श्रीमद्भगवद्गीता और तुलसी कृत वैराग्य संदीपनी: तुलनात्मक अध्ययन

श्रीमद्भगवद्गीता का गोस्वामी तुलसीदास कृत वैराग्य संदीपनी से तुलनात्मक अध्ययन
मृदुल कीर्ति

- मृदुल कीर्ति


 ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात पूर्ण मुदच्यते।
 पूर्णस्य पूर्ण मादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।।

 श्रीमद्भगवद्गीता जीवन का दर्शन, शोध और संविधान है। कामना, तृष्णा और एषणा से आप्त, तप्त और संतप्त जीव को, तृष्णा रहित चित्त की अवस्था और अंततः परब्रह्म की शरणागति ही समाधान है। श्री कृष्ण 'गीता' में और 'वैराग्य संदीपनी ' में संत प्रवर तुलसी दास ने जीव के चित्त की इन्हीं वृत्तियों का भाव-विभाव, प्रभाव-स्वभाव एवं समाधान मानव के कल्याण हेतु बताया है। जीव परिणाम की इच्छा करते हैं, कृष्ण इच्छा का परिणाम बताते हैं। इन ब्रह्मनिष्ठ ज्ञान के अंतर्वर्ती मूल्यों में अभिन्नता है, शाश्वती है, चिरंतन सत्य हैं अतः उसमें द्वैत्व कहाँ है? इन दोनों में विषय सारूप्यता ही इनके तुलनात्मक अध्ययन का आधार है। वैराग्य संदीपनी को तुलसी कृत गीता भी कहा जा सकता है, यहाँ इसी साम्यता का विवेचन है। तुलनात्मक समीकरण के साक्ष्य, सन्दर्भ सहित इस शोध पत्र में परिलक्षित हैं।
 तुलसी वेद पुराण मत, पूरण शास्त्र विचार। यह विराग संदीपनी अखिल ज्ञान को सार। (वैराग्य संदीपनी 7)

 परब्रह्म एक है, परिपूर्ण है। प्राणीमात्र के कल्याण के लिए कभी श्री राम तो कभी श्रीकृष्ण बनकर अवतरित होते हैं।

1. अवतार भाव की साम्यता
 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।। (गीता 4/7)
 संत प्रवर तुलसी भी वैराग्य संदीपनी में इसी प्रवाह में मुखरित हैं।
 अज अद्वैत अनाम अलख रूप गुण रहित जो। मायापति सोइ राम, दास हेतु नर तन धरेउ।। (वैराग्य संदीपनी 4)

2. निर्गुण और निराकार
ब्रह्म साकार और सगुण होने के साथ-साथ निराकार और निर्गुण दोनों है, अतः अवतरित होने के साथ-साथ ब्रह्म निर्गुण होते हुए - अणु-अणियाम और महत-महियाम होने के कारण सृष्टि के अणु-कण में समाहित भी है। गीता में -- कृष्ण भी स्वयं को निराकार बताते हैं।
 सर्वेंद्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुण गुणभोक्तृ च। (गीता 13/14)
 परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियों से रहित, आसक्ति रहित,सम्पूर्ण जगत का भरण-पोषण करने वाले हैं तथा गुणों से रहित है और सम्पूर्ण गुणों के भोक्ता हैं।
 तुलसी का ब्रह्म भी "पग बिनु चलहि, सुनहि बिनु काना। कर बिनु कर्म करे बहु नाना। वैराग्य संदीपनी के आदि में ही मंगलाचरण में भगवत्स्वरूप वर्णन है उसमें निराकार भाव ही है।
 सुनत लखत श्रुति नयन बिनु, रसना बिनु रस लेत। वास नासिका बिनु लहै, परसै बिना निकेत। (वैराग्य संदीपनी 3)

3. अव्यभिचारिणी भक्ति
 केवल एक सर्वशक्तिमान को सर्वस्व मानते हुए निरंतर भक्ति करना ही अव्यभिचारिणी भक्ति है। श्री कृष्ण को एकनिष्ठ भक्त प्रिय है जो एकमेव मेरा हो। जो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति के द्वारा मुझको भजता हो, वह तीनों गुणों को लांघ कर ब्रह्म प्राप्त होने के योग्य है।
 मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। (गीता 13/10) मा च यो अव्यभिचारेण भक्ति योगेन सेवते। (गीता 14/26)
 तो इधर रामत्व में लीन तुलसी की भी राम एक मात्र ध्रुवीय सत्ता है, एक अटल लक्ष्य बिंदु, एक आस्था, एक विषय, एक उपास्य, एक काम्य --एक राम।
 एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास। राम रूप स्वाति जलद, चातक तुलसी दास। (वैराग्य संदीपनी 15

4. अनन्य भक्ति और निष्ठा
 अनन्य भक्त को कृष्ण एक और आश्वासन देते हैं -हे अर्जुन जो अनन्य चित्त होकर निरंतर मेरा स्मरण करता है, उसे मैं सहज ही प्राप्त होता हूँ। यहाँ अनन्य चेताः दृष्टव्य है - भक्त और प्रभु के बीच कोई अन्य नहीं, यही अनन्यता और एकीभाव है।

 अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभं पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः। (गीता 8/14)

 'सुलभ ' शब्द विशेष महत्त्व का है -उसका कारण है कि पूरी भगवद्गीता में 'सुलभ' शब्द केवल एक बार आया है जब कि योग शब्द 64 बार आया है। केवल अनन्य भक्त को ही मैं सुलभ हूँ, इसलिए अनन्यता और सुलभ दोनों भक्त और ब्रह्म की पूर्णता के द्योतक हैं। इधर तुलसी का अस्तित्व सर्वस्व, समर्पण की पराकाष्ठा में भाव विह्वल हैं, जिसमें तुलसी अणु मात्र भी तो स्वयं को बचाकर नहीं रखते बल्कि अनन्यता से भी अधिक समर्पण को आतुर सर्वांश होकर कहते हैं, मैं तो प्रभु तेरा ही हूँ किन्तु जो तेरा नाम भूल से भी लेता है उसके पग की पगतरी अपने तन के चाम से बनाने को प्रस्तुत हूँ।

 तुलसी जाके बदन सों, धोखेहुँ निकसत राम। ताके पग की पगतरी, मोरे तन को चाम। (वैराग्य संदीपनी--37
 यह समर्पण और अनन्यता का अंतिम छोर है। यह श्रद्धा से भी उच्च अभीप्सा का स्तर है, जो आधा अधूरा नहीं, समूर्ण, सर्वांश, सर्वांग और सर्वोपरि है।

5. चित्त,चाह और कामना
 चित्त ही वह बिंदु है जहाँ से चाह का जन्म होता है, चाह का निर्माण बंद होना ही दुःखों का निराकरण है। कामनाओं का अंश रहने तक प्राणी साधक कहलाता है, सर्वथा अभाव होते ही वह सिद्ध हो जाता है।
 सर्वसंकल्पसन्यासी, योगारूढः, तदा, उच्यते। (गीता 6/4)
 इसी विषय में तुलसी दास --
 जाके मन ते उठि गई, तिल-तिल तृष्णा चाहि। मनसा वाचा कर्मणा तुलसी वंदत ताहि।

6. राग-विराग से परे वीतराग
 गीता और वैराग्य संदीपनी दोनों में यह सिद्ध किया गया है- राग-विराग से परे जो वीतराग वृत्ति में जीता है वही जीवन्मुक्त स्थितप्रज्ञ है। ऐसा वीतरागी मुनि जब जीवित होता है तब भी ब्रह्म में ही विश्राम करता हुआ, निष्काम कर्म करता है। कर्म में अकर्म भाव होना ही कर्म का निष्काम होना है। तन-मन और वचन से सबको सुख देता हुआ शुभ और निःस्वार्थ कर्म करता है। 'आत्मवत सर्व भूतेषु ' उसका स्वभाव हो जाता है।

 अद्वेष्टा सर्व भूतानां, मैत्रः, करुणः एव च, निर्ममः, निरहंकारः, समदुःखसुखः, क्षमी। (गीता 12/13)
 तुलसी के अनुसार --तन करि, मन करि, वचन करि, काहू दूखत नाहिं। तुलसी ऐसे संत जन राम रूप जग माँहि।। (वैराग्य संदीपनी 23)
 अति सीतल अति ही अमल, सकल कामना हीन। तुलसी ताहि अतीत गनि, वृत्ति शांति लवलीन। (वैराग्य संदीपनी 25)

7. आत्मसंयमी होकर भगवत्परायण हो, विषय परायण नहीं।
 काम ही मन और इन्द्रियों द्वारा ज्ञान को आच्छादित कर जीवात्मा को मोहित करता है। अतः आत्मसंयमी होकर भगवत्परायण हो विषय परायण नहीं। श्री कृष्ण के वचनों में यहभाव
 तानि, सर्वाणि, संयम्य, युक्तः, असीत, मत्परः। वशे हि यस्य,इन्द्रियाणि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (गीता 2/61)
 आत्मसंयमी होकर राम भक्ति करना ही तुलसी का जीवन सार है।
 आकिंचन इन्द्रिय दमन, रमन राम एक तार। तुलसी ऐसे संत जन बिरले या संसार। (वैराग्य संदीपनी 29)

8. समत्व भाव -समत्वं योग उच्च्यते।
 समत्व के उदय से ही आत्मा में अमृत्व प्लावित होता है। स्थिति और गति में समन्वय की अवस्था होती है। आकर्षण और विकर्षण में तटस्थ भाव की व्यवस्था होती है। हर्ष, द्वेष, स्नेह और घृणा में सम्यक व्यवहार की एक प्रथा होती है। सम्यक, समत्व और संतुलन - में जीवन व्यवहार की विधा गीता का उपदिष्ट विषय है--
 यः, नः, हृष्यति, न, द्वेष्टि, न, शोचति, न, कांक्षति। शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान, यह,सः, में, प्रियः।। (गीता 12/17)
 तुलसी भी इसी भाव में मुखरित हैं --
 राग-द्वेष की अग्नि बुझानी, काम-क्रोध वासना न आनी। (वैराग्य संदीपनी 60)
 सो जन जगत जहाज है, जाके राग न द्वेष। तुलसी तृष्णा त्यागि कै, गहै सील संतोष।। (वैराग्य संदीपनी 17)

9. अहम् शून्य वृत्ति
अहम् शून्य चित्त की अवस्था अध्यात्म जगत की सर्वोपरि अवस्था है और अहम् का दिव्यीकरण होना ही अहम् का विगलित होना है। इन अर्थों में निष्काम वृत्ति कालजयी परम उपलब्धि है। निष्काम होते ही काम राम हो जाता है और काम का गंतव्य भी राम होना ही है। फिर साधक उस असीम कार्यसत्ता के अंश से जुड़ जाते हैं। कैसा शुद्ध दैवीय समाधान है, जब दृष्टी में केवल परमात्मा ही रहता है। श्री कृष्ण ऐसी चित्त वृत्ति को गुणातीत कहते हैं -
 उदासीनवत, आसीनः, गुणैः, यः, न, विचालयते, गुनाह, वर्तन्ते, इति, एव, यः, अवतिष्ठति, न, इंगते।। (गीता 14/23)

 ऐसी सात्विक वृत्ति के लिए तुलसी --
 अति कोमल अति विमल रूचि, मानस में मल नाहिं। तुलसी रत मन हुई रहैं, अपने साहिब माँहिं। (वैराग्य संदीपनी 25)

10. माया से निर्लिप्त
 संतवृत्ति प्रलोभनों के पार की अवस्था है। ज्ञानी संत जानता है कि जगत का सारा सौंदर्य व् सुख क्षय और मृत्यु के आधीन है। उनकी कंचन और कांच, माटी सोना में अभेद दृष्टि है। ---समदुःखसुख, स्वस्थः, समलोष्टाश्मकांचन। तुल्यप्रियाप्रियः, धीराः, तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः।। (गीता 14/24)
 ठीक वैसा ही तो तुलसी लिखते हैं ---
 सम कांचन काँचै, गिनत शत्रु मित्र सम दोई । तुलसी या संसार में कहत संतजन सोई। . वैराग्य संदीपनी 31)

11. दुर्लभ संत
 ऐसे संत कितने दुर्लभ है --
 मनुष्याणां, सहस्त्रेषु, कश्चित्, यतति सिद्धये। यतताम, अपि, सिद्धानां, कश्चित्, माम, वेत्ति, तत्वतः।। (गीता 7/2)
 तुलसी के वचनों में समर्थन
 बिरले-बिरले पाइये, माया त्यागी संत। तुलसी कामी कुटिल काली, केकी केक अनंत।। (वैराग्य संदीपनी 32)

12. हे अर्जुन ! अनन्य चित्त भक्त नष्ट नहीं होता
 उसके योग-क्षेम और निर्वाह का दायित्व मेरा है। यदि तू आत्मार्थी से मोक्षार्थी होकर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होना चाहता है तो --मेरा हो जा --
 मन्मनाः भव, मद्भक्तः, मद्याजी, माम, नमस्कुरु, माम एव एष्यसि, युक्त्वा, एवम, आत्मानं, मत्परायणः।। (गीता 9/34)
 यही भाव संत तुलसी के हैं --
 अति अनन्य जो हरी को दासा, रटै नाम प्रतिदिन प्रति स्वासा। तुलसी तेहि समान नहीं कोई, हम नीके देखा जग कोई। (वैराग्य संदीपनी 13)
 मैं आनंदस्वरूप आत्मा हूँ, देह नहीं हूँ--यह तो ज्ञान है तथा सबकुछ प्रभु का है --यह भक्ति है। प्रतिबोध दे भगवन!
 गीता में अर्जुन का अमृत प्राशन श्री कृष्ण वचनों से करते हैं और वैराग्य संदीपनी में संत तुलसी का अमृतप्राशन उनके भावों में समाकर श्री राम करते हैं। अतः श्रीमद्भगवद्गीता और संत प्रवर तुलसी कृत वैराग्य संदीपनी में एकीभाव, एक तत्व और एक ही ज्ञान है।

 --राम-कृष्ण का अभेद स्वरूप, दोनों एक ही हैं।
 कृष्ण वाणी के वाचस्पति व् शब्दों के स्वामी है, तो राम धर्म के प्राण, प्रमाण और कर्मों के स्वामी हैं। कृष्ण के वचन अनुकरणीय हैं तो राम का जीवन अनुकरणीय है। गीता में श्री कृष्ण कि "रामः शस्त्रभृतामहं" (गीता 10/31) शस्त्रधारियों में, मैं ही राम हूँ। ब्रह्म स्वयं मुखरित होकर अपना भेद बताते हैं कि मैं अभेद हूँ। संत तुलसी ने --"विनय पत्रिका" में कृष्ण का स्वरूप कहीं-कहीं दर्शाया है, पर "श्रीकृष्ण गीतावली " में तो यह अभेद प्रत्यक्ष प्रगट होता है।
 वासुदेवः सर्वं --गीता का उद्घोष है
 तो
 सीय राममय सब जग जानी। --तुलसी की आत्मा का संकीर्तन है। ब्रह्म अद्वैत है।

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