धरोहर की हिफाज़त: ममता जोशी

ममता जोशी
मेरी ढलती उम्र पर इनको यकीन नहीं होता
मेरी हमदम रहीं है गुज़रे ज़माने मे
बोझ सी लगती है  दोस्ती इनकी अब
पोंछ कर, तरतीब से लगाने में

याद है मुझको सारी तस्वीरें
कहाँ कहाँ मिले थे कब किस ड़गर
पुस्तक मेलों, फुटपाथों या छोटी-बडी़ दुकानों में
यारों के दामी तोहफे या आपसी रूठने मनाने पर

दार्जिलिंग चाय का प्याला पकडे़ हम
मश़गूल रहा करते थे, नये पुराने  अफसानों में
खुशियाँ औ' ग़म छूते रहते थे हरदम
अधलेटे, नरम लिहाफों में

इस थाती को सौंप दूँ उनको
जो विरसा बंद है लकडी़ के कैदखानों में
न वक्त न जगह उनके पहलू में
बस मगन हैं आनलाइन फ़सानों में

हिज्र का वक्त जब भी आयेगा
उस खिज़ा को भी देखा जायेगा
टुकुर टुकुर ताकते इन फरिश्तों को
सलामती से तब तक सहेजा जायेगा|

1 comment :

  1. अति सुन्दर अभिव्यक्ति। पुस्तकें बाहर से देखने पर बोझ तो लगती हैं, पर अन्दर ही अन्दर हमसे बेहद जुड़ी हुई होती हैं। यह तो तब पता चलता है जब हम मनाने लगते हैं कि कोई जरूरतमंद कुछ पुस्तकें मांगने चला आए तो कुछ बोझ तो कम हो, कुछ जगह तो बने । पर जब सचमुच ही कोई अा जाता है, तो लगता है कि वे पीली पड़ती, फटती हुई पुस्तकें रो रोकर हमें रोक रही हैं - किसी मूक भाषा में।

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