वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’ का कथा संसार: संघर्ष और सरोकार

पुनीता जैन

पुनीता जैन


प्राध्यापक (हिन्दी), शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भेल, भोपाल
चलभाष: +91 942 501 0223; ईमेल: rajendraj823@gmail.com

मूल हिन्दी में कथा रचना करने वाले आदिवासी लेखकों में वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’ प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी पहली कहानी ‘वह कौन थी’ नयी दिल्ली से प्रकाशित ‘संजीवन’ साप्ताहिक में 4 अगस्त 1965 को प्रकाशित हुई। यह कहानी उनके प्रथम कथा संग्रह ‘लौटती रेखाएँ’ के अंत में संकलित है। विषयवस्तु की दृष्टि से यह धर्म प्रचार व मिशनरी प्रभाव की लघु कथा कही जा सकती है। उनके चार कथा संग्रह उपलब्ध हैं- लौटती रेखाएँ (1980), देने का सुख (1983), जंगल की ललकार (1989) तथा अपना अपना यु़द्ध (2014)। वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’ के प्रारंभिक दो कथा संग्रहों में आदिवासी समाज, संस्कृति और चेतना का स्वर उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति पूर्णतः पीटर पॉल एक्का के प्रारंभिक लेखन की तरह है। वाल्टर भेंगरा अपने तीसरे कथा संग्रह ‘जंगल की ललकार’ में पूरी तरह आदिवासी समाज की चुनौतियों से साक्षात्कार करते हैं। इस दृष्टि से यह उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण कथा संग्रह है। ‘अपना अपना युद्ध’ संग्रह में भी वे आदिवासी अस्मिता व संकट को विषय के केन्द्र में रखते हैं किन्तु आदिवासी प्रश्‍नों से जीवंत मुठभेड़ करती कहानियाँ ‘जंगल की ललकार’ में अधिक प्रभावी रूप से सम्मुख आई हैं। यह संग्रह 1989 में प्रकाशित हुआ है जो स्पष्ट करता है कि इस काल में वाल्टर भेंगरा की कथा दृष्टि में व्यापक परिवर्तन आया है। निश्चित ही यह अस्मिता मूलक आंदोलनों का दौर था। दलित विमर्श इसी समय आकार ले रहा था। आदिवासी चेतना को भी इस समय विशिष्‍ट दृष्टि मिली जिसका संकेत वाल्टर भेंगरा की कथा दृष्टि में मिलता है। 

वाल्टर भेंगरा के प्रथम संग्रह ‘लौटती रेखाएँ’ की कहानियाँ समाज के सामान्य विषयों को लेकर लिखी गयी हैं। युवा जीवन की रूमानियत, शिक्षा, बेरोजगारी, स्त्री -पुरूष संबंध, प्रेम तथा इस पर कठोर नैतिक आग्रह इन कहानियों के केन्द्र में है। ‘वह भी मेरा भाई है’, ‘भूल’, ‘नाता’, ‘प्रेरणा’, जैसी कई कहानियों के चरित्र सामाजिक, नैतिक दबावों के अनुरूप संचालित है। ये स्वतंत्र चरित्र नहीं है। इनमें प्रेम, सेवा, त्याग, बलिदान का आदर्श आरोपित है। प्रारंभिक दो संग्रह के अधिकांश चरित्र आदर्श स्थापित करते हैं और एक काल्पनिक आदर्श संसार के निर्माण में सहभागी है जो लेखक के नैतिक आग्रहों के अनुरूप है। वाल्टर भेंगरा के दूसरे संग्रह की भी कई कहानियाँ स्त्री-पुरूष प्रेम को लेकर लिखी गई हैं। यह लेखक की रचना-यात्रा का प्रारंभिक चरण कहा जा सकता है, जिसमें ‘जल्दी आना’, ‘ऋतु पल्लव’, ‘बंधे हाथ’, ‘सालगिरह की भेंट’, ‘सहजउत्सर्ग’, ‘दृष्टिभ्रम’, जैसी अधिकांश कहानियाँ स्त्री-पुरूष संबंधों में प्रेम, सेवा, उत्सर्ग, त्याग के आदर्शो को भावुकता के साथ प्रमुखता देती हैं। ‘देने का सुख’, कथा संग्रह का शीर्षक ही निस्वार्थ समर्पण, त्याग के आदर्श को बयान करता है। इन प्रेम कहानियों में भावुकता, रूमानियत, प्रेम त्रिकोण और शंका है तो साथ ही आदर्श, काल्पनिक चरित्र भी हैं जो विवाह पूर्व प्रेम को स्वीकार्यता देते हैं किन्तु यह स्वीकार्यता स्त्री पक्ष की ओर से है। प्रेम को प्रमुख विषय बनाकर भी ये कहानियाँ समाज में स्थापित पुंसवादी दृष्टि से अलग जाकर कुछ नया नहीं रचती हैं। अस्तु, ये सामान्य सामाजिक विषयों की कहानियाँ हैं। इनमें से कुछ कहानियाँ निश्चित ही मानवीय धरातल पर अपना प्रभाव रखती हैं। प्रथम संग्रह ‘लौटती रेखाएँ’ में संकलित ‘अंतर्ज्‍वाला’ तथा दूसरे कथा संग्रह ‘देने के सुख’ की ‘ऋतुपल्लव’ तथा ‘ एक थी रानी बेटी’ मानवीय संवेदनशीलता की दृष्टि से उल्लेखनीय कहानी हैं। किन्तु वाल्टर भेंगरा की कहानियाँ का स्त्री-पुरूष संबंध या प्रेम भाव सामाजिक वर्जनाओं, शुचिता के आग्रह और निषेधों के भय से अत्यंत संयमित, सीमित है। यह ‘प्रेमभाव’ आदिवासियत के नैसर्गिक स्वीकार्यता से बहुत दूर है। इन प्रारंभिक कहानियों में आदिवासियत के विचार प्रतिबिम्बित नहीं होते। यह नागर समाज की कहानियाँ है। ‘जल्दी-आना’ या ‘मैं तुमसे घृणा करती हूँ’ कहानियों में स्त्री को भोग्य वस्तु के रूप में देखा जाना पितृसत्ता की वह मनोवृत्ति है जो आदिवासी विचार का हिस्सा नहीं है। वाल्टर भेंगरा की इन प्रारंभिक कहानियों में क्षमा भावना और सेवा के मूल्यों की स्थापना उनके धार्मिक आग्रह के प्रभाव को दर्शाती है। हृदय परिवर्तन की कहानी ‘पियक्कड़’ या क्षमाभाव की ‘मुझे माफ कर दो’; शंका और विश्‍वास की कहानी ‘सहारा’; सेवा, सहयोग व करूणा की कहानी ‘प्रेरणा’ ‘बैसाखी’, ‘योर्स सिंसियरली’; त्यागभाव की ‘दृष्टिभ्रम’, ‘देने का सुख’ आदि धार्मिक मूल्यों के आदर्श सामाजिक रूपांतरण को नाटकीय रूप से प्रस्तुत करती हैं। स्पष्ट है कि इन कहानियों में आदिवासी जीवनशैली, विचार, संस्कृति, दर्शन का प्रभाव प्रायः अनुपस्थित है।

प्रथम कथा संग्रह ‘लौटती रेखाएँ’ की कहानियाँ जो कथा विषय में नैतिक आग्रह को प्रतिफलित करती है। वहीं इन्हीं कहानियों के बीच अंतर्ज्‍वाला’ एक भिन्न विषय को मानवीय संवेदनशीलता के साथ उठाती है। दंगे में भगदड़ और कर्फ्यू के बीच एक बच्ची की रक्षा करने वाला युवक जब पुलिस की मदद से भी उसके माता-पिता तक नहीं पहुँच पाता, तब वह उसका लालन-पालन पूरे मनोयोग से करते हुए स्वयं विवाह से दूर रहने का निर्णय लेता है। लंबे समय बाद जब उसे ज्ञात होता है कि बच्ची अब वास्तव में अनाथ हो चुकी है तब उसका समर्पण और दृढ़ हो उठता है। दंगा, कर्फ्यू, युद्ध आदि की विभीषिका का दुष्प्रभाव पूरी मानवता को आघात पहुँचाता है। यह कहानी मानवीय संवेदनशीलता, दायित्व बोध को अत्यंत सहज रूप से मनुष्य चरित्र की परम आवश्‍यकता के रूप में स्थापित करती है तथा करूणा, त्याग और परानुभूति का ध्वज उठाए बिना मानव प्रेम को, उसके सहज स्वभाव के रूप में सामने लाती है। इसी क्रम में दूसरे कथा संग्रह ‘देने का सुख’ की कहानी ‘ऋतु पल्लव’ में मानवीय सहानुभूति, करूणा की जाति प्रथा पर विजय को दर्शाया गया है जिसमें एक ब्राह्मण कन्या और दलित युवक को एक पिता स्वयं विवाह हेतु स्वीकृति देता है क्योंकि अपरिहार्य स्थितियों में इसी युवक द्वारा पिता और पुत्री हेतु रक्तदान किया गया है। वाल्टर भेंगरा जहाँ प्रारंभिक दो कथा संग्रह में सेवा, क्षमा, प्रेम, त्याग को मिशन भाव से स्थापित करते हैं, वहीं बाद के दो संग्रहों में आदिवासी सांस्कृतिक, आर्थिक विस्थापन, उत्पीड़न व संकट को कथा विषय में पिरोते हैं स्त्री-पुरूष के स्वाभाविक आकर्षण में भी वे सामाजिक, दबाव को दृष्टि में रखते हैं। सामाजिक दृष्टि से आदर्श चरित्रों की स्थापना का प्रयास उनके प्रारंभिक कथानकों को वास्तविकताओं से दूर काल्पनिक संसार में ले जाता है। इस दृष्टि से आदिवासी संसार को कथा विषय बनाते ही वे यथार्थ के कठोर धरातल को स्‍पर्श करते हुए वास्तविक चुनौतियों से मुठभेड़ करते हैं। यही कारण है कि ‘जंगल की ललकार’ नामक उनका तीसरा संग्रह उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानियों का संकलन बनकर सम्मुख आता है। वाल्टर भेंगरा के लेखकीय व्यक्तित्व में सन्निहित आदिवासियत जो प्रारंभ में मौन रही, इस संग्रह में प्रकट होती है। हालांकि यह प्रकटीकरण भी आदिवासी जीवन के सम्मुख उत्पन्न संकट से जुड़ा है। इससे पूर्व के आदिवासी जीवन का वास्तविक सांस्कृतिक, सामाजिक दृश्‍य ये कहानियों, स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत नहीं करती हैं।

‘जंगल की ललकार’ कथा संग्रह में संकलित बारह कहानियों में से अधिकांश महत्त्वपूर्ण है। इस संग्रह की प्रस्तावना में लेखक का कथन है - ‘‘जंगल की ललकार’ और अन्य कहानियाँ छोटा नागपुर वनांचल में उत्पन्न वन- कुसुम हैं। यहाँ के भू-पुत्र एवं पुत्रियों की जीवन गाथा को उजागर करने का यह महज एक संवेदनशील प्रयास है।’’ यह सही बात है कि इस ‘संवेदनशील प्रयास’ द्वारा जंगल की ललकार की अपेक्षा जंगल के रहवासियों के संघर्ष का दृश्‍य अधिक उद्घाटित हुआ है। पीटर पॉल एक्का और वाल्टर भेंगरा दोनों का प्रारंभिक कथा संसार आदिवासियत और उसके जीवन जगत से विच्छिन्न रहा है। जबकि उनके आगे के लेखन के कथाविषय, चरित्र, परिवेश सभी में आदिवासी समाज का प्रतिबिंब उपस्थित है। वाल्टर भेंगरा की कथा भाषा में रूपगत प्रौढ़ता है जो संग्रह की पहली ही कहानी ‘जंगल की ललकार’ में दृष्टिगत होती है जिसमें आदिवासी जीवन जगत के संकट को कथाविषय में सशक्‍त रूप से विन्यस्त किया गया है। विकास के नाम पर जंगल से खदेड़ दिए गए आदिवासियों को वहाँ से लकड़ी काटने की भी मनाही है। जंगल पर पूर्णतः अवलंबित, उसी से आजीविका चलाने वाले आदिवासी समाज पर यह दोहरी मार है। विकास की सर्वाधिक मार इन्हीं आदिवासियों पर पड़ी है। बुदु मुंडा का दोष यही है कि वह बरसात और बेटी के विवाह हेतु जंगल से लकड़ियाँ लाकर संग्रह करता है किन्तु एक दिन रेंजर, गार्ड और पुलिस द्वारा इस जुर्म में कैद कर लिया जाता है। पिता को बचाने गयी मंगरी की लाश बाद में सड़क किनारे मिलती है। कहानी स्पष्ट संकेत करती है कि शंभू सेठ के ट्रक रातोंरात लकड़ी लाद कर शहर में पहुँचाते हैं किन्तु गार्ड, पुलिस इसे चिह्नित नहीं करते हैं। ये विकास की विचित्र अवधारणा है जिसमें प्रकृति के स्वाभाविक रहवासी उससे वंचित ही नहीं किए जा रहे हैं अपितु उनके लिए वन सामग्री भी निषिद्ध है। यह उनके आर्थिक उच्छेदन ही नहीं सांस्कृतिक उच्छेदन का कारण भी बनता है। तीन माह बाद कृशकाय हो लौटे बुदु मुंडा में पुनः जंगल की ओर रूख करने का साहस नहीं है। यह टूटन, विलगाव सामान्य नहीं है न ही ये केवल शोषण है- ये प्रकृति के सान्निध्य में युगों से जीवन यापन करने वाली आदिम समुदाय की जीवंत इच्छाशक्ति पर प्रहार है। यह मानवीय जिजीविषा की जड़ों पर कुठाराघात है। इसी का परिणाम है कि बुदु मुंडा का पुत्र शहर में मजदूरी करने के विकल्प को चुनता है अर्थात् जंगल से पूर्णतः विमुक्त होने की स्थिति का चुनाव। प्रकृति से यह कटाव, दूरी उन्हें उनकी स्वाभाविक सांस्कृतिक शक्ति व चेतना से भी विलग करती है। बुदु मुंडा की पत्नी का खेत को अधबटाई पर देना अन्ततः अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख देना है। यह कहानी एक आदिवासी के जीवन पर विकास के नाम से होने वाली चोट को उनके स्तरों पर जाकर रेखांकित करती है। असहाय और भयभीत बुदु मुंडा खेती की दयनीय स्थिति से तंग आकर पहाड़ी की ढलान पर शराब बेचने को विवश है किन्तु दोबारा जंगल की ओर जाने का साहस प्रशासन व तंत्र द्वारा उसकी देह में नहीं छोड़ा गया है। पीटर पॉल एक्का की एक कहानी ‘जंगल के फूल’ की स्त्री पात्र देह शोषण की शिकार होकर चाय बागान जाना छोड़कर शराब बेचने लगती है। पुलिस की पिटाई, देह शोषण, आदिवासी द्वारा शराब बेचे जाने के पीछे ऐसे कई बड़े कारण कार्यरत हैं। पिता की दुर्दशा से दुखी बुदु मुंडा का बेटा पांडु मजदूर बनने और पलायन के लिए मजबूर आदिवासी का प्रतीक है। विस्थापन, शोषण और पलायन को यह कहानी संवेदनशील रूप से प्रस्तुत करती है। बचपन से पिता की दयनीय स्थिति का गवाह पांडु जब एक बार फॉरेस्‍ट गार्ड को लाको मुंडा, जिसकी पुत्री चानो से उसका विवाह निश्चित है, के घर की ओर जाते देखता है तथा लाको मुंडा के न मिलने पर चानो को ही उनके साथ चलने को विवश होते देखता है। तब आक्रोश से जगी विद्रोही चेतना उसे धनुष तीर उठाने को विवश करती है। चानो को छुड़ाकर उसके जंगल में छिप जाने पर पिता बुदु मुंडा को पुनः छह माह की जेल काटनी पड़ती है किन्तु जब वह लौटता है तो पाता है कि पांडु और चानो गाँव की रैय्यती परती जमीन को खोदकर उसमें अपना जंगल लगाने के लिए छोटे-छोटे ढेर पौधे लगा रहे हैं। जंगल और आदिवासी जीवन की अन्योन्याश्रितता को दर्शाता यह सशक्‍त चित्र है। प्रकृति, सृष्टि और आदिवासी का सहजीवी संबंध आदिम है। यह पर्यावरण के संग सहज अस्तित्व की उनकी मूल जीवन दृष्टि है। जंगल और आदिवासी जीवन के अभिन्न संबंध को दर्शाती इस कहानी को इस तरह भी समझा जा सकता है कि कल्पना संसार से इतर यथार्थ में भी जंगल लगाने की चिंता आदिवासियों में जीवंत है। पूर्वी सिंहभूम के मुटुर खंब गाँव की अड़तीस वर्षीया पद्मश्री तथा कथित ‘लेडी टार्जन’ जमुना टुडू वर्षों से जंगल माफिया से मुठभेड़ करते हुए नए पौधे लगाकर जंगल को घना करने के कार्य में संलग्न है। (जनसत्ता, 13 अगस्त 2019, पृष्ठ-7) इसी क्रम में ‘फॉरेस्‍टमैन’ के नाम से प्रसिद्ध हैं असम के ‘जादव मोलाई पायेंग’, जिन्होंने जीवन के तीस वर्ष लगाकर 1360 एकड़ क्षेत्र में बिना किसी सहयोग के जंगल उगा दिया। (इंटरनेट) इसी तरह कर्नाटक की 107 वर्षीय पद्मश्री साल्लुमरादा थीमक्का ने चार हजार बरगद समेत आठ हजार से ज्यादा पेड़ लगाए और ‘वृक्षमाता’, कहलाई। वस्तुतः यह प्रकृति की चिंता का वास्तविक संसार है। ‘जंगल की ललकार’ के पांडु और चानो आदिवासी संस्कृति के इसी सहजीवी विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं। शहर के ठेकेदार व सभ्य समाज जंगल से केवल लेने का विचार रखते हैं जबकि आदिवासी विचार प्रक्रिया जंगल लगाने, उसका पालन पोषण करने तथा उससे आवश्‍यकतानुसार ही लेने के विचार से सन्नद्ध हैं। शहरी सभ्यता और आदिवासी संस्कृति के इस मूलभूत अंतर को कहानी चरितार्थ ही नहीं करती वरन् लालच बनाम सहअस्तित्व के बड़े अंतर को भी चिह्नित करती है। इस कारण यह वाल्टर भेंगरा की महत्त्वपूर्ण ही नहीं बल्कि प्रतिनिधि कहानी बनने का दावा भी प्रस्तुत कर सकती है।

वाल्टर भेंगरा के इस तीसरे संग्रह की कई कहानियाँ आदिवासी संसार के परिदृश्‍य, उसकी हलचल, संकट को प्रस्तुत करने वाले कथ्य और सघन संवेदनशीलता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं। अतः यहाँ उनके विस्तृत विवेचन की जरूरत है। कथित सभ्य, आधुनिक समाज के जीवन दर्शन और आदिवासी जीवनदर्शन में मौलिक अंतर है। यही अंतर इनमें टकराहट पैदा करता है। इतिहास के कई आदिवासी विद्रोह और उलगुलान को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। जल, जंगल, जमीन और स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को वे अपना नैसर्गिंक अधिकार मानते हैं जो स्वाभाविक भी है। आदिवासी जीवनशैली में अनधिकृत हस्तक्षेप ने उनकी जड़ें हिला दी हैं। 

‘जंगल की ललकार’ के पांडु और चानो की तरह ‘सोमा’ कहानी का आदिवासी चरित्र भी शोषण के विरूद्ध हिंसक होने की जगह रचनात्मक राह चुनता है। यह आदिवसियत की सदियों की संघर्ष और सर्जनात्मक क्षमता है कि वे विपत्तियों का सामना करके बार-बार नयी राह गढ़ने की अनथक यात्रा करते हैं। ये दोनों कहानियाँ इसे स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं। सोमा और बुधनी का प्रकृति के प्रांगण में हंसता खेलता नृत्य, संगीत युक्त उल्लसित जीवन है। हाट में सुरगुजा के बीज बेचने गयी बुधनी से एक दलाल जबरन चतुराई पूर्वक अत्यल्प मूल्य में सुरगुजा हथिया लेता है जिसका वह विरोध करती है। वस्तुतः ये दलाल आदिवासी परिश्रम को महत्त्व नहीं देते तथा उन्हें गंवार, मूर्ख या सीधा समझ कर शोषण करते है। किन्तु सोमा इस कपट को पहचान लेता है और पर्याप्त मूल्य न देने व जबर्दस्ती करने पर डंडा चलाकर दलाल को लहूलुहान कर देता है। उसे जेल हो जाती है किन्तु कृशकाय हालत में लौटकर वह नौजवानों को संगठित करता है तथा शोषण से बचने हेतु उपज की खरीदी बिक्री में सहकारिता द्वारा उचित मूल्य प्राप्त करने के उपाय करता है। परिश्रमी, प्रकृति, प्रेमी व सरलमना आदिवासी मूर्ख नहीं है। यह कहानी उनकी विद्रोह चेतना व संगठन क्षमता का परिचय भी देती है। इस कथा संग्रह की कहानियों में वाल्टर भेंगरा आदिवासी जीवन की अनेक छवियों को उकेरते हुए उनके वैशिष्‍टय, प्रकृति से अंतरंगता, शहरी हस्तक्षेप से उपजे संकट, चुनौतियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए उसे कथा में विन्यस्त करते हैं जिसमें उनकी रचनात्मकता, भाषा कौशल उन्हें पर्याप्त सहायता पहुँचाती है। ‘सोमा’ कहानी का नायक मजबूत है अतः वह एक नयी राह निकाल लेता है किन्तु शोषणकारी शक्तियाँ हमेशा अपने प्रत्येक हथियार का प्रयोग करती हैं और नए नए हथकंडे अपनाती है। ‘संकल्प दीप’ कहानी का लेपा भी दलालों, साहूकारों से बचकर हाट में अपना व्यापार करता है किन्तु ऐसे जागरूक, विद्रोही व्यक्तित्व शोषणकारी शक्तियों की आँखों में खटकते हैं। लेपा और उसकी प्रेमिका सुगनी के भाई सुखराम की हत्या के पीछे यही कारण है। शोषण के विरूद्ध खड़ी मौन चेतना को षड्यंत्रपूर्वक रास्ते से हटा दिया जाता है किन्तु वाल्टर भेंगरा निराश सुगनी के मुख पर इस संकल्‍पशक्ति को दिखा कर विद्रोह चेतना को जीवंत रखने की संभावना को बनाए रखते हैं। वंचित समुदाय में उसके नैसर्गिक अधिकार हेतु संघर्ष चेतना की निरंतरता को बनाए रखने की जरूरत इस कहानी द्वारा स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई। 

पीटर पॉल एक्का की कहानियों की तरह वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’ की कथा रचना में भी आदिवासी जीवनशैली का अभिन्न अंग उनका सांस्कृतिक वैभव बहुत कम दिखाई देता है। इसके स्थान पर उदारीकरण, औद्योगीकरण व कथित विकास के कारण आदिवासी जगत में उत्पन्न संकट को अधिक प्रमुखता से उकेरा गया है। ‘जंगल की ललकार’ ‘सोमा’ ‘संकल्पदीप’ कहानियों में आदिवासी संघर्ष चेतना को केन्द्र में रखा गया है जबकि ‘संगी’, ‘पलास’, जैसी कहानियाँ आदिवासी श्रमिकों के पलायन व शोषण की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं। बाँध निर्माण, जंगल, जमीन से विस्थापन गरीबी, बेकारी का परिणाम पलायन है, जो आदिवासी शोषण, बिखराव के अनेक द्वार खोलता है। ‘बसेरे की ओर’ कहानी के द्वारा इस ओर संकेत किया गया है। गाँव में सूखा व फाँका की स्थिति में गाँव के धूर्त दलाल किसन के साथ बिरसिंह मुंडा का शहर आना, ईट भट्टे पर काम, रिक्षा चलाने, कोयला ढोने के काम में तीन साल तक कुछ अर्जित न कर पाना, गाँव में माँ को खो देना और अंततः प्रेमिका सुकमनी का भी दलाल के चंगुल में फँसकर शहर की ओर पलायन कर जाना - यह एक युवक की त्रासदी हैं। किन्तु स्त्री को यह पलायन देहशोषण की ओर धकेल देता है। पीटर पॉल एक्का की कहानी ‘खोए हुए लोग’ की तरह यह कहानी भी पलायन व शोषण की स्थिति को सामने लाती है।

वाल्टर भेंगरा अपने तीसरे कथा संग्रह में कई उल्लेखनीय चरित्र प्रधान कहानियों की भी रचना करते हैं- चैतु, फुलो, पालू, दुलारी, पंचु इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कहानियाँ है। चैतु कहानी एक गरीब की परिस्थितियों के सम्मुख विवशता का दृश्‍य प्रस्तुत करती है। यह विवशता परिस्थितियों के आगे मनुष्य की संघर्ष चेतना के विलुप्त होने की बेचारगी को अभिव्यक्ति देते हुए कंफन (प्रेमचन्द) कहानी के पिता-पुत्र का भी तनिक स्मरण कराती है। चैतु की जमीन का बॅटवारा, आधी जमीन का बेटी के विवाह के कारण बनिया के पास चले जाना एक किसान की बदहाली की शुरूआत है। बैंक से सूअर , बकरी पालन हेतु कर्ज में दो हजार पर ठप्पा लगवा कर एक हजार रूपए हाथ में आने के बाद स्थितियाँ और बदतर हो जाती हैं। जानवर धीरे-धीरे बिक जाते हैं। आखिरी मुर्गे को हाट में बेचकर नमक, मिट्टी का तेल और कुछ पैसे लिए लौटता हुआ चैतु मित्र के बहकावे में आकर पूरा पैसा हंड़िया पीने में बरबाद कर देता है। घर में सुकनी परेशान है किन्तु नशे में मस्त गाता हुआ चैतु खाट पर पड़ा सोचता है इसी तरह कटता चला जाएगा।’ नियति की मार के सम्मुख ऐसी विवशता और निर्ममता बदहाली की चरम स्थिति का परिणाम है। जिसके कारण एक व्यक्ति संघर्ष करने की इच्छा से ही मुक्त हो जाता है। ‘कफन’ (प्रेमचंद) को याद दिलाती यह कहानी मानव मन की स्थिति का संवेदनशील चित्र खींचती है। इसी तरह ‘फुलो’ कहानी का स्त्री चरित्र भी आदिवासी स्त्रियों की दुरवस्था, जीवन संघर्ष और शोषण का चित्र सम्मुख लाती है। आदिवासी कथाकारों की कहानियाँ में परिवेश या वातावरण की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। जिस नैसर्गिक वातावरण के वे आदी रहे हैं उसी में सेंध लगने से उनकी जीवनशैली, संस्कृति और आर्थिक स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। अतः परिवेश का चित्रण यहाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ ही ‘चरित्र’ को भी कई कहानियों में केन्द्रीय भूमिका मिली है। दरअसल आदिवासी व्यक्ति की जिजीविषा, संघर्ष क्षमता व दृढ़इच्छा शक्ति का परिचायक उनकी जंगल व प्रकृति के कठोर- कोमल रूप से सतत निकटता है, जिसके सान्निध्य में वे जीवन के उतार-चढ़ाव को सहन करते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। पीटर पॉल एक्का की भाँति वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’ की कहानियेां में भी परिवेश के विस्तृत दृश्‍यों के अतिरिक्त चैतु और फुलो जैसी सशक्‍त चरित्र प्रधान कहानियाँ दिख जाती हैं।

‘फुलो’ कहानी में शहर का एक फोटोग्राफर अपने एक पत्रिका के संपादक का पत्र पाकर कुछ दिन के लिए एक गाँव जाता है और आदिवासी जीवन के विविध रूपों को कैमरे में कैद करने का प्रयास करता है। उसके काम का यह हिस्सा उसे गाँव के परिवेश में बाहरी हस्तक्षेप से उत्पन्न शोषण के मार्मिक दृश्‍यों से परिचित करा देता है। गाँव में प्रविष्ट होते ही उसे गार्ड बाबू से झाड़ियों में जूझती , बचती फुलो दिखाई दे जाती है। एक सरल, भोली आदिवासी कन्या जो वनरक्षकों या गार्ड से बचने का प्रयास करती हुई प्रेमी बुदु से जल्द विवाह की जिद करती है। फोटोग्राफर लकड़ी काटते, बोझा बाँधते, उसे सिर पर ढोते हुए उसकी कई फोटो खींचता है। फुलो शराबी पिता से त्रस्त है और उस पर कुदृष्टि रखने वाले बाह्यागतों से लगातार बचने का प्रयास करती है। इसी बीच गाँव में बुदु का क्षत-विक्षत शव बरामद होता है। फोटोग्राफर को गाँव से जाते देख फुलो भी आत्मरक्षा के उद्देश्‍य से उसे साथ ले चलने का आग्रह करती है। किन्तु यह संभव नहीं हो पाता। एक दिन फोटोग्राफर को यही फुलो पहले वन रक्षक के साथ फिर एक कार में सेठ के साथ बैठी दिखती है। कुछ दिनों बाद स्थानीय समाचार पत्र एक ग्रामीण युवती के क्षत-विक्षत शव की तस्वीर के साथ उसकी हत्या की सूचना प्रकाशित करते हैं। यहाँ फुलो और बुदु की हत्या के पीछे वनरक्षक की भूमिका एकदम स्पष्ट हो जाती है। आदिवासी जीवनदृष्टि में लैंगिक समानता का अत्यधिक महत्त्व है अतः बलात्कार, हत्या और जबर्दस्ती जैसी स्थितियों से यह समुदाय प्रायः दूर रहा है। किन्तु जंगल, जमीन से विस्थापन, बाह्य हस्तक्षेप ने उनके जीवन-जगत में क्रूर स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। गाँव में बाहरी व्यक्तियों की कुदृष्टि की शिकार युवती के प्रेमी की हत्या और उसे शहर में बेच दिया जाना, आदिवासी युवतियों के देहशोषण व संघर्ष की अंतहीन कथा है जिसे पीटर पॉल एक्का के अतिरिक्त अन्य आदिवासी कथाकारों की कहानियों में भी दर्शाया गया है। प्रायः आदिवासी जीवन शैली, संस्कृति , उनका कला बोध, नृत्य-गीत संगीत शहरी व्यक्तियों के लिए आकर्षण व अजूबे का केन्द्र बनता है। उनके जीवन के ऐसे दृश्‍यों को कैमरे में कैद करने आए फोटोग्राफर के माध्यम से लेखक ने स्पष्ट किया है कि इन बाहरी दृश्‍यों के भीतर कई करूण दृश्‍य और क्रूर स्थितियाँ हैं जिन्हें कैमरों में कैद नहीं किया जाता। वस्तुतः आदिवासी समुदाय नागर समुदाय से भिन्न अवश्‍य है किन्तु वे मानसिक, वैचारिक रूप से समृद्ध, मानवीय और उदार है। वे प्रकृति, सृष्टि के हितचिंतक हैं, जबकि आधुनिक सभ्य मानव आत्मकेन्द्रित व कई अर्थों में शोषक है। भूमंडलीकरण व पूँजीवाद ने आदिवासियों को जंगल से विस्थापित ही नहीं किया बल्कि उस व्यक्तिवादी सभ्य समाज के सम्मुख बाजार की वस्तु की तरह प्रदर्शन योग्य बना दिया है। उनकी वेशभूषा, आभूषण, नृत्य ही नहीं उनकी स्वाभाविक उन्मुक्त जीवनशैली को फोटोग्राफी की वस्तु बना दिया है। आदिवासी संसार में बाहरी लोगों के प्रवेश और उनके द्वारा सरल लोगों के शोषण के दृश्‍य दिखाती यह कहानी अपनी कथा संरचना में आदिवासी स्त्री की विवशता, बेचैनी, उत्कट संघर्ष को दर्शाती है। फुलो का बुदु से बार-बार विवाह की जिद, अजनबी फोटोग्राफर से साथ ले चलने का आग्रह और गाँव में गार्ड की कुदृष्टि से बचने का प्रयास उसकी भीतरी विकलता को प्रकट करना है। वह शहर को अपने बचाव के रूप में चुनती है किन्तु यहाँ शोषक वर्ग उसके जीवन की श्वासें भी छीन लेता है। शहर में हम प्रायः बाहर से मजदूरों के समूह को सड़क, भवन निर्माण के कार्य में संलग्न देखते है। इन दृश्‍यों के पीछे की सच्चाई व इनकी बदहाली प्रायः अनदेखी ही रह जाती है। वाल्टर भेंगरा के इन दोनों चरित्रों चैतु और फुलो की विपदा आदिवासी जीवन में घुसपैठ कर चुके पूँजीवादी भूमंडलीकरण का प्रतिफल है। पूँजीवादी विकास ने उन जंगलों को उजाड़ा, जिनके साथ आदिवासी जीवन दर्शन जुड़ा है। इन जंगलों, जमीनों के नीचे छिपी अपार खनिज संपदा के लोभ ने आदिवासियत को अत्यधिक हानि पहुँचाई है। उल्लास , उमंगपूर्ण जीवनदर्शन के ग्राही आदिवासी की स्थिति जब उसे ‘जीवन ऐसे भी कट जाएगा’ सोचने को विवश कर देना सामंती पूँजीवादी शक्तियों की आदिवासी जीवन पर विजय है। यही वर्चस्‍वशाली शक्तियाँ फुलो जैसी सरल स्त्री को शहर ले जाकर रौंद डालती है। जबकि ग्रामीण परिवेश तुलनात्मक रूप से भाईचारा व सद्भावना से भरापूरा है, ‘पालू’ कहानी इसे स्पष्ट करती है। जायदाद और बँटवारे को लेकर मतभेद के बावजूद आपसी प्रेम की जगह यहाँ जिंदा है। इसलिए लेखक ‘निर्णय’ जैसी कहानी में उच्च शिक्षित युवक को पुनः गाँव लौटकर अपनी शिक्षा से गाँव को लाभान्वित करने का निर्णय लेते हुए भी दर्शाता है।

आदिवासी जीवन की चुनौतियों को दर्शाती सशक्‍त कहानियों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ‘जंगल की ललकार’ संग्रह के अतिरिक्त लेखक के चौशे संग्रह ‘अपना अपना युद्ध’ की भी कुछ कहानियाँ उल्लेखनीय हैं। इस संग्रह की कहानियों में शहरी जीवन की भी कुछ समस्याओं यथा प्रौढ़ वय में नौकरी छूटना, बेरोजगारी की समस्या, भ्रष्टाचार, घरेलू हिंसा, स्त्री की दृढ़ इच्‍छाशक्ति आदि को दर्शाया गया है। इसमें ‘खखरा’ ‘करमी’ जैसी चरित्र प्रधान कहानियाँ उल्‍लेखनीय हैं। ‘निर्णय’ कहानी की तरह ही ‘खखरा’ नामक व्यक्ति विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद गाँव में लौटता है तथा स्कूल, अस्पताल, कुटीर उद्योगों की स्थापना करता है। फलस्वरूप मीडिया के लोग उसका साक्षात्कार लेने गाँव आते है। ‘खखरा’ या जतरा नामक व्यक्ति के नामकरण का किस्सा भी इस कहानी को रोचक बनाता है। ‘करमी’ कहानी के माध्यम से आदिवासी बहुल गाँवों में जंगली हाथियों के उत्पात पर प्रकाश डाला गया है। वस्तुतः यह आदिवासी इलाकों की एक बड़ी समस्या है। सर्पदंश से पति की मृत्यु तथा दो पुत्रों के शहर पलायन के बाद करमी अधबंटाई पर खेती बाड़ी मंगल को दे देती है। फसल में नुकसान होने पर वह घर पर हंड़िया बनाकर बेचने लगती है। एक दिन इसी हंड़िया की खुशबू से आकर्षित होकर मदहोश हाथियों का समूह घर की दीवार तोड़ कर हंड़िया के घड़े को बाहर खींच लेते हैं बाद में घर की धान पर भी टूट पड़ते हैं। मकान, अनाज की बरबादी के ऐसे दृश्‍य प्रायः दोहराए जाते हैं। गाँव की इस त्रासदी की ओर कई आदिवासी लेखकों की कहानियों में संकेत किया गया है। ‘करमी के जीवन संघर्ष के माध्यम से यहाँ भी इस दृश्‍य को कहानी का केन्द्र बिन्दु बनाया गया है। बच्चों के पढ़ लिख कर शहर पलायन को भी इस कहानी की तरह कई अन्य कहानियाँ मुख्य विषय बनाती है। ‘पोठी’ कहानी अपनी सांकेतिकता द्वारा इस समस्या को अत्यंत मार्मिक रूप से प्रस्तुत करती है। छोटे से घटनाक्रम और दृश्‍य को केन्द्र में रखकर लिखी गयी यह कहानी अपनी कथा संरचना में बिना अनावश्‍यक विवरण के गाँव के दृश्‍य और पलायन के बाद बचे रह गए लोगों की मानसिक स्थिति को प्रस्तुत करती है। हिन्दी के लिए ये परिदृश्‍य अछूते न सही विशिष्‍ट तो हैं ही। कहानी में गाँव के एक परिवार में पिता की मृत्यु, भाई का विवश हो शहर पलायन पीछे माँ और छोटे बेटे बुधन को अकेला कर देता है। अब बुधन खेती और मछली पकड़ने के कार्य संभालने के लिए विवश है। एक सुबह वह खेत किनारे से नदी की ओर मछलियाँ पकड़ने जाता है। आधी टोकरी पोठी मछली पकड़ने के बाद वह सोचता है कि पहले खेतों के पानी में ही गरई, गेतु बुदु मछलियाँ मिल जाती थी क्योंकि लोग गोबर खाद प्रयुक्त करते थे। अब रासायनिक उर्वरकों ने मछलियों व अन्य जीव जंतुओं पर गहरा असर डाला है। अब नदी, नालों में ही मछलियाँ मिल पाती हैं। वस्तुतः औद्योगीकरण, भूमंडीकरण और तथाकथित विकासवादी भौतिक दृष्टिकोण ने आदिवासी जीवन जगत पर व्यापक असर डाला है। सोमा काका और बुधन का संक्षिप्त वार्तालाप ही कहानी में खेत खलिहानों से लेकर गाँव घर तक आए गहरे परिवर्तन की ओर पर्याप्त संकेत कर देता है। खेती में लगातार नुकसान, ग्रामीण युवकों का शहर पलायन, शोषण और बदलाव ही आदिवासी कथाकारों की कहानियों में प्रायः विषयवस्तु बनकर आता है। पोठी कहानी अपनी छोटी सी विषयवस्तु द्वारा प्रभावी तरीके से गाँव और किसान के जीवन में आए परिवर्तन को अभिव्यंजित करने के लिए मछलियों की किस्म का प्रयेाग करती है। रासायनिक उर्वरकों ने गाँव से कई मछलियों को उसी तरह विलुप्त कर दिया है जिस तरह यहाँ के नवयुवक पलायन करने को विवश कर दिए गए हैं। गाँव में पोठी मछलियाँ ही बुधन की तरह शेष रह गयी हैं। बड़े भाई के शहर पलायन और बुधन के गाँव में रह जाने को सटीक रूप से व्यंजित करने वाली कहानी की यह अंतिम पंक्ति व्यापक अर्थ देती है- ‘‘बुधन सोचने लगा, खेतों में गरई, गेतु और बुदु मछलियाँ तो गायब हो ही रही हैं। बस बच गई है यह पोठी मछली।’’ (अपना अपना युद्ध - पृष्ठ 89) सांकेतिकता व प्रभावान्विति की दृष्टि से ये वाल्टर भेंगरा की उल्लेखनीय कहानी कही जा सकती है। 

‘अपना-अपना युद्ध’ कथा संग्रह की दो और कहानियों का उल्लेख यहाँ आवश्‍यक है। क्योंकि ये कहानियाँ नक्सली समस्या और आदिवासी जीवन दर्शन पर बाह्य प्रभाव को रेखांकित करते हुए आदिवासी समुदाय के नित नए संघर्ष को रेखांकित करती हैं। ये कहानियाँ है- ‘लड़ाई जारी है’ तथा ‘एक और मगदलेना’। आदिवासी समुदाय व गाँव कुछ ऐसी चुनौतियों, समस्याओं का भी सामना कर रहे हैं जिसका संबंध अन्य गाँव या कस्बों से नहीं है। नक्सलियों के भय से गाँव में युवकों का विवाह न हो पाना, नक्सलियों के नाम पर आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों द्वारा लूटपाट करना, नक्सलियों के नाम पर पुलिस द्वारा निर्दोषों की धड़पकड़ होना, नेता, पुलिस और नक्सलियों की मिलीभगत ऐसी समस्याएँ है जिसके कारण ग्रामीण नक्सलियों और पुलिस दोनों ओर से प्रताड़ना का शिकार होते हैं। जंगल पर सरकारी आधिपत्य, जमीनों का अधिग्रहण, बाँध निर्माण, कल-कारखानों का निर्माण जैसी गतिविधियों ने आदिवासी जीविकोपार्जन को अत्यधिक प्रभावित किया है - ‘लड़ाई जारी है’ कहानी इस ओर पर्याप्त संकेत करती है। पीटर पॉल एक्का की तरह वाल्टर भेंगरा की भी कई कहानियाँ परिवेश या वातावरण को केन्द्र में रखते हुए कथानक को हाशिए पर ले जाती हैं। यहाँ वे कथासूत्र थामते जरूर हैं किन्तु इसके माध्यम से परिस्थितियों को चित्रित करने में अधिक रूचि लेते हैं। 

वाल्टर भेंगरा की ‘एक और मगदलेना’ कहानी भी नए विषय का स्‍पर्श करते हुए कथित सभ्य समाज और आदिवासी जीवन दर्शन के टकराव को प्रस्तुत करती है। वस्तुतः आदिवासी समाज लैंगिक भेदभाव, यौन शुचिता और छद्म वर्जनाओं पर विश्‍वास नहीं करता। यहाँ ‘घोटुल’ संस्था द्वारा स्त्री-पुरूष को एक दूसरे को समझने की स्वस्थ परंपरा रही है। जबकि कथित सभ्य समाज के प्रभाव में आकर छद्म नैतिकता, वर्जनाओं और निषेधों ने यहाँ भी पैर जमाए है। ‘सुसारी’ नामक स्त्री का फौजी पति उसे नियमित पैसे अवश्‍य भेजता है किन्तु उसकी कभी खोज खबर नहीं लेता। उदासी और अकेलापन सुसारी को काटता है। लोगों के बीच जाने के लिए बाजार या यहाँ-वहाँ भटकती है और संगी जुलतन से भी मिल लेती है। वह बेबाकी से स्वीकार भी करती है- ‘‘जीवन में अगर संगी-साथी न हो न, तो ये लंबी जिंदगी कटेगी नहीं।’’ (पृष्ठ 62 अपना अपना युद्ध) वह संगी जुलतन से भी स्पष्ट कहती है- ‘‘लेकिन संगी, जीवन में आत्मा के साथ शरीर को भी बहुत कुछ चाहिए।’’ इस कहानी की पात्र ‘सुसारी’ कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ की चर्चित पात्र ‘मित्रो’ का स्मरण कराती है जिसमें अपनी ‘देह’ की इच्छाओं को लेकर कोई संकोच भाव नहीं है। सुसारी का जुलतन के साथ उसके गाँव में चार-पाँच दिन रह जाना फिर लौटना सुसारी की सखी फुलो को पसंद नहीं आता। सुसारी का गैर मर्दों के साथ घूमना, रात बिताना वह अच्छा नहीं मानती। फुलो और उसकी माँ उसे रास्ता दिखाने हेतु समझाती हैं। आदिवासी समाज में भी विवाहेतर संबंधों को स्वीकार्यता नहीं है किन्तु यहाँ विधवा विवाह या स्त्री का दूसरा विवाह मान्य है। यह कहानी स्वतंत्र चेतना और नैतिक आग्रह के द्वन्द्व को रेखांकित करते हुए प्रायः नैतिक आग्रह की ओर झुक जाती है। किन्तु निश्चित ही यह कहानी साहसपूर्वक देह की नैसर्गिक जरूरत को कथा का विषय बनाने का प्रयास करती है तथा सांस्कृतिक अन्तर्विरोध को दिखाती है। 

वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’ आदिवासी कथाकार है किन्तु आदिवासी समुदाय की चुनौतियों के अतिरिक्त भी कई अन्य विषयों को कथा के केन्द्र में लाने के कारण उनका कथा संसार वैविध्यपूर्ण है। पीटर पॉल एक्का और वाल्टर भेंगरा दोनों कथाकारों का कथा जगत आदिवासी सांस्कृतिक वैशिष्‍टय को रेखांकित करने से ज्यादा आदिवासी जीवन में पूंजीवादी भूमंडलीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न संकट को उजागर करता है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि आदिवासी समुदायों पर पूँजीवादी विकास का दुष्प्रभाव इन कथाकारों में रचनात्मक उन्मेष जागृत करता है। 

परिवेश के प्रति आक्रोश और एक्टिविज़्म को साहित्य की मानक स्थापनाएँ निषिद्ध मानती रही है। किन्तु विमर्शमूलक लेखन में व्यक्त आक्रोश और प्रश्‍नवाचकता उन स्थितियों को साहित्य में बेनकाब करता है, जो किसी अस्मिता के सम्मुख अस्तित्व का संकट उत्पन्न करता है। विमर्शमूलक साहित्य के लिए शाश्‍वतता बहुत बड़ी सीमा है क्योंकि यहाँ भोक्ता का यथार्थ अनुभव अस्तित्व रक्षा हेतु तत्काल अभिव्यक्ति की माँग करता है। इस स्थिति के बावजूद दलित साहित्य की तुलना में आदिवासी लेखन की दृष्टि में मानव अस्तित्व की रक्षा के बड़े प्रश्‍न धैर्य के साथ सम्मुख आते हैं। आदिवासी लेखन की प्रारंभिक स्थिति में यह बड़ी उपलब्धि है। वाल्टर भेंगरा की कई कहानियों में इसकी झलक मिलती है। ये कहानियाँ सामाजिक परिवर्तन हेतु सशक्‍त साहित्यिक हस्तक्षेप का सफल प्रयास करती है। वाल्टर भेंगरा के कथा जगत में आदिवासी जीवन मूल्य परंपरा, संस्कृति व जीवनदृष्टि को प्रस्तुत करती कहानियों की कमी खलती है। इन सीमाओं के बावजूद ये कहानियाँ सर्वथा अछूती भावभूमि, परिवेश और चरित्र सृजन के कारण हिन्दी कथा संसार के नागर समाज को नए संसार से परिचित करवाते हुए कथित ‘विकास’ के बहुप्रचारित स्वप्न पर विचार करने को विवश करती हैं। पूँजीवादी विकास के दुष्परिणामों व दुष्प्रभाव को प्रकट करने हेतु ये कहानियाँ सार्थक हस्तक्षेप करती हैं और सभ्यतागत और सांस्कृतिक विभिन्नता के बावजूद संपूर्ण मानव जीवन व सृष्टि के महत्त्व के पक्ष में खड़ी होती है।

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