अनुराग शर्मा द्वारा शैलजा सक्सेना का साक्षात्कार


साहित्यकार शैलजा सक्सेना से अनुराग शर्मा की वार्ता


डॉ. शैलजा सक्सेना
कहानियाँ बहुत सी घटनाओं के घात-संघात से उत्पन्न भाव और विचार से बनती हैं और लेख किसी ज़रूरत से उत्पन्न होते हैं।
लेखन की प्रक्रिया हमेशा अवचेतन में ही प्रारंभ होती है। भीतर की आँखॆं जब तक करुणा, प्रेम के आँसुओं से भीगती नहीं तब तक कहाँ सोचना हो पाता है! उस आँख में कभी रोष तो कभी प्रेम जमा होता रहता है जो सही मौका पा कर चेतनावस्था में कलम पकड़ा देता है। मैं लेख के अतिरिक्त कभी लिखने के नियम से बँध कर नहीं बैठ पाई, जब भीतर का आलोड़न बाहर आने को तैयार हुआ तभी लिखा, इसी कारण कभी-कभी कोई विचार महीनों तक ही दिमाग में रहने के बाद प्रकट हुए। कविता की रचना-प्रक्रिया का जीवन काल छोटा रहता है। (डॉ. शैलजा सक्सेना)



अनुराग शर्मा: अपने बचपन व किशोरावस्था के बारे में कुछ बताइये, कुछ यादें, कोई उल्लेखनीय बात?

शैलजा सक्सेना: अनेक बातें हम सभी के बचपन में होती हैं अनुराग जी, मेरे बचपन में भी हुईं। मेरी दादी को पढ़ाने का बहुत शौक था सो बहुत छोटी अवस्था में ही अक्षर ज्ञान से लेकर पहाड़े आदि उन्होंने सिखा दिए थे। दो कमरों के बीच झूला डाल कर वे उस पर मुझे और मेरी छोटी बहन को बिठा कर, मलाई बर्फ खिलाने और गंगा जी दिखाने ले जाने का लालच देकर दोपहर भर पढ़ाती थीं। इसी के चलते मैं आयु से पहले ही स्कूल जाने लगी और वह भी सीधे कक्षा दो में, जिसके कारण बाद में कम आयु के कारण कक्षा दस में मुझे परीक्षा देने से रोका गया। लिखना मैंने सातवीं कक्षा से शुरू किया और पहली कविता अपनी अध्यापिका के प्रोत्साहन पर पूरे स्कूल के सामने डरते हुए सुनाई। अनेक किस्से हैं विशेष कार्यक्रमों में भाग लेने, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं, भाषण प्रतियोगिता आदि के, ये सब मेरे जीवन को बनाने में सहायक रहे।


अनुराग शर्मा: क्या साहित्य या हिंदी का आपकी आजीविका से कोई सम्बन्ध है?

शैलजा सक्सेना: जी, मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में पी.एचडी. की उपाधि प्राप्त की है और शोध करने के समय से ही पहले एक वर्ष रविवारीय कक्षाएँ दिल्ली विश्वविद्यालय के जीसस एंड मैरी कॉलेज में लीं फिर 1989 से लगभग नौ वर्ष तक मैंने जानकी देवी कॉलेज में पढ़ाया, तो हिन्दी ने सोचने की तमीज़ देने के साथ मेरे लिए आजीविका का धन भी दिया। 1998 में वह नौकरी छोड़ने के बाद से हिन्दी मेरी आजीविका का माध्यम नहीं रही। ह्यूस्टन और यहाँ कनाडा में मैंने स्वैच्छिक रूप से हिन्दी पढ़ाई।


अनुराग शर्मा: परिवार की साहित्यिक पृष्ठभूमि, और लेखन की प्रेरणा के बारे में बताइये। 

शैलजा सक्सेना: मेरे परिवार में कोई लेखक नहीं है पर किताबें पढ़ने की परंपरा रही है। मेरे ताऊजी, ताईजी मथुरा में प्रोफ़ेसर थे, बहुत अधिक पढ़ते थे और हर तीन-चार महीने में दिल्ली से मथुरा उनके पास जाने का अवसर मिलता, उनके घर की लायब्रेरी खंगालती। यही नहीं पढ़े हुए पर बातचीत होती। पात्र, कथानक, भाषा, विचार, उपमाओं आदि की चर्चा होती। इस कारण बहुत पढ़ना और किताबों के बारे में बात करने का अवसर मिलता था।


अनुराग शर्मा: आप क्यों लिखती हैं? प्रमुख उत्प्रेरक क्या हैं? सामान्य रचना प्रक्रिया का जीवन-चक्र क्या है? यह प्रक्रिया कितनी चेतन है, कितनी अचेतन?

शैलजा सक्सेना: इस प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं हो सकता। जब कोई भी लिखना शुरू करता है तब कारण यह होता है कि किन्हीं घटनाओं और बातों का मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि भावों के आलोड़न के बीच से कविता प्रस्फ़ुटित हो ही जाती है, कहने को अधिक हुआ तो कहानी और लेख जन्म लेते हैं। रच कर अपनी बात कह देने का आनंद, यानि स्वान्त:सुखाय ही उस समय परम ध्येय होता है। मेरा लेखन भी ऐसे ही शुरू हुआ। सन 1975-85 में जब मैं बड़ी हो रही थी, दिल्ली में ’ईव-टीज़िंग’ चरम पर थी। सड़क पर, बसों में, लड़कियाँ कहीं सुरक्षित नहीं थीं बस, ऐसे कलम उठी, सातवीं कक्षा से लिख कर कह देने का मन होता था। समय के साथ लिखने की प्रवृत्ति बढ़ी और कलम के प्रति एक ज़िम्मेदारी का अनुभव हुआ। लगा, यह मेरा कर्तव्य है कि जो कुछ आस-पास देख रही हूँ, उसे कहूँ। कह सकती हूँ कि मेरे उत्प्रेरक तत्व भी वही हैं जो प्राय: अन्य कवियों के होते हैं, भाव और विचार! कविताएँ किसी आदर्श की कल्पना-क्रिया रूप में, प्रकृति की अनंत पाठशाला से, तो कभी घटनाओं की प्रतिक्रिया रूप में आती हैं, कहानियाँ बहुत सी घटनाओं के घात-संघात से उत्पन्न भाव और विचार से बनती हैं और लेख किसी ज़रूरत से उत्पन्न होते हैं।

लेखन की प्रक्रिया हमेशा अवचेतन में ही प्रारंभ होती है। भीतर की आँखॆं जब तक करुणा, प्रेम के आँसुओं से भीगती नहीं तब तक कहाँ सोचना हो पाता है! उस आँख में कभी रोष तो कभी प्रेम जमा होता रहता है जो सही मौका पा कर चेतनावस्था में कलम पकड़ा देता है। मैं लेख के अतिरिक्त कभी लिखने के नियम से बँध कर नहीं बैठ पाई, जब भीतर का आलोड़न बाहर आने को तैयार हुआ तभी लिखा, इसी कारण कभी-कभी कोई विचार महीनों तक ही दिमाग में रहने के बाद प्रकट हुए।

कविता की रचना-प्रक्रिया का जीवन काल छोटा रहता है। भाव उमड़े और लिखने की सुविधा हो पाई तो लिख लेती हूँ पर वे बहुत समय तक डायरी में बंद रहते हैं, जब तय कर लेती हूँ कि ये प्रकाशन के लायक हैं तभी बाहर निकालती हूँ। इधर एक आधुनिक खंड काव्य तीन सालों के बाद पूरा हो पा रहा है। कहानियाँ कुछ हफ़्ते तो लेती हैं, बाकी बहुत से भाव तो पानी केरा बुदबुदा का सा छोटा जीवन पा कर, व्यस्तता के चलते पन्नों तक आते-आते दम तोड़ देते हैं… कभी इस तरफ़ बहुत ध्यान से सोचा नहीं था, अब लग रहा है, लग कर लिखने बैठना चाहिए था। खैर!


अनुराग शर्मा: आपकी रचनाओं का पाठकवर्ग क्या है? कौन आपको पढ़ता है?

शैलजा सक्सेना: लेखकों को यह शिकायत है कि उनका पाठकवर्ग सिमटता जा रहा है, जो कि सच भी है सो ऐसे में यह प्रश्न लेखन की सार्थकता या ज़रूरत के बिंदु पर लाकर खड़ा करने वाला है।

आयुवर्ग के हिसाब से देखें तो मेरे पाठक वर्ग में युवा से लेकर प्रौढ़ सभी हैं। प्रवासी लेखन की दृष्टि से देखें तो एक बड़ा समुदाय है जिन्हें मेरी कविताओं में अपना जीवन दिखाई देता है। मेरी कहानियों में भारत के प्रवासियों के साथ-साथ दुनिया के अन्य प्रवासियों के जीवन को और उनकी ज़मीन को दिखाने की चेष्टा भी है इस हिसाब से एक व्यापक ज़मीन है मेरे पास लिखने के लिए और पाठकों को भी अपने जैसे जीवन जीने वाले अन्य देशों के प्रवासियों के जीवन की जानकारी मिलती है और वे ये कहानियाँ पसंद करते हैं। भारतीयों के प्रवासी जीवन पर लिखी कहानियाँ तो असंख्य हैं, उनमें ये कहानियाँ अपना अलग स्थान बना रही हैं। मेरे लेख पढ़ने और उन्हें इधर-उधर छापने वाले प्रकाशकों/ पाठकों में यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों से लेकर बहुत से साहित्यप्रेमी लोग हैं। इन लेखों और समीक्षाओं में ’आज’ के संदर्भ और व्याख्याएँ केंद्र में होने से पाठकों को ये पसन्द आते हैं।


अनुराग शर्मा: अपनी रचनाओं में आपको कौन सी सर्वाधिक प्रिय है, और क्यों?

शैलजा सक्सेना: कठिन प्रश्न है, वैसे इस प्रश्न से हासिल कुछ होगा नहीं। लेखक को चाहे जो पसंद हो, कसौटी तो पाठक के हाथ में है पर आपने पूछा है तो उत्तर देने की चेष्टा करती हूँ। कहानियों में ’थोड़ी देर और’ कहानी, लेखन के अनुभव में विचित्र होने के कारण प्रिय है। लेबनॉन की भूमि पर आधारित यह कहानी 1912 के समय की पृष्ठभूमि पर है। इसके स्थान वर्णन आदि  जैसे स्वप्न की तरह चलते हुए मेरे सामने आए।

प्रिय कविताओं में मेरा अप्रकाशित आधुनिक खंड काव्य है जो भीष्म पर आधारित है। वह जैसे पिछले तीन सालों से मुझ में गूँज रहा है। भीष्म में शक्ति और ज्ञान दोनों सबसे अधिक थे, उनमें महानायक बनने के सभी गुण थे पर वे महानायक नहीं बन पाए। मृत्यु शय्या पर उनका यह चिंतन और चिंता दोनों समझने की चेष्टा में मुझे उनके मन में अनेक बार घुसना पड़ा.., यह एक पीड़ाभरी पर रोचक क्रिया थी, इस कारण यह मुझॆ पसन्द है।


अनुराग शर्मा: आपकी रचनाओं में सबसे ज़्यादा हलचल किसने मचाई और क्यों?

शैलजा सक्सेना: कविताओं में ’माँ’ कविता लोगों को पसंद आई। ’टेलिफोन के उस पार तुम हो, मेरा बचपन है, मेरा अतीत है, टेलिफोन के इस पार मैं हूँ, मेरा वर्तमान है, मेरा परिवेश है…’ इसमें प्रवास की सच्चाई स्वीकार करते हुए, माँ और बेटी के जीवन की समानता-भिन्नता और अंतत: ’तसल्ली बस यही है कि टेलिफोन के उस पार तुम हो, मेरा बचपन है, मैं जानती हूँ’!

कहानियों में ’शार्त्र’ कहानी लोगों को बहुत पसंद आई। यह युगांडा से आई एक लड़की की कहानी है जो कनाडा में काम ढूँढते हुए, माँ के अल्ज़ाइमर के कारण उसके जीवन को जान पाती है और फिर एक अलग जीवन दर्शन बनता है उसका।

लेखों में ’साहित्य क्यों?’ ’साहित्य क्या?’ पसंद किए गए और उन्हें कुछ समाचार पत्रों, पत्रिकाओं ने स्वयं लेकर छापा। इनमें आज के संदर्भ में साहित्य की स्थिति और आवश्यकता सरल भाषा में लिखा गया। इन्हें शास्त्रीय ढँग से नहीं, ललित निबंध की शैली में लिखा गया है, शायद इस कारण इसकी पठनीयता अधिक रही। ’अंतिम अरण्य के बहाने निर्मल वर्मा पर एक दृष्टि’ लेख दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपनी ई लर्निंग में लिया था।


अनुराग शर्मा: अपनी किसी ऐसी रचना के बारे में विस्तार से बताइये जिसे पूरा करना कठिन रहा हो?

शैलजा सक्सेना: ’भीष्म’ खंड काव्य में मुझे बहुत समय लगा और जब तक वह प्रकाशन में नहीं चला जाता, मेरे अनुसार वह समाप्त नहीं होगा। भीष्म की पीड़ा क्या थी, इसको सही तरह पकड़ पाने और उसी तीव्रता से उतार पाने में लगातार बेचैनी रही। दरअसल जब आप इतिहास या मिथक से किसी पात्र को लेते हैं तो अनेक सावधानियाँ बरतनी होती हैं, इसी के चलते कहूँगी कि यही सब से कठिन रचना रही।


अनुराग शर्मा: अगर आप लेखक न होतीं तो क्या होतीं?
शैलजा सक्सेना: मैंने जानकी देवी कॉलेज में नौ वर्ष पढाया था, वही करती रहती। अध्यापन का ही काम करती रहती। वैसे लिखने से ज़्यादा पढ़ने और पढ़ाने का महत्व होता है। हम सही ढँग से पढ़ सकें, वह भी बहुत बड़ा काम हो।


अनुराग शर्मा: आपका प्रिय लेखक कौन है और क्यों? 

शैलजा सक्सेना: बहुत से लेखक मेरे प्रिय हैं, सबसे पहले तुलसी बाबा, फिर मुक्तिबोध, अज्ञेय, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर, नरेन्द्र कोहली, शिवाजी सावंत, निर्मल वर्मा, चित्रा मुद्गल आदि बहुत से लेखक मुझे बहुत पसंद हैं। बहुत से नाम छूट गए होंगे... ऐसा सवाल नहीं पूछना चाहिए।


अनुराग शर्मा: जो आज्ञा। लेखक न सही, अपनी प्रिय पुस्तक ही बता दीजिये। कौन सी और क्यों?

शैलजा सक्सेना: रामचरित मानस मेरी बेहद प्रिय पुस्तक है। इसके बाद राम कथा के आधार पर नरेन्द्र कोहली जी का उपन्यास भी बहुत पसंद आया। वैसे हर किताब में एक जीवन है और हर जीवन में बहुत सी कहानियाँ हैं, पीड़ा और साहस के अद्भुत उदाहरण हैं जो सभी मुझे बहुत प्रिय लगते हैं। जैसे मुक्तिबोध कहते हैं न,
’मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में महाकाव्य पीड़ा है/ पलभर में सब से गुज़रना चाहता हूँ/ प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ’ उसी भाव, उत्सुकता और आदर से हर किताब खोलती हूँ।


अनुराग शर्मा: आपकी दृष्टि में प्रवासी हिंदी साहित्य लेखन की वर्तमान प्रगति कैसी है?

शैलजा सक्सेना: प्रवासी लेखन बहुत अच्छा चल रहा है। बहुत सी विधाओं में, बहुत अच्छा लिखा जा रहा है। इंटरनेट तथा तकनीक के बढ़ने से प्रवासी लेखन के स्तर में भी सुधार हुआ है और अच्छे प्रवासी लेखन का दुनिया को भी पता चला है।

लेकिन एक बात अवश्य कहना चाहूँगी कि हम ’प्रवासी’ शब्द में भारत के बाहर की विशाल दुनिया को समेट लेते हैं। अब हर देश में लेखन का स्तर एक जैसा तो होगा नहीं। कुछ देश जहाँ भारतीय बाद में पहुँचे, वहाँ अगर नॉस्टेलिजिक तरीके का लेखन हो रहा है तो वहीं जिन देशों में भारतीय बहुत पहले से पहुँचे हुए हैं वहाँ के विषय अधिक स्थानीय हो गए हैं। ऐसे ही अगर लेखक २५-३० सालों से उस देश में रह रहा है तो वह प्रारंभिक नॉस्टेलिजिक दौर से निकल कर ज़मीनी सच को स्वर देना शुरू कर देता है पर उसी देश में नया आया व्यक्ति जब कविता लिखता है तो मिट्टी छोड़ने की पीड़ा उसकी रचनाओं में उभर कर आती है।ऐसा पहले भी हुआ है और ऐसा ही होता रहेगा। यह संवेदना की यात्रा है, जब हम इस सच को स्वीकार कर के प्रवासी रचनाकारों की रचना-यात्रा देखते हैं तो हम उनके साथ न्याय कर पाते हैं।

वैसे हर देश में आपको बहुत से अच्छे लेखक मिलेंगे। मॉरीशस, अमरीका, कनाडा, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और यू.के..आप जानते ही हैं कि कुछ लोगों के लेखन पर तो अब शोध कार्य भी हो रहा है। प्रवासियों को साहित्य की मुख्य धारा में स्थान देने की अनेक कोशिशों से यह दूरी पटी है और प्रवासी लेखन इस प्रचार के कारण बढ़ी हुई ज़िम्मेदारी के साथ और अधिक सावधान और समृद्ध हो रहा है।


अनुराग शर्मा: प्रवासी हिंदी लेखन की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

शैलजा सक्सेना: तीन महीने पहले यानि कोरोना से पहले बहुत से प्रवासी साहित्यकार अपरिचय के अंधकार में थे। कुछ नाम हर जगह चल रहे थे, दिख रहे थे, पढ़े और सुने जा रहे थे, बुलाए जा रहे थे, सम्मानित हो रहे थे और अनेक लोग ऐसे थे जो अच्छा लिख कर भी बहुत अधिक प्रकाश में नहीं आ पा रहे थे। कोरोना से पहले उनकी यह बड़ी चुनौती थी कि उन्हें अपनी मेहनत और प्रतिभा का पूरा देय नहीं मिल रहा था पर पिछले कुछ समय से व्हाट्सएप और अब ज़ूम के माध्यम से बहुत से लोग घर बैठे जुड़ रहे हैं और मुझे पूरी आशा है आगे भी इस माध्यम से बहुत से लोग जुड़ेंगे।

एक और बड़ी चुनौती अब भी बनी हुई है वह है किताबों का अनुपलब्ध होना। यद्यपि ई-पुस्तकें आईं हैं लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में प्रवासी पाठक और लेखक किताबें न मिलने से परेशान रहते हैं।

तीसरी चुनौती है साहित्यिक वातावरण का अभाव। भारत में लेखकों को आपस में बात करके एक साहित्यिक माहौल मिलता है पर प्रवास में आप वह माहौल बनाते हैं जिसमें बहुत सा समय और ऊर्जा जाती है जो आपके लेखन में काम आ सकती थी। नई ज़मीन के अपने संघर्ष, रोज़ी-रोटी-परिवार को पालते हुए लेखन के कार्यों में लगने वाले प्रवासी हिंदी के प्रचार-प्रसार के कामों में स्वयं को खपा देते हैं तब भी वह वातावरण नहीं मिल पाता जिसके लिए वे तरसते हैं। आशा है तकनीक के विकास से यह समस्या भी सुलझेगी।

एक और चुनौती जो केवल प्रवासियों के सामने ही नहीं बल्कि भारत में भी है, वह अगली पीढ़ी को हिन्दी में रुचि जगाने की, हिंदी की धरोहर को अगली पीढ़ी को सौंपने की! अंग्रेज़ी का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि प्रवासी हिंदी प्रेमी लोगों के सामने यह एक बड़ी चुनौती है कि हिंदी की भविष्य में क्या स्थिति होगी!


अनुराग शर्मा: हिंदी साहित्य में विविध विमर्शों (यथा, नारी, दलित, आदि) के बारे में आपके क्या विचार हैं?

शैलजा सक्सेना:  साहित्य की संवेदना में हर वर्ग और वर्ण सम्मिलित रहा है। जब निराला ने लिखा, ’वो तोड़ती पत्थर, इलाहाबाद के पथ पर’ तब वो स्त्री और मज़दूर स्त्री की बात बिना किसी विमर्श को लाए हुए कर रहे थे, उनका ’चतुरी चमार’ भी बिना वर्ण का ढोल पीटे अपनी बात कह रहा था। कहने का मतलब है कि साहित्य में नज़रअंदाज़ कर दिये लोगों की चर्चा करने की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है पर दलित विमर्श और नारी विमर्श इस स्थिति के एक दूसरे आयाम को प्रस्तुत करते हैं, वह आयाम है वर्ग विशेष, वर्ण विशेष का सच उन्हीं के द्वारा लिखा जाना और प्रकाशित होना!

इन विमर्शों का आधार है कि जिस के पैर फ़टते हैं, वह ही बिवाई का दर्द समझ सकता है। आप दलित लेखकों, आदिवासी लेखकों के लेखन में उनके जीवन संघर्षों को जब पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं कि हमारे समाज में गरीबी का, उत्पीड़न का ऐसा विकराल रूप भी है? जब तक हम स्वयं वह दुख नहीं सहते तब तक वह दुख हमारे लिए एक खबर रहता है पर जब हम पर वह दुख पड़ता है तब वह अनुभव की सचाई बनता है, मन को तार-तार करता है, उन स्थितियों में कोई आगे आ कर लिखने की चेष्टा करता है तो यह उसके लिए बहुत बड़े साहस की बात है। ज़रा सोचिए कि जब कोई स्त्री अपने वर्ग पर हुए अत्याचारों को लिखती है तो वह पुरुष समाज के द्वारा पैदा किए हुए डर को जीने के बाद, कितने साहस से उस दर्द के भारी लबादे को उतार कर सामने आई होगी! ऐसे लेखन को महत्त्व दिया जाना चाहिए। पुरुष लेखक स्त्री की स्थिति को संवेदना से लिख सके हैं पर अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें मूलत: स्त्री ही लिख सकती है क्योंकि स्त्री उन्हें भोगती है, ठीक वैसे ही जैसे दलित असमानता के अन्याय को दिन-रात भोगते हैं। उनकी ये पीड़ाएँ उनके तन-मन में व्यापी हुई हैं। कोई और उनके दर्द को लिख कर इसलिए छप जाए कि वह नामी लेखक है या बड़े नामों को पहचानता है या बहुत उच्च शिक्षा लिए हुए है तो यह उस वर्ग और वर्ण के साथ दोहरा अन्याय होगा। मैं यह नहीं कह रही कि पुरुष या सवर्ण अपनी संवेदना से स्त्री या दलित संचेतना को खारिज कर दे, बल्कि यह कि संपादक को दलित लेखक और लेखिकाओं को अपनी बात कहने के लिए प्रोत्साहन और छपने के लिए स्थान देना चाहिए। इन सब विमर्शों का मुख्य उद्देश्य यह है कि हाशिये पर रह गए लोगों के जीवन की अनेक समस्याओं और विभीषिकाओं के प्रति समाज संवेदनशील बने। यह संवेदनशीलता भोगे हुए सच और पूरे सच के उजागर होने पर ही आएगी। इस संदर्भों में विमर्शों ने इस संवेदना को जगाया है, बढ़ाया है। कई बार सच आपके मुँह के आगे होता है पर जब तक कोई आकर उसे रेखांकित नहीं करता तब तक वह दिखाई नहीं देता। विमर्शों को भी उसी रेखांकन की तरह समझना चाहिए।

अब ये सच लोगों को दिख रहे हैं और संवेदना भी जागनी शुरू हो गई है तो यह काम चलते रहना चाहिए। लेकिन हाँ, इसे राजनीति से बचाना भी बहुत आवश्यक है। राजनीति संवेदना को खा जाती है। उसके नियम हृदय के नियम नहीं होते, शक्ति पाने के लिए अवसरवादिता के नियम होते हैं, संवेदना बढ़ाने के लिए राजनीति की नहीं, भावनीति की आवश्यकता होती है।


अनुराग शर्मा: आपकी दृष्टि में हिंदी का सम्बन्ध अन्य भारतीय भाषाओं से कैसा है, इसे कैसा होना चाहिये?

शैलजा सक्सेना: हिंदी ने अन्य भाषाओं को हमेशा मान दिया है। बचपन से ही मैंने बंगाली, तमिल, मलयालम आदि भाषाओं की किताबों के अनुवाद पढ़े हैं। साहित्य अकादमी की अनुवाद कार्य-योजनाओं से इस दिशा में रुचि और चेतना दोनों जगे हैं। दूसरी भाषाओं में भी हिंदी पुस्तकों के अनुवाद हुए हैं पर नि:संदेह दोनों ही दिशाओं में बहुत काम करने की आवश्यकता है।

दूसरी बड़ी बात जिसकी आवश्यकता मुझॆ अनुभव होती है, वह है संवाद की। अन्य भाषाओं के साहित्यकारों से हिंदी के साहित्यकारों के बीच संवाद, विचार-विनिमय होना बहुत आवश्यक है ताकि उन भाषाओं की स्थितियों और चुनौतियों को भी जाना जा सके। भाषाएँ जब अपनी गुटबाज़ी छोड़ेंगी, या कहें साहित्यकार अपने अहं को पीछे रख कर जिज्ञासु की तरह आगे आयेंगे तभी भारतीय भाषाओं के बीच सशक्त सेतु स्थापित हो सकेगा और इस सब के बीच से भाषा की राजनीति को तो बिल्कुल हटाना पड़ेगा। राजनीति के चलते भाषाओं के बीच दूरियाँ घटने की बजाए बढ़ी हैं।


अनुराग शर्मा: क्या आपको लगता है कि 'विशेषज्ञता का अभाव' भी हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का एक बड़ा संकट है? 

शैलजा सक्सेना: इस प्रश्न के दो तरीके के उत्तर बनते हैं। एक तो यह कि इंटरनेट पर ब्लॉग और खुद से प्रकाशित करने वाली बहुत सी वेबपत्रिकाओं में बहत कुछ सूचनाओं जैसा एक साथ दिया जा रहा है, खोजने और सोचने का काम पाठकों के लिए छोड़ दिया जाता है तो ऐसे में विशेषज्ञता क्या करेगी? उसकी आवश्यकता पर ही प्रश्न चिह्न है। पत्रकारिता का हाल तो और भी बुरा है। सब जगह मात्र अपने दृष्टिकोण का प्रचार ही है। इन सब पर रोक लगा कर एक मानक बनाना असंभव ही है।

दूसरी बात यह कि आप विशेषज्ञता का अभाव कह रहे हैं, पर यहाँ तो हर कोई विशेषज्ञ बना हुआ है! अभाव के स्थान पर बहुतायत के कारण समस्या अधिक है। खैर! यह तो हँसी की बात थी। कमी तो है इस क्षेत्र में। साहित्य के अनेक आयामों में पुराने विशेषज्ञों के खाली पड़े सिंहासन दिखाई देते हैं। पर एक बात और है कि सही लोग सही तरह से सामने नहीं आ पा रहे हैं। बहुत से विद्वान हैं जो विभिन्न विधाओं और विषयों पर अधिकार रखते हैं, वे लिख और छप भी रहे हैं पर चर्चा में उतने नहीं, या उनकी विशेषज्ञता को उतना मान नहीं मिल रहा जितना मिलना चाहिये। हम विशेषज्ञ को विशेषज्ञ मान कर उन्हें स्वीकार भी तो करें! जो जैसा लिख रहा है, छपने की जल्दी में है। समीक्षा के नाम पर ऐसे-ऐसे लेख छपते हैं जो माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड के कॉपी- पेस्ट के उदाहरण हैं। ऐसे समीक्षकों को समीक्षा की सही परिभाषा तक पता नहीं होगी पर क्योंकि वे बराबर ऐसे लेख लिख रहे हैं तो छप भी रहे हैं। साहित्य में नए आने वालों को भी ’कौन किस को जानता है, कौन किस से अपना क्या हित साध सकता है’ इसमें विशेषज्ञता हासिल करने में लाभ दिखाई देता है।

इस स्थिति को सुधारने के लिए यह आवश्यक है कि हम जानें कि कौन लोग विशेषज्ञ हैं और उनकी राय को महत्व दें तभी सही दिशा में भी मुड़ेंगे साथ ही नई पीढी का ध्यान विशेषज्ञता हासिल करने की ओर भी खींच सकेंगे।


अनुराग शर्मा: मेरा अनुभव यह है कि प्रामाणिकता की कमी भी हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की एक बड़ी समस्या है। आप क्या कहती हैं?

शैलजा सक्सेना: यह केवल हिंदी पत्रकारिता की बात नहीं है, आजकल हर पत्रकारिता एक चौंकाने वाली, दहलाने वाली, लोगों के ’नैगेटिव सेंटीमेंट्स’ यानि कि नकारात्मक भावनाओं को जगाने के लिए जल्दबाज़ी में, बिना पूरी कहानी जाने, उसे बाकी चैनलों से या अखबारों से पहले परोसने की होड़ में लगी हुई है, ऐसे में प्रामाणिकता के लिए कहाँ स्थान बचता है? वैसे भी राई जैसी प्रामाणिकता को पहाड़ जैसा मनगढंत बना कर कहना पत्रकारों का काम हो गया है। हिंदी पत्रकार भी वही कर रहा है। किसी ज़माने में कोई झूठी बात छप जाती थी तो पत्रकार और उनकी खबर छापने वाले प्रकाशक क्षमा माँगते थे, अब उस झूठ को सच बनाने के लिए झूठे सबूत जुटाए जाते हैं। भाषा और कथ्य दोनों का संयम भी कम है, इन्हीं कारणों से सोशल मीडिया की लोकप्रियता बढ़ी थी पर अब वहाँ भी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी है जहाँ झूठ, झूठे प्रमाणों से सजा-धजा बिकता है। पत्रकारों को लगता है, जनता को प्रामाणिक कहानी नहीं, रोमांचक कहानी चाहिए जो कि सच नहीं। श्रोता और पाठक भी अब धीरे-धीरे इस झूठ के प्रति सचेत हो रहे हैं पर कैसी दुख की बात है कि हमने रोमांच को भी घृणित रोमांच में बदल कर बेचना शुरू कर दिया है।

पत्रकारिता की तुलना में साहित्य अब भी किसी सीमा तक प्रामाणिकता को सँभालने की चेष्टा में लगा है, कम से कम अच्छे साहित्यकार तो कुछ अध्ययन कर के ही अपनी बात रखने की चेष्टा कर रहे हैं पर यह भी सच है कि पुराने साहित्यकारों जैसी खोजी प्रवृत्ति अब कम देखने को मिलती है। अनेक संग्रहालयों और पुस्तकालयों में जा कर पुस्तकों को देखने की बजाय लेखकों को यह सुविधाजनक लगता है कि इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को ही सरसरा सा देख लिया जाए। इस स्थिति को बदलने के दो ही रास्ते हैं कि या तो लेखक अपने तथ्यों की खोज करना शुरू करें या अधिक से अधिक सामग्री इंटरनेट की प्रामाणिक वेबसाइ्ट्स पर उपलब्ध हों ताकि लेखक के साथ-साथ पाठक भी उनके साहित्य के तथ्यों की जाँच कर सकें और केवल प्रामाणिक साहित्य को ही स्वीकृति दें।


अनुराग शर्मा: हिन्दी के कुछ तथाकथित सेवक, या साधक कवि और कपि में अंतर नहीं समझते, सामान्य शब्दों को ठीक से कह-लिख नहीं सकते, फूहड़ चुटकुलों को कविता या लघुकथा बनाकर प्रस्तुत करते हैं। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि हिन्दी का एक संकट टके सेर भाजी, टके सेर खाजा का भी है?

शैलजा सक्सेना: आप सही कह रहे हैं। हिन्दी के ऐसे तथाकथित सेवक हिन्दी का बहुत नुकसान करते हैं। लेकिन यह सारी बात बहुत बड़ी और गहरी भी है। इस पूरी समस्या में तीन आयाम हैं, एक बिंदु पर तो इस तरीके के कवि स्वयं है जिन्हें स्वयं अच्छे साहित्य का ज्ञान नहीं है, दूसरे पर हमारी हिन्दी की शिक्षा-व्यवस्था है जहाँ वर्तनी की शुद्धता कम से कमतर होती चली जा रही है, अच्छे लेखन को कक्षाओं में पढ़ाने और सिखाने वाले प्राध्यापकों की कमी हो गई है, तीसरे पर हमारे दर्शक या श्रोतागण हैं जिन्हें कवि नहीं, स्टैंड-अप कॉमेडियन चाहिए। चुटकुलों या व्यर्थ की बातों को इन दर्शकों ने कवि सम्मेलन का ज़रूरी हिस्सा मान लिया है, उसका विरोध अगर ये करते तो शायद बात कहीं रुक जाती पर हमारी हर बात पर वाह-वाह करने की आदत और हर चीज़ को स्वीकार करते चले जाने की आदत के चलते, इन मंचीय समारोहों का स्तर गिर रहा है। स्वस्थ आलोचना लेना भी हम नहीं जानते, सो वरिष्ठ कवि भी अब नये कवियों को कुछ कहते संकोच में पड़ते हैं। पुराने ज़माने की गुरु-शिष्य परंपरा या उस्ताद वाली परंपरा अब लगभग ख़त्म है।

दो-तीन दशकों पहले तो संपादक भी कवियों की रचनाओं को सुधरवाते थे या बहुत गल्तियों वाली रचनाओं को छापने से मना करके कवियों को बेहतर लिखने के लिए प्रोत्साहित करते थे, आज के समय में तो कोई अच्छा संपादक अगर किसी को टोकता है तो वह कवि किसी और पत्रिका में या ब्लॉग में जा कर अपनी रचना अपलोड कर देता है। अनेक संपादक संपादन का आवश्यक कार्य नहीं करते और रचनाओं में वर्तनी के अनेक दोष रचना प्रकाशित होने पर पाठक उसे देख कर विरक्त होता है।

इन सब नकारात्मक बातों के बाद एक बात मैं अवश्य रेखांकित करूँगी कि मंच की फूहड़ कविताओं पर और प्रकाशित रचनाओं के स्तर और वर्तनी दोष की ओर अब दर्शक और पाठक सजग हो रहे हैं। हज़ारों बार के सुनाए पुराने चुटकुलों की दुकानों को समझ में आ गया है कि कुछ अच्छा नहीं सुनाया तो सम्मेलन सफ़ल नहीं होगा। इससे सम्मेलनों के स्तर में सुधार की आशा दिखाई दे रही है। अच्छी और श्रेष्ठ पत्रिकाओं की पहचान भी सामने आ रही है, जैसे कि आपकी पत्रिका ’सेतु’ है, कनाडा से सुमन कुमार घई जी की पत्रिका ’साहित्यकुंज.नेट’ या अभिव्यक्ति, अनुभूति आदि कुछ अच्छी पत्रिकाओं में आप लोग रचनाओं के स्तर और वर्तनी दोष की ओर बहुत सजग हैं। आशा है पाठकों की यह जागरूकता कवियों को बेहतर बनाने के काम आयेगी। हाँ, वर्तनी दोष को कम करने के लिए स्कूलों और विश्वविद्यालय स्तर पर काम किया जाना बहुत ज़रूरी है।


अनुराग शर्मा: हिंदी के साथ क्या दोयम दर्ज़े की भाषा जैसा व्यवहार हो रहा है? बीबीसी जैसी ख्यात संस्था भी अपनी हिंदी साइट पर व्यवसायिकता और निपुणता के मामले में बेहद लापरवाह दिखती है। जब कभी भी किसी मित्र के उल्लेख आदि के कारण वहाँ कुछ पढ़ने गया, हमेशा व्याकरण, वर्तनी आदि की त्रुटियाँ रसभंग करती हुई मिलीं। कई वाक्य अधूरे ही छोड़ दिये गये होते हैं तो कई इतने बेतुके ढंग से लिखे गये होते हैं कि वे लगभग विपरीतार्थक हो जाते हैं। हिंदी के प्रति इस दुर्व्यवहार के क्या कारण हैं? 

शैलजा सक्सेना: हिंदी या किसी भी भाषा के प्रति दुर्व्यवहार उनके उपयोग करने वालों के कारण ही होता है। भाषा के प्रति गर्व, जातीय गर्व से जुड़ी बात है। हमें अपने भारतीय होने पर गर्व होगा तो अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति गर्व होगा। अगर भाषा के प्रति गर्व होगा तो हम उसके शुद्ध और अशुद्ध रूप के प्रति भी सचेत रहेंगे। हम गलत अंग्रेज़ी बोलते या लिखते हुए लज्जित होते हैं पर गलत हिंदी बोलते और लिखते हुए लज्जित अनुभव नहीं करते बल्कि यह कहने में गर्व अनुभव करते हैं कि हमें हिंदी नहीं आती। उत्तर भारत का लगभग हर बच्चा कम से कम आठवीं कक्षा तक तो हिंदी पढ़ता ही है, इस भाषा में वह परिवार और बाहर में बोलता भी है तब हिंदी न आने की बात गर्व से बताने की बात मुझे कभी समझ नहीं आई। अपनी भाषा के प्रति भारतीयों की यह उपेक्षा बी.बी.सी., मीडिया के अन्य संसाधनों या अन्य समाचार-पत्रों में भी फैलेगी ही! हर जगह हिंदी के प्रति उपेक्षा का वातावरण हो, ग़लत प्रयोग पर टोकने वाला कोई नहीं हो तब भाषा के प्रति लापरवाही आना स्वाभाविक है।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। देश की स्वतंत्रता के 70 वर्षों में हम चाहें बाकी क्षेत्रों में आगे बढे पर भाषा और संस्कृति के प्रति अपनी निष्ठा में बहुत पिछड़ गए हैं, यह तथ्य हर तरफ़ दिखाई देता है। हिंदी या अन्य प्रादेशिक भाषाओं पर जो यह गहरा संकट है, उसे समझ कर हम दुखी तो हैं पर जो समय इस गलती करने और गलती को बढ़ाने में चला गया, उसे लौटाया नहीं जा सकता, यह भी कड़वा सच है।

इस दशा को सुधारने में बहुत तेज़ी से और बहुत सा काम करने की आवश्यकता है। सबसे पहले तो हमें अपना रवैया बदलना पडेगा। जहाँ ऐसे प्रयोग हों, वहाँ पत्र द्वारा अपना विरोध दर्ज कराने की आवश्यकता है। अशुद्ध प्रयोगों पर रोक लगाने का दूसरा तरीका यह  है कि हिंदी का सही प्रयोग इतना बढ़ाया जाए कि अशुद्ध प्रयोग करने वाले इस दिशा में सजग और सचेत हों। वर्तनी और शब्द दोष से हिन्दी को बचाने के लिए स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर बहुत सख़्ती से काम करने का समय आ गया है। इस सच्चाई को हमें पूरी निष्ठा और निरंतरता के साथ ज़ोर से बोलना होगा।

अनुराग शर्मा:  धन्यवाद, और शुभकामनाएँ!

शैलजा सक्सेना धन्यवाद

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