काव्य: पल्लवी मिश्रा

पल्लवी मिश्रा

 - 1 -

रेत रेत हुए जाते पहाड़
खण्डित होता हिमालय का दर्प
जिन पर सँजोई संजीवनियाँ
चढ़ाई जाने लगी है
घाटी की चरम महत्वकांक्षाओं
की बलिवेदी पर।

अपनी उजली बर्फ़ की चादर
समेटने लगता है हिमालय
ज़्यों देवदारों में सनसनाती हवा
फुसफुसा जाती हैं उसके कानों में
घाटियों में घूमती
सत्यकथाएँ।

दरकते पहाड़
सिकुड़ते बुरांश
कि ऊँची हो चुकी है
हिमालय से अधिक
घाटियों की क्षुद्र महत्वकांक्षाएँ।

रेत रेत पहाड़
टूटते शिलाखंड
उन्हीं घाटियों में रचे षड्यंत्रों पर
हिमालय का प्रहार
रेत होते पहाड़
रेत किए देते हैं
घाटियों का अनर्गल दम्भ।

हिमालय के हुँकार पर
ज़्यों फटते हैं बादल
फफक पड़ती हैं नदियाँ
पिता की वेदना पर
उमड़ आती है
गंगा की अश्रुधार
जो बहा ले जाना चाहती है
रेत का हर वह कण
जो चुभता हो
पिता की आँखों में।

प्रकृति-पुरुष!
हिमालय की सौभाग्यदायिनी पुत्रियों का
अखण्ड रखना सौभाग्य का दर्प
कि जीवनदायिनी बनी रहे
हिमालय की पुत्री।
विशुद्ध रहे गंगाजल
विषाक्त किनारों से
बह कर भी।

प्रकृति-पुरुष!
बनाए रखना हिमालय की देहरी पर
देव-स्थानों का सम्बल
जो थाम लें बढ़कर कर हिमालय को।
कर सकें उसका आलिंगन
कह सकें मुस्कुरा कर
कि देवस्थल पर तो विराजमान हैं देव
उसकी ही सौभाग्यवती पुत्री के साथ।

बना रहे हिमालय का दर्प
धैर्य धर सके पृथ्वी
गुंजायमान होती रहें घाटियाँ
घंटाधवनियों से
कि क्षीण हो सके फुसफुसाहटें
अनगिन शंखों की
मंगल-ध्वनियों से।

            - 2 -

गुलाब की पंखुड़ियाँ
तुलसीदल,
आरती वाले घाट,
कपूर की खुशबू
मंत्रोच्चार,
कितना कम कर पाते हैं,गंगा?
सदियों से तन पर पड़े
बेहिसाब घावों की पीड़ा।

तुम कितना छुपा पाती हो, गंगा?
कितना छोड़ देती हो दुख
उलझे, अधखुले बालों सा
ज़्यों नहीं होता मन,
उन्हें सुलझा लेने का
जब आत्मा पर पड़ा घाव
बिलखता जाता है ।।

तुम कितना मुस्कुरा लेती हो, गंगा?
सजा लेती हो दियों की बिंदी
ज़्यों उमड़ आती है घाटों पर
अतिथियों की भीड़।

अपने सज पाने
मुस्कुरा लेने
छुपा लेने की कहानियाँ
कभी मन हुआ
तो कह जाना, गंगा।
थम कर नहीं
बह कर ही गंगा।
कह जाना कि
सीता नहीं हो पाई गंगा
धरती ने नहीं किया कभी
गंगा से
सीता सा प्रेम।

कह जाना कि
कितने फ़ूल, दिए, धूप ,चन्दन, गुलाब
चढ़ा दिये गए
उठाए गए मेले
बेघर हो जाने का दुःख
जलता रहा हर क्षण
चिताओं की ताप लिए।

            - 3 -

पतझड़ी पत्तों पर चले पैरों से
निकली पतझड़ी धुन
जब बन जाएगी संस्कार-गीत - अविस्मरणीय,
जब-जब उठ आया करेंगे क़दम
जंगलों की ओर,
पतझड़ी पत्तों की पुकार पर
उसी दिन से सदाबहार के पेड़
हो लेगी पृथ्वी।

पलाश, अमलताश, गुलमोहर,
मालती, शिउली, पारिजात की लंबी कतारें
जब देने लगेंगी सड़कों का पता
उन्हीं दिनों से
अपनी चिरंतन सूर्य- परिक्रमा पर निकली पृथ्वी
ले जाया करेगी अपने आँचल में
सुगंधित शिउली की पंखुड़ियाँ
गंध रहित पेड़ों के डोले पर
विश्राम का सुख लेती पृथ्वी
हो लेगी भारहीन
असीमित पोषण के कर्तव्यों से।

नीम, बरगद, पीपल, पाकड़
ज़्यों देने लगेंगे बस्तियों और कस्बों का पता
पृथ्वी -
बसी रहेगी किसी वाल्मिकी की कुटिया में
अपनी अबोध बालिका को ढूँढने का उपक्रम करती
जो छुपी रही जंगलों में, कुटियों में
अनजान राजमहलों में।

ऋषि कण्व की सुकुमार कन्या सी
जिस दिन सजने लगेगी पृथ्वी
वन-तुलसी की मालाओं से
उसी दिन से
जन्म लेने लगेंगे
भारत जैसे पराक्रमी पुत्र।

तपती, जलती रेत पर
दौड़ती, भागती छाँव को आतुर गंगा
जीती जाती है पीहर से बिछड़ने का दुःख
जहाँ इठलाती धार को बढ़ कर थाम लिया
करते थे हिमालयी वटवृक्ष और लताएँ।
जिस दिन बहेगी गंगा
बरगद और कदम्ब के छाँव तले
पृथ्वी के समग्र दुःख
विसर्जित हो लेंगे
गंग- तरंग में।

जिस दिन ताल, पोखर, सरोवर किनारे
उगने लगेंगे रुद्राक्ष और अशोक
पृथ्वी एकाग्र हो
रचने लगेगी सुमधुर कविताएँ
जो गूँजा करेंगी देवदारों में।

                - 4 -

ज़्यादा करीब न आओ, रुपहले चाँद
आसान नहीं
धरती-सा होना,
प्रेम में भी।

धरती का निर्विकार प्रेम-
धुन है
धुरी है
ध्यान है
जीवन का उन्माद है।

तुम-सी हो नहीं सकती धरती
धरती मात्र कला नहीं, कल्पना नहीं
अंतरिक्ष का
संस्कार है।

तुम-सा
घटता बढ़ता नहीं
धरती का प्रेम।
तब भी
पूजे गए नक्षत्र
औऱ
निहारे जाते रहे हो तुम।

जिस दिन पूजी जाएगी धरती
उग आएँगे-
बहुप्रतीक्षित ब्रह्मकमल
हो सकेगा,
धैर्य धरती देवियों का श्रृंगार।

जिस दिन पूजी जाएगी धरती,
घट जायेंगे घाट और मसान
प्रीतिकर हुई जाएँगी
वेश्यालयों की लकीरें।

धरती वालों ने
चिरकाल से-
बिसारी है धरती,
ढूँढा है नक्षत्रों में
अवसादी सुख,
उठाया है भ्रमों का कारोबार
निहारा है चाँद का आईना
किये हैं रिक्त,
धरती के सीने में बसे
मानसरोवर।

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