कहानी: बिरजू का अपराध-बोध

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी


ब्रजेश कुमार उर्फ बिरजू सपने देखने का शौकीन था। तरह-तरह के सपने, वो भी थोक के भाव; सुप्तावस्था का सपना, जागृत अवस्था का सपना, अमीरी का सपना, कभी-कभी नेतागिरी का भी. लेकिन आजकल उसे प्रकाशक बनने की धुन लग गई और लगता था यह सपना शायद हकीकत में शायद बदल जाय। कहना मुश्किल है ये बात उसके दिमाग में क्योंकर आ गई। इस बारे में उसके दोस्त का कहना है कि वह कविता लिखता था और उसने उन कविताओं को प्रकाशन के लिये भेजना शुरू किया, पर कोई भी प्रकाशित न हो पाई। बस फिर क्या था उसने ठान ली प्रकाशक बनने की। वैसे वजह एक और भी हो सकती है जो ज्यादा विश्वसनीय लगती है कि उसके पिता का भी ये सपना था जो पूरा न हो सका। पिता एक पत्रकार थे और उन्होंने कुछ पत्रिकाओं के लिये लेखन व संपादन का काम भी किया था। उसे अस्पष्ट सी याद है जब उन्होंने एक दो बातें उससे साझा भी की थीं।

वैसे सपने वो कई और तरह के देखता था, समाज के लिये, देश के लिये कुछ करना चाहता था पर यह भी वो जानता था कि सोचने और करने में कितनी विराट दूरियाँ हैं. उन दूरियों को भर सकने लायक कुछ न कर पाने की वजह से एक अस्पष्ट सा अपराध-बोध उसके संवेदनशील मन को छू जाता।

बिरजू ने यकायक करवट बदली, तभी उसे पसलियों में कुछ चुभन सी महसूस हुई। सोचा फिर वही गलती कर बैठा। पढ़ते-पढ़ते ही सो गया था शायद और खुली पड़ी उसकी कलम ही उस चुभन का सबब है; अधनींदी अवस्था में अपने हाथ से उसने कुछ टटोला और उसे हटा दिया । कुछ अंतराल के बाद सपना फिर चालू हो गया जिसमें वह अपने सहायक को निर्देश दे रहा था कि कौन सामान कहाँ रखा जाना है और किसे क्या काम सोंपा जाना है। ‘सुमति प्रकाशन’ – उसका ड्रीम प्रोजेक्ट आकार ले रहा था दो-तीन उत्साही युवा भी मिल गये थे और यह छोटी सी टीम लेकर वह प्रकाशन के क्षेत्र में एक स्वस्थ एवं सृजनशील परिवेश विकसित करने का प्रयास करना चाहता था या यों कहें कि यह उसकी प्राथमिकताओं में एक था। बिरजू ने अपने सहयोगी के काम पर खुशी जाहिर की और हाथ बढ़ाया उसे शाबासी देने के लिये लेकिन हाथ में काँटे की चुभन; पीठ मे काँटे कैसे? एक बार फिर उसे दोहराया, अबकी बार चुभन अधिक तीखी लगी, और तभी आंख खुल गईं। उसका हाथ काँटेदार झाड़ी की शाखा में उलझा था। उसने कांटा हटाया और रिसती रक्त की बूंद को झटक दिया।

सारी बात सोचकर वह मुसकराया- हंह, सुमति प्रकाशन, जिसे नियति के प्रशासन ने धूल चटा दी। तीन दिन महानगर में रुक कर उसे डी टी पी संबंधित जानकारी हासिल कर कुछ उपकरणों की खरीदारी करनी थी। वह सब धरा रह गया और तो और घर तक वापस लौटना भी मुश्किल हो गया। नगर में भाई के पास रुका था सवेरे घर वापस जाने के लिये बस का तो सवाल ही नहीं था। जिंदगी जैसे एकदम ठहर गई थी वह भी तीन हफ्ते के लिये। भैया का स्कूटर लेकर निकला पर इसका अनुमान न था कि लाकडाउन की वजह से अपने घर वापस जाने वालों का ऐसा मंजर होगा कि स्कूटर निकाल पाने में ही कई घंटे लग जायेंगे। चार घंटों की मशक्कत के बाद वह नगर के बाहर हाइवे तक पहुंच पाया। कुछ सुनसान सी जगह देख एक पेड़ की छाया में स्कूटर खड़ा किया और थकान मिटाने के लिये लेट गया। थकान की वजह से लेटते ही झपकी आ गई बस फिर शुरू हो गया वही सुंदर सपना, सुमति प्रकाशन, सहकर्मियों से विचार-विमर्श और काँटे की चुभन।

झपकी आ जाने से उसकी थकान कुछ दूर हुई। उसने पानी पिया और साथ में लाई सैंडविच खाकर आगे जाने की तैयारी शुरू की। कुछ देर अपना काम न बन पाने का दंश उसे सताता रहा। चलो अब इंतजार करना होगा सामान्य हालात वापस आने का। वैसे लगता नहीं कि हालात जल्दी सामान्य हो सकेंगे अभी तो संक्रमण अपने पैर पसार रहा था जिसकी वजह से यह सब बंदी की जरूरत पड़ी। वैसे कठिन हालात में इसके अलावा रास्ता भी क्या था?

तभी अचानक उसने अनुभव किया कि उन हालात में सुमति प्रकाशन पर इतना आग्रह उसकी संवेदनहीनता का परिचायक है उसकी अपनी समस्या उतनी बड़ी न थी जितनी की उन पदयात्रियों की जो न घर के थे न घाट के। और उनकी क्या कहें जिनके पास अब कोई रोजगार भी न था। आँखों के सामने त्रासदी का ये मंजर उसे अंदर तक हिला गया।

ऐसा नहीं कि पहली बार ऐसा तीव्र उत्कट अनुभव इतने तीखेपन से अंतरतम तक भेद गया हो।

तीन साल पहले की नोटबंदी का भी वो मंजर याद है उसे जब उसके दोस्त राजन के पिता को दर्द उठा और वे दोनों दोस्त उन्हें लेकर इलाज के लिये गुहार लगाते रहे। सरकारी अस्पताल में पूरे एक घंटे जब कोई डाक्टर नहीं मिला तब नर्सिंग होम का रुख किया। उसी रात नोटबंदी की घोषणा हुई थी और उनके पास जमा करने को पैसा नहीं था। अगले दिन तक रुपया जमा करने के वादे पर वे तैयार नहीं थे और नतीजा वही हुवा जो स्वाभाविक था चाचा की तबियत बिगड़ती गई और सुबह तक वे चल बसे। संभवत: एपेन्डिसाइटिस का मामला था और उन्हें सर्जरी करके बचाया जा सकता था। हो सकने और होने के बीच का फासला अचानक इतना बढ़ चुका था कि सिर्फ फासला ही दीख पड़ता था।

 और आज का मंजर तो खंजर की तरह दिल में चुभ रहा था बंदी की वजह से अपने सपने के टूटने का उसे उतना दु:ख नहीं था जितना पैदल सैकड़ों मील का सफर तय करने के लिये कटिबद्ध लोगों के हुजूम के लिये था। वे चल रहे थे उन्हें न प्रशासन से कोई आशा थी, न उन मालिकों से जहाँ सालों काम करते आये थे और न ही उस जैसे तथाकथित प्रबुद्ध जनों से। प्रशासन की जो भी खामियाँ हों लोकतंत्र में एक जागरूक नागरिक का भी तो कोई फर्ज होता है। अक्सर उसे लगता उसकी और उस जैसे अन्य लोगों की संवेदना भी एक दिखावा, एक छलावा है हिपोक्रिसी है। हिपोक्रिसी वैसे तो हर जगह है हर देश में, हर समाज में, पर अपने यहाँ इसको विशेष स्थान प्राप्त है शायद विश्व के सबसे बड़े हिपोक्रेट हमीं में हैं तभी तो हम कितनी आसानी से कह उठते हैं आत्मवत सर्वभूतेषु, और अगले ही पल कोई दीन-हीन हमसे कुछ उम्मीद करता है तो कह उठते हैं चल हट। अगर ऐसा न भी हुवा तो एक-दो रुपया देकर समझ लेते हैं कि हमने काफी पुण्य कमा लिया। न जाने क्यों इस भीड़ को देख वह सवेरे से ही एक अपराध-बोध से दबा महसूस कर रहा था?

बिरजू उठा और अपनी बोतल से दो घूंट पानी पिया। उसका स्कूटर सामने खड़ा था और वह अगला कदम उठाने के असमंजस में था। उसे घर पहुंचकर विलम्बित प्रकाशन प्रोजेक्ट का अगला चरण तय करना था लेकिन यह पैदल चलने वालों का हुजूम उसे झकझोर रहा था। सारा देश रुक गया था पर ये सारे लोग शायद देश के भी परे थे। शायद ये देश के नागरिक नहीं थे नागरिकों का काम करने वाले लोग थे। उसकी मानवीय संवेदना उसे झकझोरती, उसे खुद की संवेदना भी एक छलावा नजर आने लगती। हिपोक्रिसी- उसे लगा कि हम भारतीयों को हिपोक्रिसी की शानदार कला में कोई मात नहीं दे सकता- आत्मवत सर्वभूतेषु, हा हा, सर्व भूतेषु।

लेकिन ये हुजूम तो सर्व भूतों में नहीं आता, तभी तो इन्हें सर्वहारा कहा गया है जिनके पास हारने को कुछ नहीं बचा है। उसे लगा जैसे वो हुजूम उस जैसे तथाकथित प्रबुद्ध लोगों से कह रहा हो- तुम्हारा नगर, तुम्हें मुबारक, तुम्हारी रेल तुम्हें मुबारक, तुम्हारी बस, तुम्हें मुबारक और तुम्हारा सुमति प्रकाशन भी। तुम जैसों से कोई उम्मीद हम नहीं रखते। तुम डरो कोरोना से ये नहीं डरते। और वो कोरोना भी क्या कर लेगा? वो मारेगा इसके पहले भूख ही ना मार देगी? बस इसीलिये बेखौफ निकल पड़े हैं सड़क पर सैकड़ों मील का सफर तय करने, सिर पर गठरी, गोद में बच्चा, जेब खाली, पगार भी कहाँ मिली, ठेकेदार का अता-पता भी न था। पास में जो भी जैसा भी था लेकर निकल पड़े।

पास के पेड़ की छाया में तनिक विश्राम कर थकान मिटाते रग्घू मिस्त्री अपने बच्चे को पानी पिला रहा था पास में उसकी घरवाली अपनी पोटली को ठीक से बांध रही थी कि आगे पदयात्रा में ज्यादा दिक्कत न होवे।

बिरजू की नजर उधर घूमी, लगा जैसे बच्चा बहुत भूखा था तभी उसने अपने बैग से बिस्कुट का पैकेट निकाला और रग्घू से कहा:

- भाई, बच्चे को देने में कोई एतराज तो नहीं?

रग्घू ने सहमति सूचक सिर हिला दिया और बच्चा चाव से खाने लगा जैसे खजाना मिल गया हो।

- लो, थोड़ा आप भी लो, आपको भी शायद ही कुछ खाने को मिला हो।

- साथ में कल की बची कुछ रोटियाँ थीं, उनसे अब तक काम चल गया। आगे का देखा जायगा।

- आपको जाना कहाँ हैं?

- फतेहपुर। अभी तो दो दिन लग ही जायगा।

- हाँ अभी काफी दूर जाना है।

बिरजू ने अपने बैग से कुछ केले निकालकर उनको दिये और बोला:

- आप थोड़ी देर आराम कर लो, यहाँ से 30 मील पर मेरा घर है वहाँ तक मैं अपने स्कूटर पर ले चलूंगा। वहाँ कुछ देर आराम कर कुछ खा पीकर आगे जाना।

रग्घू को सहसा विश्वास न हुआ, कुछ देर अपलक देखता रहा, बोला:

- आपकी मेहरबानी भाई जी। वरना इतना कौन करता है किसी अनजान के लिये !

उन लोगों को स्कूटर पर बैठाकर ले जाने में बिरजू को खास दिक्कत नहीं हुई क्योंकि सभी क्षीणकाय थे और सामान भी तीन पोटलियों के सिवा कुछ न था। इतना लम्बा सफर पैदल तय करना अधिक सामान के साथ संभव भी न था खासकर तब जबकि रग्घू बच्चे को भी गोद में लिये था। घर पहुंचने पर बिरजू ने थोड़ा झिझक महसूस की यह सोचकर कि पता नहीं माँ क्या सोचेगी, पर उसका डर निर्मूल निकला। उसने माँ से सारी बात कहकर भोजन की व्यवस्था करवाई और पानी का नल दिखाकर कहा:

- रग्घू भाई, आप लोग हाथ-मुँह धोलें. अगर स्नान करना चाहें तो कर सकते हैं।

इस बार रग्घू की घरवाली बोली:

- आप हमारे लिये फरिश्ता बनकर आये हो। समझ नहीं आता कि आपका ये ऋण हम कैसे चुका सकेंगे?

बिरजू को लगा ये मेहनतकश लोग इतनी थोड़ी सी मदद का हिसाब चुका सकने की सोच सकते हैं इन मजबूर हालात में भी। बोला:

- आपको कोई हिसाब नहीं चुकाना है। ऋण तो मैं चुका रहा हूँ वह भी बहुत थोड़ा सा। अगर कुछ चुकाना ही है तो मुझे और मेरे जैसे लोगों को, न कि आप लोगों को।

अबकी बार रग्घू बोला:

- आपकी बात पूरी समझ नहीं आती पर इतना जरूर है भइया हमारे पहले जनम के कुछ पुण्य रहे होंगे नहीं तो आप जैसे लोगन से हमें इतनी मदद न मिलती।

- चलें भाई, आप हाथ मुँह धो लें। बच्चा भी देखो भूखा सो गया। पहले आप लोग भोजन कर लो तब तक ये भी जाग जायगा। इसके लिये कुछ दूध का प्रबंध करता हूँ.

इतने में सुमति जी (बिरजू की माताजी) भी आ गई बोलीं:

- अभि रेडियो समाचार में सुना है कि राज्य सरकार की ओर से बसों का इंतजाम किया जा रहा है. अच्छा होगा ये लोग आज यहीं पर रुक जायें। कल सुबह तक सारी जानकारी मिल सकेगी और तभी इन लोगों का जाना ठीक रहेगा।

अगले दिन राज्य सरकार द्वारा पैदल चल रहे लोगों को बस द्वारा भेजने का इंतजाम किया जा रहा था साथ ही यह भी तय था कि अपने गांव या नगर पहुंचने पर कुछ समय तक सभी आगन्तुकों को अलग ही रखा जायगा। बिरजू ने उन लोगों को फतेहपुर की बस तक पहुंचाया। माँ ने उनके रास्ते के लिये कुछ खाना रख दिया था जो उसने रग्घू को दे दिया।

उन लोगों को विदा करने के बाद बिरजू घर आकर माँ से बोला:

- माँ, नियम के अनुसार मैं भी अपने कमरे में ही रहूँगा और जरूरत हुई तो जाँच भी करवा लूंगा। आपको भी याद रखना है कि कुछ दिन मेरे कमरे की तरफ बिलकुल नहीं आना। मेरा खाना भी बाहर की मेज पर रखवा देना, मैं खुद आकर ले लिया करूंगा।

उस दिन बिरजू को जीवन में पहली बार लगा कि उसकी हिपोक्रिसी का स्तर शायद थोड़ा कम हुवा है; कुछ अपराध-बोध भी धूमिल लगा। वह अपने से कुछ संतुष्ट था, चलो कुछ तो सही दिशा में कदम है।

उस दिन के बाद से एक परिवर्तन बिरजू को नजर आया जिसका कारण वह आज तक न जान पाया। उस घटना के बाद उसे सपने कम आने लगे।

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