देशभक्ति और देशभक्तों की शौर्यगाथा को गाता खण्डकाव्य: भगवाध्वज

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: भगवा ध्वज (खण्डकाव्य)
ISBN: 978-81-8111-673-9
प्रकाशन वर्ष: 2019
रचनाकार: श्री हरिदत्त चतुर्वेदी ‘हरीश’
प्रकाशक: जवाहर पुस्तकालय, सदर, मथुरा-281001 (उ.प्र.)
पृष्ठ: 104, मूल्य: ₹ 175.00 रुपये

--------------------------------------------------------------------------
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के प्रकाशन अनुदान से प्रकाशित खण्ड काव्य- ‘भगवा ध्वज’ में वरिष्ठ साहित्यकार एवं छन्दशास्त्र के विद्वान श्री हरिदत्त चतुर्वेदी‘हरीश’ ने भारतीय संस्कृति एवं भारत माता की लाज की रक्षार्थ देश पर अपने जीवन तक को समर्पित कर देने वाले वीर शिवाजी की शौय गाथा का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है।

पुस्तक कुल सात सर्ग में विभक्त है। सात सर्गों से पहले रचनाकार ने भारतीय संस्कृति का उदारता से पालन करते हुए सर्वप्रथम माँ सरस्वती की वन्दना की है। इस खण्डकाव्य का उद्देश्य भारत की संस्कृति एवं गौरवशाली परम्परा को बनाए रखने के लिए प्रेरित करना है जिसके बारे में रचनाकार ने स्वयं भी ‘उद्देश्य’ शीर्षक के अन्तर्गत लिखा है-इस खण्ड काव्य का उद्देश्य भारत की किशोर एवं युवा पीढ़ी को अपने गौरव एवं संस्कृति को बचाये रखने के लिए जीवन तक अर्पित करने को प्रेरित करना है।

खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग में कोंड़ाणे के दुर्ग पर औरंगजेब के शासन की लहराती यवन पताका को देख-देख कर वीर शिवाजी की माता जीजाबाई के हृदय में उठती पीड़ा की लहरों को रचनाकार ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है।-

लहराती जो यवन पताका आसमान में,
उसे देखकर मेरा सीना फटा जा रहा।
करती है अपमान मिटा हिन्दुत्व हमारा,
देख! मान, तू! भारत माँ का घटा जा रहा।

होकर मदोमस्त जो लहरा के अम्बर में,
यवनों के पौरुष का ही संगीत गा रहा।
उठ वत्स! खड़ा हो ले कृपाण, जाग अभागे,
मेरे सपनों का प्रिय हिन्दुस्तान जा रहा। (पृष्ठ-39)


माँ जीजाबाई के वचनों को सुनकर वीर शिवाजी की धमनियों में बहता रक्त खौल उठा। उन्होंने माँ को आश्वासन किया कि वह यवनों को प्रातः तक सिंहगढ़ से भगाने के बाद ही चैन की सांस लेंगे-
चिंता का अथाह सिंधु, चित्त में न लायें मातु,
प्रातः ही यवन केतु दिखने नहीं पायेगा।
दीजिए आशीष मातु, शीष पर हाथ रख,
भोर ही सिंहगढ़ भगवा फहरायेगा। (पृष्ठ-43)

श्री हरिदत्त चतुर्वेदी‘हरीश’ ने खण्डकाव्य भगवा ध्वज के दूसरे सर्ग में शिवाजी के द्वारा युद्ध की तैयारी, ताना जी का आगमन, शिवाजी के चिंतित चेहरे को देखकर ताना जी द्वारा कारण जाानने की हठ और कारण जान लेने के बाद ताना जी द्वारा अपने पुत्र के विवाह की तैयारी की जगह युद्ध के लिए तैयार होना, शिवाजी एवं ताना जी की गुप्त मंत्रणा को किसी कार्य से वहाँ आये ताना जी के मामा शेलार सिंह द्वारा सुन लेना और स्वयं यवनों को भगाने हेतु युद्ध के लिए उद्यत होना, शेलार सिंह की बातें सुनकर तानाजी के पुत्र रायबा के द्वारा भी युद्ध में जाने की जिद करना आदि प्रसंगों को रचनाकार ने बहुत ही सुन्दर तारतम्य के साथ प्रस्तुत किया है-

‘शेलार की बातें सुनीं तो रायबा ने भी कहा,
यवनों को देने त्रास मैं भी साथ जाऊंगा।
दिल में न सोचो तात, बालक नादान मुढे,
भरत की भाँति मैं भी पौरुष दिखलाऊंगा।

दाँत गिन सिंह के भरत ज्यों विख्यात हुए
त्यों ही उन गीदड़ों का काल बन जाऊंगा।
विवाह होगा पीछे, देश कार्य तो जरूरी है
पिताजी! मैं भी दुर्ग पर भगवा फहराऊंगा। (पृष्ठ-53)

दिनेश पाठक ‘शशि’
हर युग में राजनीति में कूटनीति भी समाहित रही है। औरंगजेब के अहंकार किन्तु शिवाजी से उसके भय को दर्शाते हुए रचनाकार ने औरंगजेब द्वारा दासीपुत्र उदयभानु को शिवाजी के विरुद्ध भड़काकर कूटनीति अपनाने सम्बन्धी बातों का उल्लेख इस खण्डकाव्य के तीसरे सर्ग में किया है-

औरंगजेब ने कूटनीति और फूटनीति से,
प्रतिशोध की चिंगारी उसमें भड़काई।
हिन्दू उकसाकर हिन्दू से बदला लेने को
कूटनीति की चालें शीघ्र उसे बतलाईं।

धूर्त सिंहगढ़ चला, शिवा का बैरी बनके
किलेदार बना दुर्ग का उदय कसाई।
रहता था उन्मत्त नशे में मदिरा पीकर,
लगा सोचने वो उर में, पाकर प्रभुताई।  (पृष्ठ- 62)

खण्डकाव्य के चैथे और पाँचवे सर्ग में विद्वान रचनाकार हरीश जी ने मात्र पचास वीर सैनिकों के साथ दुर्ग पर चढ़ाई का तथा युद्ध का रोंगटे खड़े कर देने वाला बहुत ही रोमांचकारी वर्णन किया है-

थे तानाजी के साथ बहुत ही थोड़े सैनिक
वहाँ दस्यु सेना-प्रबन्ध हो चुके कड़े थे।
कठिन कार्य था पंच हजारी सेना से लड़ना
यहाँ आके इतने पर भी वीर खड़े थे।

मान लिया मुगलों को कालरूप थे लेकिन
थके-थकााये वीर मावले खूब लड़े थे।
सूर्या जी सेना लेके निश्चिंत ही आते होंगे
यही सोच कल्याण द्वार पर सभी खड़े थे। (पृष्ठ-80)

युद्ध में ताना जी के शहीद होते ही सेना के आत्मबल को सूर्या जी द्वारा बनाये रखना तथा यवनों को हराकर सिंहगढ़ पर भगवा ध्वज का फहराया जाने का वर्णन श्री हरिदत्त चतुर्वेदी जी ने खण्ड काव्य के छठवे सर्ग में किया है-

हर्षोल्लास के बीच फूंक के यवन-केतु को
राष्ट्रभक्त ने राष्ट्रध्वज भगवा फहराया।
देव सभी दुंदुभी बजाने लगे स्वर्ग अरु,
उनने होकर प्रसन्न अमृत बरसाया।

रणदेवी जयमाल लिए तब दौड़ी आई
हो गया सिंहगढ़ विजय, हर्ष अति छाया।
था हर्ष अपार किन्तु उदासी थी वहाँ भारी
क्योंकि सिंहगढ़ जीत केहरी स्वर्ग सिधाया। (पृष्ठ-94)

और अंतिम यानि खण्डकाव्य के सातवे सर्ग में रचनाकार हरीश जी ने तानाजी के शहीद होने पर शिवाजी द्वारा दुख प्रकट करने एवं देश की रक्षार्थ जयचंदों से सावधान रहने का संदेश दिया हैं-

हे देश वासियो! भुजा उठाके करो प्रतिज्ञा
स्वार्थ त्याग के मातृभूमि का संकट टालो।
मिलके अब सब एक सूत्र में बंध जाओ
मातृभूमि मर्दन को जयचंद न पालो।

दल को दलदल के समान जो नित्य बनाते
उनके अब अरमान चूर कर डालो।
गौरवमय इतिहास यही कहता है
ताना जी की भाँति नया इतिहास रचा लो। (पृष्ठ-102)

निष्कर्षतः भगवाध्वज के माध्यम से रचनाकार श्री हरिदत्त चतुर्वेदी‘हरीश’ ने देशभक्ति का जो दीपक जलाया है, वह स्तुत्य है। खण्ड काव्य की भाषा एवं शैली सहज एवं सरल है। मुद्रण त्रुटिहीन है। हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

2 comments :

  1. वर्तमान समय में देशद्रोह देशद्रोहियों से संक्रमित हैं। ऐसे समय में भगवा ध्वज का प्रणयन व प्रकाशन राष्ट्रधर्मिता के संरक्षण एवं प्रसारण हेतु एक नया अध्याय है। विद्वान लेखक श्री हरि दत्त चतुर्वेदी 'हरीश ' जी को कोटि-कोटि प्रणाम। इस युगांतरकारी खंड काव्य की श्रेष्ठ समीक्षा हेतु समीक्षक साहित्य गौरव श्रद्धेय डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को कोटि-कोटि नमन।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष
    तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी

    ReplyDelete
  2. आदरणीय श्री हरि दत्त चतुर्वेदी द्वारा लिखित "खंडकाव्य भगवा ध्वज"की समीक्षा आदरणीय श्री डां, दिनेश पाठक'शशि'जी द्वारा स्पष्ट एवं निष्पक्ष सच्चाई के साथ उत्तम तरीके से की है खंडकाव्य की विशेषताओं अनेकों उदाहरण द्वारा उभार कर रख दिया है। डॉ, दिनेश पाठक'शशि'जी द्वारा की गई समीक्षा बहुत ही उत्तम उच्च कोटि की है ,लेखक एवं समीक्षक दोनो को ही सादर धन्यवाद एवं अभिवादन करते हैं।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।