भारत की एक और खोज

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

शाश्वत खोज
जवाहरलाल नेहरू रचित भारत की खोज [1] जैसी कृति अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि रचनाकार द्वारा जो खोजा गया वह मात्र बाहर नहीं अंदर भी था, लेखक के मन में। यह बात कई अन्य रचनाओं के लिये भी सही हो सकती है क्योंकि ऐसे लेखन में रचनाकार का अपना नजरिया भी सार्थक भूमिका निभाता है। ऐसी कृतियाँ खोजित (जो खोजा गया) और खोजकर्ता दोनों का ही चित्रण करती हैं यद्यपि दोनों की भूमिकाएँ व प्रभाव क्षेत्र अलग हैं, परिमाण में और गुणवत्ता में भी। भारत की खोज करने कोलम्बस निकला था पर दिशाभ्रम ने उसे कहीं और पहुँचा दिया। इंडिया तो वह नहीं खोज पाया पर उसने अपने तरीके से ‘’इंडियन’ आविष्कृत कर दिये। वास्को दि गामा सही जगह पहुँच गया और उसने भी एक भारत खोज लिया। दरअसल भारत की खोज एक शाश्वत प्रक्रिया है जो सदैव होती रहती है हर एक के मन में और उसके निष्कर्ष भी अलग हुआ करते हैं जो स्वाभाविक है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर – तथा अन्य अनेक प्रबुद्ध लोगों ने अपने तरीकों से भारत को खोजा, पुनर्परिभाषित किया और उसके संभावित भविष्यपथ निर्धारण में योगदान किया। बहुचर्चित लेखकों में ए एल बाशम [2], वी एस नायपॉल [3, 4], पाल थरू, बिल एटकेन [5] - सभी की खोजों में कुछ है जो हर पाठक को उचित लगेगा और कुछ नहीं भी।

मेरे और आपके - हम सबके अंदर एक भारत है जो कई बार बदलता भी दिखता है पर कुछ है जो अपरिवर्तित रहता है और संभवत: आगे भी रहेगा।  मुझे दोनों की तलाश है - वह जो अपरिवर्तित है, शाश्वत है और वह भी जो प्रवाहमान है बहते जल की तरह। जैसा कि नदी के बारे में कहा भी गया है - “तुम एक नदी में दोबारा नहीं नहा सकते”, भले नाम नदी का वही हो पर जो जल प्रवाह हम एक समय में देख रहे होते हैं वह दोबारा देखने पर आगे निकल चुका होता है और उसका स्थान दूसरी जलराशि ले लेती है। यह निरंतर प्रवाहित होता रहना नदी की नियति है और उसकी सार्थकता भी। वैसे जीवन भी एक प्रवाहमान इकाई है काफी कुछ नदी की तरह और शायद यही वजह है कि भारत में नदियों का अपना महत्व है जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। अपनी पुस्तक ‘सात पवित्र नदियाँ’ में बिल एटकेन [5]: “भारत मानवता का सार है; यह एकमात्र देश है जो जीवन रूपी सरिता के प्रवाह को प्रस्तुत करने का दावा कर सकने की स्थिति में है।”  यह एक लेखक का एक समय पर किसी विशिष्ट संदर्भ मे कहा गया कथन है जिसने लगभग तीन दशकों से अधिक के भारत प्रवास में बहुत कुछ लिखा है जिसमें वे बातें भी शामिल हैं जो ऋणात्मक पक्ष भी प्रस्तुत करती हैं और यह स्वाभाविक ही है।

हर एक का भारत उसके मन में है जो अन्य लोगों के कल्पित भारत से थोड़ा बहुत मेल खा सकता है और कई संदर्भों में नहीं भी। बात चल निकलेगी तो दूर तलक जायेगी, पर बहुत दूर निकल जाने की जल्दी मुझे नहीं। मैं यह समझने के प्रयास में हूँ कि भारत जो खोजा गया है क्या वही मेरा अभीष्ट है या फिर वह भी जो उसे होना था या फिर आने वाले समय में होना है। कहने का मतलब सीधा है कि मात्र खोज तक ही हमें सीमित नहीं रहना है अपितु आविष्कार की भी जरूरत है एक ऐसे भारत की जो उसे होना चाहिये था। पर इसके पहले हमें यह जानने का प्रयास करना होगा कि जो उसे होना चाहिये क्या उसका कोई प्रारूप हमारे पास है और अगर है तो वह सामने लाना संभव कैसे हो सकता है? यह काम सरल नहीं फिर भी करने योग्य है क्योंकि तभी हमें पता चल सकेगा कि हर एक के मन में जो भारत की छवि है उसमें क्या है जो सभी में मौजूद है? साथ ही यह भी पता चल सकेगा कि वे कौन सी बातें हैं [6] जो मुझे भारत के भविष्य के लिये जरूरी लगती हैं और कितने लोग मेरी सोच से मेल खाते हैं?

पहली बात तो यह कि किसी देश की एक छवि वह होती है जो कागज पर है यानि पौराणिक व ऐतिहासिक संदर्भ; और यह भी जान लेना जरूरी है कि आज की जमीनी हकीकत में कितना प्रतिशत है जो कागज की बात से मेल खाता है? दूसरी बात यह कि हकीकत में जो आज है वह समय के साथ बदल सकता है और बदलता भी है। यों मात्र कुछ घटनाओं से किसी देश को नहीं आँका जा सकता पर वह कुछ अगर घुन की तरह लग जाय तब बात की तह तक जाना जरूरी हो जाता है।

जैसा पहले जिक्र किया, भारत का एक चित्र मेरे मन है, वैसे ही जैसे हर एक के मन में और जो सबमें उभयनिष्ठ है वह सामान्यतया भारत का प्रतिनिधित्व करता है। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि जो भविष्यपथ निर्मित हो रहा है वह भारत को कहाँ ले जा सकता है और उसके निर्माण में हमारी क्या भूमिका होनी चाहिये? कहने का अर्थ यह कि जो भारत खोजा गया वह पहले का है और वह जो आविष्कृत होना है क्या उसकी कोई तसवीर हमारे मन में है, अगर है तो क्या है?

एक उदार दृष्टिकोण, मानवीय मूल्यों में गहन आस्था, बहुलतावादी और लोकतांत्रिक पद्धति पर आधारित एक प्रगतिशील समाज - यह है मेरी कल्पना का भारत, जो अपने लिये एक स्वस्थ व सृजनशील भविष्यपथ निर्माण करने में सक्षम है, एक ऐसा भारत जो पश्चिम से आ रही हवाओं के लिये खुला है पर उसकी कार्बन कापी नहीं।

बदलता परिदृश्य
अतीत की दु:खद यादें पीछे छोड़ नव-प्रभात के आगमन के साथ स्वतंत्र राष्ट्र का नयी ऊर्जा के साथ अगला कदम रखना एक विशेष अनुभूति थी। कई सदियों से समंदर पार न जाने की लगभग अंधविश्वासी प्रवृत्ति ने स्वच्छ हवा के जिस झोंके को रोक दिया था वह अब बदल चुकी थी और इसका लाभ मिलना आरम्भ भी हो गया।

पारिवारिक स्तर पर शिक्षा के प्रति एक न्यूनतम लगाव बदली अनुकूल परिस्थितियों में प्रभावी साबित हुवा। यूरोप और अमेरिका में विज्ञान व अभियाँत्रिकी में शोध की लगन सारी पारम्परिक कमियों के बावजूद भारत को एक विशिष्ट स्थान दिला सकने में सफल हुई। बीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों तक भारत की उपस्थिति अमेरिका में लगभग नगण्य थी जो इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक लगभग तीस लाख के आँकड़े तक पहुँच चुकी थी। महत्व केवल संख्याबल का नहीं अपितु गुणवत्ता का भी था। अमेरिका में निवास कर रहे विभिन्न प्रवासी लोगों में भारतीयों का शैक्षिक स्तर काफी अच्छा है और अमेरिका के निवासियों की तुलना में लगभग समान। यह बात न केवल इंजीनियरिंग व विज्ञान के लिये सही है अपितु कुछ हद तक इनके इतर के संदर्भों पर भी लागू होती है जैसे कई वाणिज्यिक व अन्य प्रतिष्ठानों में नियुक्तियों के मामलों में।

एक देश जो अभी अपना घर सुव्यवस्थित करनें में संघर्षरत हो, जहाँ गरीबी अभी भी पाँव पसारे हो, जहाँ आज भी जातिवादी समीकरणों से बाहर निकलना लगभग असंभव दीख रहा हो, जहाँ विकास से जुड़े अनेक मामले अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी नीचे के पायदानों पर हों और जहाँ कमजोर व दलित को इक्कीसवीं सदी में भी न्याय मिलना मुश्किल हो जाता हो वहाँ का प्रवासी शिक्षित वर्ग एक विकसित देश में ‘सफलता की कहानी’ लिख रहा हो यह बात सच होते हुए भी हमें सोचने को मजबूर करती है प्रेरित करती है गहन आत्ममंथन के लिये। गौर से देखें तो इसके कई पक्ष सामने आते हैं जो दर्शाते हैं कि यह सफलता की कहानी एक अन्य संदर्भ में असफलता की भी कहानी है अकर्मण्यता की भी। बात सरल है अगर हम अमेरिका में जाकर सफलता की कहानी लिख सकते हैं तो अपने घर में क्यों नहीं? वही वर्ग जो सफलता के मानदन्ड बाहर निर्धारित करता है अपने देश में क्यों नहीं कर पाता? उत्तर भी मुश्किल नहीं है, यहाँ पर वह माहौल नहीं है साथ ही स्वस्थ व निष्पक्ष प्रबंधन नहीं है। एक राष्ट्र के निर्माण में प्रबंधन की भी अहम भूमिका है वैसे ही जैसे एक स्वस्थ ब्यूरोक्रेसी और राजनैतिक समझ की। हम उस जगह सही काम कर सकते हैं जहाँ प्रबंधन हमें स्वयं न करना पड़े। बात सीधी है हमें अपने सिस्टम पर भरोसा नहीं है और इसके कारण भी हैं।

विचारों को उनके समुचित निष्कर्ष तक ले जाने में किसी सीमा तक तार्किक दृष्टि, वस्तुपरकता तथा श्रेणीबद्ध चिंतन [7] की जरूरत होती है जिसका अभाव साफ दिखायी देता है आज हमारे राष्ट्रीय जीवन में। ये सभी बातें वैज्ञानिक चिंतन का आधार रही हैं और बहुत कुछ उसकी सफलता कारण भी। तार्किक दृष्टि और वस्तुपरकता पर आग्रह हमारे आरंभिक चिंतन में किसी हद तक विद्यमान था पर अब उनका अभाव दिखायी देता है। श्रेणीबद्ध चिंतन का महत्व समझने के लिये हम एकल व रिले दौड़ की तुलना कर सकते हैं। एकल दौड़ में हर धावक अपने में एक इकाई है और उसे किसी से किसी प्रकार के तालमेल की जरूरत नहीं होती जबकि रिले दौड़ में आपसी तालमेल भी उतना ही जरूरी है। रिले दौड़ में पहले एक धावक दौड़ता है और निश्चित दूरी जाने के बाद अपना टोकन दूसरे को थमा देता है, यह दूसरा धावक अपनी निर्धारित दूरी तय करने के बाद टोकन तीसरे धावक को दे देता है। इस दौड़ में हर धावक की फुर्ती तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही टोकन थमाने में अच्छे तालमेल की भी जरूरत है। इसके अतिरिक्त और क्या खास अंतर है रिले और एकल दौड़ों मे? रिले में हर एक धावक थोड़ी ही दूरी तय करता है पर टोकन काफी दूर तक चला जाता है। विचारों के विकास में यही बात लागू होती है। अच्छे तालमेल के अलावा अन्य जरूरी बातें हैं निष्पक्ष व न्यायपूर्ण श्रेय वितरण एवं कुशल प्रबंधन। यदि हर धावक जानता है कि उसे उचित श्रेय मिलेगा तब वह मन लगा कर काम करेगा। यह एक टीम-भावना की दरकार रखता है। हमारा अतीत कितन‍ा शानदार था इसमें ध्यान न देकर हमें यह सोचने की जरूरत है कि अगर वह सब जो हम अतीत के बारे में जानते आये हैं सच है तब अब क्या है जो हम उसे दोहरा नहीं सकते? इस प्रश्न का उत्तर खोजकर भविष्यपथ निेर्माण हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये यदि ऐसा नहीं हो पाता तो हम खुद से ज्यादा उम्मीद करना छोड़ दें यही बेहतर होगा।

हमने पहले जिस विराट सफलता-कथा की बात की है वह मुख्यत: पारिवारिक जीवन की सफलता की कथा है, राष्ट्रीय जीवन कथा की उस सीमा तक नहीं। यह ठीक है कि राष्ट्र परिवारों व लोगों से ही मिलकर बनता है पर वह एक खास अनुशासन की मांग करता है जिसमें वैचारिक अनुशासन भी शामिल हो जाता है। हमने जिस रिले दौड़ का पहले जिक्र किया है वह जिस तालमेल व अनुशासन पर आधारित है कुछ वैसा ही राष्ट्र निर्माण में भी आवश्यक है। दरअसल राष्ट्र-निर्माण एक सतत प्रक्रिया है और यह प्रक्रिया अंदर (यानि हमारे मन में) व बाहर प्रदर्शित घटनाचक्र के रूप में निरन्तर चलती रहती है। साथ ही राष्ट्र की छवि जो हमारे मन में है समय के साथ थोड़ा बहुत परिवर्तित हो सकती है। जो है वह खोज लेने के बाद वह जो होना चाहिये हमारे प्रयत्नों को गति देता है। उस गति की दशा और दिशा हमारे प्रयत्नों की गुणवत्ता व तीव्रता पर निर्भर करेगी।

निश्चय ही मोटे तौर पर भविष्य की रूपरेखा सामने रख कर आगे बढ़ना ही सही तरीका होगा। आजादी के बाद के दशकों में ऐसी एक रूपरेखा प्रस्तुत की गयी थी जो एक संतुलित व परिपक्व वैचारिक पृष्ठभूमि की ओर इंगित करती है। एक परम्परावादी पिछड़े देश के लिये लोकतंत्र का प्रयोग मायने रखता था। गरीबी व पिछड़ेपन के साथ ही धार्मिक व जातीय तनावों के चलते लोकतंत्र का प्रयोग जिस सीमा तक सफल हुआ वह अपने आप में एक उपलब्धि कही जा सकती है इसे समझने के लिये हमें नवोदित राष्ट्रों की सूची पर एक नजर भर दौड़ानी है। पर इस आरम्भिक अच्छी शुरूआत का लाभ हम नहीं ले पा रहे। यह पहली बार नहीं हो रहा जब अच्छे आरम्भ के बावजूद हम वह नहीं कर सके जो कर लेना चाहिये था। क्यों न एक उदाहरण से समझें!

कई हजार साल पहले जब ऋग्वेद का नासदीय सूत्र आकार लेने लगा होगा तब सृष्टि के आरंभ की बात में कल्पना का पुट होना लाजमी था। संदर्भ तब केवल पौराणिक ही हुआ करता था जो स्वाभाविक था। पर जिस संयत तरीके से सृष्टि के आरंभ जैसे जटिल व गंभीर विषय को लिया गया वह प्रशंसनीय है। किसी अन्य धर्म के पौराणिक आख्यान में सृष्टि के विषय में वह संतुलन नहीं मिलता और कुछ सीमा तक यह तरीका विज्ञान विधि से निकट जान पड़ता है जबकि तब संदर्भ केवल धार्मिक या पौराणिक ही हो सकता था।

एक और उदाहरण लेना रुचिकर होगा। दशावतार की बात जिसमें भगवान विष्णु के अनेक अवतारों में पहला मत्स्य अवतार है उसके बाद कच्छप, सूकर, नृसिंह आदि आते हैं। यह संदर्भ भी पौराणिक ही है और कल्पना का पुट लाजमी है पर यह कल्पना भी कितनी संयत व संतुलित है। इस धरती पर जैविक विकास कथा में अलग-अलग चरण विद्यमान थे और आज हम यह जानते हैं कि जल में जीवन का आरंभ हुवा होगा जिसमें मत्स्य आरंभिक चरणों में मानी जा सकती है। मानव की जैविक विकास यात्रा भी मोटे तौर पर इन्हीं चरणों से होकर गुजरी है। एक पौराणिक कथा का यथार्थ के इतना निकट होना – भले ही वह मात्र एक संयोग हो - संयत कल्पना व सहजज्ञान के समन्वय से ही प्राप्त हो सकता है। ये दो उदाहरण काफी हैं यह इंगित करने के लिये कि हमारी सांस्कृतिक शुरूआत संतोषप्रद थी पर इसका लाभ हम नहीं उठा सके और इतनी अच्छी शुरूआत के बावजूद आने वाले समय में एक लम्बा अंधायुग हमें बहुत पीछे छोड़ गया। क्यों हुआ होगा ऐसा?   

रिले दौड़ की अनिवार्यता
इस सवाल का कोई एक सरल जवाब नहीं है पर यहाँ हम पुन: चर्चा करेंगे श्रेणीबद्ध या शृंखलाबद्ध चिंतन की जिसका संक्षिप्त वर्णन पहले किया जा चुका है और जिसकी कमी हमारी अच्छी शुरूआत के बावजूद हमारी प्रगति में बाधक रही है। हम अपनी बात कहना जानते हैं पर दूसरे की बात सुनना या समझना हमें रास नहीं आता। इसकी महत्ता समझने के लिये श्रेणीबद्ध चिंतन की तुलना एक रिले दौड़ से की गयी थी। इन बातों का महत्व और सामर्थ्य समझने के लिये हम एक ठोस उदाहरण लेंगे - आधुनिक विज्ञान के विकास का; सत्रहवीं सदी से बीसवीं तक विज्ञान प्रगति की रफ्तार कितनी तेज थी इसका अनुमान लगाना रोचक होगा। सौर मंडल संबंधी हमारी आज जो जा‍नकारी है वह बहुत पुरानी नहीं। पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं यह सोलहवीं सदी तक ज्ञात नहीं था। निकोलस कोपरनिकस ने सौर-केन्द्रित सिद्धांत सामने रखा जिसका बाद में कैपलर और गैलीलियो ने समर्थन किया। तब से अब तक के मात्र चार सौ सालों में विज्ञान कहाँ से कहाँ पहुँच गया। कैसे? यह वह समय था जब श्रंखलाबद्ध वैचारिक विकास आकार लेने लगा था और वैचारिक स्तर पर रिले दौड़ प्रभावकारी होने लगी थी। विचारों के प्रकाशन की भी इसमें भूमिका थी, साथ ही कोईं बात कहने के पहले दूसरे लोगों द्वारा कही गयी बात को लेकर उसे आगे ले जाने की भावना भी थी। इसके अलावा विश्लेषण विधि व वस्तुपरकता पर विशेष आग्रह दिया जाना भी विज्ञान विधि के त्वरित विकास में सहायक रहा।

आईने के सामने
यह जरूरी है कि इतिहास के आईने के सामने खड़े होकर हम विश्लेषण करें और यह समझने का प्रयास करें कि अच्छी शुरूआतों के बावजूद हम उस लय को बनाये रखते हुए दूर तक क्यों नहीं जा पाते। यह अच्छी शुरूआत हमने लगभग तीन हजार साल पहले की थी जिसका जिक्र किया जा चुका है। आजादी के बाद भी शिक्षा के क्षेत्र में हम सब मिलाकार नवोदित राष्ट्रों में अग्रणी रहे और हमारे कुछ विश्वविद्यालय तथा प्रौद्योगिकी संस्थान एक ‘ब्रांड’ के रूप में जाने जा रहे थे। एक बार वेल्स यूनिवर्सिटी में मेरी कुछ पाकिस्तानी शोध छात्रों से बातचीत हुई थी। बात ही बात में जब उन्हें मैंने बताया कि मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान मात्र पन्द्रह रुपया प्रति माह की फीस दी थी तब उन्होंने यह मानने से इंकार कर दिया, वे यह विश्वास ही नहीं कर सके। बाद में कई अन्य भारतीय मित्रों ने जब इसकी पुष्टि की तब उन पाकिस्तानी छात्रों में से एक ने कहा: अब मेरी समझ में आ रहा है कि आजादी के बाद हमारे दोनों देशों के एक साथ शुरूआत करने पर भी आज भारत विज्ञान व प्रौद्योगिकी में इतना आगे कैसे निकल गया। उसकी समझ में आ गया पर मेरी समझ में तो आज तक नहीं आया कि हर बार अच्छी शुरूवात के बाद हम हाराकिरी क्यों कर बैठते हैं?

शिक्षा में भी यही हुआ, आजादी के बाद के दशकों में जिसे हमने प्राथमिकता देकर एक ब्रांड के रूप में स्थापित कर दिया था वह लगभग एक व्यापार बन चुका है। आज शिक्षा को भी एक धंधा माना जाने लगा है। टटपुंजिया स्कूल अब इंटरनेशनल कहलाते हैं और लाखों रुपये फीस लेकर एक अत्यंत साधारण स्तर की शिक्षा प्रदान करते हैं। ऐसे स्कूल आज देश के कोने-कोने में घास-फूस की तरह उग आये हैं। कई सरकारी स्कूल जहाँ फीस नहीं के बराबर है इन इंटरनेशनल स्कूलों से अच्छी शिक्षा देते हैं। फर्क इतना है कि इन इंटरनेशनल स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है साथ ही दिखावा और फीस काफी ज्यादा।

यही गिरावट उच्च शिक्षा में भी देखने को मिलती है। कुछ विश्वविद्यालयों व प्रौद्योगिकी संस्थानों के अतिरिक्त पहले के अन्य संस्थान स्थानीय राजनीति के अखाड़े बन चुके हैं। केवल प्रतिभा के बल पर अमेरिका जाकर कोई उच्च पद प्राप्त कर लेना असंभव नहीं पर अपने देश में ‘केवल प्रतिभा’ का स्थान नहीं के बराबर हो गया है और ‘पहुँच’ के बिना यह टेढ़ी खीर ही साबित होता रहा है कुछ अपवाद स्वरूप संस्थानों को छोड़। देश में शिक्षा के स‍ाथ यह खिलवाड़ करने की इजाजत कैसे और क्यों दी गयी यह सोचने की बात है। लेकिन जिनके सोचने से कुछ फर्क आ सकता है उन्होंने सोचना लगभग बंद कर दिया है। मेरे जैसे दस-बीस अपना राग अलापते रहें उसे सुनने वाला भी शायद ही कोई हो।

पहले हमने देश मे शृंखलाबद्ध चिंतन की कमी का जिक्र किया था पर अब हालात उस से भी बदतर हैं अब  शिक्षा में या अन्यत्र भी गुणवत्ता का कोई अर्थ नहीं रह गया है। इसका कारण समझना उतना कठिन भी नहीं है। दरअसल कई सदियों की गुलामी और पिछड़ेपन के बाद जब आजादी मिली तब हमें अंग्रेजों से कुछ संस्थान हस्तांतरित हुए जिनमें शैक्षिक संस्थान, कार्यपालिका, न्यायपालिका व रक्षा संस्थान शामिल थे। इन संस्थानों की सुचारु व्यवस्था उनके समय से चली आ रही थी और कुछ इस कारण तथा कुछ अपने प्रयासों से एक मानक बनाये रखने में सफलता मिली जो पहले के संस्थानों के अलावा कुछ नवोदित संस्थानों में भी साफ दिखायी दी। यह पीढी जब अवकाश प्राप्ति की ओर अग्रसर हुई और एकदम नये चेहरे सामने आये तब सरकारी तंत्र और मानवी कमजोरियों का सीधा प्रभाव सामने आता गया और स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती गयी। सरकारी तंत्र की अप्रत्यक्ष दखलंदाजी और प्रबुद्ध वर्ग की असाधारण उदासीनता – दोनों ने मिलकर स्थिति को वहाँ पहुँचा दिया जहाँ आज हम उसे देख रहे हैं।

बात भारत के भविष्यपथ की
हम फिर अपने मुख्य विषय की ओर लौटते हैं कि हमें भविष्य में कैसे भारत की कल्पना है और यह कि उस दिशा में हमारे प्रयास कहाँ तक सफल हो सके हैं। निश्चय ही ऐसा भविष्यपथ अतीत के अनुभवों को ध्यान में रख कर निर्धारित करना उचित होगा। हमारी अब तक की पहचान जो इस संस्कृति को परिभाषित करती आयी है वह एक बहुलतावादी, सर्वस्वीकारी समाज की रही है और यदि हम भारत के आविष्कार को उसकी खोज के साथ समन्वय में रखना चाहते हैं तो सारी कठिनाइयों एवं विसंगतियों के बावजूद इस विशिष्ट पहचान को विरासत के रूप में संभाले रखना जरूरी होगा। जो विसंगतियाँ हमने अनुभव की हैं उनको ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा।। एक उदार, प्रगतिशील, बहुलतावादी भारत जो मात्र उपभोक्ता संस्कृति को विकास का पर्याय न माने मेरे लिये एक आदर्श है जिसमें जरूरत पड़ने पर, मूल सिद्धांतों से समझौता किये बिना, समय-समय पर आवश्यक संशोधन किये जा सकते हैं।

पर इस राह में कुछ कठिनाइयाँ हैं जिन्हें समझना भी जरूरी है। आज की तारीख में बहुलतावादी तसवीर को क्षति पहुँची है, भारत की पहचान को क्षति पहुँची है। यह केवल राजनीति से जुड़ा सवाल नहीं है और इस देश के प्रबुद्ध वर्ग को अपनी वैचारिक निष्क्रियता त्याग कर अपनी भूमिका निभानी होगी। यह तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग खुद खेमों में बँटा है इसलिये यह राह आसान नहीं होगी।

स्वप्निल भावलोक के महान भारत और बीहड़ यथार्थ के महाभारतों तक
स्वतंत्रता के बाद के दशकों में सदियों से दौड़ में पिछड़ते देश ने एक नयी ऊर्जा के साथ अपनी पहचान बनाने का भरसक प्रयास किया. इसमें आरम्भिक भूमिका एक अच्छे नेतृत्व की भी रही. लेकिन आजादी के बाद के कुछ दशकों में नेतृत्व की गुणवत्ता में गिरावट साफ नजर आने लगी, फिर चाहे वह राजनीति से संबंधित हो या शिक्षा से।

वह पीढी जिसने आजादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भाग लिया, मंच से जा चुकी थी और जो मंच पर आसीन थे, वे सुविधाजीवी जीवन के लक्ष्य से अधिक दूर की सोचने में सक्षम न थे। गिरावट की कथा लिखी जाती रही और देश अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति में पिछड़ता गया। इतना जरूर था कि देश लोकतंत्र की  पहचान बनाये रखने में सफल हुआ यद्यपि उस पर खतरे के बादल यदा-कदा मंडराते रहे। सब मिलाकर हम लड़खड़ाकर चलते रहे प्रगति के कठिन पथ पर। आर्थिक प्रगति व प्रौद्योगिकी के विकास के साथ नवधनाढ्य वर्ग जिस भविष्यपथ का निर्धारण करने लगा वह पश्चिमी समाज की भोंड़ी नकल था – एक फूहड़ गैरजिम्मेदार उपभोक्तावाद। इसके साथ ही मीडिया के व्यापक प्रभाव ने अपेक्षाकृत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के सामने उपभोक्ता संस्कृति का एक स्वप्निल भावलोक प्रस्तुत कर एक मृग-मरीचिका के मायाजाल में उसे भी बांध लिया। एक पारम्परिक सोच से जुड़े लोगों को नयी समृद्धि व नव-प्रौद्योगिकी के लाभ दिखायी दिये तब एक संस्कारी समाज ही अपने को बचा सकता था उन मानवीय कमजोरियों से जो नवोदित राष्ट्रों में अक्सर देखने को मिलती है। अपनी समृद्ध संस्कृति के बल पर हमें आशा थी कि हम अपनी विशिष्ट पहचान नये संदर्भों में नये तरीके से ढालने में सफल होते और मात्र पश्चिम की कार्बन कापी बनकर न रह जाते, पर घटनाचक्र देखते हुए अधिक संभावना यही प्रतीत होती है कि हम कार्बन कापी ही बनकर रह जायेंगे। जिस सांस्कृतिक समृद्धि की बात हम करते हैं वह इतिहास है हमें उसकी दावेदारी करने के पहले अपने वर्तमान का पुनर्मूल्यांकन करना होगा जिसे करने से हम हमेशा पलायन करते आये हैं।

 रखना याद - उपजना, पलना
नकारात्मक वृत्तियों का
नहीं सीमित मात्र एकल व्यक्तियों में
जडें उनकी दूर तक हैं
मन की विकृतियों औ कुरीतियों तक
अचेतन की अतल गहराइयों तक।

संतुलित औ विवेकी समदृष्टि लेना
सभीका, तुम्हारा भी फर्ज होगा
अतिरंजित सभी वे कल्पनाएँ
न भटकायें कभी फिर से
ध्यान रखना तुम्हारा संकल्प होगा।

और भी कुछ याद है रखना तुम्हें
मानव मूलत: पशु एक
मस्तिष्क विकसित कर प्रकृति ने
चेतन मन उसे उपहार देकर
द्वन्दमय जीवन दिया है
जो कहीं विकृतियों का स्रोत है
तो सृजन का उत्कर्ष भी है।
विरासत में बोध मिल सकता नहीं
हर एक को राह खुद ही ढूंढना है
इतिहास को ढोते चले जाना नहीं
उससे जहाँ तक हो, सीखना है।
यही गलती सदा हम करते रहे
झूठे दम्भ से पथभ्रष्ट होते ही रहे
उन गलतियों की शृंखला को तोड़ना है
स्वीकार त्रुटियाँ कर स्वयं को जोड़ना है।


आत्ममंथन की जरूरत
यथार्थ कितना ही बीहड़ क्यों न हो परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों मानव-मन की एक विशेषता यह है कि वह सपने देखना कभी नहीं छोड़ सकता। माना कि हर सपना पूरा नहीं हो सकता पर उसे यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित करने में जिस आधारभूत ढांचे और प्रबंधन की जरूरत होती है उसका हमारे देश में नितांत अभाव दीखता है। हम पहले जिक्र कर चुके हैं कि कैसे श्रंखलाबद्ध चिंतन रिले दौड़ की तरह टीम-भावना की अपेक्षा रखता है जिसमें कुशल प्रबंधन, न्यायपूर्ण व्यवस्था और उचित श्रेय वितरण की जरूरत होती है। इन सभी बातों को ध्यान में रख आगे बढना होगा। कोई सरल सूत्र नहीं है इन सब के लिये। सही वैचारिक परिवेश, कुशल प्रबंधन एवं निष्पक्ष कार्यशैली ही हमारे लक्ष्य निर्धारण व उसकी प्राप्ति मे सहायक हो सकती हैं। साथ ही गुणवत्ता से कोई समझौता किये बिना आगे बढना होगा। पिछले लगभग तीन दशकों में शिक्षा का जो व्यवसायीकरण हो गया है उसे भी रोकना होगा [8]।

पर कभी यह भी सोचता हूँ कि यह सब तो बाद की बात है पहले हम समाज में अव्यवस्था, अनाचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार, हिंसा और आर्थिक अपराधों की दिनोंदिन बढ़ती जा रही घटनाओं पर ही नियंत्रण कर लें तो बड़ी बात होगी। हमने बड़े-बड़े सपने देखे थे पर आज की तारीख में सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण जीवनयापन स्वयं एक मरीचिका बनता दीख रहा है। मंगलयान और चन्द्रयान हमें दिनों दिन बढ़ रही अव्यवस्था, बेरोजगारी, प्रदूषण और तनावों से निजात नहीं दिला सकेंगे। मैं स्वयं को स्वप्निल भावलोक के महान भारत और बीहड़ यथार्थ के महाभारतों के बीच भटकता पाता हूँ। भारत सदा से अपरिभाषित रहा है और आज भी वहीं है - जूझता हुआ अपने आप से एक अनोखे महाभारत में या शायद यही उसकी आज की पहचान है।

संदर्भ
[1] J L Nehru, Discovery of India, Penguin India, 2008 (First published 1946).
[2]  A L Basham, The Wonder that was India, Sidgwick and Jackson, London, 1954.
[3] V S Naipaul, An Area of Darkness, Andre Deutsch, London, 1964.
[4] V S Naipaul, India: A Wounded Civilisation, Picador 2010.
[5] Bill Aitken, Seven Sacred Rivers, Penguin India, 1992.
[6] C M Bhandari, Discovering, Inventing India, Muse India, Nov – Dec 2015.
[7] वन्द्रमोहन भंडारी, परिवेशीय सृजनशीलता: हिंदी संसार का सच, सेतु, अक्टूबर 2018.
[8] चन्द्रमोहन भंडारी, यादों के झरोखे से: स्वातंत्र्योत्तर भारत का एक विशिष्ट सृजनशील कालखंड, सेतु, नवम्बर 2019.

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