शिक्षा का भूमंडलीकरण

रवीन्द्र कुमार

रवीन्द्र कुमार

सारांशः- परिवर्तन अथवा बदलाव प्रकृत्ति का अटूट नियम है। इस बदलाव में ही नई संभावनाएँ निहित हैं और इन्हीं संभवनाओं की बदौलत ही मानवीय जीवन का अस्तित्व आदिकाल से वर्तमान तक बरकरार रहा है और कदाचित् भविष्य में भी रहेगा। बदलाव की इस प्रक्रिया में पुरानी चीजें, विचारधाराएँ, कार्य इत्यादि जो अपना कार्य समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप पूर्ण रूप से निभा चुके हैं, उन्हें अब पीछे हटना पडे़गा क्योंकि वर्तमान हालातों को सहन करना अथवा उनके अनुसार समस्याओं का समाधान निकालना अब इनके वश की बात नहीं है। नए मौसम के लिए नए पत्तों का निकलना आवश्यक है। नई मशीनों के लिए नए मकैनिक, नए औज़ारों की जरूरत रहेगी ही। यह बात आज समाज के प्रत्येक हिस्से पर लागू होती हैं। शिक्षा भी इसमें एक महत्त्वपूर्ण भाग है जिसमें समाज के बदलाव के साथ-साथ इसके उद्देश्यों, विधियों, शोधकार्यों इत्यादि में भी बदलाव वाँछनीय है। प्रक्रत्ति के इस नियम में हमारी भागीदारी भी समाज व मानवीय कल्याण हेतु कदाचित् अपनी विशेष भूमिका निभाती रहेगी और ऐसा होना चाहिए भी।


मुख्य शब्दः- वैश्वीकरण, तकनीकी यंत्रीकरण, पूर्वाग्रहों, वैश्विक चिन्तन, सूचना प्रौद्योगिकी, उदारीकरण,  अंतर्राष्ट्रीय स्कूल, डिजिटल लाईब्रेरी, ई-शिक्षा, वेबिनार इत्यादि।

              अभी तक हम देखते आ रहे हैं कि भारतीय इतिहास में शिक्षा के संबंध में जहाँ तक हमें इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं तब से लेकर आज तक हमने शिक्षा के प्रबंध, उसके उद्देश्य एवं उसकी नीतियों के संबंध में पढ़ा कि जैसे-जैसे वातावरण में अथव समाज में बदलाव आता रहा तब-तब शिक्षा के प्रत्येक पहलू में भी बदलाव आता रहा। किन्तु गौर करने वाली बात यह है कि बीसवीं शताब्दी के अस्सीवें दशक में पूरी दुनिया में एक घटना घटी जिसनेे सारी दुनिया के समाज पर अत्यंत गहरा प्रभाव डाला। इसे हम वैश्वीकरण अथवा भूमंडलीकरण कहते हैं। इसने शिक्षा के साथ-साथ समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपना सुदृढ़ प्रभाव जमाया। दुनिया के सभी देश इससे किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए।

 अर्थ एवं परिभाषाः-        

        ‘भूमंडलीकरण’ शब्द अस्सी के दशक में ही चलन में आया। इसका संधि-विच्छेद है भू+मंडलीकरण जहाँ भू का अर्थ भूमि और मंडलीकरण का अर्थ समाहित करना है। भाव यह कि दुनिया के सभी देशों के द्वारा अपनी भूगौलिक सीमाओं को खत्म करना और एक दूसरे का सहयोग देना। दरअसल इस शब्द की कोई निश्चित् परिभाषा नहीं है। मुख्य रूप से इसे पृथ्वी के सभी देशों को एक परिवार के रूप में मानकर आपसी मेल-मिलाप, आदान-प्रदान व सहयोग के रूप में लिया जाता है। यह आदान-प्रदान व्यक्तियों, विचारों, कलाओं, मूल्यों, त्योहारों, साजो-सामान, सूचनाओं, पूंजी, संस्कृतियों, तकनीकी विकास इत्यादि किसी भी रूप में हो सकता है। वैसे भारतीय धार्मिक ग्रन्थों में सम्पूर्ण विश्व को आदिकाल से एक परिवार की संज्ञा से प्रभाषित किया जा चुका है। सनातन धर्म में तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ मुख्य संस्कार के रूप में विख्यात है।

              भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव सन् 1980 से लेकर 2000 तक रहा। 1990 में इसने पूरा जोर पकड़ लिया था। बहुत सी विदेशी कम्पनियों ने भारत में अपना प्रभाव जमा लिया था। किन्तु इसके साथ ही भारतीय संस्कृति पर भी बहुत बड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ा। भारतीय लोगों में परम्परागत रूढ़ियों ने जगह छोड़नी शुरू कर दी थी। इस संबंध में अभय कुमार दुबे अपनी संपादित किताब ‘भारत का भूमंडलीकरण’ में कहते हैं कि “यह परिघटना इतनी व्यापक थी कि जीवन का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह सका। भारत के पुराने राष्ट्रवादी पूँजीपतियों से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी के व्यवसाय से बने नये उद्योपतियों तक; पब्लिक सेक्टर की चैधराहट के तले पनपे नौकरशाहों और सत्तारूढ़ रहने की आदत डाल चुके राजनेताओं से लेकर विपक्ष और असहमति की राजनीति में रचे बसे राजनैतिक दलों और जनपक्षीय आंदोलनकारियों तक; पिछड़ी जातियों, महिलाओं, शहरी गरीबों और दलितों के हितों में सोचने वालों से लेकर माक्र्सवादियों, नक्सलवादियों, आधुनिकता के आलोचकों, नागरिक अधिकारवादियों, गाँधीवादियों और पर्यायवरणवादियों तक को इस परिघटना के पक्ष-विपक्ष में राय बनानी पड़ी।”[i]  भाव यह कि वैश्वीकरण से समस्त भारतीय परिपेक्ष्य प्रभावित हुआ। विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव आज भी निरंतर जारी हैं। इसका असर शिक्षा पर भी होना वांछनीय था और बाकायदा हुआ भी।

1. शिक्षा में तकनीकी यंत्रीकरणः-

              भारतीय शिक्षा के इतिहास से हम भलीभांति अवगत हैं कि आदिकाल से ही शिक्षा समाज का एक बेहतरीन व अटूट हिस्सा रही है। पत्थरों पर उकेरी गयी चित्रलिपियों तथा पत्तों एवं पेड़ों की छालों पर लिखे गये ग्रंथों से लेकर 19वीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते कागज़ व कलम के इस्तेमाल से ढेरों किताबें लिखी जा चुकी थी। किन्तु वैश्वीकरण से भारतीय समाज का प्रत्येक वर्ग प्रभावित हुआ। शिक्षा के प्रत्येक आयाम पर भी इसका असर हुआ। सन् 1990 में राजीव गांधी की सरकार के दौरान ‘नई शिक्षा नीति’ पर बाखूबी कार्य चला। उस नीति में कम्प्यूटर को पहली बार शिक्षा में स्थान दिया गया। भाव यह कि जो बच्चे या अध्यापक विगत लम्बे समय से केवल किताबों-कापियों से शिक्षण कार्य करते आ रहे थे, वह अब कम्प्यूटर की मदद से बच्चों को पढ़ाएँगे। बच्चों के लिए भी यह एक नया अनुभव था। हालाँकि उस समय इस स्कीम को लागू करना स्वयं में ही एक बहुत बड़ी चुनौती थी। किन्तु यह वैश्वीकरण का असर था कि इसे शिक्षा जगत में लागू करना अनिवार्य था ताकि हम दुनिया की दौड़ में पीछे न रह जाएँ।

              इस प्रकार के तकनीकी विकास एवं यंत्रीकरण ने शिक्षा में एक नयी क्रांति ला खड़ी की हैं। यदि एक पल के लिए सोच भी लिया जाए हमें इन सभी उपकरणों का इस्तेमाल नहीं करना है तो चाहे हम कितने भी पढ़े-लिखे अथवा सूझवान हों, हम दूनिया के साथ नहीं चल पायेंगे।

2. हस्तलिखित बनाम प्रिंटिग प्रैसः-

              इस बात से कदापि इनकार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा ने मानव को फर्श से उठाकर अर्श पर बिठाया है। किन्तु इसके लिए मनुष्य ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। वैदिक काल में संस्कृत लिखित दोहों अथवा मंत्रों को पीढ़ियों दर पीढ़ियों ने निरंतर कंठस्थ किया है। फिर धीरे-धीरे पत्थरों, पत्तों तथा कपडे़ इत्यादि पर लिखने का कार्य लम्बे समय तक चलता रहा। कागज कलम की खोज ने इसमें बहुत तेजी ला दी थी जिसकी बदौलत संसार का बहुत सा ज्ञान अथवा जानकारी हम संरक्षित कर पाये। किन्तु प्रिंटिग प्रैस की खोज ने तो लेखन कला में एक ऐसा मोड़ पैदा किया कि समय की बचत करते हुए समस्त संसार का ज्ञान तथा जानकारी एक बहुत बड़ी गिणती में लगभग सभी लोगों की पहुँच तक संभव हो पाया। हालाँकि यह छापेखाने भारत में फैले वैश्वीकरण से बहुत पहले आ गये थे, किन्तु कम्प्यूटर के आने के बाद यह सारे छापेखाने कम्प्यूटर एवं बिजली से संबंधित हो गये और इससे किताबों के प्रकाशन में बेतहाशा वृद्धि हुई।

              आज कम्प्यूटराईज्ड प्रिंटिग प्रैसों की मदद से भारत के लगभग सभी अमुल्य ग्रंथों, धार्मिक पुस्तकों एवं विभिन्न पांडुलिपियों को किताबों के माध्यम से प्रकाशित करवा सदा के लिए सुरक्षित कर लिया है।

3. भाषाओं को आदान-प्रदानः-

                                         ‘निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल।

                                          बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

                                         विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

                                         सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

              हिन्दी साहित्य के आधुनिक युग के महान लेखक भारतेन्दु हरिशचन्द्र जी के कविता ‘निज भाषा’ से लिया गया यह प्रसिद्ध दोहा उस समय की समकालीन परिस्थितियों का परिचायक है। जब भारत गुलाम था और अंग्रेज भारतीयों पर तरह-तरह के जुल्मों की बारिश कर रहे थे। साथ ही वह भारतीय भाषाओं को दबा

 अंग्रेजी भाषा के प्रचार-प्रसार के अंतर्गत भारतीयों पर दबाव की स्थिति बनाये हुए थे। उस समय भारतेन्दु हरिशचन्द्र जी ने भारतीय लेखकों एवं पाठकों को दबाव मुक्त करने और अंग्रेजों को भारतीयों का अपनी भाषा के प्रति प्रेम, लगाव दिखाने के मकसद से यह शब्द कहे थे। किन्तु जैसा कि हम सभी जानते ही हैं कि बदलते समयानुसार प्रत्येक चीज़ अथवा वस्तु में परिवर्तन आना स्वाभाविक ही है। उसी प्रकार उस समय के हालातानुसार यह कविता पूरी स्टीक बैठती है।

              अब विदेशों में जाकर पढ़ने वाले बच्चे विभिन्न देशों की भाषाएँ सीख रहे हैं। अंग्रेज हिन्दी एवं संस्कृत सीखने भारत आ रहे हैं। भारत सरकार संसार के विभिन्न देशों से व्यापार अथवा अन्य प्रकार के संबंध कायम करने के मकसद से अनुवादकों की सहायता ले रही है। विभिन्न विश्व संगठनों में विभिन्न भाषाओं में भाषण हो रहे हैं। सन् 1977 में यू.एन. संयुक्त राष्ट्र के 32वें अधिवेशन में पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी जी ने हिन्दी में भाषण दिया जिसकी विश्वभर में प्रशंसा हुई। 72 वें अधिवेशन में नरेन्द्र मोदी ने भी हिन्दी में भाषण दिया।

              भाव यह कि वैश्वीकरण ने पूरे विश्व की भाषाओं को एक मंच पर ला दिया है। अपनी मातृ एवं राष्ट्रीय भाषाएँ तो लोग बोल ही रहे हैं, उनका संरक्षण भी कर रहे हैं किन्तु विदेशी तथा दूसरी भाषाओं को भी सीख रहे हैं।

4. हिन्दी भाषा और विदेशी शब्दः-

              भाषा के प्रत्येक विद्यार्थी को यह तो ज्ञात ही होता है कि विभिन्न प्रकार के वर्णों, शब्दों एवं वाक्यों का सुव्यवस्थित रूप ही भाषा का रूप अख्तियार करता है। जैसे-जैसे सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आता है उसी प्रकार उनके शब्दों में भी बदलाव आता है। यूँ भी कहा जा सकता है कि कठिन से सरलता की ओर जाने वाली मानवीय मानसिक प्रवृत्ति ने भाषा में बदलाव की प्रक्रिया में विशेष भूमिका निभाई।

              आज हिन्दी भाषा में अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं के शब्दों का समावेश हो गया है जो हम निरंतर इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि ऐसा नहीं है कि वह शब्द हिन्दी भाषा में नहीं है; हिन्दी भाषा में भी उससे संबंधित शब्द हैं। किन्तु हम अपनी सुविधा के अनुसार उनका अन्य भाषाओं में उच्चारण करते हैं। कुछ उदाहरणें निम्नलिखित हैं।

              1. हम रेलगाड़ी से जाएंगे।

              2. हम ट्रेन से जाएंगे।

                           3. हम अस्पताल गये।

                           4. हम हॉस्पिटल गये।

                                         5. क्या आपने दोपहर का खाना खाया?

                                         6. क्या आपने लंच किया?

              कहने का भाव यह कि इस प्रकार के बहुत बड़ी तादात में शब्दों का भण्डार है तो बाकायदा हिन्दी में मौजूद हैं किन्तु हम उनकी बजाए किसी अन्य भाषाओं के शब्दों का हिन्दी भाषा में इस्तेमाल करते हैं और यह प्रक्रिया इस प्रकार चल रही है कि अब तो यह महसूस होने लग गया है कि विभिन्न प्रकार के ऐसे अनेक शब्द हिन्दी भाषा के ही हैं।

              हिन्दी भाषा के बारे में यह बात बहुत पहले से ही प्रचलित थी कि यह विश्वस्तरीय विकास की दौड़ में भाग लेने में सामर्थ नहीं है। वैश्वीकरण की वजह से नयी जन्मी तकनीकी एवं यंत्रीकरण तथा विज्ञान की शिक्षा को हिन्दी भाषा के माध्यम से पढ़ाना  असंभव है। उनमें इन नये विषयों से संबंधित शब्दों को अभाव है। किन्तु हिन्दी भाषा ने समयानुसार स्वयं को बदला अथवा वैश्वीकरण की वजह से इसमें जो बदलाव आया उस वजह से बहुत से ऐसे शब्दों का हिन्दी भाषा में विलय हो गया जिस कारण अब यह सब नये विषय दूसरी भाषाओं में भी पढ़े जा सकते हैं।

              1. पाठ्यक्रम-----------------कोर्स------------ course

              2. स्वरूप--------------------पैटर्न-------------- pattern

              3. शिक्षा--------------------एज्यूकेशन-------- education

              4. कक्षा---------------------कलास------------- class

              5. अनुक्रमांक अंक----------रोल नं------------ roll no

              6. विभाग-------------------डिपार्टमैंट---------- department

              7. विज्ञान-------------------सांइस--------------- science

              8. प्रौद्यौगिकी--------------इंजीनियरिंग------ engineering

              9. रचनात्मक---------------फाॅरमैटिव--------- formative

              10. दरजाबंदी---------------ग्रेडिंग----------------- grading

 

              इनके अतिरिक्त भी हजारों ऐसे शब्द हैं जो हिन्दी भाषा में बकायदा मौजूद हैं जिनके आधार पर हम तकनीकी व विज्ञान जैसे विषयों के लिए इस्तेमाल किये जा सकते है। किन्तु हम उन्हें अंग्रेजी भाषा के शब्दों के उच्चारण के आधार पर ही हिन्दी वर्णों के इस्तेमाल से नया बना दिया है। यह सब भूमंडलीकरण का ही असर है।

5. भारतीय भाषाएँ और विदेशी विश्वविद्यालयः-

              सारे संसार में एक दूसरे देशों में प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा हो गई है जिस कारण अपने-अपने वर्चस्व को बचाने अथवा उसका अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार करने हेतु विभिन्न नीतियों को भी अमल में लाया गया। जिसके तहत विभिन्न देशों में कई तरह के समझौते हुए। शिक्षा के संबंध में भी यही हुआ। जिस कारण आज हमारे देश से बहुत बड़ी तादात में विद्यार्थी विदेश पढ़ने जाते हैं। बहुत से देशों से हमारे देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में बच्चे पढ़ने आते हैं जिस कारण लगभग सभी विश्वविद्यालयों में संबंधित भाषाओं की पढ़ाई करवाई जाने लगी।

              प्रत्येक भाषा की अपनी गरिमा होती है जिसके आधार पर प्रत्येक व्यक्ति अपने मूल्य एवं संस्कारों को जीवत रख पाता है। भारत की ओर से पंजाबी, हिन्दी व गुजराती भाषाएँ विश्व स्तर पर अच्छा कार्य कर रही हैं। ‘अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति’ विश्व स्तर पर भारत के लिए तथा हिन्दी भाषा की प्रगति हेतु निरंतर कार्याधीन है जो भारत की सभ्यता, संस्कृति, मूल्यों तथा इसके गौरव हेतु कार्य कर रही है। न्यू जर्सी के तो बहुत से स्कूलों में हिन्दी को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है।

              संसार के बहुत से देशों में प्रत्येक वर्ष भाषा के संबंध में चर्चाएँ, सम्मेलन अथवा कार्यशालाएँ चलाई जाती है जिस पर विभिन्न विद्वानों द्वारा उन्हें अपनाने एवं सुधार करने की स्थिति पर विचार-विर्मश होता है। अमेरिका में एक संस्था बनी हुई है जिसे American Council For Teaching Foreign Language  के नाम से जाना जाता है जिस पर संसार की विभिन्न भाषाओं के संबंध में चर्चा होती है। न्यू यार्क में भी ‘हिन्दी न्यास समिति’ भी हिन्दी भाषा और भारतीय सभ्यचार से संबंधित कार्यक्रमों को आयोजित करने में अपना विशेष योगदान देती आ रही है। साथ ही साथ पत्र-पत्रिकाओं को भी प्रकाशन निरंतर एवं निर्विघ्न जारी रखे हुए हैं जो भाषाओं के प्रचार-प्रसार, उनमें प्रगति तथा उनसे संबंधित विचारों, मूल्यों एवं संस्कारों को भी जीवित रखे हुए हैं।

6. साहित्यिक विधाओं का बदलता स्वरूपः-

              हमारे देश में जब से लिखने का कार्य शुरू हुआ है तब से लेकर आज तक इसमें समय-समय पर बहुत से बदलाव आते रहे हैं। आदिकाल से हम देखते आ रहे हैं कि उस समय प्रत्येक भारतीय भाषाओं में जितने भी ग्रंथ अथवा धार्मिक किताबें लिखी गई उन सभी को पद्य रूप में ही लिखा गया था। वह दोहे, चैपाई, कविता इत्यादि किसी भी रूप में हमें प्राप्त होते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह सभी गेय अथवा गायन की विशेष अवस्था ही धारण किये हुए थे और उनकी प्रस्तुति भी उसी प्रकार की थी।

              बदलते समानुसार साहित्य की इन विधाओं नें आधुनिक युग तक पहुँचते स्वयं में बहुत बदलाव कर लिया था। भारतेन्तु हरिशचन्द्र आधुनिकता के युग प्रवृतक माने जाते है। उन्होंने लम्बे समय के चली आ रही पद्य की कड़ी में गद्य की विभिन्न विधाओं  कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, आलोचना इत्यादि को जोड़ दिया था। भाव यह कि भारतेन्दु जी के कारण साहित्य की इन विधाओं का उद्भव और विकास हुआ। इन सभी विधाओं के आगमन तथा मुदृण कला के सहयोग से आधुनिक युग में इन सभी में बेतहाशा वृद्धि हुई।

              वैश्वीकरण के आरम्भ से आधुनिक युग की इन सभी विधाओं में भी बहुत परिवर्तन आया। यह परिवर्तन दो प्रकार से हुआ। एक तो जो परंपरागत विधाएँ चल रही थी उनमें परिवर्तन आया। जैसे कहानी के संबंध में छोटी कहानी का प्रसंग बहुत ही प्रचलित हुआ है। कविता के संबंध में खुली कविताएँ चल पड़ी हैं। उपन्यासों के आकार में परिवर्तन आ गया है। दूसरा यह कि इन विधाओं के अलावा भी पाश्चात्य की तर्ज पर बहुत सी नई विधाओं का भी उद्भव हुआ। इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं।

6.1- एकांकीः-

      आदिकाल से ही नाटक हिन्दी साहित्य की एक विशेष विधा रही है। किन्तु नाटक के किसी विशेष अंक को एकांकी कहा जाने लगा। यह विदेशी विधा है। इसे अंग्रेजी के ‘वन ऐक्ट प्ले’ शब्द के स्थान पर हिन्दी भाषा में एकांकी के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा।

6.2- प्रहसन अथवा कॉमेडीः-

      हिन्दी साहित्य के काव्य-शास्त्र में विभिन्न प्रकाण्ड पंडितों ने अपनी विलक्षणता के पुख्ता सबूत दिये थे। उनमें से भरत मुनि ने नाटक के संबंध में विश्व प्रसिद्ध किताब लिखी। उस समय काव्य को श्रव्य काव्य तथा दृश्य काव्य के रूप में बांट कर उसका भरपूर इस्तेमाल किया जाता था। डॉ. सत्यदेव चैधर तथा डॉ. शान्तिस्वरूप गुप्त अपनी किताब ‘भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र का संक्षिप्त विवेचन’ नामक किताब में काव्य के इन भेदों के बारे में कहते हैं कि “-दृश्य काव्य उसे कहते हैं जिसका अभिन्य किया जा सके, दूसरे शब्दों में, जिसे अभिनीत रूप में देखकर सह्नदय उसका आनन्द प्राप्त कर सकें। दृश्य काव्य को रूपक भी कहते हैं। -श्रवय काव्य उसे कहते हैं जिसका अभिन्य न हो सके, दूसरे शब्दों में, जिसे पढ़कर अथवा सुनकर उसका आनन्द प्राप्त कर सकें”[ii]   कहने का भाव यह कि वैसे तो प्रहसन काव्य का ही एक सुधरा हुआ रूप है। पहले दृश्य काव्य को प्रहसन के रूप में बहुत ही कम इस्तेमाल किया जाता था किन्तु वैश्वीकरण के कारण आज यह विधा बहुत ही उच्च स्तर पर प्रचलित है। आज बड़े-बड़े प्रोग्रामों में विशेष रूप से इसका प्रदर्शन होता है।

6.3- आलोचनाः-

               यह विधा भी आधुनिक युग की विधा है। भूमंडलीकरण के इस दौर में इसके प्रदर्शन में बेतहाशा वृद्धि हुई है। कारण यह कि अत्यंत सामाजिक परिवर्तन के परिपेक्ष्य में शिक्षा के संबंध में बहुत कुछ बदल रहा है जिस कारण बुद्धिजीवियों की बदोलत उसके विश्लेषण हेतु आलोचना अथवा समालोचना विधा भी प्रगति पर है।

6.4- रिपोर्ताजः-

              यह एक पाश्चात्य लेखन विधा है। अंग्रेजी भाषा के ‘रिपोर्ट’ शब्द से रिपोर्ताज शब्द का उद्भव हुआ। इसका अर्थ है आँखों देखी सच्ची घटना का निष्पक्षता से व्याख्यान करना। समाचार पत्रों में इसका खूब प्रयोग होता है। वैश्वीकरण के बाद इसमें अत्यधिक वृद्धि हुई है।

6.5- डायरी लेखनः-

              वैश्वीकरण के इस दौर में इस विधा ने बहुत तेज चाल से प्रगति की है। इसमें व्यक्ति अपने व्यक्तिगत अनुभवों को लिखता है। पश्चिमी देशों में इसके लिखने का चलन बहुत पहले से रहा है।

6.6- गल्प अथवा फिक्शनः-

              इसे कल्पना भी कहते हैं। भूमंडलीकरण के कारण तकनीक एवं यंत्रीकरण के बढ़ते दौर में जहाँ आँखों देखी घटनाओं के चित्रण या स्मृति पर आधारित घटनाओं के चित्रण में बढ़ोतरी हुई, वहीं गल्प अथवा फिक्शन में भी बहुत कार्य हुआ। ऐनीमेशन, फिल्में, कार्टून इत्यादि इसी के हिस्से हैं। आजकल तो यह एक बहुत बड़े स्तर पर व्यवसाय बना हुआ है।

6.7- साक्षात्कारः-

               किसी से भेंट कर उससे बातचीत करना अथवा स्वयं या किसी अन्य के द्वारा तैयार की गई प्रश्नावली के माध्यम से जवाब प्राप्त करना साक्षात्कार कहलाता है।  अप्रत्यक्ष रूप से यह कार्य चल तो बहुत पहले से रहा था। किन्तु इसका कोई निश्चित् आधार नहीं था। वैश्वीकरण के पश्चात् इसका एक निश्चित् आधार तैयार हुआ। इतना ही नहीं बल्कि अब तो इसके विभिन्न रूप तैयार हो चुके हैं। विभिन्न टी.वी. चैनलों, समाचार पत्रों, शोध-कार्य अथवा किसी भी प्रकार की जानकारी हेतु आज साक्षात्कार का महत्व बहुत बढ़ गया है।

6.8- व्यंग्यः-

              शिक्षा के क्षेत्र में यह एक ऐसी नई विधा है जिसमें कहीं न कहीं आलोचना की प्रवृत्ति छिपी रहती है। हास्य रस के कवि पिछले लम्बे समय से इस कार्य में संलग्न थे किन्तु उनमें केवल मनोरंजन का भाव रहता था। परन्तु आजकल आलोचना मिश्रित व्यंग्य चलता है। समाचार पत्रों एवं टी.वी. इत्यादि में अकसर

 राजनेताओं के खिलाफ हास्यास्पद विधि से कार्टून इत्यादि के रूप में अथवा दो या तीन पंक्तियों में लिखकर इसका प्रदर्शन किया जाता है।

7. विदेशी कम्पनियों के स्कूलः-

              भारतीय शिक्षा के इतिहास से जैसा कि हम सब इस बात से अवगत ही हैं कि इस भूखण्ड पर आदिकाल से लेकर ब्रिटिश काल के मैकाले मिनट तक सदा ही सरकार के हाथ में रही थी और सभी बच्चों के लिए इसे मुफ्त और लाज़मी किया हुआ था। किन्तु जैसा कि वर्णित है कि ब्र्रिटिश काल में शिक्षा देने के बदले फीस का भूगतान भी शुरू किया जाने लगा और इसके लिए निजी प्रयासों को भी महत्त्व दिया जाने लगा था किन्तु उस समय इस प्रकार के प्रयास सफल नहीं हो पाये थे। किन्तु वीसवी शताब्दी के आठवें दशक में जब से भारतीय अर्थव्यवस्था की हालात बिलकुल कमजोर हो गई थी। तब उदारीकरण की नीति ने विदेशी कम्पनियों को भारत आने को लालायित किया। सरकार ने कुछेक विभागों को छोड़कर बाकी सभी विभागों का निजीकरण कर दिया था। जिसमें शिक्षा भी एक थी। 1990 में इस निजीकरण ने तेजी पकड़ी और समस्त भारत के प्रत्येक हिस्से पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। तब से ही बहुत से ही धनी लोगों ने अपने-अपने स्कूल, कॉलेज और अन्य शिक्षण संस्थान खोले। बहुत सी विदेशी बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने बहुत बड़े व उच्च स्तर के स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की लड़ी को भारत के प्रत्येक हिस्सों में खोला।

              आज भी बहुत सी विदेशी और देशी कंपनियाँ समाज के अन्य क्षेत्रों की बजाए शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा कार्य कर रही हैं और व्यापार इत्यादि को छोड़ कर विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान खोलने में अपनी दिलचस्पी ले रही हैं। बहुत सी विदेशी संस्थाओं ने अंतर्राष्ट्रीय स्कूल खोले हैं जिनमें उच्च वर्ग अथवा धनी लोगों के बच्चे पढ़ते हैं। हालाँकि इनकी फीसें भी डालरों में ही अदा की जाती है। ताज़ा आंकड़ों की यदि बात की जाए तो भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों की गिनती में दिन-ब-दिन बढ़ोतरी होती जा रही है। 18 नवंबर,2019 को ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ में छपी एक खबर के अनुसार 2012 में इन स्कूलों की गिणती 313 थी जो 2019 में बढ़कर 708 हो गई है। इस गिनती के साथ भारत ने दुनिया में दूसरा स्थान हासिल कर लिया है। पहला स्थान चीन का है 

              कहने का भाव यह है कि भारत जैसे विकासशील देश में अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों का खुलना वैश्वीकरण का उच्च स्तर तक पहुँचने की स्थिति को दर्शाता है।

8. साहित्यिक विधाओं में भूमंडलीकरण की झलकः-

              मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यदि बात कही जाए तो सभी इस बात से सहमत व अवगत हैं ही, कि वातावरण का मानवीय जीवन पर पूरा प्रभाव पड़ता है। आदिकाल से ही बहुत से हमारे विद्वानों, पंडितों, साहित्यिकारों संतो-महात्माओं तथा बुद्धिजीवियों ने कहा था कि ‘संगत के फल लगता है’ कहने का भाव यह कि व्यक्ति जिस प्रकार की संगत में रहेगा उसी प्रकार उसे फल मिलता रहेगा।

              हमारे आस पास जो भी रहता है; जो भी घटित होता है उसका हमारे मन पर, हमारे व्यवहार पर पूरा असर पड़ता है। यही हाल वैश्वीकरण के पश्चात् हमारी साहित्यिक विधाओं का हुआ। आज हमारी साहित्यिक विधाओं में जो भी वर्णित हो रहा है वह है तो समय का भाव ही। इस पर हम किसी भी व्यक्ति विशेष पर दोषारोपण नहीं कर रहे हैं। किन्तु कहीं न कहीं यह बदलाव हमारी संस्कृति, हमारे नैतिक मूल्यों तथा हमारी सभ्यता पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर देती है। कबीर दास जी का दोहा हमने अभी पढ़ा जो लगभग आज से 600 वर्ष पूर्व लिखा गया था। समकालीन परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि सामाजिक हालात सही नही चल रहे हैं इसलिए मार्गदर्शन के दृष्टिकोण से मनुष्य को अवगत कराया गया है। आधुनिक युग में वैश्वीकरण के असर ने साहित्यकारों को भी झंझोड़ कर रख दिया है। वह भी उसी की ही बोली बोल रहे हैं।

              आधुनिक कवि लीलाधर जगूड़ी अपनी किताब ‘अनुभव के आकाश में चांद’ में अपनी कविता के माध्यम से कदाचित् यही कहने की कोशिश कर रहे हैं।

              “दुनिया माने पेट्रोल, मारुति कार, नयी दिल्ली

              दुनिया माने सातवाँ निर्गुट शिखर सम्मेलन?

              दुनिया माने शरणार्थी

              दुनिया माने तिब्बत और जनगण मन में सिंध

              दुनिया माने लक्ष्मीधर मालवीय की जापान से आती हुई चिट्ठी

              दुनिया माने पहाड़, समुन्द्र और रेगिस्तान

              ध्वस और बियाबान

              वरना दुनिया माने क्या ?”  [iii]

      इसी के साथ ही हिन्दी साहित्य के सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यासों को कौन नहीं जानता। समकालीन हालातों की दुर्दशा का वह स्टीक चित्रण किया है कि उस समय की पर्दा डालकर भी हम उस सच्चाई को छिपा नहीं सकते। चित्रण में भी ऐसे भावों का समावेश करवाया गया है कि पढ़ते-पढ़ते स्वयं को उसी परिस्थिति में पाते हैं। किन्तु आज यदार्थ चित्रण में ही वैश्वीकरण अपनी बाहें फैलाए खड़ा है जिससे भाव भी मुरझाए से लगते हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह अपने उपन्यास ‘रावी लिखता है’ में कदाचित् यही बयाँ करना चाहते हैं।

              “म्यूनिख, जर्मनी। होटल कांकर्ड। कमरा नम्बर 416। दोनों बहनें लेटी हैं। और एक-दूसरे को छेड़-छेड़कर खी-खी, खी-खी कर रही हैं। दोनों अपने बचपन के दिनों में लौट गई हैं।

               अपने दादा की पोती और अपने डैडी की बेटी माॅस्को से पहले वार्सा पहुँचती है। फिर छोटी-बहन को लेकर बर्लिन होती हुई म्यूनिख आ जाती है। वार्सा से छोटी बहन ने बहुत कहा कि कुछ घूमघाम लो और कुछ नहीं तो ‘ओल्ड टाउन’ ही देख लो। मगर इस लड़की ने एक न सुनी। म्यूनिख पहुँचकर भी इन्होंने कुछ खास नहीं देखा। इनके भाई गुल्लू ने चूँकि, शाम से पहले न पहुँच सकने की मजबूरी बताई थी-फोन पर, इसलिए दिन में ‘मेरी प्लात्स’ और ‘बीयर हॉल’ वगैरह नजदीक की जगहें देखकर ही दोनों लौट आई थीं।”  [iv]

              कहने का भाव यह है कि साहित्यिक विधाओं के शीर्षकों में तथा उनकी अंदर की सामग्री में भी वैश्वीकरण का पूरा असर आज हमें देखने को मिलता है।

9. पढ़ाई हेतु विदेशों का रुखः-

               वैश्वीकरण से सामाजिक दायरों में अत्यंत वृद्धि हुई है। पूरी दुनिया में लोगों के लिए व्यवसाय के साथ-साथ पढ़ने एवं घूमने-फिरने जैसे पर्यटन उद्योगों में भी वृद्धि हुई है। विदेशों से बहुत से लोग भारत के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण हेतु आगमन करते हैं। भारतीय भी प्रत्येक वर्ष घूमने के मकसद से विदेशों की सैर करते हैं। इसके साथ ही एक बहुत ही तेज़ी से बढ़ता हुआ रूझान विदेश में भारतीय बच्चों का पढ़ने हेतु जाना, नजर आ रहा है। वैश्वीकरण के कारण सभी देशों द्वारा नियमों में की गई ढील की कारण तथा विदेशों में पढ़ाई से अच्छे अवसरों की प्राप्ति हेतु इस प्रकार का रूझान मिल रहा है। वैसे इसके दो-तीन मुख्य कारण है जिसके आधार पर भारतीय बच्चे ऐसा कर रहे है।

              पहला तो यह कि हम मानते हैं कि वैश्वीकरण से भारत में शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विकास हुआ है किन्तु इसमें निजीकरण से भारतीय धनी लोगों ने इसे अपने एक व्यापार के रूप में ले लिया है। वह पढ़ाई के नाम पर केवल धन कमाने की लालसा लिए बैठे हैं जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता पर भी असर पढ़ रहा है।

              दूसरा यह कि निजीकरण से अप्रत्यक्ष रूप में भारत में भ्रष्टाचार का भी बहुत बड़े स्तर पर बोलबाला पैदा हो गया है। प्रत्येक सरकार इस पर नकेल डालने में विफल रही है जिस कारण शिक्षा के क्षेत्र में कुछेक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर कोई भी ऐसा संस्थान नहीं है जो विश्वस्तरीय हो। इसलिए बच्चे विदेशों की ओर रूख कर रहे हैं।

              तीसरा यह कि यहाँ के विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में किसी भी व्यावसायिक कोर्स में दाखिले संबंधी विभिन्न प्रकार की भ्रान्तियाँ एवं झोल हैं। प्रोफेश्नल कॉलेजों में मैरिट को छोड़कर मैनेजमैंट कोटे में फीस इतनी होती है कि जिससे बच्चे विदेशों में पढ़कर वापिस भी आ सकते हैं। इस प्रकार की नीतियों के तहत भारतीय बच्चों एवं उनके अभिभावकों में निराशा रहती है और वह अपने बच्चों को बाहर पढ़ने के लिए भेजने में अपनी दिलचस्पी दिखाते हैं।

                           भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय शिक्षा प्रणाली में बेहद बदलाव हुए है। विभिन्न प्रकार के कोर्स उत्पन्न हुए हैं। उच्च वर्ग के लोगों के लिए विदेशों में पढ़ने के अनेक अवसर प्राप्त हुए हैं जिससे रोजगार में भी वृद्धि हुई है।

10. ऑन-लाइन किताबें एवं ई-लाइब्रेरीः-

              शिक्षा प्रणाली के विभिन्न क्षेत्रों में आये बदलावों में से एक ही स्थान पर बैठकर दुनिया जहान की किताबों को पढ़ने की सुविधा भी बहुत की अनूठा, विलक्षण एवं सराहनीय कार्य है। इसे ई-लाइब्रेरी, ई-पुस्तकालय, डिजिटल लाइब्रेरी, इलेक्ट्रानिक लाइब्रेरी, वर्चुअल लाइब्रेरी, हाइब्रिड लाइब्रेरी इत्यादि के नाम से जाना जाता है। इससे शिक्षकों को, विद्सार्थियों को तथा अन्य पाठकों को किताबों की खोज में पढ़ने हेतु इधर-उधर भटकने तथा विभिन्न पुस्तकालयों में भ्रमण करने की अफरा-तफरी से पूर्णतःछुटकारा दिला दिया है। इस कदम से समय, मेहनत तथा धन की अत्यधिक बचत हुई है। आज लगभग प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय में कंप्यूटर की पढ़ाई के साथ ही इंटरनेट की मदद से ऑन-लाइन किताबों की सुविधा भी उपलब्ध है। पढ़ाई के दौरान यदि हमें सहायतावश किसी भी किताब अथवा जानकारी की जरूरत महसूस होती है तो पलक झपकते ही हम उसे प्राप्त कर सकते हैं। उसके लिए हमें पूरी एक किताब खरीदने अथवा पढ़ने की जरूरत नहीं होती। समय और मेहनत की भी बचत होती है। इसमें डाटा डिजिटल स्वरूप में कंप्यूटर में सुरक्षित रहता है और जरूरत पड़ने पर कभी भी एक्सेस किया जा सकता है।

              भारत में ऐसे बहुत से कार्यों को अच्छे तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। अलग-अलग संस्थाओं की मदद से भारत सरकार ने कई ऐसी वैब-साईट्स बना कर तैयार कर ली हैं जिनमें हजारों किताबें ऑन-लाइन पढ़ी जा सकती है। उन्हें डाउनलोड भी किया जा सकता है। ऐसी संस्थाएँ रोज़ाना पुरानी किताबों को स्कैन कर पी.डी.एफ सॉफ्टवेयर की मदद से वैब-साइट पर डाल रही हैं। जिनका पाठकगण एवं विद्यार्थी भरपूर लाभ उठा रहे हैं। किताबों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

              ‘नेश्नल डिजिटल लाईब्रेरी ऑफ इंडिया’      https://ndl.iitkgp.ac.in

               ‘दिल्ली पब्लिक लाईब्रेरी’                                dpl.gov.in

              ‘यूनिवर्सल डिज़िटल लाईब्रेरी’                          http://www.ulib.org

              ‘डिजिटल लाईब्रेरी ऑफ इंडिया’                  http://www.dli.ernet.in

              ‘डायरैक्ट्री ऑफ ओपन एक्सैस बुक्स’        http://www.doabooks.org

              ‘इंडिया एज्यूकेशन डिजिटल लाईब्रेरी’          http://www.edudl.gov.in

              ‘विज्ञान प्र्रसार डिज़िटल लाईब्रेरी’                 http://www.vigyanprasar.gov.in

              ‘ई पुस्तकालय’                                             epustakalay.com

             ‘कल्चरल हैरीटेज़ डिजिटल लाईब्रेरी इन हिन्दी

                                                                            http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/welcome.html

              इस के साथ भारतवर्ष में अनेक ऐसे ई पुस्तकालय हैं जो निरंतर किताबों को कंप्यूटर में डालकर पाठकों एवं विद्यार्थियों के लिए डिजिटल दौड़ में अपना भरपूर सहयोग दे रहे हैं।

              इन पुस्तकालयों से सबसे बड़ा फायदा दुनिया के सभी लोगों को इस प्रकार है कि जो किताबें बहुत पुरानी हो चुकी हैं और उनका नया संस्करण भी नहीं आ रहा है तो उन किताबों को स्कैन कर कंप्यूटर में डाल दिया जाता है जिससे वह सुरक्षित होकर सदा के लिए पढ़ने योग्य बनी रहती है। बहुत सी शिक्षण संस्थाएँ भारत सरकार की मदद से दिन-रात इस कार्य में जुटी हुई हैं।

              वैश्वीकरण के कारण पुस्तकालयों को ई-पुस्तकालयों में बदलना अथवा तबदील होना स्वयं में ही एक बहुत बड़ा विकासशील एवं सराहनीय कदम है। इस प्रक्रिया में अब तो और भी एक नया कदम आगे निकल कर आया है और वह है मोेबाइल में इंटरनेट की सुविधा। इससे तो अब ‘किताबें हमारी जेब में’ कहने में हमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जब भी जरूरत महसूस हुई। जेब से मोबाइल निकाला और मनचाही किताब, पेपर्स, इमेज, आर्टिकल्स, फाइल्स इत्यादि आपके हाथ में। इसके साथ ही सरकार इस संबंध में दिन-रात काम करके प्रतिदिन नए-नए एप्प, वैबसाइट्स तथा सॉफ्टवेयर ला रही है जिससे लोगों के समय की बचत हो सके और वह हर पल नई जानकार से अवगत हो पायें। अब तो डिजिटल लाइब्रेरी के अलावा बैंकों में डिजिटल लॉक्र, डिजिटल पेमैंट तथा डिजिटल हस्ताक्षर भी चलने लगे हैं।

11. टी.वी.चैनल बनाम कलास रूमः-

              लम्बी समयावधि के लेकर वर्तमान तक ऑल इंडिया रेडियो भारतीय लोगों के मनोरंजन का एक बहुत ही उम्दा साधन रहा है। समय-समय पर इसमें विभिन्न कार्यक्रम जुड़ते रहे हैं जिन्होंने लोगों के मनोरंजन के साथ-साथ सुचनाओं एंव शिक्षा संबंधी जानकारी भी मुहैया करवाई है। भारतीय दूरदर्शन के माध्यम से लोगों ने चित्रहार, रंगोली, रामायण, महाभारत जैसे प्रसारणों का भरपूर लाभ उठाया। भारत में टेलीविजन की शुरुआत 1959 में हुई। किन्तु राष्ट्रीय प्रसारण की शुरुआत भूमंडलीकरण के प्रारंभिक दौर सन् 1982 से ही शुरु हुआ। उस दिन से लोगों के मनोरंजन का एक नया साधन उनकी श्रेणी में दाखिल हो गया था।

              डी.डी.1: - कृषि प्रधान देश होने के कारण इसमें सबसे पहले डी.डी.1 पर ‘कृषि दर्शन’ नामक खेतीबाड़ी से संबंधित प्रोग्राम चलाया गया। यह प्रोग्राम आज भी निरंतर भारतीय किसानों को खेती से संबंधित जानकारी मुहैया करवाता आ रहा है। भारतीय किसानों के लिए मनोरंजन के साथ-साथ जानकारी प्राप्त करने का यह एक महत्त्वपूर्ण प्रोग्राम है। ‘ज्ञान-दर्शन’ भी दूरदर्शन का अत्यंत महत्त्पूर्ण प्रोग्राम चलाया गया था इसमें शिक्षा से संबंधित विशेष कार्यक्रम चलाए जाते थे।

              डी.डी.-2: - धीरे-धीरे भारत में लोगों की दूरदर्शन के प्रति बढ़ते लगाव को देखते हुए डी.डी.2 मैटरो नामक दूसरा चैनल लॉन्च किया गया।

              डी.डी.स्पोर्टसः- दिल्ली में ऐशियाई खेलों के सीधे प्रसारण हेतु डी.डी.स्पोर्टस चैनल की शुरुआत की गई जिससे खेलों से संबंधित लोगों के लिए यह चैनल बहुत स्टीक जानकारी मुहैया करवाई जाती थी।

              डी.डी.भारतीः- देश के सांस्कृतिक कार्यक्रम को लोगों तक पहुँचाने के लिए डी.डी.भारती चैनल की शुरुआत की गई जो कि अप्रत्यक्ष रूप से लोगों को जागृत करने तथा शिक्षित करने के माध्यम हेतु ही था।

              कोरोना जैसी महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिया। किसी न किसी प्रकार से प्रत्येक समाज का प्रत्येक वर्ग इससे किसी न किसी प्रकार से प्रभावित हुआ। किन्तु फिर भी कुछ नया निकल के आया। यदि हम यहाँ केवल शिक्षा के दृष्टिकोण से बातचीत करें तो हम पाते हैं कि स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय तथा अन्य सभी प्रकार के शिक्षण संस्थान बंद हो गये। तो कुछ समय पश्चात् किसी न किसी प्रकार से संचार प्रसारण प्रणाली के माध्यम से शिक्षा को निरंतर एवं निर्विघ्न रखने हेतु दूरदर्शन तथा अन्य निजी टी.वी.चैनलों ने अपने विभिन्न चैनलों के माध्यमों से विद्यार्थियों के पढ़ने के लिए ऑन-लाइन लैक्चरों एवं कलासों का प्रबंध किया।

              दूरदर्शन ने ‘स्वयंप्रभा’ नामक अपना एक नया चैनल लॉन्च किया जिसके तहत 32 चैनलों की एक लड़ी को प्रस्तुत किया जो शिक्षा संबंधी सामाग्री को बच्चों तक पहुँचाने का कार्य करती रही और कर भी रही है। इसी के साथ ही डिश टी.वी.चैनल की तरफ से भी चार चैनल शुरू किये गये। ऐयर टैल की तरफ से भी तीन शैक्षणिक चैनलों को लांच किया गया। वीडियोकॉन की तरफ से भी तीन चैनलों को लांच किया गया। टाटा स्काई की तरफ से भी दो शैक्षणिक चैनलों को भी लांच किया गया।

              कहने का भाव यह कि आज टी.वी.चैनल भी कहीं न कहीं कलास रूम की विशेष भूमिका निभा रहे हैं जो समय की बदलती हालात के अनुसार कहीं न कहीं वाँछनीय भी हैं।

12. वैबिनारः-

              समाज के बढ़ते दायरों को सुचारू रूप से चलाने हेतु इसमें दिन-ब-दिन नये प्रयोग होते ही रहते है। टैलीफोन की शुरुआत से पहले किसी ने सोचा भी न था कि ऐसे भी बात हो सकती है। फिर मोबाइल आए तो काम और भी आसान हो गए। दूर देशों में बैठे लोगों से पलभर में ही बातचीत हो जाती है।

              आज मोबाइल अथवा लैपटाॅप को इंटरनेट से जोड़कर बातचीत के दौरान आवाज के साथ-साथ हमारी फोटो भी स्क्रीन पर दिखाई देती है। इसी संदर्भ में कोरोना के लॉकडाउन ने तो घर बैठे सभी शिक्षण संस्थाओं के आचार्यों, प्राध्यापकों एवं अध्यापकों ने एक नया ऑन-लाईन कार्यक्रम शुरू किया जिसे ‘वैबिनार’ का नाम दिया गया। यह एक प्रकार की बहुत सारे व्यक्तियों की आपसी दूरी को बरकरार रखते हुए भी किसी भी मुद्दे पर कम्प्यूटर व इंटरनेट के माध्यम से आपसी बहस व बातचीत को साकार रूप दिया जाता है। इसके लिए किसी भी बातचीत अथवा बहस हेतु व्यक्तियों का किसी भी एक निश्चित् स्थान का होना अनिवार्य नहीं है।

              शब्दिक अर्थ की यदि बात की जाए तो यह अंग्रेजी शब्द ^WEBINAR* से बना है। इसका अर्थ है  WEB + SEMINAR  हिन्दी में इसका अनुवाद करें तो कहा जा सकता है कि इंटरनेट पर कोई भी संगोष्ठि

अथवा सेमिनार। इंटरनेट पर संगोष्ठी या सेमिनार से वेबिनार शब्द तक के सफर में भी मानव की कठिन से सरल की ओर चलने वाली प्रवृत्ति शामिल है। दरअसल यह शब्द ‘वैबसाइट वाले सेमिनार’ से कम होकर ‘वैबसाइट सेमिनार’ फिर इससे कम होकर ‘वेबसेमिनार’ इससे भी कम होकर आज ‘वेबिनार’ शब्द पर आकर रुक गया है। धीरे-धीरे यदि हमें यह भी कठिन लगने लगा तो पता नहीं इससे छोटा क्या होगा। खैर...

              हम बात कर रहे थे इंटरनेट की मदद से सेमिनार अथवा संगोष्ठि का आयोजन। इस अत्याधुनिक प्रक्रिया से संगोष्ठी अथवा सेमिनार का मुख्य उद्देश्य तो पूरा होता ही है। साथ ही साथ बहुत से अवाँछनीय बिंदुओं से छुटकारा भी मिल जाता है। मसलन, संगोष्ठि के लिए कमेटी का गठन करना; लोगों की गिणती के अनुसार उनका प्रबंध करना;उनके बैठने हेतु उचित जगह का प्रबंध करना, उनके आने जाने तथा व्हीकल्स की पार्किंग का प्रबंध करना। उनके चाय-पानी का प्रबंध करना;उचित म्यूज़िक सिस्टम का प्रबंध करना इत्यादि के अतिरिक्त भी ऐसे बहुत से कार्य है जो संगोष्ठि के मुख्य उद्देश्य के साथ सदा जुड़े रहते थे और कदाचित् अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित भी करते थे। किन्तु ‘वेबिनार’ नामक सुविधा से हम इन सभी अनावश्यक चीजों से छुटकारा पा चुके हैं।

              सारांश में कहा जा सकता है कि भारतीय शिक्षा के आदिकाल से आजतक के सफर के संदर्भ में बहुत कुछ परिवर्तित हुआ है। पत्तों एवं पत्थरों पर लिखने से लेकर वेबिनार तक के सफर में इसके उद्देश्यों में भी बहुत परिवर्तन आया है। वैश्वीकरण ने तो इसकी काया ही पलट दी है। भविष्य में भी आगे विभिन्न प्रकार के परिवर्तन की गुंजाइश बनी रहेगी।

पाद-टिप्पणियाँ/संदर्भ
[i] दूबे अभय कुमार, भारत का भूमंडलीकरण, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-22
[ii] चौधरी डॉ. सत्यदेव, गुप्त डॉ. शान्तिस्वरूप, भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र का संक्षिप्त विवेचन, अशोक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008, पृष्ठ-166
[iii] जगूड़ी लीलाधर, अनुभव के आकाश में चाँद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, पृष्ठ-70
[iv] बिस्मिल्लाह अब्दुल, रावी लिखता है, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृष्ठ-134

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