काव्य: शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
नवगीत 1. शहर में संभावना थी

गाँव छोड़ा इसलिए था,
शहर में संभावना थी,
चार रोटी तो मिलेंगी,
भट्ठियों में तन तपाकर।

पास के जलवायु में तो,
ईंट-भट्ठों का धुआँ था,
पेट भी था भाड़ सा, यह
अधभरा खाली कुआँ था,
मर गए उद्यम घरेलू,
थे पड़े पगडण्डियों पर,
जेठ की दोपहरियों में,
देह की हड्डी गलाकर।

कुछ दिनों तक साँस भटकी,
कोठियों की धूल, फाँकी,
गंदगी की नालियों में,
जिन्दगी की भूल, झाँकी,
खड़े पुल की गुटरगूँ में,
आस के दीये जलाए,
बुझ रहीं चिनगारियों से,
आँच चूल्हों की जलाकर।

अब समय की धाँधली से,
मन बहुत घबड़ा रहा है,
दाँत की रक्षा किया जो,
वह नहीं जबड़ा रहा है,
आँधियों के बीच आस्था
का हिमालय गल गया है,
लौट मैं घर चल पड़ा हूँ,
भूख की गठरी उठाकर।
***


नवगीत 2. जा रहे घर हम

घुट रहा है इस शहर में,
दैहिकी का दम,
जा रहे घर हम।

जेलचुंगी पर खड़ा है,
ले दरोगा डंड,
निर्दयी है और देता,
बिना लांछन दंड,
हाथ खाली, पेट भूखा,
और फिर कितने गिनाऊँ,
ये लगे क्या कम?

गाँव में है एक छोटी
छान, छोटा घेर,
काट लेते दिन पिताजी,
रोज गन्ना पेर,
साथ सोते पेड़-पौधों
के सघन हँसमुख बगीचे,
और ऋतु है नम।

खेत हरियल, है नयापन,
है टहलती वायु,
लोग कहते, रह यहाँ, है
गगन चढ़ती आयु,
सड़क पर कारें अबाधित,
तेज गति से दौड़ती हैं,
साथ चलता यम।

जल रहे पगडण्डियों पर,
दीपलट्टू आज,
निडर होकर चल रही है,
रात में भी लाज,
चोरबत्ती के बिना है,
साँझ का सावन अकेला,
दुम-कटा है तम।
***


नवगीत 3. राजमिस्त्री 

ईंट-गारा जोड़ता है,
प्रभा-मंडल
अगम पथ पर,
जिंदगीभर छोड़ता है,
किन्तु उसके पास कोई घर नहीं है।

साइकिल से दूरियों को,
नापता है वह अधिकतर,
राजगीरी का लिए पद,
साँस लेता युग-युगांतर,
देह को हरदम चलाता,
वह फफोले
पाँव में जो,
अँगुलियों से फोड़ता है,
किन्तु उसके पास कोई डर नहीं है।

कभी इसके, कभी उसके,
शहर का मुख चूमता है,
एक यायावर बना है,
हर जगह वह घूमता है,
काम से जो कुछ कमाता,
मेल से वह
भूल कर भी
नहीं नाता तोड़ता है,
किन्तु उसके पास कोई थर नहीं है।

राजमिस्त्री! लोग कहते,
राज उसका चल रहा है,
करनियों से, बसुलियों से,
पेट उसका पल रहा है,
धैर्य अनपढ़ हँस रहा है,
वह किसी के
सामने न,
हाथ अपना ओड़ता है
किन्तु उसके पास कोई जर नहीं है।
***


नवगीत 4. बूढ़ा चशमा

बूढ़ा चशमा, ढूँढ़ रहा है,
तले समोसे में,
इस जीवन का हल।

बुझी अँगीठी सुलगाती है,
एक रतौंधी साँस,
झूली चमड़ी और वक्ष की
रही यक्ष्मा खाँस,
चढ़ी कड़ाही में हँसती हैं,
ब्रेड पकौड़ों की,
गरम आँच के बल।

नहीं कहीं है ग्राहक कोई,
खड़े लोग कुछ दूर,
तना परिश्रम की आँखों की
सेवा का संतूर,
सोने का है एक बिछौना
और मुलायम है,
नम मिट्टी का तल।

आगे खुली कमीज की तरह,
देह सिली है शर्ट,
तनी हुई है एक अरगनी,
फटा टँगा है स्कर्ट,
थोड़ा-थोड़ा दीख रहा है,
बाल्टी में पानी,
जो है गंगाजल।

काली पड़ी पतीली में है,
नये समय की भूख,
खड़ा पास से देख रहा मग,
अंग गए हैं सूख,
बहा पसीना, झरना कोई,
धुआँधार वाला,
या है बहता नल
***


नवगीत 5. संबोधन पद

शब्दों को संबोधित करता
है, संबोधन पद!

वह समूह है,
है समूह से दूर,
चन्द्रप्रभा है,
चंदा है वह, पूर,
स्वयंसिद्ध! निर्धारित करता
है वह अपना, कद!

है लकीर वह,
अमल अलौकिक चिह्न,
वह विराम है,
किन्तु न डाला, विघ्न,
एक नाम है, है अनाम वह,
है वह बहता नद!

सजग जाग है
और आग है, धर्म,
वह वाणी है,
वीणा है वह, कर्म,
सब कुछ, लेकिन
कहीं न पाला, मद!

चुना हुआ है,
कुशल प्रबन्धक, श्रेय,
सार्थ विजेता,
है पुकार वह, प्रेय,
सरल सुचितई,
निपुण तत्व है, सद!

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