आकृतियों के समंदर में मोती की तलाश

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी


साकार और निराकार

विश्व में जो भी अस्तित्ववान है उसमें संभवत: सबसे जटिल मानव मस्तिष्क एवं उसकी कार्यविधि है मन उसी कार्यविधि को परिभाषित करता है ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा। आज की हमारी जानकारी के अनुसार जैविक विकास प्रक्रिया के फलस्वरूप समस्त जीव-जगत अपने पूरे विस्तार और वैविध्य के साथ इस धरती पर विद्यमान है। मन की यह जटिलता मुख्यत: चेतना के उद्भव एवं विकास से जुड़ी है जो हमारे चिंतन, मनन, लेखन, पठन-पाठन का आधार भी है। इसी चेतना के द्वारा हम विश्व को समझने का प्रयास करते रहे हैं वही हमारी सांस्कृतिक विकास यात्रा का उद्गम भी है। निश्चय ही मन मस्तिष्क पर आधारित है कुछ वैसे ही जैसे कम्प्यूटर पर चलाया जाने वाला कोई सॉफ्टवेयर। कई मामलों में कम्प्यूटर हमारी अपेक्षा बहुत तेजी से काम कर सकता है पर कुछ बातों में मानव मस्तिष्क और मन की गुंथी-उलझी जटिलता का कोई विकल्प नहीं। जब वैचारिक स्तर पर जटिल स्थिति से गुजरना होता है तब अमूर्त धारणाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती  हैं। जीवन का अनुभवजनित यथार्थ साकार-निराकार, मूर्त व अमूर्त में गुंथा-उलझा प्रतीत होता है जिसके एक पक्ष की झलक यहाँ देखेंगे।

विश्व व उसकी घटनाओं को समझने के प्रयासों में कई बार वस्तुपरक एवं तार्किक दृष्टि ली जाती है जो विज्ञान विधि के निकट है। दूसरा प्रयास उसके कलात्मक पक्ष को लेकर है जो जीवन के अनुभवजनित यथार्थ से जुड़ता है। अपनी सुविधा के लिये यह वर्गीकरण हमने किया है और एक धारणा बना ली है कि विज्ञान और कला एक दूसरे से अलग असम्पृक्त विधाएँ हैं और यह कि एक की चर्चा में दूसरे की कोई विशेष भूमिका नहीं। कुछ गहरे उतरने पर लगता है कि यह सोचना सदैव सही नहीं होता और कुछ विशेष स्थितियों में दोनों एक दूसरे के निकट आ जाते हैं । यहाँ मुख्य चर्चा इसी पक्ष को लेकर है कि विश्व प्रक्रियाओं को विज्ञान विधि से समझने के प्रयास में हमें उनकी सौन्दर्यानुभुति को नजरअंदाज करना ही पड़े यह आवश्यक नहीं। कवि का मन ऐसी ही किसी तलाश में कह उठता है:

मैं डुबकी लगाता हूँ
आकृतियों के समंदर में
तलाशने वह अमूल्य मोती - निराकार।
(रवीन्द्रनाथ टैगोर, गीतांजली से, अंग्रेजी से अनुवाद लेखक द्वारा)

यहाँ जीवनानुभव की गहराई को आत्मसात करने का प्रयास है तार्किक विवेचन का नहीं। वैसे यह सवाल मन में उठ सकता है - कैसा है यह मोती, वह भी निराकार? मोती की पहचान ही उसकी आकृति की वजह से है तब फिर निराकार मोती? कवि की उड़ान का यही स्वरूप है और यही कलात्मक अनुभूति उसकी पहचान है। यह अलंकारों की भाषा है जनाब, ये कोई गणित या विज्ञान नहीं है यह कला है जो मन के एक हिस्से की जरूरत है और पहचान भी। और फिर इस तरह के उदाहरण तो ठोस विज्ञान के धरातल पर भी दिख जाते हैं। जिन्हें हम अलंकार या मैटाफर कहते हैं वह भी हमारे मस्तिष्क की बनावट और बुनावट में शामिल है  यानि यह सब केवल मानव की अपनी खूबी नहीं अपितु प्रकृति को इस श्रेय का बड़ा हिस्सा मिलेगा क्योंकि मस्तिष्क के न्यूरोनी कनेक्शन [1] में अलंकारों के लिये प्रावधान है।

वैसे यह स्पष्ट कर देना भी जरूरी है कि इसका प्रावधान किसी ने सोच-विचार कर रखा हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। इतना जरूर कह सकते हैं कि जैविक विकास प्रक्रिया के तहत मानव मस्तिष्क का विकास कुछ इस प्रकार हुआ जिनसे मानव को भाषा ज्ञान, सूचना संप्रेषण और अमूर्त चिंतन में विशेष कठिनाई नहीं हुई। इतने विकसित मस्तिष्क के होते यह सब देर-सबेर होना ही था।

अमूर्त चिंतन सभी विधाओं में

अमूर्त चिंतन हमारे विकसित चेतन मन की सबसे अहम पहचानों में एक है और जैसे जैसे मस्तिष्क की जानकारी बढ़ रही है भानमती के कई पिटारे खुलने को हैं और कुछ खुल भी चुके हैं। भाषा में अलंकार के प्रयोग की बात पहले की गयी है कि यह प्रावधान मस्तिष्क की संरचना में विद्यमान है और इसीलिये हमें अलंकार का प्रयोग करने में कोई खास परेशानी नहीं होती। इसी तरह अमूर्त धारणाओं के लिये भी प्रावधान मौजूद हैं। मोटे तौर पर यह भी पता लग चुका है कि कुछ अमूर्त बातों के लिये मस्तिष्क का अगला भाग (Frontal Lobe) विशेष रूप से जिम्मेदार है।

अमूर्त की बात करें तो कई तरह की बातें सामने आती हैं पेन्टिग में अमूर्त का चलन हो चुका है जिसमें किसी वस्तु का सरल व प्रत्यक्ष चित्रण न होकर अप्रत्यक्ष चित्रण किया जाता है जिसमें रेखाओं, रंगों आदि के प्रभाव से बात कहने का प्रयास होता है। इसमें आकृतियों का प्रयोग भी संभव है पर वह प्रत्यक्ष नहीं होना होगा। कविता में भी अमूर्त की बात हुआ करती है पर यह कहना कठिन है कि उसकी सार्थकता का क्या मानदंड होगा? पर जो बात अधिकतर लोग शायद नहीं जानते कि अमूर्त का गहन एवं विस्तीर्ण उपयोग गणित व विज्ञान में हो रहा है। अगर यह कहा जाय कि गणित अमूर्त की भाषा है तो हम यथार्थ से अधिक दूर नहीं होंगे।

गणित में अमूर्त
हर विधा में अमूर्त का रूप एक जैसा हो यह जरूरी नहीं। कविता में इसकी अपनी पहचान है चित्रकला में भी यही कह सकते हैं। इन सबमें खास है अमूर्त (abstract)  का व्यापक एवं प्रभावी प्रयोग करने वाली भाषा - गणित। गणित एक भाषा है अमूर्त की भाषा। चार सौ साल से अधिक पहले चले चलते हैं सोलहवीं सदी में जब आधुनिक विज्ञान की नींव पड़ना आरम्भ होने को थी। गैलीलियो तब अपनी दूरबीन की मदद से आकाश में ग्रहीय गतिविधि को समझने का प्रयास कर रहे थे और अपने कथनों से चर्च को नाराज कर चुके थे। यह बात तो सभी जानते रहे हैं पर जो सामान्यतया विदित नहीं है वह यह कि गैलीलियो मात्र दूरबीनी अन्वेषण ही नहीं अपितु कुछ और बातों के लिये भी याद किये जाने चाहिये। दरअसल वे एक नक्षत्र विज्ञानी, गणितज्ञ, दार्शनिक एवं द्रष्टा थे: उनका मानना था कि विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिये हमें उस भाषा का प्रयोग करना होगा जिसमें प्रकृति स्वयं को अभिव्यक्त करती है और वह है गणित की भाषा [2]। यानि प्रकृति को अपने गूढ़ रहस्य उदभाषित करने में सामान्य भाषा नहीं अपितु एक सशक्त अमूर्त भाषा की जरूरत होती है। शायद तब कुछ ही लोग उनकी उस गूढ़ बात का मर्म समझे होंगे। उन कुछ गिने चुने लोगों में दो नाम खास महत्व के थे आइज़ैक न्यूटन और रेने देकार्त। वे बात को समझे भी और उस दिशा में आगे भी बढ़े। न्यूटन ने डिफरेन्शियल कैलक्युलस की नींव रखी और देकार्त ने नियामक ज्यामिति की। इनके बिना विज्ञान की तीव्र प्रगति संभव न होती।  पहले अंकगणित, एलजबरा (यानि बीजगणित) और ज्यामिति तक की ही हमारी पहुँच थी अब तो दर्जनों तरह की एलजबरा और ज्यामितियाँ हैं। कम्प्यूटर में बूलियन एलजबरा की अपनी उपयोगिता है जिस से लगभग सभी परिचित हैं।

मूर्त और अमूर्त का हमारे जीवन एवं चिंतन से खास नाता है और कई बार तो पता भी नहीं चलता कि बात किसकी हो रही है। जीवन के हमारे अनुभव में साकार, निराकार साथ चलते हैं। जीवन में अंतत: हम जो भी चाहते हैं उसमें बहुत कुछ अमूर्त ही है - आनंद, शांति, सुख, स्वास्थ्य - सब अमूर्त ही तो है बहुत कुछ न चाही जाने वाली बातें भी इसी श्रेणी में आ सकती हैं। क्या पीड़ा या वेदना अमूर्त नहीं कही जायेगी? प्रसाद के शब्दों में स्मृति में छाई घनीभूत पीड़ा अमूर्त ही तो है जो आँसू बन जाने के बाद मूर्तिमान मानी जा सकती है। अक्सर होता यही है जिनमें हम अमूर्त खोज रहे होते हैं वह मूर्तिमान है सामने प्रत्यक्ष है। कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के ही शब्दों में-

अनंत आकृतियों के इस खेलघर में
खूब खेला हूँ मैं, और
मैंने देखी है उसकी झलक 
जो है निराकार;
मेरा अंग-अंग उद्वेलित है उसके स्पर्श से
स्वयं जो स्पर्श से परे,
और यदि मुझे आज संसार से विदा लेना पड़े 
तो यही सही
तब यही मेरे अंतिम शब्द हों।

कविता, चित्रकला, गणित, विज्ञान –  हर कहीं अमूर्त की अपनी  अलग पहचान है अलग रीत है। गैलीलियो ने चार सौ साल से ज्यादा पहले इसकी उपयोगिता पहचान ली कि किस तरह प्रकृति के कार्य की भाषा गणित की अमूर्त भाषा है। जैसे जैसे समय बीतता गया यह बात अधिक मुखरित होती गयी। बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों में सूक्ष्म जगत की घटनाओं को समझने के प्रयास में यह स्पष्ट हो गया कि पुरानी विज्ञान विधि के स्थान पर एक नयी विधि तलाशनी होगी और जब यह संभव हुआ उसका नामकरण किया गया –क्वांटम विज्ञान; यह विज्ञान काफी कुछ अमूर्त की विधि है उलझे-उलझाते समीकरण हैं और वैसी ही अनोखी नियमावली। सामान्य समझ से परे क्वांटम थ्योरी के मूलभूत तत्व कुछ सीमित संदर्भों में अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय चिंतन के करीब हैं क्योंकि उलझी-उलझाती बातें कहने में हमारा सानी मिलना मुश्किल है और हमारी वहाँ पकड़ भी अच्छी रही है।

वह गतिमान है और स्थिर भी,
दूर भी है और निकट भी; 
अंदर है वह और है बाहर भी।
- ईशोपनिषद

कापरा ने अपनी पुस्तक [3] में क्वांटम थ्योरी के दो महान वैज्ञानिकों के बारे में लिखा है एरविन श्रोडिंजर और वर्नर हाइजनबर्ग; श्रोडिजर संस्कृत के ज्ञाता थे और उन्होने पुराणों की अच्छी जानकारी प्राप्त की थी। कापरा ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है कि श्रोडिंजर ने अपने चिंतन पर पौराणिक संदर्भों के प्रभाव को स्वीकार किया। दूसरी ओर हाइजनबर्ग का मानना था कि उनके रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ विचार विनिमय होते रहे थे अत: यह संभव था कि उनके शोध में अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय चिंतन का प्रभाव आया हो।

अब सवाल उठना लाजमी है कि जो चिंतन क्वांटम थ्योरी के संदर्भ में विदेश के वैज्ञानिकों के लिये इतना प्रेरणाप्रद रहा हो वह स्वयं हमारे वैज्ञानिकों, दार्शनिकों को आज के समय में प्रभावित न कर सका, ऐसा क्यों? बात सिर्फ इतनी है कि हमने मनन करना बंद कर दिया है बस हर अच्छी बात को कीर्तन का आधार बना डालते हैं और हर अच्छे इंसान को मानवेतर दर्जा दे डालते हैं ताकि हमें उसकी तरह बनने की जरूरत न हो। वह जो चिंतन-मनन का आधार होना था अधिकतर कीर्तन का आधार बन जाता है या पूजा का।

जिन मुश्किल सवालों से आज दार्शनिक व वैज्ञानिक जूझ रहे हैं वे हैं: (1) ब्रह्मांड की उत्पत्ति, (2) धरती पर जीवन की उत्पत्ति, (3) चेतना की उत्पत्ति, और (4) यथार्थ का स्वरूप। पहले सवाल पर बात करें जो ब्रह्मांड विज्ञान के अंतर्गत आता है और इसमें गणित का ठोस आधार बहुत जरूरी है। दूसरे सवाल के समाधान के प्रयास में गणित का प्रचलन अभी नहीं पर तीसरे व चौथे में इसकी कुछ भूमिका निर्विवाद है। इस तरह हमारे जीवन में मूर्त एवं अमूर्त, साकार एवं निराकार दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

*निराकार में साकार की तलाश

कविवर की कविता में आकृतियों के समंदर में निराकार मोती की तलाश है। मन करता है क्यों न हम निराकार के समंदर में आकृतियों की तलाश करें? देखें कुछ मिलता है या नहीं और अगर मिलता है तब वह कैसा हो सकता है?

अमूर्त की भाषा गणित का अपना सौन्दर्य है। गणितज्ञ-दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल इस बारे में कुछ ऐसे बयाँ करते हैं:
गणित में केवल सत्य ही नहीं अपितु एक अलौकिक सौन्दर्य भी बिम्बित होता है; एक अदभुत सौन्दर्य, शीतलता एवं संयम से भरपूर, जो कभी भी हमारे व्यक्तित्व के निर्बल पक्ष को आंदोलित नहीं करता। इसमें संगीत या चित्रकला जैसी चमक-दमक भले न हो, लेकिन पूर्णता की ओर अग्रसर होने की क्षमता है ऐसी पूर्णता, जो केवल महानतम कला में ही संभव है।

तो हम प्रयास करते हैं निराकार के महासागर में साकार के मोती की तलाश? कवि की कल्पना लाजवाब थी पर गणितीय कल्पना भी कम नहीं। गणितीय अमूर्त का महासागर विराट है उसकी विस्तृत बात फिर कभी हो सकती है पर अभी इस महासागर के किनारे के निकट की एक छोटी सी खाड़ी में डुबकी लगा लेते हैं। यह खाड़ी बहुत गहरी नहीं और डुबकी लगाने में कोई खतरा भी नहीं। इस खाड़ी का नाम है फ्रेक्टलीय खाड़ी (Fractal Structures) [4, 5]; चलिये इस निराकार के सागर से मिले मोती पर एक नजर डालकर देखते हैं।

एक सरल गणितीय प्रक्रिया

किसी समतल सतह पर, जैसे यह पृष्ठ, दो संख्याएँ चाहिये किसी बिन्दु का स्थान बतलाने के लिये। एक बायें से दाहिनी ओर की दूरी (x) और दूसरी नीचे से ऊपर की ओर (y)। पृष्ठ पर z = x + i. y, एक बिंदु का स्थान होगा।
गणित में i का वर्ग -1 के तुल्य होता है यानि यह -1 का वर्गमूल है। चित्र में वह नीचे से ऊपर की दूरी दर्शाता है। अब हम एक सरल गणितीय प्रक्रिया लेते हैं:
   z2 =  z12  +  c
c को भी कोई मान दिया जा सकता है जैसे ०.5 +  i. ०.5;
सबसे पहले  z1 को कोई मान देते हैं और z2 प्राप्त कर लेते हैं, अगली बार इसी प्रक्रिया के तहत z3 प्राप्त करेगे; z3  =  z22 +  c. इसे दोहराते जाने पर हमें चित्र में z1z2z3z4 … बिंदुओं का एक समूह या सेट मिलता है जिसे इनके खोजकर्ता गणितज्ञ गेस्टन जूलिया के सम्मान में जूलिया सेट कहते हैं।
c  के हर अलग मान के लिये अलग सेट मिलता है। चित्र 1 में c के  जिस मान से गणना की गई वह
-0.5009,  -0.5228 के निकट है।

चित्र-1: c के एक मान के लिये प्राप्त जूलिया सेट ([6] विकिमीडिया कोमन्स से)

c के सैकड़ों हजारों मान लेकर जूलिया समूहों का विराट संग्रह प्राप्त होता है जिसमें अदभुत सौन्दर्य एवं वैविध्य है। हजारों आकृतियाँ इस तरह प्राप्त होती हैं। मैंडलब्राट ने बीसवीं सदी के आठवें दशक में इन विराट एवं अदभुत जूलिया सेटों का वर्गीकरण करने का प्रयास किया और एक ऐसा बिंदु समूह प्राप्त किया जो जूलिया समूहों के वर्गीकरण में सहायक हो सकता है।

जूलिया सेट जो चित्र 1 में दिखाया गया है एकल चित्र का निर्माण करता है यानि सेट के सभी बिंदु एक इकाई में बंधे लगते हैं। यह भी हो सकता है कि वे अलग-अलग हिस्सों में बँटे हों। हम इसी तरह के जुड़े हुए सेटों की बात करेंगे। c के वे सारे मान जो जुड़े या एकल जूलिया सेट बनाते हैं, यदि चित्र में दिखाये जायें तो वे मैंडलब्राट सेट निर्माण करेंगे। इस मैंडलब्राट सेट के किसी छोटे से हिस्से को आवर्धित कर देखें तो एक नजारा मिलता है दूसरे हिस्से को लेने पर दूसरा। इसमें विराट वैविध्य एवं सौन्दर्य है। अगले चित्र 2 में इसी सेट के कुछ अंशों को आवर्धित कर दिखलाया गया है। यह सेट भी बिंदुओं का एक विराट समूह है जो जूलिया सेट की ही तरह एक अत्यंत सरल गणना द्वारा प्राप्त गया है।

चित्र-2: मैंडलब्राट सेट के एक छोटे अंश का आवर्धित चित्र (विकिमीडिया कॉमन्स से प्राप्त [7] )

जैसा पहले कहा गया अमूर्त के सागर के एक छोटे हिस्से में इतना कुछ है पूरे महासागर की तलाश की कल्पना ही की जा सकती है। कलात्मक रूप से अनूठी और जटिल ये आकृतियाँ एक अत्यंत सरल गणितीय समीकरण से प्राप्त हो जाती हैं। जो भी चित्र हम देख रहे हैं वे लाखों बिंदुओं के समूह हैं एवं कम्प्यूटर की सहायता से कुछ मिनटों में चित्र प्राप्त हो जाता है। जहाँ तक गणितीय प्रक्रिया का सवाल है एक बालक भी इसे कर सकता है और कम्प्यूटर के बिना भी असंभव यह नहीं, हाँ समय बहुत लगेगा। पर कुछ बिदु प्राप्त कर देख सकते हैं कि चित्र में वे कहाँ होंगे। जहाँ तक रंगों की बात है वे सौन्दर्य एवं कलात्मकता के लिये हैं।

आकृतियों के समंदर में निराकार मोती की तलाश से शुरू हुई बात हमें विपरीत दिशा में ले आई और सरल गणितीय प्रक्रियाओं के अमूर्त समंदर में जूलिया व मैंडलब्राट सेट की आकृतियों की अनूठी झलक दिखा गई।
महज कलात्मक रूप से देखें तो भी ये असाधारण हैं पर साथ ही प्रकृति में हर कहीं विद्यमान फ्रेक्टल रचनाओं की विविधता और स्व-साम्य और उनके सरल गणितीय निरूपण की झलक की ओर इंगित कर जाते हैं जिनकी विस्तृत चर्चा यहाँ संभव नहीं।

साइकेडेलिक कला

बीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों में एल एस डी नामक रसायन का प्रचलन हुआ था जो मन को विशेष कलात्मक अभिरुचि प्रदान करता था और तब इनके सेवन से सेवन कर्ता खास तरह की पेन्टिंग का सृजन करने में सक्षम हो जाता था जिसे ‘साइकेडेलिक कला’ (psychedelic art) [8] कहा जाता है। यह कला अक्सर अमूर्त कला की तरह की हुआ करती थी।

संदर्भ

[1] V. Ramachandran, The Emerging Mind, Profile Books Ltd., London.
[2] F. Capra, The Turning Point – Science, society and the Rising Culture, Simon and Schuster, USA, 1982.
[3] F. Capra, Uncommon Wisdom, Bantam Books, 1989.
[4] James Gleik, Chaos- The Amazing Science of the Unpredictable, Penguin, New York, 1987.
[5] Heinz-Otto-Peitgen, H. Jurgens and D. Saupe, Chaos and Fractals, Springer-Verlag, 1982.
[6] A public domain Julia Set image from Wikimedia; Author: Eequor, November 2004.
[7] A public domain Mandelbrot Set image from Wikimedia; Author: Antonio Miguel de Campos, February 2006.
[8] F. Capra, The Web of Life, Anchor Books, Doubleday, New York, 1996.

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