कहानी: नर्म फाहे

- भावना सक्सैना

सेमल खूब फला था इस बार। हर तरफ नर्म फाहे तैर रहे थे मानो किसी ने टोकरी भर उजले नर्म फूल ऊपर से उड़ेल दिए हों और वे गिरना भूलकर तिरने लगे हों हवा पर। नटखट बालकों से इधर-उधर दौड़ते सेमल के फाहों के बीच आक के सुकोमल बीज भी तैर रहे थे।  महीन धागों के पंख नन्हे-नन्हे बीजों को सेमल के फाहों से होड़ करने को उकसा रहे थे। हवा दोनों के पंखों को उड़ान देती इस चहल-पहल से खुश हो इठला रही थी।

गेट के पास सतत प्रहरी से खड़े अशोक के वृक्ष में गुलमोहर की एक टहनी यूँ आकर बस गई थी कि लगता अशोक नारंगी फूलों से खिल उठा है। दूर से देखने पर यही लगता मानो अशोक के पेड़ पर ही सुर्ख फूल खिल आए हों।

उसे यह मौसम बचपन से ही बहुत पसंद था। ये गहमागहमी चंद दिनों चलती, फिर एक बरखा के बाद सब शांत हो जाता। प्रकृति सद्यस्नाता सी लजाई, ज़रा भारी मन से सेमल के भीगे फाहों को विदा कहती और अमलतास के झूमर और गुलमोहर के गुच्छों से श्रृंगार कर निखर जाती। वह जानता था ये मौसम बहुत कम दिन ठहरता है, इसीलिए इसका भरपूर आनंद लिया करता था। हर दोपहर वह कार्यालय से बाहर निकल आता और प्रकृति में होती इस गहमागहमी को आत्मसात करता।

 ऐसे ही एक रोज़ जब वे दोनों भोजनावकाश में कार्यालय के पास के पार्क की बेंच पर आकर बैठे तो उसने आक के एक बीज को पकड़ उसके हाथ पर धर दिया और बोला "लो जो चाहे माँग लो।”

वह खिलखिला दी, "ऐसे माँगने से कुछ मिलता है क्या?”

उसकी इस खिलखिलाहट पर वह न्योछावर होने को तैयार रहता था, कि यह मिलती कभी-कभार ही थी। संजीदगी का खोल वह इस तरह कस कर पकड़े रहती थी मानो वही उसकी आखिरी जान हो। फिर भी वह समझ नहीं पाता था कि ज़िन्दगी बहुत कड़वे दौर से गुज़र कर भी किसी की खिलखिलाहट कायम कैसे रह सकती है। उसने कई बार झांकने की कोशिश की थी कि संजीदा से खोल के पीछे कुछ और दिखता है क्या, पर वह जान न सका था आज तक। यूँ भी किसी को उतना ही जाना जा सकता है जितना जानने की वह छूट दे।
पहचान नई हो ऐसा न था, लेकिन इतनी पुरानी भी न थी कि एक दूसरे को आरपार जानते हों। उन दोनों को साथ काम करते अधिक समय ना हुआ था,  लेकिन एक ही प्रोजेक्ट पर काम करते रहने से दोनों के बीच में अधिक सद्भाव था और एक दूसरे के प्रति सम्मान ही। जो उसने जाना वह उड़ती हुई कुछ खबरों से, जो अपने से ज़्यादा दूसरों से सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवियों ने खोज निकाली थी। उन्होंने ही पता लगाया था कि वह विवाहित किंतु अकेली वाली श्रेणी में है। स्वयं उसने उत्कंठा को कभी शालीनता पर हावी न होने दिया और उनका संबंध साथ काम करने वालों के बीच सहज हँसी-मजाक का होकर रह गया था, आपसी सौहार्द्र को मित्रता कहा जाए तो दोनों को मित्र कहा जा सकता था। संग उठना-बैठना, चाय पीना और भोजनावकाश में कभी परिसर में टहलने निकल जाना। इसी दौरान आने वाले फ़ोन कॉल से ही उसने अंदाज़ लगाया था कि वह दो पुत्रियों की माँ भी है। यद्यपि वह कहीं से भी उस वय की लगती न थी। मध्यम कद-काठी, तीखे नैन-नक्श पर घुंघराले काले बाल, छोटे होते हुए भी उसे निखार देते थे। एक घड़ी के अतिरिक्त किसी अन्य आभूषण का देह पर न रहना थोड़ा विस्मित करता था लेकिन उसका कभी कुछ कहने पूछने का साहस न हुआ।

 बेहद संजीदा रहने वाली अपने काम को समर्पित कंचन अक्सर लंच में बाहर निकल जाती थी। उन दोनों के बीच का आवरण एक रोज़ तब खिसका जब अचानक कार्यालय परिसर से कुछ दूरी पर स्थित उस पार्क में एक तितली को देखकर वह स्वतः ही मुस्कुरा रही थी और तितली के पीछे दौड़ती नज़र उसकी नज़र से आ टकराई थी।  उस मुस्कान ने उसके अन्यथा आकर्षक व्यक्तित्व को  इस तरह निखारा था जैसे वर्षा की बूंदें संपूर्ण प्रकृति को निखार देती हैं। उसे अपने आपको देखता हुआ पाकर वह लजा गई थी, और  उसे इस स्थिति से निकालने के लिए वह यूँ ही कह उठा था “मुझे भी फूल और तितलियाँ बहुत पसंद हैं। कुछ समय पहले तक मैं  भोजन अवकाश के दौरान, रोज इस पार्क में टहलने आया करता था।”

ओह! तो अब बंद क्यों कर दिया? आया कीजिए ना साथ टहलेंगे। कोई और शायद इस सहज प्रतिक्रिया में आमंत्रण खोज सकता था, लेकिन अचिंत ने मुस्कुराकर बस “ठीक है” कह दिया था। शायद वह स्वयं भी यही चाहता था, और इस तरह उनका भोजन अवकाश में संग आना आरंभ हो गया था। दोनों का व्यवहार सहज व निश्छल था, न कोई अपेक्षा, न आग्रह। बातों के विषय धरती से आकाश तक सब समेटे रहते थे और धीरे-धीरे वे एक-दूसरे को कुछ बेहतर समझने लगे थे।

अचानक उसे एहसास हुआ कि वह एकटक उसे देखे जा रही है... मुस्कान अब तक सिमट गई थी। वह संजीदा होते हुए बोली, “कुछ गलत कह दिया मैंने? बस यही तो पूछा कि ऐसे माँगने से कुछ मिलता है क्या?”
आज वह भी बात को जरा आगे ले जाने के मूड में था, सो जरा सा मुस्कुराते हुए बोला, “नहीं, कुछ गलत नहीं, पर तुमने माँगा है क्या कभी!”

“हम्म्म बहुत माँगा है, और अब तक ये समझ आ गया है कि मिलता वही है जो अपने हिस्से का हो... ”

“क्या माँगा था जो न मिला तुम्हें?”

“क्या करोगे जानकर?”

“बताओ तो”

“बरस दर बरस एक चाहत इन उड़ते बीजों के संग उड़ाई मैंने... और वह हर बरस किसी नम भूमि में पड़ ऐसी फली की अब हज़ार बन गयी हैं... पूरी एक भी न हुई, बस बढ़ती गईं। सब को सहेज कि दिल के आले में सजा रखा है, लगता नहीं इनमें से कोई अब पूरी होगी, हाँ बरगद सी फैली उन इच्छाओं का मूल एक ही है और वह मेरे संग विदा होगी इस दुनिया से।”

“ऐसा न कहो, चलो इस बार कोई नई ख्वाहिश करके देखो।”

उसकी आँखों में कुछ था कि वह न हँसी में टाल सकी और न ही कुछ और कह सकी। हथेली को खोला तो उस बीज के कई सुकोमल रेशे उसकी नम हथेली पर चिपक गए थे, जो न चिपके थे वे हथेली खोलते ही फिर से हवा में तिर गए। बीज कुछ रेशों के साथ अब भी हथेली पर था। उसने आँख बंद कर कुछ बुदबुदाया और फिर आँख खोलकर हथेली पर धरे आक के बीज को फूंक मारकर उड़ा दिया ।चेहरे पर कोमल स्निग्ध मुस्कान ने फिर अपना डेरा जमा लिया था।

“क्या माँगा?”

“अरे! बताते नहीं हैं। बताने से कामना पूरी नहीं होती।”

“बताओ न”

“नहीं”

“इससे पहले जब माँगा तो किसी से कहा था”

“न”

“वह भी तो पूरा न हुआ, एक बार बता कर देखो शायद मन की मुराद मिल जाए।”

उस पल उसे लगा शायद वह सही हो, और जो बात उसी से जुड़ी है वह बताने में हर्ज़ भी क्या, किंतु अगले ही पल उसकी छठी इंद्री सचेत हो उठी। वह जानती थी कि भावावेश में कुछ कहना खुद को कमजोर कर देना होगा। तो फिर से खिलखिलाकर हँस दी कि खिलखिलहाहटें मन में सरसराती सारी आवाज़ों को दबा देती है। उसके पास हिम्मत से खड़े रहने का विकल्प न था। मन और देह की डोर उसने बुद्धि को सौंप रखी थी, बहुत संयत आवाज़ में उसने प्रतिप्रश्न किया, “पहले तुम कहो, तुम माँगते तो क्या माँगते?”

वह लड़की न था, और न ही अल्हड़ किशोर था। बात बहुत दिन से मन में अटकी थी इसलिए बहुत सोचने को तवज्जो न दी उसने, सामने दिख रही गुलमोहर की डाली पर नज़र टिकाकर बोला, “मैंने माँगा कि गुलमोहर की उस लता सी तुम, मेरे जीवन में बस जाओ और मेरे हरेपन में सुर्ख गुलाब टांक दो।”

यह सुनते ही उसकी मुस्कान लजा गई और चेहरा खुद गुलमोहर हो गया। अपने मन की बात दूसरे से सुनकर जो आनंद मिलता है वह शब्दों के बयान से परे होता है। उसे इस बात का कोई फर्क न पड़ा कि ये उसकी पहली मोहब्बत थोड़ी न थी। उसका लजाना किसी चंचल किशोरी से कम भी न था। किंतु भावातिरेक में बह जाए इससे कहीं अधिक परिपक्व थी। संजीदा होते हुए बोली, “वह लता इसलिए पल्लवित हो रही है कि आज भी वह जुड़ी अपनी जड़ से ही है, व मूल वृक्ष से पोषण पा रही है। यदि उससे अलग हो जाएगी तो सूख जाएगी और वह अशोक कुछ न कर पाएगा। वह सूखी लता चार दिन में सब सौंदर्य खो धराशायी हो जाएगी।”

उससे कोई उत्तर न पा वह बोलती गई... “मेरे बारे में जानते ही क्या हो जो मुझे अपने खुशहाल जीवन में टाँगने का इरादा कर चले हो।”

“जितना मैं जान पाया हूँ काफी है।”

“नहीं वह काफी नहीं है। तुम नहीं जानते मैं उस लता सी हरी नहीं सूखी शाख हूँ... वह शाख जो सिर्फ तब तक उस जड़ से जुड़े रहना चाहती है जब तक उस पर आश्रित दो नन्हीं चिड़ियाँ अपना खुद का घोंसला न बना लें।”

“मैं समझा नहीं! क्या तुम अब भी जुड़ी हो उनके पिता से? मुझे लगा था तुम अलग हो!”

“समझने के लिए जानना पड़ता है पहले अचिंत। तुमने बस यही जाना कि मैं अकेली रह रही हूँ... वह आधी बात है, मैं अकेली नहीं दो बेटियों की माँ हूँ।

“उतना तो मालूम है क्या मैं पूरी बात जान सकता हूँ?”

“पिछले कुछ समय में तुम ने एक विशेष स्थान बना लिया है अपना और मैं समझती हूँ कुछ कोमलता तुम्हारे मन में उत्पन्न हो रही है, जिसे मैं लौटा न पाउँगी, इसीलिए तुम्हें पूरा अधिकार है पूरी बात जानने का। मैं नहीं चाहती तुम किसी भ्रम या उम्मीद में रहो। मेरे साथ सोलह और अट्ठारह बरस की दो बच्चियाँ है। पिछले चार साल से उन्हें लेकर इस डरावने महानगर में जी रही हूँ, और इसके साथ-साथ खुद से भी लड़ रही हूँ...”

वह निर्विकार उसकी बात बड़े गौर से सुन रहा था। अब कंचन अपनी रौ में बह निकली थी, “इन पिछले चार बरस से पहले के दो बरस और भी भयावह थे... लगता नहीं था उनसे निकल पाउँगी। यहाँ पहुँचने की तो सोची भी नहीं थी। लेकिन जद्दोजहद जब ज़िंदगी से हो तो ज़िंदा रहना ही एकमात्र ख्वाहिश रह जाती है। बाकी सब ख्वाहिशें उस एक ख्वाहिश पर कुर्बान हो उसको पूरा करने के लिए अपनी ऊर्जा समर्पित कर देती हैं। छः वर्ष पहले जब मुझे पता लगा कि मैं कैंसर सी भयावह बीमारी से ग्रस्त हूँ तो अपनी बच्चियों को देख मैंने अपनी सारी ऊर्जा जिंदा रहने पर लगा दी थी। ईश्वर की कृपा थी या बच्चियों का भाग्य, मैं बच गई। मौत के मुंह से लौट कर आये इंसान को ज़िंदगी लीज सी लगती है अचिंत। मेरा भी यही हाल था... हर पल यही सोचती थी, और आज भी हर पल यह मन में रहता है कि न जाने कितनी साँसे बची हैं झोली में। न आज का भरोसा न कल का।

बेटियों का कल सुरक्षित करने को अलग रहने का कदम उठाया, उस समय रिद्धि बारह की और काव्या चौदह वर्ष की थी। मैं घबरा गई थी कि यदि मुझे कुछ हो जाये तो इन दोनों का क्या होगा। वे दोनों बच्चियाँ मेरा दायित्व थीं।

वह शुरू से बेलौस था, मस्त, जिसे न आज की फिक्र न कल की। किसी तरह की कोई बचत-पूंजी न थी। यह बीमारी बड़ा झटका था। इलाज कराने की हैसियत न थी। संबंधियों ने बहुत सहायता की। उनसे आर्थिक मदद ले वह मेरे साथ खड़ा रहा किंतु मैं उसके भरोसे मर नहीं सकती थी, क्योंकि उसकी सोच फिर भी यही थी कि सब हो जाता है अपने आप, फिक्र क्यों करें।  तो कीमो के दर्दनाक दौर से जल चुके अपने अस्तित्व की बची-खुची राख समेटी और चल पड़ी... ज़िद के कोसे पानी से उसे गूंथा, पिछले 10 बरस में अपनी बच्चियों को ही नहीं, खुद को भी गढ़ा है मैंने। माँ होना आसान नहीं होता, एक बार माँ बनने के बाद आप अपने बारे में सोचना छोड़ देते हो। आपकी सम्पूर्ण ऊर्जा व विचार अपने बच्चों के लिए होते हैं।

गाँव में कोई रास्ता न था कुछ करने का, ज़्यादा से ज़्यादा कुछ ट्यूशन कर सकती थी लेकिन उससे न गुज़र होती न बच्चियों का भविष्य बेहतर होता। बेटियों को मैं एक बेहतर माहौल देना चाहती थी। उनपर  कोई परंपरागत बन्धन न रहें और न कायदों के दबाव यही सोच एक रोज़ बस तिर गई ख्वाहिश के पंख लिए दृढ़ता के आकाश में। विवाह से पहले किया बी.ए. और सेक्रेटेरियल कोर्स काम आया औऱ एक मित्र ने यह नौकरी पाने में सहायता की।

“तुम बहुत बहादुर हो कंचन। तुमने बहुत सहा है जिंदगी में।”

“हाँ अचिंत आसान नहीं था... स्त्री कितनी भी साहसी हो, संरक्षित वातावरण से कदम निकालना उसके लिए बड़ी चुनौती होता है। वह कई-कई बार परखती है, तौलती है। लेकिन मैंने पाया कि जो पीछे छूटने वाला है वह बहुत मामूली है, उसे दाँव पर लगाने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था मेरे पास।”

“यह सब जानकर मेरे मन में तुम्हारा सम्मान और बढ़ गया है। नहीं जानता कहना चाहिए या नहीं लेकिन मैं तुम्हारी आगे की राह का साथी बनना चाहता हूँ, जिस रूप में तुम चाहो।”

“मैंने अभी कहा कि मुझे स्वयं न अपने कल का पता है न आज का और फिर मैंने उसे त्यागा नहीं है, त्याग सकती नहीं, क्योंकि उसने तब मेरा साथ दिया जब मैं मृत्यु के द्वार पर खड़ी थी।” मेरी ख्वाहिश बस यही रही कि मैं अपनी बच्चियों का भविष्य सुरक्षित कर सकूँ। अपने लिए मैं न सोचती हूँ न जीती हूँ। मैं नहीं जानती मेरे पास कितना समय बचा है। और साथी तो अनजाने में बन ही गए हो तुम। एक नर्म फाहा हो तुम मेरी जिंदगी में। बस दो कदम साथ चलने से अधिक कुछ न माँगो कि मैं करीब से यह देख चुकी कि किसी का पास होकर न होना और किसी का पास न होते हुए भी पास होना दोनों दुखदाई हैं।

“मैंने यह सीखा है इस सफर में कि जब स्थिति तुम्हारे नियंत्रण में न हो तुम खुद ऐसे हो जाओ कि तुम जब हो, तो भी न हो, और जब न हो तो भी रहो कहीं आसपास...”

“इन्हीं नर्म फाहों से, देखना ज़िंदगी आसान हो जाएगी...”

संयोग था शायद कि उसके यह बोलते-बोलते सेमल का एक फाहा आहिस्ता से आकर उसके काँधे पर बैठ गया मानों प्रकृति का आश्वासन हो कि वह उसे नर्म फाहे देती रहेगी।

4 comments :

  1. बहुत ही सूक्ष्म भावों को अपने भीतर संजोए सुंदर अभिव्यक्ति । बधाई भावना ।

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  2. बहुत ही सूक्ष्म भावों को अपने भीतर संजोए सुंदर अभिव्यक्ति । बधाई भावना ।

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  3. प्रकृति के फाहों के साथ को महसूस कीजिये, जिन्दगी आसान हो जायेगी. अभिव्यक्ति की बधाई

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  4. सुकोमल, सुगठित अभिव्यक्ति

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