सम्पर्क सूत्र - चिट्ठियाँ

शशि पाधा

- शशि पाधा


चिट्ठियाँ सैनिको के जीवन की वो डोर है जिसका एक छोर दूर दराज़ क्षेत्र में तैनात सैनिक के पास और दूसरा उसके प्रियजनों के पास। एक छोटे से लिफ़ाफ़े में भेजा जाता था अगाध प्रेम, आँसू, उलाहने, हिदायतें, वायदे और आशीष। आज की युवा पीढ़ी इसके महत्व को समझ ही नहीं सकती क्यूँकि आज ईमेल, वाट्सऐप का ज़माना है। आज तो पल-पल की ख़बर सात समन्दर पार और दुर्लभ पर्वतों को लाँघ कर भी पहुँच जाती है। अब न तो विरह की पीड़ा है, न प्रतीक्षा के अंतहीन पल। जब जी चाहे, मोबाइल का बटन प्रियजन से मिला देता है।

 मैं मोबाइल फोन के आने के पहले की बात कर रही हूँ जब सुदूर पूर्वोत्तर सीमा पर तैनात या सियाचन की बर्फ़ीली चोटियों के शीत से जूझते सैनिकों के पास अपने प्रियजनों से सम्पर्क करने का एक मात्र साधन था–चिठ्ठी। यह चिट्ठी या तो फौजी अंतर्देशीय नीले पत्र में आती थी जिसके बाहर सेना की मोहर लगी होती थी या बंद लिफाफे में। सुना है आने वाली और भेजने वाली चिट्ठी को कई बार सुरक्षा की दृष्टि से पढ़ लिया जाता था और फिर भेजी जाती थी। फौज में चिट्ठी को लेकर कई गीत बने हैं, कई लघु नाटक खेले गए है। जिस परिवार का कोई सदस्य सेना में नहीं है वो इसके महत्व को नहीं जान सकता।

चिट्ठियों के विषय में फौजियों के पास कई किस्से कहानियाँ हैं। मेरे विवाह के समय मेरे पति भारत चीन सीमा पर स्थित ‘शुगर सैक्टर’ में तैनात थे, जहाँ पहुँचने के लिए कई दिन लग जाते थे। शिमला के आगे बर्फीली पहाड़ियों पर रेंगती हुई फौजी गाड़ियाँ अपने कैम्प तक पहुँचने में कई दिन लगा देतीं थी। ऐसे बर्फीले प्रदेश में चिट्ठी भी हैलीकॉप्टर  से पहुँचाई जाती थी और वो भी सप्ताह में एक बार और अगर मौसम ख़राब तो?? मेरे पति मज़ाक में बहुत बार कहते थे कि कबूतर के पैरों में बंधे संदेशों से ही प्रेरित होकर हैलीकॉप्टर का निर्माण किया गया होगा। नहीं तो चिट्ठी पत्री बादलों के पंखों के साथ बंद कर भेजनी पड़ती। मैं जानती थी कि मैंने उन्हें कालिदास के मेघदूत के कुछ अंश कभी पढ़कर सुनाए होंगे। नहीं तो कहाँ गोली और कहाँ इतनी खूबसूरत कल्पना।

चिट्ठी पहुँचने की रोमांचक कहानी मेरे पति के शब्दों में --- सप्ताह में एक बार जब मौसम साफ़ होता था तो हमें दूर से हैलीकॉप्टर के आने का शोर सुनाई देता था। शायद सभी सैनिकों की ह्रदयगति उस समय बढ़ जाती थी। हैलीकॉप्टर तो किसी बेस कैम्प तक ही आता था लेकिन एक आस बन जाती थी कि हमारी चिट्ठी आएगी। उसके बाद उस बेस कैम्प से अलग अलग स्थान की ओर फ़ौजी गाड़ियों से अपनी अपनी यूनिट के डाक के थैले भेजे जाते थे। कभी कभी सुबह के देखे हैलीकॉप्टर के कई घंटे बाद देर शाम तक ही डाक पहुँचती थी प्रतीक्षा के वे पल कहीं छल कदमीं में, कहीं रेडियो पर फिल्मी गाने सुनने में और कभी कनखियों से खिड़की के बाहर झाँकते हुए निकलते थे। इन दारुण पलों में सामने दराज़ पर पर रखी ब्लैक एंड वाइट तस्वीर आपके मन के सारे भेद जान जाती थी।आखिर शाम हो ही जाती और चिट्ठियाँ आपके कैम्प तक पहुँचा दी जाती थीं।

सेना अधिकारियों को आई चिट्ठियाँ  उनके सहायक उनके बंकरों में पहुँचा देते थे। केरोसिन के लैम्प की रोशनी में उन्हें जाने कितनी बार पढ़ा जाता था, यह लैम्प जाने या सैनिक के काँपते हाथ जानें। दो-चार या बउससे भी ज़्यादा बार पढ़ने के बाद तुरंत उत्तर भेजने की प्रक्रिया भी आरम्भ हो जाती थी। क्यूँकि डर यह था कि प्रेम संवाद का ताना-बाना टूट न जाए।

अन्य सैनिकों के पास चिट्ठी पहुँचने की अलग प्रक्रिया थी। शाम के समय कम्पनी के हिसाब से सैनिकों को एक स्थान पर एकत्रित किया जाता था। इस समय को ‘रोल कॉल’ का नाम दिया गया था। सभी सैनिक एक या दो लाइन बना कर खड़े हो जाते थे। हवालदार मेजर सामने से चिट्ठियों का थैला लेकर आता था। जवान आस में टकटकी लगाए उस थैले को बड़ी हसरत से देखते थे। हवलदार मेजर एक-एक करके पत्र निकालता था और जिसका नाम पढ़ता था वो आगे आकर अपनी चिट्ठी ले जाता था।  जिसके नाम से कोई पत्र नहीं आता था, उसके चेहरे पर गहन निराशा का भाव छा जाता था। चिट्ठियाँ बँटने के बाद लाइन तोड़ का आदेश मिलते ही सभी अपने-अपने बंकरों में चले जाते थे। कोई तो हाथों में खुशी समेटे और कोई आँखों में घोर उदासी। पहाड़ों की चोटियों पर उस समय जाने कितने शायरों ने जन्म लिया होगा और कितनी प्रेम कहानियाँ बुनी गयी होंगी। यह तो चिठ्ठी भेजने वाला और चिठ्ठी पाने वाला ही जानता होगा। अब चिट्ठी की जबाब तो वहां भी उसी समय लिखा जाता था ताकि कल की डाक से संदेश छूट न जाए।

यह तो है ‘उस तरफ़’ की कहानी। अब इस तरफ की कहानी मेरे शब्दों में ---
हमारे घर में मेरे बचपन से ही जो डाकिया चिट्ठी लेकर आता था उन्हें हम मणिराम चाचा कहते थे। जब भरी दोपहरी की धूप में चाचा अपनी साइकल हमारे घर के गेट के साथ टिकाते तो हमें पता चल जाता था कि डाक आई है। वो तो अक्सर पत्र गेट के ऊपर से घर के आंगन में फेंक के चले जाते थे। लेकिन हमारे घर का नियम कुछ अलग ही था। उन्हें अंदर बुला कर ठंडा निम्बू पानी का गिलास देना मेरी जिम्मेदारी होती थी। पानी पीकर चाचा ढेरों आशीषों से मेरी झोली भर देते थे। यह सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा।  फिर मेरा विवाह एक फ़ौजी अधिकारी के साथ हो गया। मैं अभी स्नातक की पढाई कर रही थी और ‘ये’ अपनी पलटन के साथ भारत चीन सीमा पर तैनात थे। मेरे और मेरे पति के बीच भी सम्पर्क का एकमात्र साधन था- चिट्ठियाँ।

मेरे विवाह के बाद चाचा का काम कुछ बढ़ गया था। मेरे पति सप्ताह में दो तीन चिट्ठियाँ तो मुझे लिखते ही थे। मेरी चिट्ठी कभी भी गेट के ऊपर से नहीं फेंकी जाती थी। चाचा अपने साइकल की घंटी बजाते थे और मैं दौड़ कर उनसे अपनी चीज़ ले लेती थी। चाचा बड़े प्यार से कहते, “ बिटिया, कप्तान साहब को हमारा प्यार ज़रूर लिखना।” मैं उनकी बात सुनती तो थी लेकिन उत्तर देने का समय कहाँ होता था मेरे पास। कभी कभी चाचा कहते, “आज नीम्बू पानी का वक्त नहीं है? कोई बात नहीं, सादा पानी भी चलेगा।”

उन सुदूर पर्वतों पर हैलीकॉप्टर भी पत्र एकत्रित करने हर रोज़ नहीं आ सकता था इसलिए शायद डाक भी कई दिनों तक अपने गंतव्य तक नहीं पहुँचती थी। फिर डाक विभाग वाले जाने कैसे छँटनी करते थे कि बहुत बार मेरे नाम से एक दिन में दो या तीन चिठ्ठियाँ भी आती थीं। चाचा के लिए विडम्बना यह थी कि उन्हें केवल मेरी चिठ्ठी पहुँचाने के लिए हमारे क्षेत्र में दिन में दो बार भी आना पड़ता था। यानी दो अलग-अलग समय, सुबह बारह बजे और दोपहर के बाद तीन बजे। शुरू-शुरू में तो चाचा बड़ी खुशी से मुझे मेरे सम्पर्क सूत्र थमाते। जब यह सिलसिला सप्ताह में तीन चार बार चलने लगा तो कई बार चाचा कुछ खीझ कर मुझसे कहते, “पता नहीं क्या लिखता है वो हर रोज़। मुझे केवल तुम्हारा पत्र पहुँचाने के लिए इतनी भरी दोपहरी में इतनी दूर से आना पड़ता है।” उन बातों में प्यार अधिक और खीझ कम होती थी। शायद थोड़ा थोड़ा सूरज देवता के प्रकोप का भी असर होता था।

मैं चुपचाप उनसे चिट्ठी लेकर शिकंजवी का गिलास थमा देती थी और वो उसी पुराने अंदाज़ में कहते, “कप्तान साहब को मेरा प्यार ज़रूर लिख देना।” यह सिलसिला भी लगभग दो वर्ष रहा।

वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में मेरे पति जम्मू के पास सीमा पर शत्रु से जूझ रहे थे। तब तक चाचा मणिराम सेवा निवृत भी हो गए थे। लेकिन वे रोज़ दोपहर के समय अपनी साइकल से हमारे घर आते, मेरे पास बैठते और सांत्वना भरी बातें सुनाते। मैं जानती थी कि उन्हें मेरी चिंता यहाँ खींच कर लाती थी। हमारी चिट्ठियों ने इतना मधुर रिश्ता जो जोड़ दिया था हम तीनों के बीच।

मैं जब भी अपने आरम्भिक वैवाहिक जीवन को याद करती हूँ तो मणिराम चाचा का स्नेहिल चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है। और मैं सोचती हूँ -
उन रिश्तों की मिठास आज के वाट्सऐप  या  ईमेल  में कहाँ ???

1 comment :

  1. बहुत ही मार्मिक संस्मरण लिखा है शशि पाधा जी ने।
    मेरे बड़े भाई साहब भी उन दिनों 1971-72 में फौज की नौकरी में जम्मू में तैनात थे और मै कक्षा दस का विद्यार्थी।
    बहुत बहुत आभार शशि जी।

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