साठ में समुद्र: पुदुच्चेरी वाया बेंगळूरु (यात्रा संस्मरण)

- गोविन्द सेन


दूसरी बार मैं बेंगळूरु के लिए 1 सितम्बर 2019 को मनावर से रवाना हुआ। बेटा विनय मेरे लिए टिकट बुक करवा चुका था। रात 10 बजे एयर एशिया का प्लेन देवी अहिल्या बाई होल्कर, इंदौर एअरपोर्ट से उड़ान भरने वाला था जिसे रात 12:05 बजे यानी 2 सितम्बर को बेंगळूरु उतरना था। मनावर से इंदौर पहुँचने में करीब 3 घंटे लगने वाले थे। इंदौर में राजेंद्र नगर उतरकर ऑटो से एअरपोर्ट जाना था। एअरपोर्ट पर उड़ान के समय से करीब डेढ़ घंटे पहले तो पहुँचना ही होता है। मुझे शेक्सपियर का वह कथन हमेशा याद रहता है कि समय को पकड़ना हो तो आगे से पकड़ना चाहिए पीछे से नहीं क्योंकि समय पीछे से गंजा होता है। एक मिनट की देरी से जाने से बेहतर है तीन घंटे पहले पहुँच जाना। समय से पहले पहुँचने में कोई नुकसान नहीं होता पर समय के बाद पहुँचने से तो नुकसान के सिवा कुछ नहीं बचता। फिर मुझ से हाय-बाप होती भी नहीं या यूँ भी कह सकते हैं कि मुझे हमेशा उतावली पड़ी रहती है। इसके अलावा कभी-कभी बसों का भी कोई ठिकाना नहीं होता। पता नहीं कौनसी बस फेल हो जाए या सवारी मिल जाने पर जल्दी ही रवाना जाए। अनेक बार मनावर से इंदौर आना-जाना होता है, पर मुझे बसों का सही-सही समय याद ही नहीं रहता। यही सोचता हुआ मैं वक्त से बहुत पहले मनावर बस स्टैंड पर पहुँच गया था। सामने इंदौर के लिए माँ शारदा बस खड़ी थी। मैं उसी में बैठ गया। संयोग से खिड़की वाली सीट मिल गयी। बस अपने निर्धारित समय पर यानी तीन बजे बचते ही चल पड़ी थी।

मनावर शहर नर्मदा के उत्तर में मान नदी के किनारे बसा मध्यप्रदेश के धार जिले की एक तहसील है। मान नदी आगे जाकर नर्मदा नदी में मिलती है। कहा जाता है कि मान नदी के कारण ही मनावर को अपना नाम ‘मनावर’ मिला। मैं खिड़की से देखता जा रहा था। यह टू लेन की सड़क नर्मदा के करीब-करीब समानांतर है। एकदम किनारे पर तो नहीं चार-पाँच किलोमीटर की दूरी पर। कहीं-कहीं यह दूरी घाट-बढ़ जाती है। अक्सर इन गाँवों के शवों के अंतिम संस्कार नर्मदा तट पर ही होते हैं। माना जाता है कि वहाँ अंतिम संस्कार होने से मृतक को तुरंत मोक्ष प्राप्ति होती है। नर्मदा को माँ माना जाता है। धरमपुरी के बाद या पहले किसी गाँव में कहीं किसी बैनर पर लिखा था - ‘माँ नर्मदा की ये पहचान / पानी, पत्थर और पुराण।’

इस बार पानी कुछ ज्यादा ही बरस रहा था जिसके कारण चारों तरफ हरियाली छायी थी। हर खेत हरा-भरा था। सड़क के किनारे नीम, पीपल और बरगद जैसे कई पेड़ झूम रहे थे। बारिश ने अनंत चतुर्दशी की झांकियों को तो रोका ही, दिवाली के दीये भी बुझाने पर आमादा रही थी। ऐन दिवाली में बारिश होती रही। अमूमन सितम्बर तक सिमट जाने वाली बारिश अक्टूबर तक चलती रही थी। यहाँ तक कि नवम्बर में भी बारिश ने अपना एक कदम रखा था। जगह-जगह पानी के डबरे भरे थे। पहाड़ों की त्वचा हरी हो गई थी। पेड़ हरे थे। कई हरी बेलें तो मौज में आकर बिजली के खम्भों की तानों पर चढ़ कर इठला रही थीं। हालाँकि पानी के आधिक्य की वजह से खरीफ की फसलों को नुकसान भी उतना ही हुआ था पर कुँए-तालाब-बांध भर गए थे।

कुछ बरस पहले तक बसें बाकानेर, धरमपुरी, धामनोद और गुजरी के भीतर से होकर जाती थी, पर अब बसें भीतर जाए बगैर बाहर-बाहर बायपास से इंदौर चली जाती हैं। इनके भीतर के रास्ते यातायात के लिहाज से तंग पड़ चुके थे। जनसंख्या के साथ वाहनों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। फिर लोग सड़क को गली बनाने में माहिर होते हैं। अपनी दुकान और मकान को आगे बढ़ाते-बढ़ाते आधी सड़क को तो हड़प लेते ही हैं। यदि आमने-सामने दो बसें पड़ जाएँ तो आगे-पीछे किए बगैर उनका निकलना मुश्किल हो जाए। एक साथ दो बसें नहीं गुजर सकतीं- ‘प्रेमगली अति सांकरी जामे दो न समाय’। नवेली बायपास सड़कों ने आवागमन को बेशक सुगम बनाया है। पर धीरे-धीरे इन सड़कों पर भी दुकानों और इमारतों का सिलसिला शुरू होने लगा है। कई नई दुकानें और मकान बायपास रोड पर भी आ गए हैं। लगता है बायपास सड़कों में कोई चुम्बक है जो दुकानों और इमारतों को बरबस अपनी ओर खींच लेता हो।

खलघाट से बस हाईवे पकड़ लेती है। हमारी बस टू-लेन से फोर-लेन पर आकर बायें हाथ की ओर मुड़ कर इंदौर का रास्ता पकड़ चुकी थी। बस मानपुर घाट से गुजर रही थी। यह घाट नेशनल हाईवे नंबर 3 पर है। इस घाट पर अधिक ढलान होने से हर दूसरे दिन दुर्घटना होती ही रहती है। एक तकनीकी त्रुटि अनेक लोगों की जान ले चुकी है और पता नहीं कितने निर्दोष लोगों की जान लेगी। इस घाट को मौत का घाट कहा जाने लगा है। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कई फौरी इलाज किए जा चुके हैं पर कोई भी उपाय कारगर सिद्ध न हो सका। विन्ध्याचल को काटकर हाईवे की सड़क बनी थी। पहाड़ को लम्बाई में ऐसे काटा गया था मानो तरबूज को बीच से काटकर उसकी फांक को अलग कर दिया गया हो। सड़क के लिए कटे हुए पहाड़ में चट्टानों की परतें और कटाव साफ़ नजर आ रहे थे। पहाड़ की भीतरी संरचना दिखायी दे रही थी। उन कटी हुई चट्टानों की परतों से जगह-जगह पानी झरप रहा था। मैं राजेंद्र नगर उतरकर सीधे एयरपोर्ट पहुँच गया। टिकिट, लगेज और चेकिंग के बाद बोर्डिंग गेट के पास की एक कुर्सी पर बैठा गया था।

रह-रह कर पोते की बालसुलभ चेष्टाओं की कल्पना कर मन पुलकित हो रहा था। करीब चार महीने के पोते अवि की बाललीला देखने की तीव्र इच्छा कुलबुला रही थी जो जल्दी ही साकार होने वाली थी। उसकी दादी वहीँ थी और करीब रोज ही अवि के बारे में बात होती थी। वीडियो कालिंग के जरिए उसे देखता रहता हूँ। तभी विनय का फोन आया। उसने मेरे एयरपोर्ट पर पहुँचने की जानकारी ली। एक खास जानकारी भी दी- ‘पापा मैंने आपके लिए एक ट्रिप प्लान की है - पांडिचेरी की’। जानकर मुझे अतिरिक्त ख़ुशी हुई।

जब प्लेन लैंडिंग कर रहा था तो नीचे का नजारा चित्ताकर्षक लग रहा था। रात में नीचे रंग-बिरंगी रोशनी की खड़ी-आड़ी-तिरछी लड़ियाँ बिछी हुई थीं। जैसे काली मखमली चादर पर लाल-पीले-सफ़ेद रंग के हीरे-मोती के अंतहीन ढेर चमचमा रहे हों। विमान का कोण बदलते ही कोई नया विस्मयकारी दृश्य नजर आने लगता था। कहीं रोशनी की अंतहीन मालाएँ दिखाई दे रही थीं तो कहीं कोई रोशनी बिखेरता कोई अकेला सूना-सा खम्भा।

तय ट्रिप के अनुसार 7 सितम्बर की रात को बेंगळूरु से पुदुच्चेरी (पॉण्डिचेरी) के लिए हम तीनों बस से रवाना हुए। हम तीनों मतलब छोटा पच्चीस वर्षीय बेटा निखिल, पत्नी सुलभा और मैं खुद। निखिल हमारा मार्गदर्शक था। पुदुच्चेरी में मेरा सबसे बड़ा आकर्षण समुद्र था। पहली बार मुझे समुद्र को देखने का मौका मिल रहा था। सुलभा का भी यह पहला ही मौका था समुद्र प्रत्यक्ष देखने का। समुद्र और हमारे बीच कोई अन्य माध्यम नहीं था। सजीव समुद्र खुद हमारे सामने था।

लगभग अनपढ़ माता-पिता की संतान हूँ। उन्होंने लिखकर या वैसे ही मेरी जन्म दिनांक को याद रखने की जहमत नहीं उठायी। यह अच्छा ही हुआ कि मैं शादी के समय जन्म कुंडली मिलने-मिलवाने के झंझट से बच गया, केवल बोलते नाम से गुण मिलाने से काम चल गया और संयोग से पर्याप्त गुण मिले थे। शायद वे गुण ही अभी तक चल रहे हैं। आखिर पति के अवगुणों के झेलने के लिए ही तो भारतीय पत्नियाँ बनीं होती हैं। गनीमत रही कि इन्हीं माता-पिता की छत्र-छाया में थोड़ा-बहुत पढ़-लिख गया और स्कूल में भर्ती होने के कारण मुझे एक जन्म दिनांक मिल गई। उसके अनुसार मैं अगस्त में साठ पार चुका हूँ। इस तरह साठ की उम्र में पहली बार समुद्र प्रत्यक्ष देख रहा था।

अभी तक मेरे लिए समुद्र केवल कल्पना में ही था। केवल फिल्मों और तस्वीरों में समुद्र देखा था। मैं पहली बार समुद्र 8 सितम्बर 2019 को करीब सुबह 6-6:30 बजे सुलभा और निखिल के साथ ‘रॉक बीच’ पर देख रहे था। रविवार का दिन था पर समुद्र छुट्टी पर नहीं था। समुद्र कभी छुट्टी पर नहीं रहते। वह हमारे सामने अपनी भरपूर उपस्थिति दर्ज करा रहा था। यह बंगाल की खाड़ी का समुद्र था। मैंने मन ही मन बड़े बेटे विनय का शुक्रिया अदा किया कि उसने खासतौर से मेरे लिए पांडिचेरी की इस ट्रिप का इंतजाम किया। चट्टानों पर बार-बार आ-आकर पछाड़ खाती समुद्र की उद्दाम फेनिल-लहरों को देख मैं मंत्र मुग्ध हो गया। बस स्टैंड पर उतरकर हम बिना ऑटो वगैरह के पैदल ही शहर को निहारते हुए रॉक बीच पर पहुँचे थे। हम काली बड़ी-बड़ी चट्टानों पर बैठ कर बेचैन लहरों की को निहार रहे थे। मुझे बार-बार स्वामी रामतीर्थ की अंग्रेजी कविता ‘वेव्स ऑन स्लीपलेस सी’ की याद आ रही थी जिसमें समुद्र को ‘स्लीपलेस’ की उपमा दी गई है। मैंने आज तक समुद्र के लिए ऐसी सटीक उपमा पढ़ी या सुनी नहीं थी। अथाह जलराशि का मालिक समुद्र कभी सोता नहीं है। वह हमेशा जागता ही रहता है। उसमें लगातार उठती-गिरती चट्टानों पर बार-बार पछाड़ खाती लहरें यही तो सिद्ध कर रहीं थीं कि समुद्र सोता नहीं है। आसमान पर बादल छाए थे जो उगते हुए सूरज की किरणों को रोकने की कोशिश में लगे थे। पर सूर्य की चंचल किरणें बादलों की हथेलियों से बाहर आने पर आमादा थीं। जहाँ भी गुंजाइश मिलीं, वहीँ समुद्र की छाती पर चमचमाती हुईं झर रही थीं और समुद्र की हिलती-दुलती लहरों पर चिलक-चिलक कर दर्शकों को चमत्कृत कर रही थीं। आकाश में किरणों की इतनी झिलमिल थी कि स्लेटी बादलों और क्षितिज के बीच की क्षीण सीमा रेखा ही नजर नहीं आ रही थीं। कहिए कि विलुप्त ही हो गई थी। आँखों के सामने बेचैन समुद्र का अद्भुत दृश्य था। समुद्र तट पर पर्यटकों का मजमा लगा था। हमारी यात्रा की थकान इन दृश्यों को देख धुलने लगी थी।

अब तक समुद्र को प्रत्यक्ष देखे बिना मैं एकाधिक ऐसे दोहे लिख चुका था जिसमें समुद्र या सागर आ चुका था। मुझे अपने दो दोहे सहसा याद आए थे। पहला-सागर पर बारिश हुई, तरसा रेगिस्तान/ भरे पेट को ही यहाँ मिलते हैं पकवान। दूसरा-सागर सोता रह गया। मचा न पाया शोर/ पानी की ले गठरियाँ, भागे बादल-चोर। समुद्र को दुनिया भर के लिए नमक ढोना पड़ता है। समुद्र की बेचैनी इस कारण भी हो कि नदी के मीठे पानी को खारा बनाने का कलंक उसके माथे पर लगा है। दुनिया भर की प्यास बुझाने की जिम्मेदारी भी लगातार उसके कंधे पर रहती है। बारिश के लिए बादलों को रवाना करने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी उसके कंधे पर ही होती है। शायद इन जिम्मेदारियों का बड़ा बोझ उसे सोने नहीं देता हो। अनिद्रा का यह रोग शायद उन्हीं जिम्मेदारियों की देन हो।

समुद्र से एक मछलांदी गंध उठकर नथुनों में समा रही थी। मैं जिस ‘मछलांदी’ गंध का जिक्र कर रहा हूँ, यह पानी, मछली और मिट्टी के बरसों के साहचर्य से बनी गंध है। शब्दकोश में शायद ही यह शब्द मिले, यह तो मेरे स्मृतिकोष में बसी गंध का एक देशज शब्द हो सकता है। इस शब्द को मैंने बचपन में सुना है। यह गंध उस गंध से मिलती-जुलती थी जो मामाजी के गाँव राजपुरा के तालाब से उठा करती थी। उस गंध के साथ ही उस तालाब पर कपड़ों को पछीटने की बरसों पुरानी आवाजें मुझे सुनाई देने लगीं। वह तालाब मेरे बचपन का समुद्र था। जब नानीजी को तुअर [अरहर] की दाल पकानी होती, उसी तालाब का पानी हांडी में ले जाया जाता। गाँव की झरी [छोटा गोल कुआँ] के पानी से दाल कटकटी रह जाती थी, घुलती नहीं थी। उस तालाब के बहाने ही सही, नाना-नानी के कर्मठ चेहरे मेरे जेहन में घूम गए। वे भी समुद्र की तरह अनथक श्रम में रत रहते थे। समुद्र ने अनायास मुझे पीछे छूट गए उस तालाब तक पहुँचा दिया था। इस बीच पर काली चट्टानों पर बैठे-खड़े कई युवा जोड़े एक दूसरे का फोटो अलग-अलग एंगल से खींचने और सेल्फियाँ लेने में ऐसे तल्लीन थे मानो उनके सिवा उस बीच पर कोई न हो। अनजान शहर में कौन-किसको जानता है, इस अनजान शहर ने उन्हें बखूबी आजादी दे रखी थी। वहाँ उनके लिए पहचान के सभी पर्दे तिरोहित हो चुके थे। मुझे शशि कपूर पर फिल्माया वह गीत याद आया-‘यहाँ मैं अजनबी हूँ। जो हूँ बस वही हूँ।’ यहाँ वे सब अजनबी थे और अजनबीपन आजादी भी देता है।

तट के समानांतर करीब सवा किलोमीटर लम्बी रोड है। इसके एक छोर पर डुप्ले पार्क है। यहाँ डुप्ले (Joseph François Dupleix) महोदय का आदमकद काले पत्थर का स्टेचू है। डुप्ले यहाँ के गवर्नर चुके थे। उनके सिर को पक्षियों ने बीटें करके सफेद बना दिया था। बीटों के सफ़ेद रेले नीचे कनपटियों और कोट तक आ गए थे। उस समय उनके सिर पर एक मासूम-सा कौआ भी आकर इत्मीनान से बैठा हुआ था। पक्षीगण बड़े-छोटे का लिहाज कहाँ रखते हैं। इसी पार्क में एक छोटे से काले रंग का हाथी का स्टेचू भी है जो हाथी के किसी इठलाते छोटे बच्चे जैसा मासूम और सलोना लग रहा था। मार्ग के दूसरे छोर पर गांधीजी की भी आदमकद काले पत्थर की प्रतिमा है पर इसे भी पक्षियों ने नहीं छोड़ा था। कौओं के लिए डुप्ले महोदय और गाँधी जी में कोई फर्क नहीं था। गाँधी जी के ठीक सामने रोड के पार भारती पार्क के बाजू में नेहरू जी की संगमरमर की बनी कम बड़ी पर आदमकद सफ़ेद प्रतिमा है। गाँधी जी एकदम काले और नेहरू जी एकदम सफ़ेद - रंग के लिहाज से एक-दूसरे के विलोम।

चाय-काफी-नाश्ते के लिए हमने बीच रोड पर स्थित प्रसिध्द ‘ले कैफ़े’ की ओर रूख किया। यहाँ से समुद्र का नज़ारा बखूबी लिया जा सकता था। कैफे समुद्र तट की ओर से लोहे की सलाखों की बाड़ से घिरा था। कैफ़े में खूब भीड़ थी। हम उत्तर की ओर खुली जगह पर ख़ाली एक टेबल देखकर बेंच पर बैठे गए। निखिल आर्डर देने के लिए काउंटर की ओर चला गया। यहाँ नारियल के दो-तीन पेड़ थे। बीच में एक छोटा-सा ताल था जिसमें कमल के छोटे-छोटे फूल खिले थे। थोड़ा झुककर गौर से देखने पर पानी में छोटी-छोटी रंगीन मछलियाँ भी नज़र आती थीं। वहीँ एक फॉसिल भी पड़ा था। प्रथम दृष्टि में वह पीले पत्थर का एक खंड नज़र आता था। पर उसके बारे में जो लिख गया था, वह पढ़ने पर पता लगा कि वह 20 मिलियन या 200 लाख वर्ष पुराना फॉसिल है। बाड़ के पार मैंने देखा, एक अधेड़ आदमी अपने कंधे पर एक बहुत बड़ा थैला उठाए चला आ रहा है जैसे वह उसका अपना समुद्र हो। मुझे उसे देख अपने शहर मनावर के कचरा उठाने के लिए घूमने वाले फटे-मैले-चीकट कपड़े पहने बच्चे, औरतें और आदमी याद हो आए। उसका थैला शायद खाद की सफ़ेद थैलियाँ को अनगढ़ ढंग से जोड़कर बनाया गया था। वह शायद पानी की ख़ाली बोतलें, कैन वगैरह ढूँढता घूम रहा था। उसका झोला ऐसे ही फेंके हुए सामानों से भरा होगा। जो लोगों के लिए कचरा या फालतू है, वह उसके लिए रोजी-रोटी का साधन था। नागार्जुन याद आए - ‘प्रभु तुम करो वमन, हो क्षुधा का शमन।’ एक तरफ कुदरत का विराट वैभव समुद्र था तो दूसरी ओर मानव की दरिद्रता का प्रत्यक्ष रूप जिसे कोई देख ही नहीं रहा था।

व्हाइट टाउन में घूमते हुए हम भारती पार्क पहुँच गए। यहाँ एक पत्थर की बेंच पर बैठ गए। हमने खाने के पैकेट निकाले। एक-दो कौए मंडराने लगे। मैंने सेव का एक टुकड़ा एक कौवे को डाला। कौए ने पट से दाना चोंच में उठा लिया। उसके पीछे-पीछे ही एक छोटा कौवा भी सेव के टुकड़े के लिए आ गया था। मैंने उस कौवे की तरफ भी एक टुकड़ा फेंका। पर वह टुकड़ा भी बड़े कौवे ने ही आगे बढ़कर चोंच से उठा लिया। मुझे अफ़सोस हुआ कि एक सबल ने निर्बल का हक़ छीन लिया। पर सोचने लगा कि यह निर्बल जब सबल होगा तो क्या यह भी इसी तरह किसी दूसरे निर्बल का हक़ तो नहीं मारने लगेगा!

‘ले जार्डिन सफ्रेन’ में सामान रखकर आटो से हम ‘पेराडाइज बीच’ के लिए रवाना हो गए थे। यह जगह बहुत शानदार है। समुद्र के यह बीच जीभ के आकार के खिले हुए एक टापू-सा है। पेराडाइज बीच पहुँचने के लिए निर्धारित टिकट लेकर हम बोट पर सवार हुए। बोटें उस बोट-स्टैंड से बीच तक सतत आवाजाही कर रही थीं। जाने वाली किसी भी बोट से बीच पहुँचो और आने वाली किसी भी बोट से वापस आ जाओ। बीच पर पहुँचते ही लगा कि सचमुच हमने स्वर्ग पर चरण धरे हों। दूर-दूर तक नारियल के पेड़ों के झुरमुट, पानी और हरियाली। एक तरफ धूम-धड़ाके से फ़िल्मी गीतों की तेज धुन और बोलों पर रेन-डांस चल रहा था। सैलानी बालीवुड के गानों पर पानी की बौछारों में नहाते हुए थिरक रहे थे। समुद्र के खुले तट पर प्रफुल्ल सैलानियों का ताँता लगा हुआ था। मैंने ‘पाँवों तले जमीन खिसकना’ तो सुना था पर यहाँ पाँवों तले रेत खिसकने को प्रत्यक्षतः महसूस किया। मैंने और सुलभा ने साथ-साथ समुद्र तट की रेत पर खड़े हो पहली बार समुद्र की उद्दाम लहरों को पाँवों तले शिद्दत से महसूस किया था। लहरें करीब-करीब घुटनों तक आ गई थीं। सैलानी खुद को आती हुए लहरों के हवाले कर देते थे और लहरें उन्हें आपादमस्तक भीगोकर वापस किनारे पर धकेल जाती थी। लगातार लहरों और सैलानियों का यह खेल चल रहा था। चारों ओर मस्ती का आलम था। यहाँ तक कि काले बुर्के पहने महिलाओं की एक टोली भी लहरों में भींगने और धकेले जाने के खेल का आनंद ले रही थीं। वे एक दूसरे को आती हुई लहरों पर धकेल रही थीं। जैसे ही लहरें आतीं और सैलानियों को किनारे की रेत पर धकेलती वैसे ही सामूहिक हर्षनाद उठता था और समूचा बीच दूर-दूर तक हर्ष ध्वनियों से भर जाता था जैसे एक हर्षध्वनि चारों ओर प्रतिध्वनित हो रही हो।

रविवार को रात्रि विश्राम ‘ले जार्डिन सफ्रेन’ में किया। हमारी यह ठहरने की जगह बंगाल की खाड़ी के रॉक बीच के करीब है और व्हाइट टाउन इलाके में आती है। बताया जाता है कि यहाँ की इमारतों की बनावट और गलियों के विन्यास में फ़्रांस का प्रभाव है। पुदुच्चेरी फ़्रांस का उपनिवेश रह चुका है। इसे भारत का छोटा फ़्रांस भी कहा जाता है। इमारतों की खिड़कियाँ दरवाजों की तरह बड़ी हैं। छतें झोपड़ियों की तरह ढलवाँ हैं जो नारियल के सूखे पत्तों से बनी हैं। रॉक बीच की एक इमारत पर एक डाल पर बैठे हुए बड़े-बड़े नीले रंग के पाँच तोते चित्रित थे और उसी डाल पर उल्टा लटका हुआ एक चमगादड़ भी बना था। रॉक बीच पर टहलते हुए यह सब बहुत सुहाना लग रहा था। एक तरह किलोल करता समुद्र था और दूसरी तरफ आकर्षक पुरानी वास्तुकला को प्रकट करती इमारतें।

जिस भवन ‘ले जार्डिन सफ्रेन’ में हम ठहरे थे, वह भी पुराने ढंग का बना हुआ, पर सभी सुविधाओं से सज्जित साफ-सुथरा था। इसका बड़ा प्रवेश द्वार एक गलियारे में खुलता था जिसकी बायीं ओर के कमरे में एक छोटी-सी लाइब्रेरी, बच्चों के खिलौने, शतरंज और गिटार वगैरह रखे हुए थे जबकि दूसरी ओर के कमरे में कुछ अन्य वाद्य पड़े थे। फ्रेम में जड़े कुछ पुराने श्वेत-श्याम फोटो करीने से दीवार पर लगे थे। ये फोटो शायद भवन-मालिक के पूर्वजों के होंगे। पूर्व में भवन का मुख्य द्वार था और पश्चिम में निकलने के लिए गेट था। लम्बा भवन दो सड़कों को जोड़ता था। यानी पूर्व में सड़क से प्रवेश करो तो पश्चिम में पिछली सड़क पर निकल जाओ। हम जिस हालनुमा कमरे में ठहरे थे वहाँ बाहर पेड़-पौधे थे। पुराने ज़माने को याद दिलाने वाली मेज-कुर्सियाँ पड़ी थीं। कमरे में छत में लकड़ी के पटाव को देख मामाजी का घर याद हो आया। पुराने ज़माने में ऐसे ही लकड़ी के पटाव वाले घर बनते थे। कमरे में फ्रेम में जड़े कृष्ण भगवान के तीन चित्र थे और एक चित्र में भारत के नक़्शे के साथ शायद फ़्रांसिसी राजा-रानी के चित्र बने थे। नक़्शे में फ़्रांस के आधीन रहे स्थान दर्शाए गए थे। एक चित्र में युवा श्रीकृष्ण शीश पर एक मोरपंख धारण किए हुए थे। उनकी सादगी और मुस्कान मनोहारी थी। ऐसा कृष्ण का मुस्कुराता चित्र मैंने बरसों बाद देखा था।

अगले दिन 9/9/19 की सुबह हम कैब से ओरेविल के लिए रवाना हो गए थे। कैब ने हमें प्रवेश द्वार पर बाहर छोड़ दिया था। यहाँ से मातृ मंदिर तक जाने का रास्ता हरा-भरा और घुमावदार था। रास्ते में देखने योग्य कई कलात्मक चीजें बनी हुई थीं जो सहसा ध्यान आकृष्ट कर लेती हैं। रास्ते में बेकार अनुपयोगी सीडियों से बनीं मछलियाँ देखकर बहुत अचरज हुआ। रचनात्मकता का नायाब नमूना थीं ये मछलियाँ। सीडी और डीवीडी का युग अब बीत गया है। उन अनुपयोगी सीडियों का ऐसा इस्तेमाल देख उन अनाम कलाकारों के प्रति मन में सहसा सराहना उपज रही थी। मेरे पास भी ऐसी अनुपयोगी सीडियाँ पड़ी हुई हैं पर मैं उनका ऐसा कोई उपयोग नहीं सोच पाया था। वहाँ सीडियाँ मछलियों के चमकीले शल्कों में बदल गई थीं। अनुपयोगी कार के पहियों ने उन मछलियों की आँखे बना दी थीं। लग रहा था कि जमीन पर दो मछलियाँ पड़ी हुई हैं और धूप में उनके शल्क चमक रहे हैं। वे स्थिर नहीं हैं, उनमें लगातार हलचल हो रही हैं।

आगे मातृ मंदिर पर निगाह पड़ती है। गोलाकार मंदिर का सुनहरा डोम धूप में चमक रहा था। दरअसल यह किसी भगवान का मंदिर नहीं, बल्कि एक ध्यान केंद्र है। लगता था कि डोम पर सोने की गोलाकार थालियाँ लगी हों। हमने एक ऊँचे चबूतरे से मातृ मंदिर को देखा। पर्यटकों को भीतर जाने की अनुमति नहीं थी। पर्यटक यहाँ से लगातार सेल्फियाँ ले रहे थे। बहती गंगा में हमने भी हाथ धोये।

ओरेविल एक हरा-भरा और मनोहारी नगर है, यहाँ 43 देशों के लोग साथ-साथ रहते हैं। यह एक छोटी-मोटी दुनिया है। ‘मय्यम पास्ट फ़ूड’ निखिल की खोज थी। वह हमें ठेठ देशी अंदाज के भोजनालय में ले गया। वहाँ परम्परागत भोजन परोसा जाता था और बिलकुल देशी अंदाज में। सारे बर्तन मिट्टी के थे। थालियाँ, कटोरियाँ और पानी कलशियाँ, सभी मिट्टी की बनी थीं। भोजन भी मिट्टी के बर्तन में ही परोसा गया था। हर दिन का मेन्यू स्थानीय कच्ची सामग्री की उपलब्धता के आधार पर बदलता रहता था। याने आप जो मांगोगे वह नहीं मिलेगा, वह मिलेगा जो ताज़ा उपलब्ध होगा। वहाँ भोजन कर नानी जी की याद हो आयी। नानी जी मिट्टी की हांडी में दाल पकाती थीं। तब अधिकांश बर्तन मिट्टी के ही होते थे। भोजन में एक मिट्टी की सुघड़ कटोरी में स्थानीय मिठाई ‘रागी पयसम’ परोसा गई थी। उसे खाकर ‘गुड़ के खाटे’ की याद हो आयी। यह मिठाई वैसी ही थी। इसे आप गुड़ की कढ़ी या रबड़ी कह सकते हैं। मुझे याद है बरसों पहले पैतृक गाँव में यह ‘गुड़ का खाटा’ सिर्वियों में अक्सर शादियों में बनता था और बहुत स्वादिष्ट था। खाटा शब्द से खटास का बोध होता है जो छाछ या दही से बनी कढ़ी में होती है। गुड़ में खटास नहीं होती, मिठास होती है। शायद दिखने की समानता के कारण ही उसे गुड़ का खाटा कहा जाता होगा। बहरहाल उस रागी पयसम ने एक पुराने मीठे व्यंजन की याद दिला दी जो मेरी स्मृति से भी विलुप्त हो गयी थी। निखिल का कहना था परोसा गया भोजन पेट पर भारी भी नहीं पड़ा यानि वह पेट-मित्र भी था। जीभ की लोलुपता और समय के बदलाव ने ऐसे कई परम्परागत व्यंजनों को हाशिये पर डाल दिया है।

ओरेविल में ही ‘स्वरम’ नाम से एक साउंड गार्डन भी है। नाम ही प्रभावित कर रहा था - साउंड गार्डन। हिंदी में अनुवाद करें तो होगा-संगीत का बगीचा। निखिल इस गार्डन को लेकर बहुत उत्साहित और उत्सुक लग रहा था। तरह-तरह की ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाद्य यन्त्र वहाँ प्रदर्शित थे। विभिन्न धातुओं, लकड़ी और पत्थर के बने वाद्य। वहीँ पास में लगा हुआ ही वाद्य यंत्र बनाने की कार्यशाला भी है। यह सोचकर अचरज होता है कि एक ध्वनि के कितने रूप हो सकते हैं। एक ध्वनि- अनेक रूप। यही ध्वनि अनुशासनहीन होकर शोर में बदल जाती है और अनुशासित होकर संगीत में। वहाँ आगन्तुक वाद्यों को बजाकर देख सकते हैं। हमने एकाधिक वाद्यों को बजाकर देखा। शिव लिंग के आकार का चिकने काले पत्थर का एक वाद्य बहुत अनोखा था। इस पत्थर में उर्ध्वाधर खाँचे पड़े हुए थे। इसे बजाने का तरीका का भी कम दिलचस्प नहीं था। इसे बजाने के लिए पहले हथेलियों पर पानी लगाना पड़ता है और फिर दोनों ओर हथेलियों के खाँचों के बगल में कुशलता से ऐसे रगड़ना पड़ता है जिससे वांछित ध्वनि निकल सके। इसे बजाना आसान नहीं था। इसे मैं ठीक से नहीं बजा सका था। अलबता निखिल ने कई वाद्यों को तन्मयता से बजाया। ‘स्टॉर्म ड्रम’ में आवाज बादल की गर्जना जैसी निकलती थी। ड्रम के बीच में एक कमानीदार नली लटकते साँप जैसी लग रही थी। इसे गोल घुमाते हुए बल देकर छोड़ने पर लगता था कि बादल गरज रहे हों और तूफ़ान आ गया हो। पहली बार गड़गड़ाहट सुनकर हम रोमांचित हो गए थे। इस वाद्य यन्त्र ने हमारा ही नहीं अन्य पर्यटकों का भी ख़ासा ध्यान खींचा। सामने ही सड़क पार एक इमारत में कार्यशाला में निर्मित वाद्य विक्रय के लिए उपलब्ध थे। देख-परख कर कुछ पर्यटक वहाँ से वाद्य यन्त्र खरीद भी रहे थे। मैं कुछ देर भीतर देख कर बाहर बेंच पर बैठ गया। उस परिसर में ही पीपल के पेड़ के नीचे काले चिकने पत्थर की चमचमाती सरस्वती माता की सुन्दर मूर्ति बनी थी। किसी की यह उक्ति सहसा याद हो आयी - ‘ब्लैक इज ब्यूटीफुल’। माता के मस्तक, वीणा आदि पर चन्दन की बिंदियाँ लगी थीं जिनसे माता की सुन्दरता और बढ़ गयी थी।

वहाँ से निकल हम चाय-कॉफ़ी के लिए कोई रेस्टारेंट ढूंढ रहे थे। तभी निखिल की निगाह ‘ओरेविल रॉ फ़ूड सेंटर’ पर पड़ी। हम भीतर दाखिल हो गए। चाय-कॉफ़ी का पूछने पर उन्होंने बताया कि यहाँ हर व्यंजन कच्ची सामग्री से बना मिलेगा, कुछ भी पकाया नहीं जाता। मतलब चाय-काफ़ी तो वहाँ मिलनी नहीं थी। ‘कच्चा खाद्य एंटी एजिंग होता है’-सेंटर की मालिक विदुषी महिला बता रही थीं। उन्होंने बताया कि वे हमेशा कच्चा ही खाती हैं और 67 की उम्र में भी ऊर्जावान बनी हुई हैं। सचमुच वे खुद इसका जीता-जागता प्रमाण थीं। निखिल से उनकी अंग्रेजी में बात हो रही थी। उन्होंने सुलभा और मेरी ओर इशारा करते हुए पूछा कि ये आपके मम्मी-पापा हैं। जब जवाब हाँ में मिला तो उन्होंने सुलभा की ओर देखकर अचरज व्यक्त किया। पूछा कि क्या आपकी मम्मी भी कच्चा खाना खाती हैं। पर ऐसा तो कुछ था नहीं। यह सुलभा के लिए एक अच्छी टिप्पणी थी कि वह मेरी तरह उम्रदराज नहीं दिखती हैं।

उन्होंने हमें वहाँ की कोई सामग्री टेस्ट करने का आग्रह किया। निखिल ने ‘चाकलेट केक’ मंगवाया। जाहिर है, केक बिना पका कच्ची सामग्री का बना था, पर उसका स्वाद ठीक केक जैसा ही था। निखिल ने उनसे पूछा-‘आप हिंदी बिलकुल नहीं जानतीं। उनका जवाब था-‘थोड़ा-थोड़ा।’ वे तमिल बखूबी जानती थीं। वे हमारे ‘तमिल’ शब्द के उच्चारण से भी संतुष्ट नहीं थीं। उन्होंने बताया कि ‘तमिल’ का सही उच्चारण ‘थमिळ’ होता है। उन्होंने बताया कि ‘ळ’ के भी तीन उच्चारण होते हैं। यह जानकर मुझे हिंदी के तीन स,श, ष सहसा याद हो आए। इन वर्णों को भाषा की उदारता नहीं सुहाती।

समुद्र में कोई ऐसा चुंबक था कि शाम को हम फिर रॉक बीच पर थे। शाम ने कब रात का रास्ता पकड़ लिया, पता ही नहीं चला। थोड़ा ध्यान से देखने पर दूर-दूर तक बोटें नजर आ रही थीं। लाइट हॉउस से चक्राकार सफ़ेद तेज लाइट घूम रही थी जिससे बोटों को अपना रास्ता मिलता होगा। घूमती हुई और दूर तक जाती लाइट को देख बरबस सर्कस की लाइट याद हो आई। मनावर जत्रा में जब सर्कस आता था तो वहाँ से इसी तरह की लाइट रात में फेंकने का इंतजाम होता था जिससे चारों ओर बसे गाँवों को मनावर में सर्कस आने और उसके शुरू होने की खबर हो जाती थी।

पुदुच्चेरी को फ्रांस का प्रतिरूप कहा जाता है। यहाँ आकर ऐसा लगेगा कि आप फ्रांस में आ गए हों। मकान और सड़कें आपको ये आभास देते हैं कि आप भारत में नहीं फ़्रांस या यूरोप के किसी देश में हैं। मकानों की दरवाजे जैसी खिड़कियाँ और वास्तुकला पर फ़्रांसीसी प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है। सोमवार को रात करीब आठ बजे जब हम चेक आउट हो अपना सामान उठाकर अपने होटल के पिछले गेट से निकले तो गली में एक पेड़ की छाया में लहीम-शहीम कद-काठी की एक गौरांग महिला काला मैक्सी जैसा लिबास पहने निश्चिन्त भाव से सिगरेट पी रही थी।

डिनर के लिए निखिल ने ‘दिल्लीवाला-6’ को चुना था। मुझे होटल का नाम कुछ हटकर लगा। शायद इसे उत्तर भारत के सैलानियों को घर जैसा एहसास देने के लिए यह नाम रखा गया हो। यहाँ पारदर्शी कांच की दीवार से विभक्त दो हाल थे। जहाँ भोजन के लिए टेबलें की दो कतारें थीं। हम एक हाल में बैठे थे। ऊपर छत की ओर देखा तो लगा कि वहाँ बीच में मकड़ी के जाले-सा कुछ है। सोचने लगा क्या इतनी सफाई भी यहाँ नहीं रखी जाती पर नहीं वह कोई जाला नहीं था, वह जाले की शक्ल का फानूस था। भोजन करते हुए पड़ोस के हाल में नज़र गयी। वहाँ शायद एक संयुक्त परिवार भोजन कर रहा था। परिवार में पुरुष-महिलाएँ और कुछ बच्चे भी थे। महिलाएँ लम्बे घूँघट काढ़े हुए भोजन कर रही थीं। वे साथ में भोजन के लिए बैठे हुए पुरुषों का लिहाज रख रही होंगी। भोजन के कौर घूँघट में जाकर कहीं खो जाते। फिर घूँघट से वही ख़ाली हाथ प्लेट से कौर लेने के लिए वापस आ जाते। उनकी बातें भी बदस्तूर चल रही थीं। घूँघट में से छनकर शब्द-वाक्य अबाध रूप से निकल रहे थे। महिलाओं के पहनावे से लग रहा था कि वे राजस्थानी हैं। उनके उठने के कुछ ही समय बाद वहाँ जींस टॉप पहने हुए दो महिलाएँ आ गयीं। जाहिर है घूँघट विहीन थीं। लगा जैसे परंपरा गई और आधुनिकता आ गई। दृश्य बदल गया था। पूर्व के दृश्य से सर्वथा भिन्न दृश्य। सहसा भारतीय स्त्रियों के एक ही जगह पर दो रूप देखने को मिल गए।

वाशरूम में गया तो वहाँ एक काँच के बक्से में रंगीन आकर्षक मछलियाँ तैर थीं। वह मछली की पता नहीं कौन सी प्रजाति थी, उनके माथे पर लाल गुमड़ जैसा कुछ उभरा हुआ था जिससे उनका सिर बड़ा और सूजा हुआ लग रहा था। शेष शरीर के अनुपात में उनका सिर बड़ा और बेढब लग रहा था।

हमारी आने की रात और जाने की रात, इस तरह दो रातें बस में सोते हुए गुजर गई थीं। मंगलवार 10 सितम्बर को सुबह हम वापस बेंगळूरु आ गए थे। पुदुच्चेरी से बैंगलोर वापस आने के एक-दो दिन बाद विनय हमें लालबाग के नजदीक ‘रोग एलीफैंट’ रेस्टोरेंट में भोजन के लिए ले गया। ‘रोग एलीफैंट’ नाम ने मुझे चौंकाया कि आखिर यह कैसा नाम है। मुझे नहीं मालूम कि यह नाम क्यों रखा गया और इसका अर्थ क्या है पर इसने मुझे आठवीं कक्षा में अंग्रेजी में पढ़ी हुई एक कहानी ‘क्लेवर रोग’ याद दिला दी। वह एक धूर्त की कहानी थी जो एक किसान के बैल चुरा लेता है। चोरी करने के बावजूद वह किसान को यह यकीन भी दिला देता है कि उसके बैलों की चोरी नहीं हुई, वे तो जमीन में समा गए हैं। खैर!

रेस्टोरेंट एक खुले और प्रकृति वातावरण के बीच स्थित कोलाहल से दूर एक शांत जगह पर था। यहाँ कई प्राचीन एंटिक चीजें भी प्रदर्शित की गई थीं ताकि आप एक अलग अनुभव प्राप्त कर सकें। अहाते में रखी गई एक रथनुमा गाड़ी ने मुझे बहुत आकृष्ट किया। यह गाड़ी बचपन में देखी गई गाडोलिया लुहारों की बैलगाड़ी जैसी लग रही थी जो सिर्फ बैलगाड़ी ही नहीं उनका समूचा घर हुआ करता था। लकड़ी और पहियों पर खूबसूरत कारीगरी थी।

जब हम रेस्टोरेंट से भोजन के बाद लौट रहे थे तब हमारी कार में गीत बज रहा था-‘ गुन गुन गुना रे... गुन गुन गुना रे ये गाना रे...’ गीत के बोल बहुत अच्छे और प्रेरक लग रहे थे। गीत निराशा में आशा का संचार करने वाला था। बीच में गीत की कई पंक्तियों ने प्रभावित किया, जैसे - ‘मायूसियों के चोंगे उतार फेंक दे न सारे/केंडल ये शाम के फूँक रात का केक काट प्यारे।’ कुछ आगे की पंक्तियाँ थीं - ‘जिंदगी के राशन में गम का कोटा ज्यादा है/ब्लेक में खरीदेंगे ख़ुशी का पिटारा रे।’ कहने के अंदाज से लगा कि यह संभवतः गुलज़ार साहब का लिखा गीत होगा पर बाद में पता लगा कि गीत अमिताभ भट्टाचार्य का है। मेरे कानों में एक और गीत बजने लगा जिसे मैं कई दिनों तक गुनगुनाता रहा था - ‘आज से तेरी सारी/गलियाँ मेरी हो गई/आज से मेरा घर/तेरा हो गया’। इसमें आगे की पंक्तियाँ गुनगुनाते हुए तो मुँह में पानी ही आ जाता है - ‘बस मेरे लिए तू मालपुए/ कभी कभी बना देना।’ मालपुए कभी बचपन में ही खाए थे। रोग एलिफेंट में परोसी गई बेबी कॉर्न की डिश देख बहुत अचरज हुआ था। बेबी कॉर्न समझ लो कि भुट्टे का सलोना बेबी और बेबी को खाना! मुझे अच्छा नहीं लगा था।

आखिर सोलह सितम्बर का वह दिन भी आ ही गया जब निखिल को बेल्जियम एमएस करने के लिए रवाना होना था जिसकी तैयारी कई महीनों से की जा रही थी। हम बेंगळूरु के एअरपोर्ट पहुँच चुके थे। कार पार्क करने के बाद हम एक कैफ़े में गए। चाय-कॉफ़ी-नाश्ते के बाद हमने मोबाइल से फोटो खींचे। फोटो के केंद्र में निखिल और पोते अवि को रखा गया था। निखिल ने हमारे पाँव छुए और लगेज लेकर आगे गेट की ओर बढ़ रहा था। तभी मैंने देखा कि सुलभा की आँखें डबडबा हुईं हैं। उसे देख मैं भी कच्चा पड़ गया। एक ही क्षण में पता नहीं क्या हो गया कि उसकी आँखों के आँसू मेरी आँखों में भी आ गए। दसवीं करने के बाद से वह पढ़ने के लिए करीब-करीब घर से बाहर ही था। इंदौर, भोपाल, पुणे, बेंगळूरु में रह चुका था पर अब विदेश जा रहा था-एक अनजाने देश में। निखिल विनय से छह साल छोटा था। विनय दसवीं में रहा होगा। वह स्कूल की ट्रिप में पचमढ़ी गया था। ‘भैया पचमढ़ी गया है तो मुझे भी पचमढ़ी जाना है।’ विनय के पचमढ़ी के एक-दो फोटो भी थे। उन्हें देख तो उसकी पचमढ़ी जाने की इच्छा और बलवती हो जाती। निखिल साल दर साल मुझ से पचमढ़ी ले चलने की जिद करता रहा। मैं हर साल कहता रहा कि अगले साल चलेंगे। तब से आज तक मैं उसे पचमढ़ी न ले जा सका पर वह हमें पुदुच्चेरी घूमा लाया था। थोड़ा समझदार होने पर उसने पचमढ़ी जाने की जिद ही छोड़ दी थी। 'आप नहीं ले जाओगे पापा। बस ऐसे ही कहते रहते हो'। उसे पचमढ़ी न ले जा पाने की हल्की सी टीस दिल के किसी कोने में आज भी मौजूद है। अचानक आँसू इतने बढ़ गए कि उन्हें छुपाना मुश्किल हो गया। हम एक-दूसरे से अपना मुँह छुपाते रहे। सोचता हूँ कि यह एअरपोर्ट कितने आँसुओं और मुस्कानों का गवाह रहा होगा।

सत्रह सितम्बर को आखिर मैं जहाज के पंछी की तरह अकेला वापस मनावर के लिए उड़ान भर रहा था। देर रात तक मनावर पहुँच पाया था। सूना घर साँय-साँय कर रहा था। बंद घर में सत्रह दिनों का सन्नाटा भर गया था। समूचे घर में धूल की कई परतें जम चुकी थी। अपना ही घर पराया-सा लग रहा था।

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