व्यंग्य: कोरोना आतंक में करुणा की चीख

- बी .एल. आच्छा


वायरस महाराजा ने अपने सिपहसालारों की इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस बुलाई। तमाम देशों के वायरस मुखियाओं ने सलामी दी। महाराज ने उद्घाटन भाषण में कहा, "धरती पर अर्थव्यवस्थाओं के उदारीकरण से हम भी ग्लोबल हो गए हैं। आजकल देश-देशांतर में जाते लोगों के साथ बिना वीजा के हम ऐसे चले जाते हैं जैसे एक भी न बुलाए, पर तेरह जीमने चले जाएँ। ... पर सेंसेक्स जितने उछाल पर है, वायरसों में सुस्ती का मार्केट है।"

तभी एक क्षेत्रीय मुखिया ने अर्ज किया, "हुजूर! हम सभी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। कभी हम सार्स बने। कभी एन्थ्रेक्स। कभी बर्ड-फ्लू बने, तो कभी मैड काऊ। कभी स्वाइन फ्लू तो कभी चिकनगुनिया। आज भी हमारे लिए उपजाऊ जमीनें हैं। जितने स्वच्छता के शोरूम है, उतने ही गंदगी के पिछवाड़े। जितनी दवाओं की काट, उतनी ही हमारी मार्केटिंग की हाट।"

तभी एक वायरस प्रमुख ने आवाज उठाई, "हुजूर! हमें तो मौका ही नहीं दिया जा रहा है। यों हमारा चेहरा मोहरा बहुत अट्रैक्टिव है। आपने ही हमें सिर पर ताज दिया है। हम क्राउन कोरोना हैं, लैटिन भाषा में।" वायरस राजा ने पूछा, "फिर शुरुआत कहाँ से करेंगे? यों इंडिया गए बहुत अरसा हो गया है।"

क्राउन कोरोना ने कहा, "नहीं महाराज, इंडिया से फ्लाइट लेना हमारे लिए घातक होगा। आप जानते हैं, इंडिया में लोग हल्दी चढ़ाए बगैर शादी नहीं करते। फिर जरा सी भनक मिली नहीं कि तुलसी, लौंग कालीमिर्च, जेवंत्री के काढ़े से दम घुटा देते हैं। इलायची और कपूर से सुगंधित झंडे लहरा कर आमने सामने हो जाते हैं। और तो और चिरायता, गिलोय के कड़वे घूँट तो हमारे प्राण ले लेते हैं। इसके अलावा भी महाराज! इंडिया में 56 इंच का सीना, 56 भोग और 56 भेरु का शोर इतना है कि हम 56 डिग्री के तापमान पर जिंदा नहीं रह पाते। हुआ तो विश्व विजय के अंतिम पड़ाव पर नमस्ते इंडिया कहकर लौट आएंगे।"

महाराज ने पूछा, "तो फिर तुम्हारा प्लान क्या है?" कोरोना ने कहा, "महाराज! इस समय चीन से प्रस्थान करना ही कारगर होगा। चीन के वन बेल्ट प्लान की इंटरनेशनल इंजीनियरिंग से हमारी दिग्विजय के घोड़े सरपट दौड़ जाएँगे।" तभी दूरदराज के एक मुखिया ने कहा, "हुजूर हम कभी समूल मारे न जाएँ। इधर के देशों ने मिसाइल रेंज बढ़ा रखी है। ताकतवर डॉलर भी मिसाइल मार के बजाय कोरियाई गलबहियों में घुस जाता है।"

क्राउन कोरोना विद्रूप अट्टहास के साथ बोला, "तुम तो शेयर बाजार के मंदड़िए हो। क्या तुम यूरोप में प्लेग के परचम भूल गए? क्या इबोला और हेपेटाइटिस के डर से आदमी अछूता हो गया? अब तो ताकतवर देश दुश्मनों पर हमला करने के लिए वायरस इंडस्ट्री कायम कर रहे हैं और हम यूँ ही पिचक रहे हैं। महाराज हुक्म दीजिए हमारी वन बेल्ट प्लानिंग को। हम भी दुनिया में छा जाएंगे।"

महाराज ने कहा, "ठीक है, पूरी दुनिया में परचम लहरा दो और हर हफ्ते अपनी तरक्की की रपट दरबार में पेश करो।"

अगले हफ्ते क्राउन कोरोना ने दिग्विजयी रिपोर्ट पेश की, "महाराज चाइना के एक प्रांत में हम दे दनादन करते रहे ।हजारों मरे, लाखों गिरफ्त में। धारदार इकनॉमी का बंटाधार। अलगथलग सी रह गई विश्व की महाशक्ति। फिर हमने ईरान और इटली का रुख किया। तेल पर मार और सेंसेक्सों का बँटाधार। कभी रोम का साम्राज्य था, आज वहाँ त्राहि-त्राहि है।" वायरस महाराज ने पूछा, "बाकी दुनिया को छू नहीं पाए ?"कोरोना बोला, "हमने लगभग डेढ़ सौ देशों में दस्तक दी है। डॉलर-यूरो-येन में भी महामृत्यु के आगाज की हड़कंप है। ट्रंप-चाल भी नसीहत दे रही है, "इंडिया में नमस्ते की बहुत अच्छी संस्कृति है।" मुश्किल यह कि दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी भी लाखों के संक्रमण पर इंडिया से दवा माँग रहा है।"

वायरस महाराज ने जानना चाहा, "अब बताओ इंडिया का क्या हाल है?" ठंडे स्वर में कोरोना बोला, "नहीं महाराज! यहाँ रात आठ बजे रेडियो बोला नहीं कि बारह बजे लॉकडाउन हो जाता है। रात नौ बजे नौ मिनट के अँधेरे में दिए जल जाते हैं।पूरे देश में छुट्टी ही छुट्टी। भीड़भड़क्कों की जगह पर अलर्ट है। सेंसेक्स यहां भी ऊँचे झरने से गोते लगा रहा है। हमारी चहलकदमी और उनकी अपनों से सोशल दूरी। फिर इनकी जीवट और कदकाठी। सफेद सेना की मुस्तैदी।सहायता के लिए अरबों की खुलती मुट्ठियाँ।"

तभी एक शेयर मार्केट के मंदड़िये की तरह एक कोरोना विषाणु पीड़ा के स्वर में ऐसे बोल पड़ा जैसे द्रौपदी के चीरहरण के समय कौरव सभा में दुर्योधन के निन्यानवे भाइयों के बीच अकेले विकर्ण की निर्दलीय सी चीख गूँज गयी हो। कहा, "महाराज! आज हम मनुष्य और पशु-पक्षियों को खत्म कर रहे हैं। कल वे हमें समूल खत्म कर देंगे। हम कोरोना हैं, पर मनुष्यों ने कोरोना के रोने को कातर करुण राग बना दिया है। आज पूरी दुनिया बिलख रही है। हम भी इस करुण स्वर को सुनें। आखिर हम भी तो इन योनियों में आएँगे।"

महाराज ने उत्तर दिया, "इंडिया में आते ही तुम बहुत दार्शनिक हो जाते हो। हम भी मनुष्यों की गंदगी और मांस के कतरों के प्रोडक्ट हैं। अब देखो न, मिसाइल की मार से, परमाणु हथियार से आदमी धमका रहा है। मगर अब आँखों से न दिखने वाले कोरोना का रोना रो रहा है। हम बिना वीजा के हर जगह घूम रहे हैं और वह हमारे डर से अपने ही घर के भूगोल में कैद हो गया है। हम कब चाहते हैं कि इस योनि में जन्म लें। हमें खुद नहीं मालूम कि हम माँस की गंदगी से पैदा हुए या बाजार में कब्जे की शह और मात की चालाकियों के आविष्कार हैं। मगर मानवी दुनिया की गंदगी या बाजार की गलाकाट होड़ के जैविक हथियार के रूप में पैदा होने के लिए हम अभिशप्त हैं। यह आदमी हम कोरोना जैसे वायरसों से तुम्हारी करुणा का राग सुन ले, यही बहुत है।"

सारी सभा सन्न रह गई। महाराज ने कहा, "हम भी नियति चक्र से बंधे जीव हैं। मरते-जीते रहेंगे। दुनिया तन से और बाजारू अहंकार की होड़भरे मन से स्वच्छ रहेगी तो हम भी अभिशप्त नहीं रहेंगे। बढ़ती गर्मी के तापमान में ट्रंप की तरह नमस्ते इंडिया कहकर निकल जाएँगे।"

(अमर उजाला, 19 अप्रैल 2020 से साभार)

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