काव्य: चंद्रमोहन भण्डारी

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी


सेतु संकल्प

दमकती दामिनी की गरजन,
लहराती नदी का उफान,
रणभूमि में शौर्य प्रदर्शन
या जन-नेतृत्व का आह्वान,
महान क्रान्ति का अग्रदूत,
चुनावी दंगल का घमासान
वाणी या लेखन का अप्रतिम जादू
जन-अंतर्मन विजय अभियान;
ऐसा कुछ न कर पाया
पर पराजय का विचार
कभी मन में न आया।

सेतु-संकल्प लिया मैंने
जुड़ने और जोड़ने - स्वयं को स्वयं से
अपने निजेतर संकल्पों से,
तुम से, औरों से, जन-मन से,
मानवी अभिप्रायों के अनछुए आयामों से।

कल जब यह बन चुकेगा
इस पर से गुजर रहे
उस हर एक की नजर में
जो समझ पायेगा मेरा मंतव्य
मैं साफ झलक जाऊँगा;
उस पल वह चुपके से
मेरी जगह ले लेगा
और तब अनायास
मैं उसकी जगह आ जाऊंगा।
***



सेतु समीकरण

मैं अपनी जगह डटा हूँ
पेड नहीं, पुल की तरह
किनारों को जोडने की कोशिश
मुझे जोड़ती हर पल स्वयं से।

वैसे जगहों को जोड़ना
इंसानों को जोड़े, जरूरी नहीं;
यह भी कि जगह को छोड़ना
अपनों को छोड़े, जरूरी नहीं।
पुल की बदौलत बहुत-कुछ जुड़ता है
तो कुछ छूटता भी है।
वक्त बदल रहा है
मायने बदल रहे और भी तेजी से।

कुछ इंसान होते हैं सेतु की तरह
शब्द भी सेतु हैं अपनी-अपनी जगह
विचार या संवाद या संचार
माध्यम हैं शब्द, शब्द ही पुल भी हैं
बेरोक गुजरते हैं जिनसे
विचार, संवाद, चिंतन के वाहन।

मैं कर्ता तो नहीं
किसी को कहीं पहुँचा सकूँ
मैं तो बस हूँ
मेरा होना इंसान के लिये जरूरी है।
इंसान भी नाम भर का कर्ता है
कहां बनाना था मुझे
कहां बना देता है
पुलों से कुछ गुजारने की चाहत लिये
खुद गुजर जाता है
और पुलों मेहराबों के नमूने छोड़ जाता है।



कल्पवृक्ष

हर शाख से पेड़ उगाता
बरगद सा विश्वास,
आकाश छूने को आतुर
आकांक्षा का देवदारु,
क्षैतिज विस्तार सहेजती
दूर्वा सी लगन;
सिमट आये हैं सभी
मेरे छोटे से मन में।

काश यह मन
कुछ और बडा हो पाता!
तब मैं बरगद, देवदारु और दूर्वा से
गहराई, ऊँचाई और विस्तार लेकर
सहज आत्मीयता के कल्पवृक्ष
हर जगह उगा आता।
***



मौसम

मौसम यों साफ रहेगा
पर संभावना रहेगी
हलके बादल छा जाने
और गरज के साथ
हलकी बूंदाबादी की।

नौ सौ मीटर की ऊँचाई पर
हवा का दाब तय करता है
जमीनी मौसम का मिजाज;
घूमती हवाओं के भी निराले हैं अंदाज?
अंडमान के पास उठा चक्करधार घेरा
आंध्र-तटीय प्रदेश बरबाद कर जाता है
कभी उड़ीसा का रुख कर
तबाही का मंजर दिखा जाता है
जब-तब असर दिखा जाता है
मौसम का शाही अंदाज।

मेरे अंदर भी
एक मौसम जोर आजमाता है
बाहर के मौसम की ही तरह
पूर्वानुमान गलत साबित कर जाता है
बाहर घटता बहुत कुछ
अपना दबाव अक्सर अंदर प्रेषित कर
रक्तचाप बढा जाता है।

यही दस्तूर है अंदर की बात
बाहरी हालात से तय होने का रिवाज
एक जगह की हलचल का
दूसरी जगह पर तूफानी अंदाज;
फितरत है कुदरत की
जो कायम है और रहेगी
कहानी यों ही चलती रहेगी।
***



हकीकत

छोटी-छोटी बात पर
सिमटता जाता मन
कितनी सहजता से
ऊँची उड़ान पर चला जाता है?
अपनों को समझने में नाकाम
पराया दर्द बखूबी समझ जाता है।

यह हिपोक्रिसी है या हकीकत,
इस बहस से क्या फायदा?
जो भी हो, एक ओर का कसाव
दूसरी ओर प्रसार में झलक जाता है।
आओ मेरे साथ तुम्हें दिखाऊँगा
कई बार इन्सान का आदर्श
दो-चार टुकड़ों में चक्कर खा जाता है।

लेकिन, निराश न होवो मेरे दोस्त
मैं फिर भी कहूँगा
ऐसा ही है हमारा हमसफर इंसान!
पूरे की चाहत में अपनी पूरी जिन्दगी
आधी कीमत पर दाँव लगा जाता है।
***



काम की बात

तुम कहते हो तो चलो
देख लेते हैं इसे भी
शायद यही काम कर जाय
बात पूरी ना सही आधी ही बन जाय।

वैसे छोटे-छोटे परमाणुओं से
दुनिया बनती है ब्रह्माण्ड बनता है
पर याद रखो छोटे-छोटे काम
परमाणुओं से बनी बड़ी चीजों की तरह
नहीं बना पाते बड़ा काम।

अक्सर यही होता है
छोटे काम बनाने के चक्कर में
बडे बिगड जाते हैं
हर दिन मेरे अंदर का
छोटा आदमी सफल हो जाता है
और मैं बड़ी कीमत चुकाता हूँ
उस छोटी सफलता की
विराट असफलताओं से।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।