नई शिक्षा नीति-2020: एक संकल्प यंत्र से मानव बनाने की ओर

 डॉ. रमेश कुमार

सह आचार्य, प्रारम्भिक शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, दिल्ली
व्यक्तिगत शक्तिओं का विकास करना शिक्षा के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य है। चूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए व्यक्तित्व का विकास समाज के अनुसार होना चाहिए। इसमें हमें समाजिक मूल्यों एवं सिद्धांत को अपने शिक्षा में स्थान अनिवार्य रूप से देना चाहिए। शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री लेना कतई नहीं है। यह तो जीवन को समझने वाला एक ऐसा साधन है, जिसके बिना हम एक पल के लिए भी जी नहीं सकते। यह मनुष्य के चरित्र को पवित्र व सुंदर बनाता है। यह हमें प्रकृति के अनुसार लचीला, परिवर्तनशील व अनुकूलित बनाने का प्रशिक्षण देता है। यह सब कुछ निर्भर करता है शिक्षा नीति पर। शिक्षा नीति जितनी सशक्त और दूरदृष्टियुक्त होगी वह देश उतना विकास करेगा। भारत में सन् 1968 और 1986 के बाद वर्ष 2020 में तीसरी बार नई शिक्षा नीति लागू की जा रही है। वर्तमान में आयी नई शिक्षा नीति-2020  (NEP-2020) पिछली दो नीतियों की तुलना में अत्यंत महत्वाकांक्षी व दूरगामी परिणामों का सफलता संकल्प है। ऐसा इसलिए की यह शिक्षा में बुनियाद से लेकर उच्च स्तर तक के परिवर्तनों के बारे में कथनी की तुलना में करनी को महत्व देती है। स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर तक सबके लिए एक समान पहुँच सुनिश्चित करने पर जोर देती है। स्कूल छोड़ चुके बच्चों को फिर से मुख्य धारा में शामिल करने के लिए स्कूल के बुनियादी ढांचे का विकास औरर नवीन शिक्षा केंद्रों की स्थापनी पर बल देती है। इस नई शिक्षा नीति में छात्रों और उनके सीखने के स्तर पर नज़र रखने, औपचारिक और गैर-औपचारिक शिक्षा सहित बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुस्तरीय सुविधाएँ उपलब्ध कराने, परामर्शदाताओं या प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्कूल के साथ जोड़ने, कक्षा 3, 5 और 8 के लिए एनआईओएस और राज्य ओपन स्कूलों के माध्यम से ओपन लर्निंग, कक्षा 10 और 12 के समकक्ष माध्यमिक शिक्षा कार्यक्रम, व्यावसायिक पाठ्यक्रम, वयस्क साक्षरता और जीवन-संवर्धन कार्यक्रम जैसे शक्तिशाली दृढ़ संकल्प हैं। एनईपी-2020 के तहत स्कूल से दूर रह रहे लगभग 2 करोड़ बच्चों को मुख्य धारा में पुनः जोड़ने के प्रति दृढ़ संकल्पित है।

प्रस्तावना
सामान्य शब्दों में नई शिक्षा नीति हमें यह बताती है कि बच्चे कब तक स्कूलों में पढ़ेंगे, कितने सालों का स्नातक करेंगे, बोर्ड की परीक्षाएँ किस-किस कक्षा में और कब-कब आयोजित की जाएगी, के बारे में बताती है। इन नियमों की एक नई नीति वर्तमान सरकार लेकर आई है, जिसे न्यू एजुकेशन पॉलिसी-2020 यानी नई शिक्षा नीति-2020 नाम दिया गया है।

नई शिक्षा नीति 2020 के ड्राफ्ट को 29 जुलाई को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दी। इसका निर्माण कार्य 31 अक्तूबर, 2015 के दिन आरंभ हुआ। तत्कालीन सरकार ने पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यन की अध्यक्षता में पांच सदस्यों की कमिटी बनाई। कमिटी ने अपनी रिपोर्ट दी 27 मई, 2016 को सौंपी। इसके बाद 24 जून, 2017 को इसरो के प्रमुख रहे वैज्ञानिक के. कस्तूरीगन की अध्यक्षता में नौ सदस्यों की कमेटी को नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। 31 मई, 2019 को ये ड्राफ्ट एचआरडी मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को सौंपा गया। ड्राफ्ट पर एचआरडी मंत्रालय ने लोगों के सुझाव मांगे थे। इस पर दो लाख से ज्यादा सुझाव आए। और इसके बाद 29 जुलाई को केद्रीय कैबिनेट ने नई शिक्षा नीति के ड्राफ्ट को मंजूरी दे दी।  

शिक्षा नीतिः परिवर्तन की आवश्यकता
शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने, नवोन्मेष और शोध को बढ़ावा देने और देश को ज्ञान का सुपर पॉवर बनाने के लिए नई शिक्षा नीति की आवश्यकता पड़ी है। अभी देश में जो शिक्षा नीति चल रही है, वह 34 साल पहले 1986 में राजीव गांधी सरकार के दौरान लागू की गई थी। शिक्षा नीति में परिवर्तन, स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर तक सबके लिए एक समान पहुँच सुनिश्चित करने, नवोन्मेष व शोध की संभावना तथा रट्टेदार शिक्षा के स्थान पर जीवनोपयोगी शिक्षा देने को ध्यान में रखकर की गयी है। इतना ही नहीं स्कूल छोड़ चुके बच्चों को फिर से मुख्य धारा में शामिल करने तथा स्कूल के बुनियादी ढांचे का विकास और नवीन शिक्षा केंद्रों की स्थापना भी इसके प्रमुख उद्देश्य हैं। 

एनईपी-1986 और एनईपी-2020 में अंतर
पहले जहाँ शिक्षा को सुनिश्चित करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय चलाया जाता था उसका नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्त से लेकर सन् 1985 तक शिक्षा मंत्री और शिक्षा मंत्रालय ही हुआ करता था, किंतु राजीव गांधी सरकार ने इसका नाम बदलकर मानव संसाधन मंत्रालय कर दिया था। 

एनईपी-1986 की तुलना में नई शिक्षा नीति 2020 अत्यंत व्यापक, लचीली और संकल्पबद्ध है।  3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए आँगनवाड़ी/बालवाटिका/प्री-स्कूल के माध्यम से मुफ्त, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण ‘प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा’ (Early Childhood Care and Education- ECCE) की उपलब्धता सुनिश्चित करना। वहीं 6 वर्ष से 8 वर्ष तक के बच्चों को प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा-1 और 2 में शिक्षा प्रदान की जाएगी। प्रारंभिक शिक्षा को बहुस्तरीय खेल और गतिविधि आधारित बनाने को प्राथमिकता दी जाएगी।
एनईपी-2020 में शिक्षा मंत्रालय द्वारा ‘बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन’ (National Mission on Foundational Literacy and Numeracy) की स्थापना की जाएगी। इतना ही नहीं राज्य सरकारों द्वारा वर्ष 2025 तक प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा-3 तक के सभी बच्चों में बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान प्राप्त करने हेतु इस मिशन के क्रियान्वयन की योजना तैयार की जाएगी।

• भाषाई विविधता को बढ़ावा और संरक्षण
एनईपी-2020 में कक्षा-5 तक की शिक्षा में मातृभाषा/ स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को अध्यापन के माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया गया है, साथ ही इस नीति में मातृभाषा को कक्षा-8 और आगे की शिक्षा के लिये प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है। स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिये संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होगा परंतु किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी। बधिर छात्रों के लिये राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पाठ्यक्रम सामग्री विकसित की जाएगी तथा भारतीय संकेत भाषा (Indian Sign Language- ISL) को पूरे देश में मानकीकृत किया जाएगा।  NEP-2020 के तहत भारतीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिये एक ‘भारतीय अनुवाद और व्याख्या संस्थान’ (Indian Institute of Translation and Interpretation- IITI), ‘फारसी, पाली और प्राकृत के लिये राष्ट्रीय संस्थान (या संस्थान)’ [National Institute (or Institutes) for Pali, Persian and Prakrit] स्थापित करने के साथ उच्च शिक्षण संस्थानों में भाषा विभाग को मज़बूत बनाने एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन के माध्यम से रूप में मातृभाषा/ स्थानीय भाषा को बढ़ावा दिये जाने का सुझाव दिया है। 

• नवीन शिक्षा व्यवस्था का प्रारूप
अभी हमारी स्कूली व्यवस्था 10+2 है। यानी 10वीं तक सारे सब्जेक्ट और 11वीं में स्ट्रीम तय करनी होती है। अब यह व्यवस्था बदलकर 5+3+3+4 कर दी गयी है। 3 से 6 साल के बच्चों को अलग पाठ्यक्रम तय होगा, जिसमें उन्हें पाठ्यक्रम के तौर पर खेल को अनिवार्य कर दिया जाएगा। इसके लिए अध्यापकों के अलग से प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। कक्षा एक से तीन तक के बच्चों को यानी 6 से 9 साल के बच्चों को लिखना पढ़ना आ जाए, इस पर खास ज़ोर दिया जाएगा। इसके लिए नेशनल मिशन शुरू किया जाएगा।  

वहीं कक्षा 6 से ही बच्चों को वोकेशनल कोर्स पढ़ाए जाएँगे, यानी जिसमें बच्चे कोई स्किल सीख पाए। बाकायदा बच्चों की इंटर्नशिप भी होगी, जिसमें वो मेकैनिक अथवा तकनीक आधार कोई कार्य सीख सकता है। इसके अतिरिक्त छठी कक्षा से ही बच्चों का शिक्षण परियोजना आधारित होगा। कोडिंग सिखाई जाएगी।  इसमें स्कूल के आखिर चार साल यानी 9वीं से लेकर 12वीं तक एकसमान माना गया है, जिसमें सब्जेक्ट गहराई में पढ़ाए जाएँगे, लेकिन स्ट्रीम चुनने की जरूरत नहीं होगी मल्टी स्ट्रीम पढ़ाई होगी। रसायन शास्त्र का छात्र चाहे तो भूगोल भी पढ़ पाएगा। या कोई अतिरिक्त पाठ्यक्रम गतिविधि जैसे- संगीत या कोई खेल है, तो उसे भी एक विषय के रूप में चयन कर सकेगा।  

सभी बच्चे 3, 5 और 8 की स्कूली परीक्षा देंगे। ग्रेड 10 और 12 के लिए बोर्ड परीक्षा जारी रखी जाएँगी, लेकिन इन्हें नया स्वरूप दिया जाएगा। एक नया राष्ट्रीय आकलन केंद्र ‘परख’ स्थापित किया जाएगा। इतना ही नहीं स्कूलों के सिलेबस में बदलाव किया जाएगा। नए सिरे से पाठ्यक्रम तैयार किए जाएँगे और वो पूरे देश में एक जैसे होंगे। जोर इस पर दिया जाएगा कि कम से कम पांचवीं क्लास तक बच्चों को उनकी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाया जा सके। किसी भी विद्यार्थी पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जाएगी। भारतीय पारंपरिक भाषाएँ और साहित्य भी विकल्प के रूप में उपलब्ध होंगे। स्कूल में आने की आयु से पहले भी बच्चों को क्या सिखाया जाए, ये भी अभिभावक को बताया जाएगा। जहाँ तक सवाल स्नातक का है तो अभी बीए, बीएससी जैसे ग्रेजुएशन कोर्स तीन साल के हैं। अब नई वाली पॉलिसी में तो कई तरह के विकल्प होंगे। जो नौकरी के लिहाज से पढ़ रहे हैं, उनके लिए 3 साल का ग्रेजुएशन। और जो रिसर्च में जाना चाहते हैं, उनके लिए 4 साल का ग्रेजुएशन, फिर एक साल पोस्ट ग्रेजुएशन और 4 साल का पीएचडी। एमफिल की जरूरत भी नहीं रहेगी। एम फिल का कोर्स भी खत्म कर दिया गया है।

प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर तक सबके लिए एकसमान पहुँच सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाएगा। स्कूल छोड़ चुके बच्चों को फिर से मुख्य धारा में शामिल करने के लिए स्कूल के इन्फ्रॉस्ट्रक्चर का विकास किया जाएगा। साथ ही नए शिक्षा केंद्रों की स्थापना की जाएगी। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत स्कूल से दूर रह रहे लगभग 2 करोड़ बच्चों को मुख्य धारा में वापस लाने का लक्ष्य है। बोर्ड की परीक्षाओं का अहमियत घटाने की बात है। साल में दो बार बोर्ड की परीक्षाएँ कराई जा सकती हैं। बोर्ड की परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ प्रश्न पत्र बनाने पर जोर दिया जाएगा।  जहाँ तक मूल्यांकन का प्रश्न है तो बच्चों के रिपोर्ट कार्ड में मूल्यांकन अब अध्यापकों के साथ-साथ बच्चे भी कर पायेंगे। बच्चों के लिए स्वमूल्यांकन हेतु एक अलग कॉलम दिया जाएगा। इतना ही नहीं अब बच्चे के  सहपाठी भी अपने मित्र का मूल्यांकन कर पायेंगे। 

बच्चा पाठशाला छोड़ते समय किसी न किसी कौशल में प्रशिक्षित होना अनिवार्य है। स्कूल के बाद कॉलेज में दाखिले के लिए एक कॉमन इंट्रेस एक्जाम हो, इसके लिए नेशनल एसेसमेंट सेंटर बनाए जाने की भी व्यवस्था की जाएगी। 

एनसीईआरटी की सलाह से, एनसीटीई टीचर्स ट्रेनिंग के लिए एक नया सिलेबस NCFTE 2021 तैयार करेगा। 2030 तक, शिक्षण कार्य करने के लिए कम से कम योग्यता 4 वर्षीय इंटीग्रेटेड बीएड डिग्री हो जाएगी। शिक्षकों को प्रभावी और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए भर्ती किया जाएगा। प्रमोशन योग्यता आधारित होगी। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय प्रोफेशनल मानक (एनपीएसटी) 2022 तक विकसित किया जाएगा। इस नीति के जरिए 2030 तक 100% युवा और प्रौढ़ साक्षरता के लक्ष्य को प्राप्त करना है।

नई शिक्षा नीति का लक्ष्य 
व्यवसायिक शिक्षा सहित उच्चतर शिक्षा में GER (सकल नामांकन अनुपात) को 26 प्रतिशत (2018) से बढ़ाकर 2035 तक 50 प्रतिशत करना है। जीईआर हायर एजुकेशन में नामांकन मापने का एक माध्यम है। हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में 3।5 करोड़ नई सीटें जोड़ी जाएँगी। 

देशभर की हर यूनिवर्सिटी के लिए शिक्षा के मानक एक समान होंगे। यानी सेंट्रल यूनिवर्सिटी हो या स्टेट यूनिवर्सिटी हो या डीम्ड यूनिवर्सिटी। सबका स्टैंडर्ड एक जैसा होगा। ऐसा नहीं होगा कि बिहार के किसी यूनिवर्सिटी में अलग तरह की पढ़ाई हो रही है और डीयू के कॉलेज में कुछ अलग पढ़ाया जा रहा है। और कोई प्राइवेट कॉलेज भी कितनी अधिकतम फीस ले सकता है, इसके लिए फी कैप तय होगी।  रिसर्च प्रोजेक्ट्स की फंडिंग के लिए अमेरिका की तर्ज पर नेशनल रिसर्च फाउंडेशन बनाया जाएगा, जो साइंस के अलावा आर्ट्स के विषयों में भी रिसर्च प्रोजेक्ट्स को फंड करेगा। 

आईआईटी, आईआईएम के समकक्ष बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय (एमईआरयू) स्थापित किए जाएँगे।  शिक्षा में टेक्नोलॉजी के सही इस्तेमाल, शैक्षिक योजना, प्रशासन और प्रबंधन को कारगर बनाने तथा वंचित समूहों तक शिक्षा को पहुँचाने के लिए एक स्वायत्त निकाय राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच (NETF) बनाया जाएगा।  विश्व की टॉप यूनिवर्सिटीज को देश में अपने कैम्पस खोलने की अनुमति दी जाएगी।

उपसंहार 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को, परामर्शों की अभूतपूर्व प्रक्रियाओं के बाद तैयार किया गया है जिसमें 2.5 लाख ग्राम पंचायतों, 6,600 ब्लॉकों, 6,000 यूएलबी, 676 जिलों से प्राप्त हुए लगभग 2 लाख से ज्यादा सुझावों को शामिल किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य शिक्षा से वंचित सभी बच्चों को मुख्य धारा में जोड़कर उन्हें सुनहरा भविष्य देना है। यह नीति बच्चों को यंत्र नहीं मनुष्य बनने पर बल देती है। यदि इसके आशयों का अक्षरशः पालन होगा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत फिर से दुनिया का विश्वगुरु बन जाएगा। 

संदर्भ
भारत सरकार, 2020, नई शिक्षा नीति-2020, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली
भारत सरकार, 1986, नई शिक्षा नीति-2020, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली
भारत सरकार, 1968, नई शिक्षा नीति-2020, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली
रा.शै.अ.प्र.प. 1976. दस वर्षीय स्कूल के लिए पाठ्यक्रम — एक रूपरेखा. रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली.
 —. 2000. विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा. रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली.
 —. 2005. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005. रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली. 
—. 2008. राष्ट्रीय फ़ोकस समह का आधार पत्र — पाठ्यचर्या बदलाव के लिए व्यवस्थागत सुधार, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली. 
—. 2009. राष्ट्रीय फ़ोकस समह का आधार पत्र — शैश्रिक तकनीकी. रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली. 
वायगोत्स्की, एल. एस. 1962. थॉट एड लैंग्वेज, कैंब्रिज, एम.आई.टी. प्रेस, मसाचुसेट्स
भारत सरकार, 2009, निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली

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