महात्मा गांधी के लोकतांत्रिक मूल्य

आचार्य नीरज शास्त्री
      पिछली डेढ़ शताब्दी में जिस व्यक्ति के व्यक्तित्व ने पूरे विश्व में सामान्य - जन पर अपनी सर्वाधिक छाप छोड़ी है, उस महान व्यक्तित्व का नाम ही महात्मा गांधी है। यही बात हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि पिछली डेढ़ शताब्दी में महात्मा गांधी जैसा लोकप्रिय व्यक्तित्व कोई अन्य नहीं बना पाया। 
     महात्मा गांधी का जन्म इस महान भारतवर्ष में तब हुआ, जबकि यहां अनेक महानतम व्यक्ति जन्म ले रहे थे और देश की गुलामी की बेड़ियों को काटने के भरसक प्रयास कर रहे थे। उस समय श्री करमचंद गांधी एवं माता पुतलीबाई के पुत्र के रूप में पोरबंदर (काठियावाड़) में मोहनदास करमचंद गांधी के रूप में जन्मे बालक मोनिया ने भारतीय इतिहास के नवीन प्रष्ठ लिखे। माता- पिता के उज्ज्वल निर्मल संस्कारों ने गांधी जी के व्यक्तित्व के निर्माण की बुनियाद उठाई। मात्र तेरह वर्ष की अवस्था में विवाहित होने पर महात्मा गांधी जी के चरित्र की दृढ़ता बनीं, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कस्तूरबा गांधी। यदि गांधी जी के जीवन में कहीं भटकाव की स्थिति बनी  तो कस्तूरबा के दृढ़ पतिव्रत एवं अनुपम प्रेम ने उन्हें संभाल लिया। यही कारण है कि वह कभी नैतिक पथ पर लड़खड़ाए नहीं।
     इस तरह पारिवारिक संस्कारों एवं प्रेम निष्ठा ने उनमें दिव्य लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास किया और वह नैतिकता एवं आचरण की उच्चता के विशाल वटवृक्ष बन गए।आज जब संपूर्ण विश्व में युद्ध  एवं संघर्ष के काले बादल छा रहे हैं, संसार प्रलय की ओर अग्रसर सा लगता है; तब उनके लोकतांत्रिक मूल्य और भी अधिक  प्रासंगिक हो जाते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों  का संरक्षक मानवता के संरक्षक के रूप में विख्यात होता है और लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन करने वाला तानाशाह के रूप में कुख्यात होता है। आज भी मानवता के संरक्षक कहीं-न-कहीं  स्वयं को गांधी जी का ऋणी स्वीकार करते हैं। इसका कारण भी गांधीजी के लोकतांत्रिक मूल्य और दर्शन ही हैं। गांधीजी के लोकतांत्रिक मूल्यों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक चार हैं। ये हैं-
1- सत्य 
2- प्रेम 
3- अहिंसा 
4- सद्भाव। 

          आइए इन सभी घटकों पर दृष्टि डालते हैं-
 1- सत्य - गांधीजी ने बचपन में सत्य हरिशचंद्र फिल्म देखकर आजीवन सत्य के पालन का व्रत लिया था। उनके जीवन में सत्य और ईश्वर एक दूसरे के पूरक बन गए थे।इसीलिए उन्होंने पहले तो कहा, "ईश्वर ही सत्य है।" और फिर उन्होंने इस वाक्य को पलटकर कहा, "सत्य ही ईश्वर है।"
         इस प्रकार गांधी जी ने सत्य और ईश्वर में भेद नहीं माना। वे सदैव  सत्य का पालन करते रहे।
 2-प्रेम -सत्य की तरह  ही गांधी जी ने प्रेम को महत्व दिया। उनका प्रेम अपने परिवार, संबंधी और रिश्तेदारों तक ही सीमित नहीं था। अपितु उनका प्रेम तो समाज और राष्ट्र की सीमाओं से भी परे पूरी मानवता और प्राणी मात्र के कल्याण तक विस्तृत था। वे प्रकृति के प्रत्येक प्राणी से प्रेम करने में विश्वास करते थे।
       इसीलिए वह कबीर के मनसा वाचा कर्मणा के सिद्धांत में निष्ठा रखते थे। वे सोचते थे कि किसी भी प्राणी को तनिक भी कष्ट न हो, यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। यह बात उन्होंने अपने जीवन के द्वारा समझाई। जैसे कि वे अपने आधे शरीर पर ही धोती लपेटते थे। एक दिन जब उनसे यह पूछा गया कि आप आधा शरीर ही कपड़े से क्यों ढकते हैं तो उन्होंने उत्तर दिया, "जिस दिन मेरे चालीस करोड़ भारतीय भाई-बहनों के पास पूरा तन ढकने के लिए कपड़े होंगे, उस दिन मैं पूरे शरीर पर कपड़े पहन लूंगा।"
       शत्रु के प्रति भी उनके हृदय में शत्रु भाव नहीं था। यही कारण है कि वे संपूर्ण विश्व में लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचे। यह उनकी लोकप्रियता ही थी कि विचारधारा भिन्न होने पर भी युवा हृदय सम्राट नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनका हृदय से सम्मान करते थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि से विभूषित किया तथा उन्हें बापू कहकर संबोधित किया। 
3- अहिंसा -यह महात्मा गांधी के लोकतांत्रिक मूल्यों का तीसरा घटक हैऔर उनके जीवन का मूल मंत्र है। गांधीजी ने अहिंसा को मानव जीवन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया था। वे कहते थे-"प्राणी हत्या से जघन्य कोई पाप नहीं है।"
          वे जीवन भर कष्ट उठाने के बाद भी पूर्ण अहिंसक बने रहे। दक्षिण अफ्रीका में प्रथम श्रेणी का टिकट लेकर जब प्रथम श्रेणी के कोच में बैठे तो पहले तो अंग्रेजों ने उनका उपहास किया; फिर उन्हें तीसरी श्रेणी के कोच में जाने के लिए विवश किया।जब उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया तो उन्हें बाहर फेंक दिया। गांधी जी ने ट्रेन की खिड़की से लटककर यात्रा की। भारत की आजादी के लिए भी उन्होंने कष्ट झेले परंतु अहिंसा का व्रत नहीं छोड़ा। 
       वे कहते थे, "मेरी अहिंसा कायरता नहीं सिखाती।" 
       यह अहिंसा का ही प्रभाव था कि शरीर से दुर्बल होने के बाद भी वे दुर्दांत विदेशी शासन के सामने झुके नहीं। उनका आत्म संयम ही उनका सबसे बड़ा सहायक था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेख' शिरीष के फूल' में शिरीष की तुलना महात्मा गांधी से की है। यह अहिंसा का गंभीर भाव उनमें संत कबीर और भगवान महावीर के प्रभाव से उत्पन्न हुआ था।
4- सद्भाव - गांधीजी के लोकतांत्रिक मूल्यों में उनका चौथा महत्वपूर्ण घटक है सद्भाव। उनका सद्भाव भी प्रेम और अहिंसा से ही प्रेरित है। इस गुण का भी गांधी जी के चरित्र में अनन्य स्थान है। वे अपने शत्रु के साथ भी सद्भाव रखते थे। यही कारण था कि अंग्रेजों के प्रति भी उनके मन में कभी दुर्भाव उत्पन्न नहीं हुआ। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के समय खून - खराबा न हो, इसके लिए अंग्रेजों को सलाह दी कि वे हिटलर के साथ अहिंसात्मक वार्ता करें। सद्भाव के कारण ही वे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सभी को समदृष्टि से देखना पसंद करते थे। उन्होंने स्वयं वैष्णव हिंदू धर्म का अनुयाई रहकर दूसरे धर्मों का भी सम्मान किया। सद्भाव के कारण ही उनमें भेदहीनता, धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक स्वतंत्रता जैसे मूल्य भी विकसित हुए। उनके ये मूल्य आज़ भी भारतीय समाज में एकता स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने इस हेतु ही अश्पृश्य(अछूत) समाज का पक्ष लेकर उन्हें हरिजन कहकर संबोधित किया तथा स्वयं अपने सिर पर मैला ढोया। उनके इन्हीं दिव्य लोकतांत्रिक गुणों के कारण आइंस्टाइन ने कहा, "आने वाली पीढ़ी मुश्किल से ही विश्वास कर पाएगी कि इस धरती पर हाड़- मांस का बना कोई चलता-फिरता ऐसा भी मनुष्य हुआ था।" मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने उनके ऊपर 'गांधी नामा' की रचना की तथा हंगरी के मशहूर लेखक लास्लो ने उन पर नाटक की रचना की थी। प्रेमचंद,पंत और बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे लेखकों पर भी गांधी जी का प्रभाव था उनके इन्हीं लोकतांत्रिक मूल्यों  के कारण गोपाल कृष्ण गोखले एवं रवींद्र नाथ टैगोर ने उन्हें महात्मा की उपाधि से विभूषित किया। महात्मा गांधी के सभी लोकतांत्रिक मूल्य निश्चित ही गीता और रामायण से विकसित हुए थे तथा उनके ये ही मूल्य उनका दर्शन बन गए।

3 comments :

  1. सेतु के संपादक मंडल का बहुत बहुत धन्यवाद।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष
    तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी

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  2. बहुत उत्तम आलेख. हार्दिक बधाई.

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  3. आदरणीय श्री आचार्य नीरज शास्त्री जी आपने बहुत ही मर्मज्ञता से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी पर स्पष्ट एवं स्वच्छंद प्रकाश डाला है स्वागतोग्य है सादर अभिवादन।

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