गाँधीजी, भारत का नमन!

- विनोद नायक

प्रिय बापू,

आपको कोटिश: नमन।


मैं आपको कैसे भूल सकता हूँ? शायद आप भी नही भूले होंगे। मेरे पैरों में जकड़ी जंजीरें, पीठ पर खाये अनगिनत कोड़े, मुँह से निकला खून और न जाने कितने असहनीय दर्द? मेरे हर दर्द को आपने महसूस किया है और दर्द को मिटाने के लिए आपने हर संभव प्रयास किये।


गाँधीजी, वो वक़्त आज मेरी आँखों के सामने झूलता है। जब नौजवानों के सीने गोलियों से छलनी किये जा रहे थे।धन-दौलत की लूट के साथ बहनों की अस्मिता लूटी जा रही थी। बच्चों को जिंदा दफनाया जा रहा था। हमारे बुजुर्गों को आजीवन बंदी बनाकर काम लिया जा रहा था। और तो और तब हमारी रूह काँप जाती थी। जब हमारे नौजवानों के सिर काट कर हमें सौंपे जाते थे। नन्हीं कन्याओं से दुराचार कर पैरों तले कुचला जाता था। दम न बचा था कि कोई भारत माता की जय कहे, वंदेमातरम के नारे लगा सके या इंकलाब जिंदाबाद कहे सके।

भुखमरी, गरीबी व कुपोषण से लोगों की जानें जा रही थीं। रोटी के नाम पर डण्डे व पानी के नाम पर आँसू पी-खाकर अपने प्राण बचाने को मजबूर थे। गाँधीजी यह तो मैंने कुछ नहीं व्यक्त किया। कई वर्षों तक गुलामी ही नही असहनीय दर्द को सहा है। उनके निशान आज तक मौजूद हैं।

गाँधीजी, सच में हमारी आने वाली पीढ़ी शायद ही विश्वास कर पायेगी कि - एक दुबली - पतली काया वाला इंसान अर्थात हांड-मांस -सा दिखने वाला व्यक्ति, भारतीयों में नवीन प्राण फूँक देगा। फिरंगियों को भारत छोड़ने को मजबूर कर देगा या फिर भारत को आजाद करा देगा।

गाँधीजी, नई पीढ़ी को विश्वास करना ही होगा क्योंकि - आज आपकी किरणों से विश्व सत्य और अहिंसा के महामंत्र से प्रकाश पाकर बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर रहा है।

जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप विश्व मंच से कहते हैं कि - हमें गाँधीजी के मार्ग पर चलकर शाँति प्राप्‍त होगी। यही नही जब देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि - मैं गाँधीजी के पथ पर चल रहा हूँ। और देश को गाँधीजी के सपनों का देश बनाना चाहता हूँ तब अवश्य नई पीढ़ी आपको जान ने के लिए उत्सुक होगी।

गाँधीजी, आपके विचारों से विश्व प्रगति पथ पर अग्रसर हो रहा है। उन्नति के शिखर को छू रहा है। आपके सिद्धान्तों से कदम से कदम मिलाकर विश्व के अनसुलझे रहस्यों को सुलझा रहा है। लेकिन बात यही आती है कि - ये हाड़-मांस के मानव में ऐसा क्या था? कितनों के मन में ये प्रश्न है? किसी को उत्तर मिल गया तो कुछ लोग अभी भी उत्तर तलाश रहे हैं। मैं उन सबको कागज़ व कलम के माध्यम से बताना चाहता हूँ कि - गाँधीजी कभी न डूबने वाला सूर्य है जो विश्व को सदैव अपने सद्गुणों से प्रकाशित करते रहेंगे।

गाँधीजी, मुझे याद आता है आपका बचपन जब नन्हा मनु, अपनी माँ पुतलीबाई का आँचल थामे, मंदिर में प्रवेश कर, नरसी मेहता के भजन "वैष्णव जन तो तेने कहिए रे पीर पराई जाणे रे।" में खो जाता था। और घर आकर माँ से पूछता था - " माँ, ऊका भैया को लोग क्यों नही छूते? क्यों लोग उनसे शौच साफ करवाते हैं?, क्यों लोग उनसे घृणा करते हैं? जब सब हरि के जन हैं तो ऐसा भेदभाव क्यों?"

यही नही मनु के मन मस्तिष्क पर उस समय गहरा प्रभाव पड़ा जब माँ के साथ राजा हरिश्चन्द्र नाटक देख कर सत्य निष्ठा की प्रेरणा लेकर पूरा जीवन सत्य-अहिंसा से जीने की प्रतिज्ञा कर ली।पूरी दुनिया को बताया कि - नन्हा मनु से लेकर महात्मा तक कैसे सत्य-अहिंसा का पालन कर, मात्-पिता, समाज व देश की सेवा कर सकता है।

गाँधीजी, आपने ही बताया कि - सत्य यह है कि - ईश्वर है। लेकिन हमें अपना कर्म तो सत्य निष्ठा से ही करना होगा। तभी लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।

गाँधीजी, यही नही उस समय अपने अध्यापक का मन जीत लिया था। जब शाला निरीक्षण के दौरान आपको परीक्षा में कुछ शब्द लिखने को दिये थे और अध्यापक आपको इशारे से स्पेलिंग सही बताने का प्रयास कर रहे थे लेकिन आप थे कि गलत शब्द लिख कर बैठे थे। फिर आपको बार-बार बताने पर भी आपने नकल नहीं की तो आपके अध्यापक परीक्षा के बाद आपके व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित और खुश हुए थे।

गाँधीजी, आपने माँ के मन के अंदर बैठे भय को भी उस समय दूर कर दिया था। जब माँ के सामने सौगन्ध ली थी कि - मैं विदेश अवश्य जा रहा हूँ माँ, लेकिन तू जिस बात से डर रही है, मैं सौगन्ध लेता हूँ - मैं, मांस-मंदिरा का कभी सेवन नही करुँगा। चोरी, झूठ व बेईमानी से सदा बचूँगा। माँ को दी सौगन्ध का आपने सदा पालन किया।
स्वालंबन का पाठ आप से अच्छा भला कौन सिखा सकता है। शिक्षा के दौरान अपना काम स्वयं करना। कपड़े धोना, प्रेस करना, साफ-सफाई, झाड़ू आदि लगाना आप स्वयं ही करते थे।

यही नही आप ने अपने आश्रम के नियमों के मुताबिक अपनी पत्नी कस्तूरबाजी को भी कड़े शब्दों में कह दिया था कि- अगर आश्रम में रहना है तो अपनी शौचालय स्वयं को ही साफ करनी होगी वरना आश्रम छोड़ सकती हो। यहाँ रहने वाले सभी लोगों के साथ यही नियम है। बा ने आपसे कहा था कि - मैं आपकी पत्नी हूँ। तब आपने कहा था - तब तो और भी आवश्यक हो जाता है। तब बा ने कहा था कि - लेकिन ये काम तो नीची जाति का है। आपने मुस्कुराकर कहा था - कोई काम ऊँचा या नीचा नही होता। काम तो काम होता है। अपना काम स्वयं करना चाहिए अगर नही कर सकती हो तो तुम आश्रम छोड़ सकती हो। बा को आखिर स्वीकारना ही पड़ा।

गाँधीजी आप स्वयं प्रात:काल जागकर, व्यायाम करना, साफ-सफाई करना, कपड़े धोना, कई किलोमीटर पैदल यात्रा करना, स्वयं की मालिश करना, स्वअध्ययन, चिंतन-मनन व आध्यात्म को समझने का काम नित्य करते थे। साथ ही साथ सभी काम निश्चित समय पर।

गाँधीजी इसी बात से मुझे वो घटना याद आती है। जब एक महिला अपने बच्चे को साथ में लेकर आपके आश्रम आई थी।आपके चरण छू कर कहा था - बापू, ये मेरा बेटा है। बहुत गुड़ खाता है। आप इसके गुड़ खाने की अादत छुड़वा दीजिए।आप ने हाथ जोड़ कर कहा था - एक माह बाद आना।


जब वो महिला एक माह बाद आई तो आपने कहा - तीन माह बाद आना। जब वो महिला तीन माह बाद आई तो
आपने कहा - कहिये क्या बात है?


महिला ने फिर वही समस्या दौहराते हुए कहा - ये गुड़ खाना नही छोड़ता।

गाँधीजी आपने कहा - जब मुझे गुड़ खाने की आदत छोड़ने में चार माह लग गये फिर तो ये छोटा बच्चा है। ये इतनी जल्दी कैसे छोड़ सकता है? और जब मैं खुद गुड़ अधिक खाता हूँ तब मैं दूसरे को गुड़ खाने से कैसे मना कर सकता हूँ? लेकिन अब मैंने गुड़ खाना छोड़ दिया है। बेटा, तुम भी आज से गुड़ खाना छोड़ दो।

आपकी बात सुनकर बच्चा समझ गया। उसने भी गुड़ खाना छोड़ दिया।

गाँधीजी, आपने देश को आजाद करने के लिए भारत के जन-जन को जोड़ा। लोगों में आजादी के प्रति अपना सब कुछ झौंक देने की बात कही।लेकिन जब एक किसान के खेत में आप गये तो किसान खेत में फसल को पानी दे रहा था। कीचड़ में सने पैरों के ऊपर एक घुटने तक की छोटी-सी धोती लपेटे व तन पर कुछ न था। वह आपके पास आकर प्रणाम किया तो आपने बोला - देश आजाद कराने में आपका सहयोग चाहिए। तब किसान ने हाथ जोड़ कर कहा - गाँधीजी मैं तो सहयोग करुँगा, लेकिन आप इन सूट-बूट में देश आजाद नही करा सकते। अगर देश को आजाद कराना है तो किसानों के मन को समझो।

गाँधीजी, आपने उसी पल सौगन्ध ली कि - मैं जब तक पूरे भारतवासियों के तन पर वस्त्र न ढ़क दूँ। तब तक मैं आपके वेश में ही रहूँगा और आपने उसी पल अपने वस्त्र त्याग कर एक धोती जीवन भर के लिए धारण कर ली।
गाँधीजी, आपने देशवासियों का मन ऐसा जीता कि - आपके लम्बे-लम्बे कदमों के पीछे हजारों कदम दौड़ते थे। विदेशी कपड़ों की होली हो या फिर नमक कर कानून भंग करना, असहयोग आंदोलन हो या फिर पूर्ण स्वराज की माँग, गली-मोहल्ला व सड़कों पर देशभक्तों का हुजूम उमड़ जाता था। यह आपकी असाधारण शक्ति का ही परिणाम था आपने सदा देशहित में निर्णय लिए, जिसके कारण अनेकों बार जेल जाना पड़ा। कई तरह की यातनाएँ झेलीं लेकिन हार कभी न मानी। आप जिस पथ से गुजरे, आपके पीछे भारी जनसैलाब ही नही अपितु विद्वान् देशभक्त गोपालकृष्ण गोखले, वीरसावरकर, सुभाषचन्द्रबोस, लाला लाजपत राय, लोकमान्य बालगंगाधर टिळक, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, रामप्रसाद विस्मिल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मोतीलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, ऐनी बीसेंट और न जाने कितनी हस्तियों ने अपने प्राण मातृभूमि को अर्पण कर दिये। इन नेताओं ने आपके नियमों और सिद्धान्तों को ह्रदय से गले लगाया और देश को आजाद करने में अपना सब कुछ अर्पित कर दिया।

गाँधीजी, अब मैं अपने मुद्दे पर आऊँ, मैं अभी तक अपने व्यक्तिगत विकास में लगा रहा। इसलिए आपको याद न कर सका। वैसे भी जब व्यक्ति सुखी होता है तब वह कम ही याद करता हेै। लेकिन आपको आपको जानकर आनंद अनुभव होगा कि - मैंने बहुत विकास कर लिया है। देश में बिजली, पानी, रोटी, कपड़ा, शिक्षा व मकान जन-जन तक पहुँच रहे हैं। पक्की सड़कें व रेल व रेल सुविधाएँ बढ़ गई हैं। सैनिक व किसानों को बढावा व आत्मविश्वास मिल रहा है। लोग रोजगार पाकर खुश हैं। और तो और धारा 370 व 35 -A जम्मू-कश्मीर से हटाकर अखंड भारत का स्वप्न साकार हो गया है। जन-जन स्वच्छ भारत के लिए अपना तन-मन-धन से योगदान दे रहा है। प्लास्टिक मुक्त व गंदगी मुक्त राष्ट्र बनाया जा रहा है। गाँव-गाँव तक शौचालय का निर्माण हो गया है। महिलाओं व बच्चों को विशेष अधिकार मिल रहे हैं।मैं इन सब कार्यों से अति उत्साहित व प्रसन्न हूँ और फल-फूल कर विश्व को अपनी शक्ति देकर ऊर्जावान व उन्नत बनाना चाहता हूँ । इन्हीं शब्दों के साथ, मैं भारत, गाँधीजी आपको शत्-शत् नमन करता हूँ।

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