काव्य: अपने घरों से... (राजेश भारद्वाज)

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1.

अपने घरों से
दूर मत जाओ
वे उदास हो जाते है
अकेलेपन में
जर्जर
वे जल्दी  मर जाते है।

घर के चूने में
पिता का पसीना
माँ के आँसुओं
की सीलन है

कहते है
घरों में
पुरखों का वास है ।

पता नहीं क्यूँ
घर के बाहर
कभी वह
नींद नहीं आती।


2.

घरों को मिलाकर
ही तो शहर बनते हैं
जिनकी अपनी
तहज़ीब होती है

तुम दूर जाते हो
शहर अपनी
पहचान खो देते है

तुम जहाँ भी जाओ
थोड़ा शहर साथ चलता है
और
थोड़े तुम भी
छूट जाते हो
शहर में।

उसी की मिट्टी से
बने हो तुम।
और तुम से
बना है वह।

1 comment :

  1. घर से प्रत्‍येक व्‍यक्ति का आत्मिक रिश्‍ता होता है और वह उतना ही सजीव और संवेदनशील भी, जितना कि कोई भी पारिवारिक रिश्‍ता। उस सजीवता को अनुभव करना सही मायने में मानवीय रिश्‍ते की सही पहचान है। इस सुंदर भाव को ये दोनों कविताएं बेहतर ढंग से व्‍यक्‍त करती है, शुभकामनाएं।

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