वर्तमान परिप्रेक्ष्य में साहित्यकार की भूमिका

अलका सोनी

बर्नपुर, पश्चिम बंगाल

साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज में घट रही घटनाएँ और स्थितियाँ ही साहित्य में चित्रित होती है। एक जागरूक और सक्रिय साहित्यकार हमेशा समाज की नाड़ी को पहचान कर उपयुक्त उपचार की ओर प्रवृत्त होता है। साहित्यकार सबसे पहले एक सामाजिक प्राणी होता है जिसका साहित्य और समाज के साथ अन्योन्याश्रित संबंध होता है वे एक दूसरे से भाव, विचार सामग्री और प्रेरणा लेकर स्वयं को सजाया संवारा करते हैं।

अतः साहित्यकार को दोहरे दबाव में जीना और सृजनात्मकता की ओर प्रवृत्त होना पड़ता है। उसे साहित्य और समाज दोनों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाना पड़ता है। समाज में घटित हो रही घटनाओं की अनुभूति प्रत्येक व्यक्ति को होती है किंतु उसकी गहन अनुभूति एवं सजग प्रतिक्रिया एक साहित्यकार की सजग लेखनी द्वारा ही व्यक्त होती है। इस कारण वह जीवन समाज का अगुआ बन जाता है। इतिहास साक्षी है कि हर युग के साहित्यकार बड़ी सजगता से अपने दायित्वों का निर्वाह करते आए हैं।

इसे हम समसामयिक परिस्थितियों में अगर देखें तो पायेंगे कि वर्तमान में कोरोना से लड़ रहे जगत के लिए कवियों और लेखकों ने अपनी कलम के माध्यम से एक ऊर्जा, सकारात्मकता और जीवन के प्रति उम्मीद जगाने का पवित्र काम किया है। जिससे समाज के प्रति उनके दायित्वों का पता चलता है।

एक साहित्यकार का हृदय, मन, मस्तिष्क वीणा के कोमल तारों की तरह संवेदनशील होता है। जो समय और घटनाओं के हल्की सी छुअन से झंकृत हो उठता है। यह झंकार उसकी कला या साहित्य के रूप में अवतरित हो राष्ट्र या जातियों, संस्कृतियों की अमर धरोहर बन जाया करता है। साहित्यकार की मानसिकता युग सापेक्ष होने के साथ-साथ परंपराओं से भी रंजित होती है। वह अपने समकालीन जीवन का साहित्य में चित्रण करता है, साथ ही युग जीवन को नेतृत्व देकर पथ प्रदर्शन भी करता है। वह अतीत की उज्जवलता से प्रेरणा लेकर वर्तमान को गुंजायमान करते हुए भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है जब भी देश की संस्कृति स्वतंत्रता या राष्ट्रीयता खतरे में होती है तो युगीन साहित्यकार अपनी लेखनी द्वारा समाज में नव प्राण का संचार करता है।

साहित्यकार का यह पवित्र दायित्व होता है कि वह अपनी सभ्यता, संस्कृति और देश को भटकने न दे। अपनी वाणी द्वारा उसमें नए प्राणों का संचार करे। उसकी चेतना को जागृत एवं सक्रिय रखे।

डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का मानना था कि साहित्यकार को मनुष्यता का उन्नायक होना चाहिए। जब तक वह मानव मात्र के लिए नहीं लिखता तब तक वह अपने दायित्व से पलायन करता रहता है। राष्ट्र की सोई हुई विवेक शक्ति को जागृत करना साहित्यकार का बुनियादी लक्ष्य होता है। अपनी युगीन स्थितियों को साथ लेकर चलने वाले साहित्यकार सदैव प्रासंगिक बने रहते हैं।इतिहास साक्षी है कि जब भी कोई राष्ट्र अपने पथ से भटका है साहित्य ने ही उसे राह दिखाई है। जब कभी भी वह झुका साहित्यकारों ने ही उसका पुनरुत्थान किया है। जब हमारा देश पराधीन था, तब प्रेमचंद, दिनकर, निराला, भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे साहित्यकारों ने जनता के हाथ में जोश और ऊर्जा से भरी स्वतंत्रता की धधकती मशाल थमाई। इनकी रचनाएँ जितनी प्रासंगिक तब थीं उतनी ही आज भी है।

तुलसीदास का रामचरितमानस आज भी समाज को संदेश देता है। नीति, प्रीति, राजा और प्रजा के संबंध आज के इस दिशाहीन समाज से छूट चुके हैं। लेकिन मानस का यदि पाठ किया जाए और आत्मसात किया जाए तो आज भी समाज इस दिशा हीनता से उबर सकता है। साहित्यकार अपनी भूमिका से विचलित नहीं होते। वर्तमान पीढ़ी के साहित्यकार भी समाज एवं राष्ट्र को अपने उच्च विचारों से सुदृढ़ करने में लगे हैं।वर्तमान समय में इनकी भूमिका और विस्तृत हो गई है। इनकी कलम सामाजिक, धार्मिक उन्माद, भेदभाव, गरीबी अमीरी से उपजी सामाजिक पीड़ा के आक्रोश को कम करने के मुद्दे पर खूब चली है और आज भी निरंतर चल रही है। तुलसी के लोकमंगलकारी भाव अपने हृदय में बसाये आज भी रचनाकार सद्भावना, सभ्यता और संस्कृति को जीवित करते आ रहे हैं। यही वजह है जनसामान्य साहित्यकारों की रचनाओं में उनके व्यक्तित्व को ढूंढता है। रचनाकार वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध होता है।

आज अनेक पत्र पत्रिकाएँ नवोदित साहित्यकारों को ऑक्सीजन देकर उनका हौसला बढ़ा रही है। वर्तमान समय में भी कई अच्छे साहित्य का सृजन हो रहा है। सामाजिक क्षेत्र में प्रेमचंद के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सद्भावनापूर्ण वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समानता एवं न्याय, सामाजिक बुराइयाँ, गरीबी, देश को जोड़ने जैसे मुद्दों पर साहित्यकार कलम चलाने को वचनबद्ध हैं, परंतु आज साहित्यकार संकट के दौर से गुजर रहे हैं। इस संदर्भ में सरकार को भी कुछ सोचना चाहिए। उनके हित में कुछ कदम उठाने चाहिए। पाठकों तक साहित्य पहुंचे इसके लिए कुछ मदद करनी चाहिए।

अंधेरी रात चाहे कितनी भी लम्बी क्यों ना हो उसका सवेरा जरूर होता है। साहित्यकार आज भी प्रतिबद्ध है। समाज में आ रही निरन्तर गिरावट से वह थोड़ा परेशान जरूर है। समय के साथ सामंजस्य बिठाकर वह समाज, युवा और राष्ट्र को जागृत करने की दिशा में अग्रसर है। यही वक्त की मांग है और वर्तमान में साहित्यकार की भूमिका भी।

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