संगीता सुनेजा (प्रतिनिधि कवयित्रियाँ 2020)

संगीता सुनेजा एयर इंडिया में वाणिज्य डिपार्टमेंट में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत है। अंग्रेज़ी, हिन्दी, के अलावा देवनागरी लिपि में पंजाबी और उर्दू की भी कविता एवं लेखन करती हैं। 2013 में आपकी अंग्रेज़ी में प्रकाशित पुस्तक ‘द फ़र्स्ट फ्यू मिनिट्स’, जो कहानियों, निबंधों व कविताओं का संग्रह है, एक मोटिवेशनल बुक के रूप में काफ़ी सराही गई है। इनकी कहानियाँ व कविताएँ, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होती रहती हैं, विशेषकर अंग्रेज़ी की कहानियाँ और कविताएँ विशिष्ट पुरस्कारों से भी सम्मानित की गई हैं। 

संगीता सुनेजा
वक़्त का एक क़िस्सा

‘आने वाली नस्लों के लिए वक़्त का बुलबुला
इक कहानी कह गया है,
आओ तुम्हें सुनाऊँ, लंबी नींद सो चुके हम,
आओ, तुम संग, अब खुद को मैं जगाऊँ।
गलती की मिट्टी में पल चुके हम,
वक़्त के मैले मटके में ढल चुके थे, ’ कहती थी,
‘आओ ज़ोर लगाओ, तो मैं इसे चटकाऊँ।’

इंसान क़हर ढा रहा था, कचरे का ढेर ऊँचा,
इंसान का क़द छोटा नज़र आ रहा है।
सभी भागे जा रहे थे,
साँझ होने को आई, जान पर थी उनकी बन आई,
वक़्त ने जो ली थी नई करवट, गाँव से आवाज़ें आ रही थी,
अब, हीरों को घर बुलाऊँ
ज़मीन उनकी उनको पुकारे,
आँखों में टिमटिमाते थे, आँसू बन सितारे।
वक़्त रुक गया, कमरों में क़ैद थे, अब सारे
पहियों को चैन आया, परियों ने ली उड़ाने
सुना है, आख़िर, आसमान को भी साँस आई
मगर अब, लोग साँस लेने से कतरा रहे थे।
अपने अपने क्षेत्रों मुँह ढके,
हवा के सर पर सिलेण्डर लिए जा रहे थे।
जीने के नए फ़लसफ़े बन रहे थे।

बेचैन धूल उड़ उड़ कर आँखें गीली कर रही थी
मैं अपने दिल का एक शांत किनारा ढूँढ रह थी
अपने अहम का कपूर जला कर,
उसे रौशन कर रही थी
हवा में घुल कर, महकने को,
अब, ख़ुशबू बन रही थी,
खिड़की में आई बुलबुल से मिल,
बातें कर रही थी
अमलतास के पीले फूलों के गुच्छों की,
गुंजन सुन रही थी,
सरपट दौड़ती दुनिया से पलट,
मैं अब ठहर रही थी,
बिखर रही थी दुनिया,
और मैं मन के अंदर के मंदिर
में चढ़ाने को टूटे बिखरे सपनों के फूल चुन रही थी।

वक़्त की आवाज़ को अब,
मैं पकड़ रही थी,
सुन रही थी, कि अब तक वक़्त की नब्ज गुम थी,
हम दौड़ में जहाँ गुम थे,
वहीं कहीं वो भी कहीं गिरी थी
ख़्यालों की भीड़ थी,
हर तरफ़ इक होड़ थी,
जैसे-तैसे उसको ढूंढा,
इक शंख नाद गरजा, बिजली सा कौंधा
आवाज़ में उसकी दम था,
हिला कर, सभी को,
मुझे को भी, नींद से जगा रहा था,
नया वक़्त,
नई भोर के डंके बजा रह था,
हर पल को, पल में ठहर के,
जीने को कह रहा था,
रूह ने अंतर में देखा,
और ज़रा फुसफुसाया,
दूर कहीं पैदल, नंगे पाँव चलता,
‘शायद, नया दौर आ रहा था
साफ़ सुथरा, नया वक़्त आ रहा था।’


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