मिलता है। ज्ञानार्जन के साथ भगवत भक्ति को मनुष्य के लिए सर्वोत्तम मार्ग माना गया है। जैसे भोजन भूख मिटाता है वैसे ही भजन अंतरात्मा की क्षुधा मिटाता है। ईश्वर भक्ति में सेव्य-सेवक भाव अनिवार्य है। इसके बिना मानव जीवन का उद्धार नहीं हो सकता। काकभुशुंडि गरुड़ से कहते हैं कि माया की  भारी भयंकर सेना इस संसार में परिव्याप्त है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि इसके सेनापति हैं। माया के बंधन में पड़कर प्राणी सांसरिक जीवन जीता हुआ अनेक दुख-पीड़ा सहता है। राम भक्ति ही वह मूलमंत्र है जिससे माया से मुक्ति मिल सकती है।
  “भोजन करिअ तृपति हित लागी, जिमि सो असन पचवै जठरानी।
असि हरि भागति सुगम सुख दाई, को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।”07

    ‘मानस’ में कालि कलुष के वर्णन में तत्कालीन समाज की सच्चाई बड़ी शिद्दत से शब्दांकित है। कलिकाल के प्रकोप से धर्म विलुप्त होने लगता है। लोग अधर्म का मार्ग अपनाकर अन्याय, अत्याचार, शोषण, दोहन, हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचर, अनाचार जैसे कुकर्मों में लिप्त रहने लगते हैं। समाज में अराजकता फैलने लगती है। सभी तरफ धर्म का मज़ाक उड़ाया जाने लगता है। राजा-प्रजा सभी लोग पाप ग्रस्त हो जाते हैं। लोगों में सात्विक भाव खत्म होने लगता है। सामान्य जन आचरण की शुद्धता की जगह बाह्य प्रदर्शन में व्यस्त रहने लगते हैं। छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, आदि जन मानस में घर करने लगते हैं। फिर भी इस कलिकाल में जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान का नाम जपने लगता है, पवित्र हृदय से ईश्वर भक्ति करता है उसे भवसागर से गति-मुक्ति मिल जाती है -
“एहिं कलिकाल न साधन दूजा, जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि, संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।”08

    ‘मानस’ की राम कथा वह संजीवनी है, जो मृत अंतरात्मा को पुनर्जीवित कर सकती है। राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान जैसे अदर्श चरित्र प्रत्येक व्यक्ति के निर्माण में सिद्धहस्त हैं। जो कोई व्यक्ति पवित्र मन से राम कथा का गायन-श्रवण करेगा उसका तन-मन पवित्र हो उठेगा। इसमें वह अजेय शक्ति अंतर्निहित है जो व्यक्ति के अंतस को ज्योतिर्मय करके सारे काल-कलुष को दूर करने का सामर्थ्य रखती है। शिवजी के मुख से राम कथा की अमृत वाणी सुनकर देवी अपर्णा, काकभुशुंडि और गरुड़ सभी का जीवन धन्य हो जाता है। काकभुशुंडि और गरुड़ इस कथामृत का श्रवण करके वैकुंठधाम गमन करते हैं। गरुड़ जी गद्गद मन से काकभुशुंडि का चरण स्पर्श करते हुए कहते हैं-
        “मैं कृत्य कृत्य भयउ तब बानी, सुनी रघुबीर भक्ति रस सानी।
        राम चरन नूतन रति भई, माया जनित विपत्ति सब गई।”09

 ‘रामचरित मानस’ एक मिथकीय ग्रंथ ही नहीं एक सांस्कृतिक महाकाव्य है। इसमें लोक नायक राम के माध्यम से अपने समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का सुंदर समन्वय करके दिखाया गया है। तुलसी ने त्रेतया युग के पौराणिक राम कथा प्रसंग को लेकर मध्यकालीन भारतीय समाज के यथार्थ संदर्भों को जितनी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ प्रस्तुत किया है, वह उनकी अद्भुत सृजनात्मक प्रतिभा का ज्वलंत प्रमाण है। ‘मानस’ में दिन-प्रतिदिन परिवर्तित समाज का जीता जागता चित्र खींचा गया है, वह बहुत कुछ आज के यथार्थ जीवन संदभों को प्रत्यक्ष कर रहा है। यह ग्रंथ मनुष्य के बदलते हुए मानवीय मूल्य तथा मनोवृत्तियों का जीवन दस्तावेज़ है।

मानव समाज के बदलते सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक-नैतिक जीवन मूल्यों से साक्षात्कार कराते ‘मानस’ के कथामृत में विश्व को मानवता का अमर संदेश देने की शक्तिमत्ता अंतर्निहित है। डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह के शब्दों में- “भारतीय आध्यात्मिक निष्ठा हमारी हजारों-हजारों वर्षों से चली आ रही सर्वश्रेष्ठ धरोहर है। हमारा सारा जीवन, आस्था, अनास्था, भाव, कुभाव, क्रोध, आलस्य, खीझ सब कुछ उसके प्रति हम में है, फिर भी वह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और एक न एक दिन सम्पूर्ण विश्व को उसके लिए कृतज्ञ होना पड़ेगा। यह भक्ति कविता रावण एवं कंस के साम्राज्यवाद के ऊपर तुलसी के ‘रामराज्य’ तथा गीता के ‘स्वराज्य’ की कविता है।”10 

आज संपूर्ण विश्व एक भयावह दौर से गुजर रहा है। हमारा वैश्विक परिदृश्य अनेक संकटों से घिरा हुआ धूमिल हो रहा है। पूरा संसार अनेक प्रकृतिक प्रकोप से घिर गया है। कहीं सूनामी, तो कहीं बर्फीली तूफान, तो कहीं रेतीली तूफान, तो कहीं सूखा अकाल, तो कहीं बाढ़-प्रलय, तो कहीं भूकंप की तांडव लीला रचकर प्रकृति कहर बरसा रही है। देवभूमि उत्तराखंड में बादल फटने से हुई तबाही तथा भूस्वर्ग कश्मीर में बाढ़ से हुई बर्बादी इसके प्रत्यक्ष गवाह हैं। प्रकृति के शाश्वत नियमों को भौतिकवादी मनुष्य ने जब से तोड़ने का कार्य शुरू किया है और विकास के नाम पर ‘इंडस्ट्रियल प्लांट’ धड़ल्ले से प्रतिष्ठित होने लगे हैं तभी से प्रकृति अपना आक्रोश दिखने लगी है।

‘नेचुरल केलमिटी’ ही नहीं वैज्ञानिक तथा भौतिक आपदाएँ भी मानवता के लिए विराट संकट बनकर खड़ी हैं। आज का मनुष्य वैज्ञानिक आविष्कारों का दुरुपयोग धड़ल्ले से करने लगा है। पूरी दुनिया आतंकवाद, नक्सलवाद, संप्रदायवाद, हिंसा, द्वेष, आपसी कलह, सांस्कृतिक-धार्मिक संघर्ष, हत्या, बलात्कार जैसे संगीन समस्याओं से घिर गयी है। राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक संकट सुरसा की भाँति पूरे संसार को निगलने पे तुला हुआ है। अनेक देश आपस में लड़ मर रहे हैं। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ सभी सदस्य देशों के बीच शांति-सद्भाव कायम करने में  असफल होकर केवल एक कठ पुतली बनकर रह गया है। कोई भी देश‘संयुक्त राष्ट्र संघ’के नियमों का न तो आदर कर रहा है और न ही पालन कर रहा है। संघ का किसी भी देश पर कोई अंकुश नहीं रह गया है। इस तरह से प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था खत्म होने की कगार पर है और तानाशाही शासन अपने ज़ोर पर है।

   इस वैश्विक संकट का समाधान हमारी आध्यात्मिक संस्कृति के पास मौजूद है। हमारी अध्यात्मवादी सात्विक जीवन दृष्टि ही पूरे विश्व को विनाश की इस महा गर्त से निकाल सकती है। और यह अजेय जीवनी शक्ति ‘मानस’ में कूट कूट कर भरी हुई है। ‘मानस’ में अंतर्निहित ‘यूनिवर्सल फ्रेंडशिप’ तथा ‘यूनिवर्सल ह्यूमनिटी’ का सात्विक भाव ही पूरी धरती में विश्व बंधुत्व की प्रतिष्ठा करा सकता है। डॉ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना के विचारानुसार - “‘मानस’ का निर्बल, निरीह एवं निराश्रित जनता से संबंध है। इसमें जगत से अधीर एवं विक्षुब्ध मानव को भक्तवत्सल एवं सर्वशक्तिमान भगवान के समीप पहुंचा कर अस्वास्त करने की अपूर्व शक्ति है। इसमें लोक-जीवन की गहराई तक पहुंचने की अद्भुत क्षमता है। इसलिए यह काव्य ‘रामराज्य’ के उन्नत आदर्श की प्रेरणा देता हुआ विश्व में सुख-शांति के साथ साथ लोकहित की प्रतिष्ठा कर रहा है।”11

निष्कर्ष
विश्व के उपभोक्तावादी तथा विज्ञानवादी प्रभावों से उत्पन्न आज के मनुष्य के संकीर्ण भेद, तुच्छ जीवन मूल्यों के भस्मीभूत हो जाने के बाद ही उनकी राख की ढेरियों से हमारी आध्यात्मिक सात्विक जीवन दृष्टि पुनर्जीवित हो उठेगी और पूरे जगत में शांति-सद्भाव कायम होगा। ‘मानस’ की ‘अमृत वाणी’ हमारे आंतरिक-बाह्य जीवन को प्राण शक्ति देती रहेगी। भगवान विष्णु के त्रेता युग के राम अवतार पर आधारित यह महान कृति तुलसी के युग सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में जितनी प्रासंगिक थी आज इक्कीसवीं सदी में भी उतनी ही प्रासंगिक है। तुलसी अपनी इसी रचनाधर्मिता के लिए‘विश्ववंद्य सन्त’ के रूप में सदैव वंदनीय हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची –
01 हिन्दी साहित्य का इतिहास- सं. डॉ. नगेंद्र, मयूर पब्लिकेशन, नई दिल्ली, प्र. सं. – 1973, पृष्ठ- 189
02 हिन्दी साहित्य- आचार्या हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ- 235
03 रामचरितमानस- टीका- श्री ज्वालाप्रसाद जी, गीता प्रेस, गोरखपुर,पद-7 ग, पृष्ठ-43
04 रामचरितमानस- टीका- श्री ज्वालाप्रसाद जी, गीता प्रेस, गोरखपुर पद-7 घ, पृष्ठ-43
05 रामचरितमानस- टीका- श्री ज्वालाप्रसाद जी, गीता प्रेस, गोरखपुर पृष्ठ-1080
06 रामचरितमानस- टीका- श्री ज्वालाप्रसाद जी, गीता प्रेस, गोरखपुर पृष्ठ-1083
07 रामचरितमानस- टीका- श्री ज्वालाप्रसाद जी, गीता प्रेस, गोरखपुर पृष्ठ-1069
08 रामचरितमानस- टीका- श्री ज्वालाप्रसाद जी, गीता प्रेस, गोरखपुर पृष्ठ-1074
09 रामचरितमानस- टीका- श्री ज्वालाप्रसाद जी, गीता प्रेस, गोरखपुर पृष्ठ-1132
10 कबीर, सूर, तुलसी- भूमिका, विकास प्रकाशन, कानपुर, 2010
11 हिन्दी के प्राचीन प्रतिनिधि कवि, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 1993, पृष्ठ-190

4 comments :

  1. संवत १६३१ कर लें।
    संवत सोरह सै एकतीसा ।
    करऊँ कथा हरिपद धरि सीसा ॥

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  2. बंन्दौ > बन्दउँ
    अवधी में -
    ऐ नहीं अइ, औ नहीं अउ

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  3. शुक्रिया सर! मेरा पहला शोध पत्र प्रकाशित हुआ। बहुत आनंदित हूँ।

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