पुस्तक-समीक्षा: एक बेगम के सच का अनावरण

समीक्षक: निधि अग्रवाल


पुस्तक: बेगम समरू का सच
लेखक: राजगोपाल सिंह वर्मा
प्रकाशक: संवाद प्रकाशन, मेरठ
मूल्य: ₹ 300 रुपये


राजगोपाल सिंह वर्मा

मूल रूप से तुर्की और फारसी शब्द  बेगम का उपयोग हमारे देश में कुलीन परिवार की महिलाओं के लिए प्रयुक्त किया जाता है। निश्चित रूप से अभिजात्य वर्ग की महिलाओं को सम्मानित सामाजिक स्थिति में दर्शाने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है जहाँ इसका अर्थ ‘रानी’ हो सकता है।

सरधना की बेगम समरू के नाम से विख्यात हुई फरजाना इस परिभाषा के अनुसार निश्चित रूप से कुलीन परिवार की न थी, पर उसने अपने को बेगम कहलाने का जो हक कमाया वह एक ‘फर्श से अर्श’ तक की एक चमत्कारिक कहानी से कम नहीं है।

लगभग पौने तीस सौ पृष्ठों में लिखी यह उस नर्तकी की कहानी है जिसने अपने रूप, चातुर्य, शौर्य और कूटनीति से अट्ठावन साल तक सरधना पर राज कर दुनिया को विस्मित किया। फरजाना से बेगम समरू बनी इस बाला की सच्ची कहानी में सब कुछ है- युद्ध, राजनीति-कूटनीति है, तो प्रेम भी है, षड्यंत्र भी, शालीनता, संशय, और निर्ममता भी। इसके अतिरिक्त इसमें जो नहीं है वह तमाम देसी-विदेशी लेखकों द्वारा उसके चरित्र को लेकर गढ़े किस्से- किम्वदंतियों का एक खोखला संसार। 

सरधना की इस बेगम समरू ने 85  साल की उम्र तक राज कर जो इतिहास रचा, वह वाकई मेंअद्वितीय है। खासकर उस दौर में जब भारत की राजनीति में कुचक्र, साजिशें, षड्यंत्र और लूटपाट आम बात थी। खुद राजा और बादशाह ही नहीं सुरक्षित था। हर कोई किसी न किसी के विरुद्ध साज़िश कर रहा था। कोई सरकार ऐसी न थी, जो स्थिर कही जा सके। यहाँ तक कि ब्रिटिशर्स भी - न उनका कलेक्टर, न कम्पनी न उनकी सेना। मगर बाज़ार की चाहत उन्हें यहाँ रोके थी।

निधि अग्रवाल
एक ऐसे काल में किसी शक्ति का बार-बार अपनी रियासत बचाना और सत्ता संतुलन बनाये रखना आसान नहीं था, खासकर उस रानी का, जिसका कोई इतिहास नहीं, कोई अतीत नहीं और कोई भी स्थिर भविष्य नहीं। कब वह राजमहल से निकल कर फिर कोठे पर चली जाएगी, इस बाबत भी कोई निश्चिंतता नहीं। मगर यह बेगम की बुद्धि ही थी, जिसके बूते वह कोठे से निकल कर इतनी बड़ी मलिका बनी। यकीनन बेगम समरू को इतिहास में याद रखना चाहिए, पर उस दौर के दस्तावेज़ बेगम के बारे में बहुत कुछ नहीं बताते। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, कि बेगम समरू का इतिहास लिखने में किसी ने रूचि नहीं दिखाई। मेडवेल और मुगलों का पतन लिखने वालों ने भी बेगम को विस्मृत कर दिया। ऐसे समय में अगर बेगम समरू का सच बताने को कोई लेखक आतुर दिखे, तो उसके प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा होनी चाहिए। यही बात इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखते हुए जनसत्ता और अमर उजाला जैसे समाचारपत्रों के पूर्व सम्पादक शंभूनाथ शुक्ल जी ने भी कही है।

यह और भी अद्भुत है कि यह लेखक की पहली पुस्तक है, शायद इसीलिये उसे उन्होंने भरपूर समय तो दिया ही है, हर तथ्य और घटना को शोधपूर्ण दृष्टि से परखा है। उन्होंने सच ही कहा है कि इतिहास के तथ्य शाश्वत, पूज्य और श्लाघ्य होते हैं, पर किसी के चरित्र का विश्लेषण जनश्रुतियों और पूर्वाग्रहों के आधार पर न कर उसके जीवनवृत्त से उपजी सकारात्मकता के आधार पर ही किया जाए तो बेहतर होता है। स्वयं लेखक ने इस सिद्धांत का ध्यान भी रखा है। पुस्तक का आवरण आकर्षक है, भूमिका और प्रस्तावना और भी जिज्ञासा जगाती है, सामग्री वास्तव में शोधपरक है, जो उनसे संबंधित हर प्रश्न का उत्तर देती है। पुस्तक की विशेषता वह परिशिष्ट है जिसमें बेगम समरू पर आये अन्य प्रकाशनों के विषय में एक ऐसा आलेख है, जो बहुत कुछ बताता है।

1 comment :

  1. पुस्तक के बारे में अच्छी जानकारी देने के लिए निधि अग्रवाल जी का हार्दिक आभार।

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