काव्य: महेश कुमार केशरी

महेश कुमार केशरी
उद्विग्न कवि

कवि उद्विग्न है!
कहीं किसी पत्रिका में छपी हैं
उसकी कुछ कविताएँ!

किसी पाठक के द्वारा
उसे पता चला है कि उसकी
कुछ कविताएँ किसी पत्रिका
में छपी हैं!

लेकिन किसी कारण से
अब तक नहीं मिली है पत्रिका!

कविता के माध्यम से कवि लोक-परलोक
सत्य-मिथ्या, प्रकृति का खूब बाँचता है ज्ञान!

जैसे कवि तत्व-दर्शी हो!
उसने जीत लिया हो संपूर्ण संसार!

उसकी पहुँच से कुछ भी दूर नहीं है!

ब्रह्म, से लेकर फूलों के सौंदर्य तक का
वह करता रहता है, अपनी कविताओं में बखान!

लेकिन कवि अपनी छपी रचना को सामने
न पाकर मन ही मन उद्विग्न है!
***


तकिये

रात को सोते समय
हम रख देते हैं
अपना सर तकिये पर
और देखते हैं सपने!

तकिए की
रुई जैसे
मुलायम होते हैं
सपने!

नींद बुनती है
खट्टे-मीठे सपने
और
धुनिया बनाता है तकिए!

शायद कभी
धुनिये ने सोचा हो
बनाते हुए तकिए
कि जैसे सपने
मुलायम होते है
और नींद भी,
कि यही सोचकर
वह बनाता है रुई से
मुलायम तकिए!

नींद, सपने, और तकिए
तीनों मुलायम होते हैं!

दद्दा कभी-कभी कहते थे
कि जो ख्वाब हम
जागृति में देखते हैं
लेकिन, उसे कभी पूरा नहीं
कर पाते!
उनकी पूर्ति के लिए भी
हमें
दिखते हैं सपने!

सपनों का होना जरूरी है
आदमी के जिंदा होने के लिए!
***

माँ के हाथ का स्वाद

माँ के हाथों से बनी चीजों
का अलग ही
स्वाद  होता है!

नहीं मिल पाता
वह स्वाद अब
भाभियों के हाथों से!

माँ को पता थी
खाने की चीजों में पड़ने
वाले मसालों की मात्रा
और आँच के ताप का
अंदाजा!

वह बाँट देती थी
थोडे़ से खाने को
बराबर-बराबर हिस्सों में!

उन दिनों
थोड़ा सा खाकर भी
मन तृप्त हो जाता था!

बाद में कई होटलों
और रेस्टोरेंट
से मंगवाया हैं
मैने खाना

लेकिन नहीं मिलती
उसमें वह महक
वह अपनापन, वह प्यार
वह लाड़-दुलार!
***

पिता पुराने दरख़्त की तरह होते हैं! 

आज आंगन से
काट दिया गया
एक पुराना दरख़्त!

मेरे बहुत मना करने
के बाद भी!

लगा जैसे भीड़ में
छूट गया हो मुझसे
मेरे पिता का हाथ!

आज
बहुत समय के बाद
पिता याद आए!

वही पिता जिन्होंने
उठा रखा था पूरे
घर को
अपने कंधों पर
उस दरख़्त की तरह!

पिता बरसात में उस
छत की तरह थे.
जो, पूरे परिवार को
भीगने से बचाते!

जाड़े में पिता कंबल की
तरह हो जाते!
पिता ओढ़ लेते थे
सबके दुखों को!

कभी पिता को अपने लिए
कुछ खरीदते हुए
नहीं देखा!

वे सबकी जरूरतों
को समझते थे.
लेकिन, उनकी अपनी
कोई व्यक्तिगत जरूरतें
नहीं थीं

दरख़्त की भी कोई
व्यक्तिगत जरूरत नहीं
होती!

कटा हुआ पेड़ भी
आज सालों बाद पिता की
याद दिला रहा था!

बहुत सालों पहले
पिता ने एक छोटा सा
पौधा लगाया था
घर के आंगन में!

पिता उसमें खाद
डालते
और पानी भी!
रोज ध्यान से
याद करके!

पिता बताते पेड़ का
होना बहुत जरूरी
है आदमी के जीवन
में!

पिता बताते ये हमें
फल, फूल, और
साफ हवा
भी देते हैं!

कि पेड़ ने ही थामा
हुआ है पृथ्वी के
ओर-छोर को!

कि तुम अपने
खराब से खराब
वक्त में भी पेड़
मत काटना!

कि जिस दिन
हम काटेंगे
पेड़!
तो हम  भी कट
जाएंगे
अपनी जडों से!

अगले दिन सोकर  उठा
तो मेरा बेटा
एक पौधा
लगा रहा था

उसी पुराने दरख़्त के पास,
वह डाल रहा था
पौधे में खाद और
पानी!

लगा जैसे
पिता लौट आए!
और  वह
दरख़्त भी!!
***


चिड़ियों को मत मरने दो

चिड़ियों को मत मारो
उन्हें धरा पर रहने दो!

फुदकने दो हमारे घर
आंगन में
उनके कलरव को बहने दो!

दुनिया के कोलाज पर
रंगों की छटा
बिखरते रहने दो!

मत मारो चिड़ियों को!
इन्हें धरा पर रहने
दो!

घरती भी
मर जाती है
चिड़ियों के मरने से!

चिड़ियों के बच्चे भी
मर जाते हैं
चिड़ियों के मरने से!

लाल, गुलाबी, नीले,
पीले, चितकबरे, और हरे
रंगों के कोलाज को इस
धरा पर बहने दो!

रंगों के रहने से ही
सपने भी रहते हैं जिंदा
इसलिए भी
चिड़ियों को मत मरने दो!

इस धरा पर
रंगों के कोलाज को
बहने दो!

फुदकने दो हमारे
घर आंगन में
उनके कलरव को बहने दो!

मत मारो चिड़ियों को
उन्हें जिंदा रहने दो!
***


संवेदना

बांध दो पट्टियाँ
गाय अगर दिखे
चोटिल!

लगा दो कुत्ते
के जख्मों पर
मरहम!

ठंड में दे दो
किसी बेजुबान को
बरामदा का कोई
कोना!

पिला दो पानी
उस परिन्दे को
जो प्यासा है!

दे दो खाना
उनको जो
भूखे हैं!

बाँट लो दुख
उनका जो दुखी हैं!
***


चुनौती को अवसर बनाइये

लाल किले से एक मुनादी
हुई थी
कि इस विकट समय में
चुनौती को अवसर  बनाइये!

मजदूरों के लिए भूख
एक चुनौती थी!
तो वह उनके लिए
अवसर कैसे बनती?

लेकिन
बिचौलियों के लिए
भूख अवसर बनी!
वे डकार गये
मजदूरों का भाड़ा!

छोड़ दिया
उन्हें मरने के
लिए सड़कों पर!
और ले भागे बिचौलिए
मजदूरों की
जीवन भर की कमाई!

भूख किसी के लिए
चुनौती बनती रही
और, किसी के लिए
अवसर!
***

जन्म: 6 नवम्बर 1982 (बलिया, उत्तर प्रदेश) 
शिक्षा: इतिहास में स्नातक (इग्नू); दर्शन शास्त्र में स्नातक (विनोबा भावे विश्वविद्यालय) 
प्रकाशन: कहानी संकलन 'मुआवजा' प्रकाशित। पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित 
संप्रति - स्वतंत्र लेखन एवम व्यवसाय
संपर्क- श्री बालाजी स्पोर्ट्स सेंटर, मेघदूत मार्केट फुसरो, बोकारो झारखंड -829144
ईमेल: keshrimahesh322@gmail.com
चलभाष: +91 903 199 1875

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