तमाम द्वन्द्वों के बीच मानव जिजीविषा को नया तर्क देकर प्रमाणित करते रहना रचनाकार का धर्म है

 (वरिष्ठ कथाकार एवं अनुवादक सुवास दीपक से प्रदीप त्रिपाठी की वार्ता) 
प्रदीप त्रिपाठी

- प्रदीप त्रिपाठी

सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक
ईमेल: tripathiexpress@gmail.com; चलभाष: +91 892 811 0451

प्रदीप त्रिपाठी: सिक्किम में हिंदी भाषा में सृजनात्मक लेखन एवं उसके विकास को आप किस रूप में देखते हैं?

सुवास दीपक:  16 मई 1975 को सिक्किम भारतीय गणराज्य का का 22 वाँ राज्य बना। इसका क्षेत्रफल 7096 वर्गमील है और जनसंख्या (2011 की जनगणना के अनुसार 6.10 लाख है। भारत में विलय के बाद ही इसके योजनाबद्ध विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1975 तक सिक्किम भारत का एक संरक्षित अधिराज्य था।

            विलय से पूर्व सिक्किम के स्कूलों में हिंदी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता था। 1925 तक सिक्किम में केवल एक सरकारी हाईस्कूल था, वह भी राजधानी गंगटोक में। इससे पहले ईसाई मिशनरियों के द्वारा स्थापित स्कूलों में हिंदी के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। 1872–73 ईस्वी में पादरी मेक्फॉरलेन ने सिक्किम के महाराजा छाग्दोर नामग्याल से अनुमति प्राप्त कर सिक्किम में मिशनरी स्कूलों की स्थापना की थी। मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य धर्म प्रचार होने के बावजूद इस समूचे पर्वतीय क्षेत्र में (उस समय सिक्किम का क्षेत्रफल काफी विस्तृत था, जिसमें आज का समूचा दार्जिलिंग जिला शामिल था जिसकी सीमाएँ कूचबिहार और पश्चिम में मेची नदी तक फैली हुई थीं) हिंदी के माध्यम से शिक्षा के प्रचार-प्रसार में इन ईसाई मिशनरियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है।

सुवास दीपक
           1875 में सिक्किम के कुछ जमींदारों (सामन्तों) ने अपने निजी प्रयास से कुछ स्कूलों की स्थापना की थी। पाठ्य-पुस्तकों में भूगोल, इतिहास, अंग्रेजी, हिंदी, विज्ञान और तिब्बती भाषा का चलन था और शिक्षा का माध्यम हिंदी था। गौरतलब है, बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों तक शिक्षा का माध्यम हिंदी था। सिक्किम और दार्जिलिंग में स्थापित स्कूलों में बिहार और उत्तर प्रदेश से हिंदी शिक्षक नियुक्त किए जाते थे। चूँकि वे स्थानीय भाषाएँ नहीं जानते थे इसलिए जनजातीय और नेपाली भाषी विद्यार्थियों को वर्णमाला सिखाते, हृस्व और दीर्घ की मात्रा को ‘छोटा इ’, ‘बड़ा ई’, ‘छोटा उ’, ‘बड़ा ऊ’ और ‘श’ ‘ष’ ‘स’ के उच्चारण की ध्वनि के स्थान पर तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य ‘स’  सिखाने के कारण इनका उच्चारण कालान्तर में केवल ‘स’ ही रह गया।  ‘न’ और ‘ण’ के उच्चारण के साथ भी ऐसा ही हुआ। केवल ‘न’ ही रह गया। इसका प्रभाव अध्यावधि देखा जा सकता है।

            1950 की भारत-सिक्किम मैत्री संधि के अनुसार सिक्किम को भारत का एक संरक्षित राज्य के रूप में विभिन्न विकास योजनाओं के लिए भारत सरकार का अनुदान प्राप्त होने लगा जिसमें पंचवर्षीय योजना अनुदान भी था। योजनाबद्ध विकास की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाने के पश्चात स्कूलों की भी स्थापना होने लगी। शिक्षा का माध्यम अब अंग्रेजी कर दिया गया था। हिंदी भी स्कूलों में पढ़ाई जाने लगी।

            गाँधी शताब्दी समारोह (1969) के अवसर पर तत्कालीन सिक्किम सरकार ने गाँधी दर्शन पर ‘अखिल सिक्किम निबन्ध प्रतियोगिता’ का आयोजन किया था जिसमें नेपाली, भूटिया, लेप्चा, लिम्बू भाषाओं के साथ-साथ हिंदी में भी निबन्ध आमंत्रित किए गए थे। हिंदी में प्रथम पुरस्कार जूनियर हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक उत्तर प्रदेश निवासी हिंदी भाषी शिवनारायण लाल गुप्ता को मिला था।

            गंगटोक स्थित भारतीय राजनीतिक अधिकारी के कार्यालय में स्थापित ‘सार्वजनिक पुस्तकालय’ में ‘ऊषा’ नामक बहुभाषी पत्रिका का एक अंक 1965-66 में प्रकाशित हुआ था जिसमें हिंदी रचनाएँ प्रकाशित हुई थीं। सभी विद्यालयों व महाविद्यालयों (सिक्किम में पहला महाविद्यालय 1978 में स्थापित हुआ था, जो एक रात्रि महाविद्यालय था) की वार्षिक पत्रिकाओं एवं स्मारिकाओं में हिंदी खंड होता था जिसमें विद्यार्थियों की हिंदी में स्वरचित रचनाएँ प्रकाशित होती रही 

            1975 से पूर्व प्रकाशन विभाग, भारत सरकार से सिक्किम के पुस्तकालयों और विद्यालयों के लिए बड़ी संख्या में विभाग के प्रकाशन, विशेष तौर पर हिंदी में गांधी साहित्य तथा भारत की स्वतंत्रता के इतिहास से संबंधित पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएँ वितरित की जाती थीं।

            सिक्किम के स्कूलों में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा आदि से आए व्यापारियों, जो स्थायी रूप से सिक्किम में बस गए हैं, के बच्चे स्कूलों में हिंदी विषय लेते ही हैं, अभी धीरे-धीरे जनजातियों और नेपाली भाषी विद्यार्थी भी हिंदी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए आगे आ रहे हैं। वर्तमान में सिक्किम में ऐसे पर्याप्त संख्या में ऐसे अहिन्दी भाषी शिक्षक हैं जो हिंदी में न केवल स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर चुके हैं बल्कि विद्यावारिधि भी हैं और राज्य के विद्यालयों, महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे हैं। सिक्किम केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी में उच्च शिक्षा की व्यवस्था है जिसमें अहिंदी भाषी स्थानीय छात्र हिंदी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। सिक्किम में हिंदी में पी.एचडी करने वाली प्रथम महिला सोनम ओङमु भूटिया हैं। उन्होंने बनस्थली विश्वविद्यालय, राजस्थान से 2011 में ‘व्याकरण कोटियों का अध्ययन हिंदी और भूटिया के संदर्भ में’ विषय पर शोध किया है।

            वर्तमान में सिक्किम के स्कूलों में कक्षा आठ तक हिंदी एक विषय के रूप में अनिवार्य रूप से और कक्षा नौ (9th) से ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। सिक्किम की आबादी में पिछले डेढ़-दो सौ सालों में नेपाली भाषियों की बहुतायत रही है। नेपाली भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में सिक्किम की राजधानी गंगटोक में हाईस्कूल में शिक्षा का माध्यम हिंदी था। 1925 के बाद तत्कालीन सरकार द्वारा हिंदी के स्थान पर नेपाली भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया गया। इस छोटे राज्य सिक्किम में विभिन्न जातीय समुदायों के बीच भाषा या धार्मिक आस्था को लेकर किसी तरह का तनाव उत्पन्न हुआ हो, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। तुलनात्मक रूप से इतनी कम आबादी में सिक्किम में जातीय और जनजातीय समुदायों की दर्जन के करीब भाषाओं को सरकारी मान्यता प्राप्त है।

            सिक्किम में हिंदी को लेकर किसी प्रकार की समस्या नहीं है। इस राज्य में शत-प्रतिशत लोग हिंदी न केवल समझते हैं, बल्कि बोलते भी हैं। सिक्किम में हिंदी साहित्य लेखन और प्रकाशन का प्रारम्भ पिछली सदी के पाँचवें दशक से होने के कुछ प्रमाण मिलते हैं। इस विषय पर कोई शोध-कार्य नहीं हुआ है, यद्यपि 1957 में गंगटोक से प्रकाशित ‘कञ्चनजङ्घा’ नामक एक नेपाली पत्रिका में कभी-कभार हिंदी रचनाएँ (विशेष रूप से कविताएँ प्रकाशित होती थीं) जो सिक्किम में कार्यरत हिंदी भाषियों की होती थीं।

            सिक्किम सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा नियुक्त हिंदी भाषी शिक्षक चंद्रचूड़ नारायण शर्मा ‘चिंतक’ की सिक्किम से प्रकाशित हिंदी की प्रथम पुस्तक है। 1972 में प्रकाशित यह पुस्तक (खण्ड-काव्य) ‘जय बांग्ला’ जो ‘बांग्ला मुक्ति संग्राम’ पर केन्द्रित है। इसके पश्चात एक अन्य हिंदी भाषी शिक्षक ध्रुव नारायण सिंह का ‘बीस बढ़ते कदम’ (गीति-नाटक) है जो 1976 में शिक्षा विभाग, सिक्किम सरकार ने प्रकाशित किया था।

            सिक्किम में स्थानीय अहिंदी भाषी रचनाकार के रूप में साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता सिक्किम के नेपाली महाकवि तुलसीराम शर्मा ‘कश्यप’ का नाम उल्लेखनीय है। उनका हिंदी में लिखित खंडकाव्य ‘इन्द्रकील’ 1992 में प्रकाशित हुआ। इसके अलावा बाद में भी हिंदी की कई पुस्तकें प्रकाशित हुई जिसमें सिक्किम के शिक्षा विभाग में नियुक्त एक अन्य हिंदी भाषी शिक्षक कृपाल सिंह द्वारा लिखित और ‘सिक्किम संस्कृति और जनजीवन’ उल्लेखनीय है। यह पुस्तक प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1997 में प्रकाशित हुई थी।

            सिक्किम में बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों से राजस्थान से सिक्किम में आए व्यापारियों द्वारा स्थापित ‘नागरिक अधिकार समिति’ के द्वारा 1978-79 में गंगटोक से ‘नागरिक अधिकार’ नामक एक ‘हिंदी न्यूज लेटर’ प्रकाशित होता था। ये व्यापारी तत्कालीन राजशासन से प्राप्त विशेष अनुमति के तहत भारत-तिब्बत व्यापार में संलग्न थे। 1975 के सिक्किम के भारतीय गणराज्य में विलय होने के बाद नयी शासन व्यवस्था में वे भूतपूर्व राजा द्वारा प्रदान किए गए विशेषाधिकारों की बहाली चाहते थे।

आज राज्य के विभिन्न जातीय समुदायों के विद्यार्थी हिंदी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और राज्य के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्य़ालयों में हिंदी शिक्षण एवं साहित्य की श्रीवृद्धि में योगदान कर रहे हैं।

            हिंदी के प्रति झुकाव का एक प्रमुख कारण है- देवनागरी लिपि जिससे यहाँ की शत-प्रतिशत जनता परिचित है। बहुसंख्यक नेपाली भाषी लोगों और हिंदी भाषी लोगों में भाषिक संस्कृति की समानता के कारण वाराणसी में संस्कृत पढ़ने के लिए जाने वाले विद्यार्थी हिंदी की स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर की परीक्षाएँ देते आ रहे हैं। इसके आर्थिक कारण भी हैं क्योंकि संस्कृत शिक्षण के अतिरिक्त इस तरह से ऐसे विद्यार्थियों के लिए विभिन्न स्कूलों में जीविका के स्थायी अवसर भी प्राप्त हो रहे हैं।


प्रदीप त्रिपाठी: सिक्किम प्रदेश में एक हिंदी कथाकार के रूप में आपका महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिंदी भाषा में सृजनात्मक लेखन सिक्किम में जिस प्रकार से होना चाहिए नहीं हो रहा है, इस उदासीनता का क्या कारण है?

सुवास दीपक: अस्सी के दशक से ही सिक्किम में हिंदी साहित्य लेखन एवं हिंदी पत्रकारिता का सूत्रपात होता है। 1970 के दशक में जब मैंने हिंदी में लिखना शुरू किया तब सिक्किम की आबादी डेढ़ लाख के आस-पास रही होगी। भू-परिवेष्ठित और नितांत अहिंदी भाषी क्षेत्र से आप उस भाषा में सृजनात्मक लेखन की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं जो उसकी अपनी भाषा नहीं है!

            किसी भी क्षेत्र/प्रदेश में किसी भाषा में सृजनात्मक लेखन का विकास उस भाषा को बोलने वाले लोगों से ही तो संभव होता है। सिक्किम में 80–90 प्रतिशत जनता नेपाली (जो कि 80–90 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा है) भाषी है। स्पष्ट है कि किसी भी जातीय-समूह का निज भाषा से ही तो जुड़ाव होगा – इतर भाषा कैसे प्राथमिकता की भाषा बन सकती है और वह भी साहित्य-सृजन की। 

  

प्रदीप त्रिपाठी: हिंदी कथा-साहित्य के क्षेत्र में पूर्वोत्तर भारत में आपके समकालीन कौन-कौन से रचनाकार सक्रिय रूप से सृजनरत हैं?

सुवास दीपक:  मेरे समकालीनों में जिनसे मेरा व्यक्तिगत परिचय और संपर्क रहा है और अद्यावधि है, वे हैं – पदम क्षेत्री (मूल निवासी तुरा, मेघालय, कर्मक्षेत्र सिक्किम) और बिर्ख खडका डुवर्सेली (सिलीगुड़ी निवासी)। पदम क्षेत्री का अधिकतर योगदान नेपाली से हिंदी में अनुवाद, हिंदी में उन्होंने कविताएँ लिखी हैं। सिक्किम में हिंदी पत्रकारिता से भी वह सक्रिय रूप से जुड़े हैं। डुवर्सेली जी का अनुवाद के साथ-साथ समालोचना के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्हें 2009 में मॉरीशस में हिंदी साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए ‘आधारशिला फाउंडेशन’ द्वारा विदेश मंत्रालय, भारत सरकार और मॉरीशस सरकार के तत्वावधान में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में ‘हिंदी गौरव सम्मान’ (2019) से सम्मानित किया गया है। समालोचना में उनकी मौलिक हिंदी में लिखित प्रकाशित पुस्तक है- ‘नेपाली साहित्य विमर्श’ (प्रकाशक– साहित्यायन प्रकाशन, ग्रेटर नोयडा-उ.प्र.,2017)। इसी पुस्तक पर उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा गठित उच्च-स्तरीय चयन समिति के निर्णय अनुरूप ‘हिंदीतर भाषी लेखक पुरस्कार योजना वर्ष 2018’ के अन्तर्गत एक लाख रुपये के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

            उनकी नेपाली से हिंदी में अनुवादित दो पुस्तकें (गिर्मी सेर्पा की ‘हिपोक्रिट चाँप-गुराँस’-1999 और जस योञ्जन ‘प्यासी’ की ‘शांति-संदेह’ 2015) प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके अतिरिक्त पूर्वोत्तर से हिंदी में लिखने वाले प्रमुख रचनाकार हैं- मेघालय से अहिंदी भाषी मंजु लामा (आकाशवाणी से संबद्ध, कविताएँ लिखती हैं) और हिंदी भाषी डॉ. अकेलाभाई, जो ‘पूर्वोत्तर हिंदी अकादेमी’ के सचिव हैं। पूर्वोत्तर, विशेष रूप से मेघालय को हिंदी जगत से परिचित कराने में डॉ. अकेला भाई का ऐतिहासिक योगदान है। वर्षों से वह पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के तत्वावधान में वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन करते आ रहे हैं।

            पूर्वोत्तर से ही नेपाली से हिंदी में अनुवाद में विशिष्ट योगदान देने वालों में मेरे अन्य समकालीनों में हैं खडकराज गिरी और इन्द्र गिरी। खडगराज गिरी की एक अनुवाद पुस्तक ‘इस शहर में तुम्हें याद कर’ (2016) राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। यह वीरभद्र कार्कीढोली की नेपाली कविताओं का संग्रह है। सिलीगुड़ी निवासी इंद्र गिरी मौलिक हिंदी और अंग्रेजी में मौलिक लेखन के साथ-साथ नेपाली से हिंदी और अंग्रेजी में परस्पर अनुवाद भी करते हैं। वह मिरिक (दार्जिलिंग) निवासी वरिष्ठ कवयित्री कमला राई की नेपाली कविताओं का हिंदी अनुवाद ‘कुछ ‘लमहे जिन्दगी के' (2019) के सह-अनुवादक हैं। दूसरे सह-अनुवादक हैं क्षेत्र ‘प्रेम’ मुखिया।

            इसी तरह कर्ण थामी का नाम भी मेरे समकालीनों के साथ लिया जा सकता है, यद्यपि वह मुझसे उम्र में बड़े थे। दार्जिलिग निवासी कर्ण थामी ने मुख्य रूप से बांग्ला से हिंदी और नेपाली से हिंदी में अनुवाद किया है। सितंबर-2020 में दिवंगत कर्ण थामी ने बांग्ला कवि सुकान्त भट्टाचार्य की कविताओं का नेपाली में अनुवाद किया था। वह साहित्य अकादेमी से अनुवाद पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय नेपाली साहित्यकार हैं। दार्जिलिंग से ओम नारायण गुप्त (साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार से नवाजे गए) भी हैं, जिन्होंने अधिकतर हिंदी से नेपाली में अनुवाद किया है।

            समूचे पूर्वोत्तर में दशकों से अनेक लेखक हैं जो हिंदी में लिखते रहे हैं। खास तौर पर असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर से स्थानीय हिंदी लेखकों के अलावा हिंदी भाषी प्रदेशों से शिक्षण क्षेत्र में संलग्न अनेक नाम हैं जिन्होंने पूर्वोत्तर में हिंदी भाषा और साहित्य की श्रीवृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

            आप जानते हैं कि पूर्वोत्तर एक नितान्त अहिंदी भाषी क्षेत्र रहा है। दशकों से मुख्यधारा से अलगाव और उपेक्षा का शिकार रहा, इस क्षेत्र में आज से आधी सदी पहले क्या स्थितियाँ होंगी – आप अनुमान लगा सकते हैं। आज तो हम सोशल मीडिया के कारण एक विश्वग्राम से जुड़ चुके हैं। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, उस कालखण्ड में कुछ राष्ट्रीय स्तर की हिंदी पत्रिकाएँ जैसेः ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘दिनमान’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘नवनीत’, ‘कादम्बिनी’, ‘नवभारत टाइम्स’ (जो प्रकाशन के हफ्ते-दस दिन के बाद ही मुश्किल से प्राप्त होती थीं) ही हिंदी भाषा से जोड़ती थीं, उन्हीं से ही हिंदी संसार को पहचानने का अवसर मिला, वे ही मेरी मार्गदर्शक थीं। उस काल में सिक्किम में कोई महाविद्यालय नहीं हुआ करता था।


प्रदीप त्रिपाठी: आपके लेखन का प्रस्थान-बिंदु क्या है? अब तक की अपनी सृजनात्मक यात्रा (लेखकीय विकास) के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? अपनी रचना-प्रक्रिया को आप किस रूप में देखते हैं? 

सुवास दीपक:  मेरे अंदर कविता का प्रस्फुटन यद्यपि 19 साल की उम्र में हुआ, मगर मेरी साहित्यिक यात्रा उसी वक्त शुरू हो गई थी जब मैंने अपने गाँव के एक बरगद के पेड़ के नीचे चबूतरे पर कोयले से वर्णमाला लिखी थी। गाँव में स्कूल नहीं था, पढ़ने की बात ही नहीं थी। ननिहाल में मेरे बड़े भाई को पढ़ने के लिए भेजा गया था। भाई को पढ़ते-लिखते देख-देखकर शायद मैंने पाँच साल की उम्र में किसी द्वारा सिखाए बगैर लिखना और पढ़ना शुरू कर दिया था। हिज्जे कर सीखने की जरूरत ही नहीं पड़ी। जिस उम्र में बच्चे टेढ़े-मेढ़े लिखना शुरू करते हैं, उस उम्र में मैं रामायण और महाभारत फर्राटे से पढ़ लेता था। यह कैसे संभव हुआ– आज यह सोचते हुए मुझे आश्चर्य होता है। 

            सन् 1967-68 में भी ऐसा ही घटित हुआ। सिक्किम में आए दो साल के अंदर ही मैंने अपरिचित भाषा नेपाली में कविता लिखना शुरू कर दिया। ऐसा लगता है कि ग्रहण शक्ति मेरे अंदर प्रबल मात्रा में थी और अज्ञात के प्रति एक तीव्र सम्मोहन के कारण पाँच साल की उम्र में शुरू हुई यह अक्षर-यात्रा आज 72 साल की उम्र में भी लगातार जारी है।

            लेखन के लिए एक भाषा चाहिए- चाहे वह मातृभाषा हो या कोई सीखी हुई भाषा। मैंने जिस समाज में जन्म लिया, वहाँ मेरी मातृभाषा डोगरी-पहाड़ी की ‘कंडी’ उपबोली बोली जाती है। मेरी पहली कविता ‘सिक्किम जननीप्रति...’ सिक्किम में नेपाली पत्रकारिता के जनक काशीराज प्रधान के स्वामित्व और सम्पादन में गंगटोक (सिक्किम) से प्रकाशित होने वाली नेपाली पत्रिका ‘कञ्चनजङ्घा’ के अगस्त 1968 के अंक में प्रकाशित हुई। नेपाली में मैंने पहली कविता लिखी 10 दिसम्बर, 1967 को। यह कविता किसी पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुई यद्यपि 1993 में प्रकाशित मेरा पहला और अकेला नेपाली कविता संग्रह ‘आधारशिला’ से प्रकाशित है। यही कविता मेरी लेखकीय यात्रा का प्रस्थान-बिंदु है। अक्षरों के वन-प्रान्तर में मेरा प्रथम प्रवेश। मेरी मातृ-भाषा ‘डोगरी-पहाड़ी’ में स्कूली शिक्षा उस भू-भाग में तब भी नहीं थी, आज भी नहीं है। किशोरावस्था से निकलकर युवावस्था की दहलीज पर खड़े, अपनी जबान और जमीन से विस्थापित इस अकिंचन की उंगली पकड़ कर नेपाली भाषा ने साहित्य-मंदिर की राह दिखाई।

            नेपाली में मेरी पहली कविता प्रकाशित होने से मुझे एक दिशा मिल गई। 1967 से 1970 तक सिक्किम, दार्जिलिंग और नेपाल से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं के अतिरिक्त रक्षा मंत्रालय से ‘गोरखाली भाषा’ (उस समय तक नेपाली भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता नहीं मिली थी) में प्रकाशित ‘सैनिक समाचार’ से भी परिचय हुआ और उसमें मेरी कुछ प्रारम्भिक कहानियाँ और कविताएँ प्रकाशित हुईं। दार्जिलिंग से नेपाली में प्रकाशित अधिकांश उपन्यास, कहानी और कविता संग्रह भी पढ़ डाले। इस अवधि में तकरीबन सभी नवोदित और स्थापित साहित्यकारों से उनकी रचनाओं के माध्यम से परिचित हो चुका था। गंगटोक की एकाध कवि-गोष्ठियों में और कालिम्पोंग में ‘भानु जयन्ती’ में कविता पाठ कर चुका था। गंगटोक से ‘कञ्चनजङ्घा’, ‘हिमालय सन्देश’, ‘प्रगति’, ‘नव-ज्योति’ और दार्जिलिंग से प्रकाशित लगभग सभी नेपाली पत्र-पत्रिकाओं से परिचित हो चुका था। सिक्किम के नवोदित और स्थापित रचनाकार पदम सिंह सुब्बा अपतन,  तुलसी अपतन,  राम अपतन, उदयचन्द्र वशिष्ठ, बी.एस.राई, सानु लामा, नर बहादुर भंडारी, तुलसी कश्यप, शैलेशचन्द्र प्रधान, गिर्मी सेर्पा, केदार गुरुंग, गंगा कप्तान, पवन चामलिङ ‘किरण’, सन्तोष बरदेवा आदि की रचनाओं से परिचित हो चुका था। इसी बीच मेरी कुछ कविताएँ, लेख और अनुवाद प्रकाशित होने लगे थे। अनुवाद की आधार-भूमि भी धीरे-धीरे विकसित हो रही थी।

नेपाली से हिंदी की ओर झुकाव:

            ‘सारिका’, ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘नवनीत’, ‘कादम्बिनी’, ‘दिनमान’, ‘माधुरी’ आदि साप्ताहिक और मासिक हिंदी पत्रिकाएँ और हिंदी के प्रमुख दैनिक समाचारपत्र ‘नवभारत टाइम्स’ गंगटोक और सिंगताम में उपलब्ध हो जाते थे। लगभग सभी पत्रिकाएँ खरीदकर पढ़ता था। नए अंकों की बेसब्री से प्रतीक्षा करता। यह पुस्तक-प्रेम मुझे हर वक्त आर्थिक अभाव की ओर धकेलता रहता किंतु यह अभाव मेरी रुचि में कोई लगाम नहीं लगा सका। यह स्थिति अद्यावधि बरकरार है।

            लिखित शब्द के प्रति यह एक अनंत भूख थी इन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से मुझे हिंदी साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों की जानकारी प्राप्त हो रही थी। इन पत्र-पत्रिकाओं के पाठकों की परिधि अति विस्तृत थी। मेरे लिए नित नए क्षितिज खुलते गए। 

            हिंदी में पहली मौलिक कहानी ‘लपटें’ 20 जनवरी 1971 को लिखी – हिंदी कथा-लेखन में यह मेरा पहला प्रयास था। यह कहानी अप्रकाशित है और अब इसकी मूल पांडुलिपि भी उपलब्ध नहीं है।

कमलेश्वर का पत्र और भारतीय नेपाली साहित्य की अवधारणाः

            ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कमलेश्वर के सम्पादन में प्रकाशित ‘सारिका’ (कथा प्रधान मासिक पत्रिका) अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थी। ‘सारिका’ में कहानियों के अतिरिक्त विभिन्न नियमित स्तंभ भी थे। लोक कथाओं के विशेषांक भी प्रकाशित होते थे। भारत की विभिन्न भाषाओं की पुरातन व नवीन प्रवृत्तियों और भाषिक तथा साहित्यिक आंदोलनों पर चर्चाओं से लेकर देश-विदेश के जातीय समुदायों के मानवाधिकारों और अस्तित्व संकट को लेकर लिखे साहित्य के अनुवाद विशेषांक प्रकाशित होते थे। 1971 में “बांग्लादेश की मुक्ति” के बाद भारतीय राजनीति और प्रेस की निगाहें अब पड़ोसी बलूच और सिंध मुक्ति संग्रामों की ओर मुड़ रही थीं, उनके संघर्ष को आवाज देने के लिए भारतीय प्रेस, खास तौर पर हिंदी प्रेस ने जैसे कमर कस ली थी। प्रगतिशील सोच का बोलबाला था। इस अभियान में जहाँ ‘धर्मयुग’ (साप्ताहिक), ‘दिनमान’ (साप्ताहिक) और ‘सारिका’ (मासिक) जैसी बड़ी व्यावसायिक पत्रिकाएँ एक के बाद एक विशेषांक प्रकाशित कर रही थीं, वहीं अव्यावसायिक लघु पत्रिकाएँ भी पीछे नहीं थी।

            भारत में नेपालियों के सबसे बड़े गढ़ दार्जिलिंग से दशकों पहले से नेपाली भाषा की संवैधानिक मान्यता की मांग उठ रही थी। 1970 से यह मांग संगठित रूप से गति पकड़ चुकी थी। राष्ट्रीय पहचान को लेकर आंदोलन शुरू हो चुके थे। संवैधानिक मान्यता से पहले भारतीय नेपाली भाषा और साहित्य को देश की शीर्ष साहित्यिक संस्था ‘राष्ट्रीय साहित्य अकादेमी’ की मान्यता आवश्यक थी। इस संबंध में दार्जिलिंग की शीर्ष साहित्यिक संस्थाएँ प्रयत्नशील थीं। मैंने साहित्य अकादेमी में नेपाली भाषा की मान्यता के पक्ष में दलील देते हुए ‘नेपाली साहित्य सम्मेलन’, दार्जिलिंग के मुखपत्र ‘दियालो’ में एक लेख प्रकाशनार्थ भेजा। यह लेख एक पत्र के रूप में 11 अगस्त, 1972 को प्रकाशित हुआ।

            ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’ और ‘सारिका’ पत्रिकाएँ केवल हिंदी भाषियों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य प्रमुख भाषाई समुदायों के लिए भी एक साझा मंच थीं। ‘सारिका’ के संपादक कमलेश्वर देश की हाशिए पर रही भाषाओं और समुदायों के अधिकारों से संबंधित साहित्य प्रकाशित कर रहे थे। अनुवाद के माध्यम से ही अन्य भाषाओं की समकालीन प्रवृत्तियों की जानकारी मिलती थी और ‘सारिका’ यह भूमिका अपनी पूरी निष्ठा के साथ निभा रही थी।

            ‘सारिका’ से ही मुझे ‘भारतीय नेपाली कथा साहित्य’ के अनुवाद का विचार सूझा। ‘सारिका’ को मैंने सिक्किम की एक लोककथा ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ 23 जुलाई, 1970 को प्रकाशनार्थ प्रेषित की। कमलेश्वर ने तुरंत पत्र लिख कर ‘सारिका’ में रचनाएँ प्रकाशित करने का आश्वासन दिया।

            1970-1973 के बीच मेरी कुछ हिंदी कहानियाँ और कविताएँ हिंदी की लघु और स्थापित पत्रिकाओं जैसे ‘सारिका’ में प्रकाशित होने लगी थीं। फरवरी 1972 के ‘सारिका’ के अंक में एक नेपाली लोककथा ‘दो मुँहों वाला सांप, दो तिब्बती लोककथाएँ ‘कसाई’ और ‘तीन शर्तें’ प्रकाशित हुईं। ‘सारिका’ के अक्टूबर 1973 में विश्व भाषाओं की चुनी हुई लघु कथाएँ प्रकाशित हुईं। मेरे द्वारा भेजी गई दार्जिलिंग के कथाकार नन्द हाँगखिम की नेपाली कहानी ‘पुराना कोट’ को एक लघु कथा ‘बोध’ शीर्षक देकर प्रकाशित तो किया लेकिन विषय सूची में नन्द हाँगखिम को ‘नेपाल’ के लेखक के रूप में प्रस्तुत किया, अनुवादक का नाम तक नहीं दिया। ‘सारिका’ को मैंने ‘भारतीय नेपाली कथा-खंड’ के रूप में भारतीय नेपाली कहानियों के अनुवाद भी प्रकाशनार्थ प्रेषित किए थे जिनके बारे में ‘सारिका’ की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली और न ही वे कहानियाँ वापस लौटायी।

            देश की बड़ी व्यावसायिक पत्रिकाओं और प्रख्यात कहे जाने वाले लेखकों और पत्रकारों द्वारा अपने ही देश के जातीय समूहों के प्रति अज्ञानता और उदासीनता की इससे बड़ी कोई मिसाल नहीं हो सकती। स्थिति से अवगत कराते हुए मैंने एक आक्रोश-भरा पत्र कमलेश्वर को लिखा, जिसका उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। स्पष्ट था कमलेश्वर ‘भारतीय नेपाली साहित्य की अवधारणा’ से असहमत थे। देश के बड़े स्थापित और नामी-गिरामी लेखक-पत्रकार, जो दुनिया-भर के मानवाधिकार आंदोलनों की पैरवी करते अपनी कलमें घोंट रहे थे, उनकी पोल ‘भारतीय नेपाली साहित्य की अवधारणा’ को अस्वीकार कर देने के बाद खुल गई थी। मैं निराश जरूर हुआ लेकिन पराजित नहीं। कठिन परिस्थितियों में भी कहीं दूर रोशनी देख लेता हूँ।

            ‘भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक’ बाद में चंडीगढ़ से शामलाल मेंहदीरत्ता प्रचंड के संपादन में प्रकाशित हिंदी मासिक ‘साहित्य निर्झर’ के अक्टूबर 1974 के अंक में प्रकाशित हुआ जो ‘भारतीय नेपाली साहित्य’ की पहचान स्थापित करने वाला प्रथम प्रयास था। इस विशेषांक में भारतीय नेपाली कथाकारों की 18 कहानियों के साथ-साथ समकालीन भारतीय नेपाली कहानी की प्रमुख प्रवृत्तियों पर एक परिचर्चा भी प्रकाशित है।

      ‘भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक’ पर डॉ. घनश्याम नेपाल की टिप्पणी–“… ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘खास खबर’, ‘सारिका’, ‘पहल’, ‘प्रस्ताव’ आदि विभिन्न हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के विभिन्न अंकों में नेपाली कवि-कथाकारों की रचनाओं के अनुवादों को प्रकाशित करना ही नहीं, चण्डीगढ़ से प्रकाशित ‘साहित्य निर्झर’ (हिंदी मासिक) के सन् 1974 के अक्टूबर अंक को ‘भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक’ के रूप में सम्पादन कर प्रकाशित करने वाले और पटना से प्रकाशित ‘प्रस्ताव’ (हिंदी) के जून 1981 के अंक में ‘भारतीय नेपाली कथा खंड’ की ‘प्रस्तावना’ तथा उसी खंड में शामिल आधा दर्जन कहानियाँ हिंदी में अनुवाद करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य कर भारत में नेपाली भाषा-साहित्य के विकास और विस्तार में सुवास दीपक ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। नेपाली से इतर किसी भारतीय भाषा की पत्रिका में नेपाली साहित्य की किसी विधा विशेषकर इस तरह के विशेषांक प्रकाशित करने का कार्य संभवतः पहली दफा ‘साहित्य निर्झर’ ने ही किया है और इसके मूलकर्त्ता सुवास दीपक ही हैं।” (सुवास दीपक द्वारा ओम  गोस्वामी के डोगरी उपन्यास ‘पल-खिन’ के नेपाली अनुवाद “पल-विपल” की भूमिका, 2000 से उद्धृत, हिंदी अनुवाद) 

            इस विशेषांक के प्रकाशन को भारतीय नेपाली साहित्य की अलग पहचान स्थापित करने की दिशा में किए गए ऐतिहासिक कार्य के रूप में लेते हुए कालिम्पोंग से प्रकाशित लोकप्रिय अंग्रेजी साप्ताहिक Himalayan Observer (संपादकः बी.डी. बस्नेत) के 12 फरवरी, 1975 के अंक में एक पत्र  प्रकाशित हुआ, जो उल्लेखनीय है-

“Sir,

Through your esteemed weekly, we take the opportunity to inform the Nepalese populace and Hindi readers, that a monthly Hindi magazine from Chandigarh, entitled “Sahitya Nirjhar” has brought to the Indian literary scene, a special issue of Indian Nepali stories in Hindi translated by Shri Subash Deepak, a well-known litterateur and his worthy associates.

It is historical in the sense that this is the first kind of publication in India.

The issues are already out in the markets of Darjeeling and and other places.

We feel it our duty to appreciate such a noble task on the part of the members of Nirjhar Parivar, especially to its editor Shri Prachand residing in Chandigarh.

We, on behalf of the Nepalese populace and Nepali language lovers extend our thanks. We, the members of the Government Press, Darjeeling, also take the opportunity to thank the Sahitya Akademi, New Delhi on its recognizing the Nepali language. (P. Arjun & Nanda Hangkhim)

 

प्रदीप त्रिपाठी: 1985 में आपका उपन्यास ‘अरण्य रोदन’ और लंबे अंतराल के बाद कहानी संग्रह के रूप में ‘चक्रव्यूह...’ संग्रह प्रकाशित हुआ। जिस गति से आपने नेपाली–हिंदी रचनाओं का अनुवाद किया वह सक्रियता हिंदी लेखन में क्यों नहीं है?

सुवास दीपकः हिंदी में न लिख पाने का मुख्य कारणः

1) ‘साहित्य निर्झर’ (1974) और ‘प्रस्ताव’ (1980) के बीच नेपाली और हिंदी साहित्य से मिली उदासीनता- ‘भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक’ भारतीय संदर्भों में नेपाली भाषा और साहित्य की पहचान स्थापित करने का प्रथम प्रयास था। इस ऐतिहासिक प्रयास की तत्काल हिंदी पत्रिकाओं में कहीं-कोई चर्चा न होना तो उस काल में स्वाभाविक ही था क्योंकि ‘भारतीय नेपाली साहित्य की अवधारणा’ का हिंदी विमर्श में कहीं कोई स्थान था ही नहीं – चर्चा का तो सवाल ही नहीं उठता। कमलेश्वर-प्रसंग का उल्लेख मैं पहले ही कर चुका हूँ। मुझे अफसोस इस बात का था कि ‘साहित्य निर्झर’ को लेकर कालिंपोंग से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक ‘हिमालयन ऑबजर्वर’ में प्रकाशित ‘संपादक के नाम पत्र’ को छोड़कर कहीं से भी किसी नेपाली पत्र-पत्रिका में इसका जिक्र तक नहीं हुआ। तत्कालीन सक्रिय कहानीकारों ने इस कार्य को लेकर व्यक्तिगत रूप में बहुत कम चर्चा  की।

2) ‘भारतीय नेपालियों की ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि और भारतीय नेपाली कहानी में प्रगतिशील तत्व’, 1981 में प्रकाशित ‘प्रस्ताव’ से संबंधित प्रसंग-

      उपरोक्त आलेख पर कुछेक तथाकथित पत्रकारों/लेखकों ने मुझ पर स्थानीय विरोधी होने का लांछन लगाते हुए अपनी पत्रिकाओं में सांप्रदायिक टिप्पणियाँ लिखीं, मुझे जलील करने के लिए नितांत असंगत और अनाप-शनाप आरोप लगाए। मुझ पर शारीरिक चोट तक पहुंचाने के लिए बीच बाजार में धमकी तक दे डाली। मुझे किसी विशेष विचारधारा का समर्थक सिद्ध करते हुए मेरे विरुद्ध सत्ता के सर्वोच्च शिखरों पर बैठे लोगों के कान भरे और मुझे चारों ओर से घेर पर आर्थिक और मानसिक आघात पहुंचाने के षड़यंत्र रचे।

      मैं आहत था लेकिन परास्त नहीं। मैंने इन विकट परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बनाए रखा। ऐसी स्थिति में मौन के अलावा और क्या विकल्प बचता है – एक अकेले मुझ जैसी हैसियत रखने वाले कलमकार के लिए! आदमी कितनी सीमा तक टूट सकता है – यह वही व्यक्ति बयान कर सकता है जो ऐसी परिस्थितियों से गुजरा हो। मैंने संकल्प कर लिया था कि मैं अपने तरीके से अपनी लेखनी को विस्तार देता रहूँगा, क्योंकि वही मेरी प्राण-वायु थी।

      मैं पहले जिक्र कर चुका हूँ कि 1980-90 का दशक दार्जिलिंग पहाड़ और मुझे हिंदी से जोड़ने का प्रमुख सूत्र चंडीगढ़ – दोनों राजनीतिक अस्थिरता से आक्रांत थे। इस अवधि में आना-जाना बंद हो गया था। मैं सक्रिय रूप से नेपाली साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ा था। सिक्किम में हिंदी साहित्य का कोई माहौल नहीं था।

      रचना से चुक जाने की इस स्थिति में मैंने लगातार नेपाली से अनुवाद-कार्य जारी रखा। इस अवधि में सैंकड़ों कहानियाँ और कविताएँ नेपाली से हिंदी में अनुवाद कर डालीं। दर्जनभर उपन्यास और कविताओं के अनुवाद संकलन प्रकाशित किए। ये सभी संकलन निर्माण प्रकाशन, नाम्ची से प्रकाशित हैं। ‘भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक’ (1996) और पवन चामलिङ ‘किरण’ की नेपाली कविताओं का हिंदी अनुवाद ‘क्रूसीफाइड प्रश्न और अन्य कविताएं’ (1996) नेपाली से हिंदी में प्रकाशित अन्य उपन्यास और कविता संकलन भी निर्माण प्रकाशन से प्रकाशित हैं। इन दोनों अनुवाद पुस्तकों की समीक्षा प्रमुख हिंदी पत्रिकाओं में हुई। इसी बीच 1990 से 2010 की अवधि में अंग्रेजी से अन्य विधाओं के अनुवाद भी हिंदी और नेपाली में प्रकाशित हुए।

अनुवाद क्षेत्र की एक प्रमुख उपलब्धिः ‘पल-विपल’

      यह उपन्यास जम्मू निवासी डॉ. ओम गोस्वामी के डोगरी उपन्यास “पल-खिन” का  नेपाली में अनुवाद है। इस अनुवाद कार्य का महत्व इस तथ्य से आंका जा सकता है कि यह मूल डोगरी भाषा से नेपाली भाषा में अनूदित होने वाली आज तक की पहली अनूदित कृति है। इस पर साहित्य अकादेमी से 2003 का अनुवाद पुरस्कार प्राप्त हुआ।

डॉ. घनश्याम नेपाल ने ‘पल-खिन’ की भूमिका (2000) में लिखाः

सांस्कृतिक संवाद-स्थापन का महती कार्य-

“…नेपाली भाषा-साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे अरसे से सक्रिय रहे लेखक-पत्रकार सुवास दीपक ने अपने लेखन के माध्यम से ही अपने लिए एक भिन्न और विशिष्ट प्रकार के ‘आकाश’(space) का सृजन किया है। यह उनका नितांत निजी, नितांत व्यक्तिगत और स्वनिर्मित आकाश है। विशेष रूप से उपन्यास लेखक, कवि, अनुवादक और पत्रकार के रूप में उनकी पहचान है। इनके अतिरिक्त, कहानी, आख्यानेतर गद्य आदि के क्षेत्र में उनके उत्साहपूर्ण कार्य पाए जाते हैं। इन विविध आकाशों में अनुवादक के रूप में उनके द्वारा सृजित आकाश विशेष महत्व और मूल्य का है। नेपाली कवि-लेखकों को हिंदी अनुवाद के माध्यम से हिंदी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत और परिचित कराने वाले महती कार्य वह लगभग विगत तीन दशकों से कर रहे हैं। डोगरी मातृभाषी सुवास दीपक के लिए हिंदी और अंग्रेजी शिक्षा-ग्रहण और ज्ञानार्जन के विशेष माध्यम रहने के बावजूद नेपाली भाषा जीविकोपार्जन के साथ-साथ सामाजिक स्व-स्थापन का मूल आधार रही है। इस प्रकार अकादमिक भाषा और संस्कृति से अंतरंग परिचय के कारण उनके लिए अनुवाद एक सहज-साध्य और नैसर्गिक कार्य बन पड़ा है।

      अनुवाद एक प्रकार का कूटनैतिक कार्य है,  दो संस्कृतियों के बीच अंतर्क्रियात्मक संबंध स्थापन कराने वाला कार्य, और इस कार्य के लिए हमारे बीच सुवास दीपक जैसा उपयुक्त और सुयोग्य व्यक्ति पाना कठिन है। आजकल नेपाली से हिंदी में अनुवाद करने वाले अन्य भी हैं किंतु अनुवाद को नितांत संदेश-स्थानांतरण की अवस्था से उठा कर एक प्रकार के सृजनात्मक कार्य-व्यापार की तह तक ले जा सकने वाली सामर्थ्य की दृष्टि से सुवास दीपक की तुलना में आ पहुंचने वाला अनुवादक नहीं पाया जाता। ‘साहित्य निर्झर’, ‘पहल’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘प्रस्ताव’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके अनुवाद कार्य के अतिरिक्त उनके पवन चामलिङ ‘किरण’ की कविताओं के ‘क्रूसीफाइड प्रश्न और अन्य कविताएं’ नामक कविता संग्रह तथा ‘भारतीय नेपाली कहानियाँ’ जैसे हिंदी अनुवादों को पढ़ते हुए इस तथ्य का प्रमाण मिलता है।

      नेपाली से हिंदी में अनुवाद उनका मुख्य कार्य क्षेत्र है। किंतु इस बार उन्होंने उस मार्ग को छोड़कर नेपाली को लक्ष्य भाषा के रूप में चुना है और स्रोत भाषा है उनकी मातृबोली डोगरी भाषा। उनके इस अनुवाद का अवलोकन करते हुए स्पष्ट होता है कि नेपाली में अनुवाद करने में भी उनकी कलम बेजोड़ है। स्थान-स्थान पर प्रयुक्त ठेठ नेपाली अभिव्यक्ति और परिष्कृत नेपाली भाषा प्रयोग से उनकी नेपाली भाषा क्षमता और इसके प्रतिपादन सामर्थ्य का स्पष्ट परिचय मिलता है।

सुवास दीपक का यह अनुवाद कार्य इसी तरह के महत् कार्य की ओर एक जीवंत प्रयत्न है। इसके माध्यम से डोगरी और नेपाली दो भाषा-भाषी समाजों के बीच संवादात्मकता का स्थापन आरंभ हुआ है। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए अनुवादक सुवास दीपक बधाई के पात्र हैं। आशा की जाती है कि इस दिशा की ओर उनसे अन्य ठोस और महत्वपूर्ण कार्य संपन्न होंगे।”

(‘पल-विपल’ की भूमिका से, नेपाली से अनूदित, 2000)

इस टिप्पणी से मैं पूर्णतः सहमत हूँ। हिंदी में मेरा लगाव मौलिक लेखन से कहीं अधिक अनुवाद में बना रहा जो मुझे हिंदी से जोड़े रखा।


प्रदीप त्रिपाठी: अनुवाद के क्षेत्र में अपने योगदान के संदर्भ में संक्षेप में बताइये।

सुवास दीपक: हाँ, अब मैं अपने अनुवाद साहित्य के बारे में क्रमशः आपको कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियों से अवगत कराना चाहूँगा।

 नेपाली से हिंदी में-

1.  भारतीय नेपाली कहानी विशेषांक, हिंदी मासिक ‘साहित्य निर्झर’ का विशेषांक अक्टूबर 1974 में चंडीगढ़ से प्रकाशित हुआ था, जो भारतीय नेपाली कहानियों का हिंदी में प्रकाशित प्रथम अनुवाद है।

2.  प्रस्ताव, हिंदी मासिक पत्रिका, पटना के जून, 1981 के अंक के ‘भारतीय नेपाली कथा खंड’ में छह भारतीय नेपाली कहानियों के हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुए।

3.  भारतीय नेपाली कहानियाँ, निर्माण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारतीय नेपाली कहानियों का प्रकाशित प्रथम हिंदी में संकलन, 1996 में प्रकाशित हुआ।

3.  क्रूसीफाइड प्रश्न तथा अन्य कविताएँ, कवि पवन चामलिङ ‘किरण’ की नेपाली कविताओं का हिंदी अनुवाद, 1996 में प्रकाशित हुआ। यह भारतीय नेपाली कविताओं का प्रथम अनूदित संकलन है।

4.  शिखर कथा कोश (भाग-1 और भाग-2, कमलेश्वर द्वारा संपादित 35 भारतीय नेपाली कहानियों का हिंदी अनुवाद, पुस्तकायन, नई दिल्ली द्वारा प्रथम भाग सन् 1999 और दूसरा भाग 2000 में प्रकाशित हुआ।

5.  सहयात्री, लैनसिंह बाङ्देल के प्रसिद्ध लघु उपन्यास ‘लङ्गडाको साथी’ का हिंदी अनुवाद, निर्माण प्रकाशन द्वारा 2001 में प्रकाशित हुआ।

6.  क्रमश:, पी.अर्जुन के खण्डकाव्य का हिंदी अनुवाद, विश्व मानव भारतीय नेपाली साहित्य प्रकाशन, दार्जिलिंग द्वारा 2002 में प्रकाशित हुआ।

7.  अथाह, विन्द्या सुब्बा के साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त नेपाली उपन्यास का हिंदी अनुवाद, निर्माण प्रकाशन द्वारा 2003 में प्रकाशित हुआ।

8.  एक बहती नदी, प्रद्युम्न श्रेष्ठ की नेपाली कविताओं का हिंदी अनुवाद, हिमाली प्रकाशन, देन्ताम द्वारा 2010 में प्रकाशित हुआ।

9.  भावधन तथा अन्य कविताएँ, अमर बानियाँ ‘लोहोरो’ की नेपाली कविताओं का हिंदी अनुवाद, काव्याक्षर प्रकाशन, गंगटोक, सिक्किम, 2015 इसी कड़ी में देखा जा सकता है।

10.  आधी सदी की कविताएँ, केदार गुरुंग की नेपाली कविताओं का हिंदी अनुवाद, जनपक्ष प्रकाशन, गंगटोक, 2015 में प्रकाशित हुआ।


हिंदी से नेपाली में-

1.  संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र, डॉ. गोपीचन्द नारंग के समीक्षा ग्रन्थ का नेपाली अनुवाद, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा 2008 में प्रकाशित मेरी महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में से एक है।

2.  इसी क्रम में ‘मेरा एकाउन्न कविताहरू’, प्रख्यात हिंदी कवि एवं भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हिन्दी कविता संग्रह ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ का नेपाली अनुवाद, 2006 में निर्माण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।

डोगरी से नेपाली में-

1.  पल–विपल, डॉ. ओम गोस्वामी के डोगरी उपन्यास ‘पल–खिन’ का  नेपाली अनुवाद,  निर्माण प्रकाशन द्वारा 2003 में प्रकाशित हुआ। यह मूल डोगरी भाषा से नेपाली में अनूदित प्रथम प्रकाशित कृति है जिसका सन् 2003 में साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार के लिए चयन किया गया था।

2.  कमालपुरको चमत्कार, डॉ. ओम गोस्वामी के डोगरी बाल उपन्यास ‘कमालपुर दी करामात’ का नेपाली अनुवाद, निर्माण प्रकाशन द्वारा 2003 में प्रकाशित पुस्तक है।

अंग्रेजी से हिंदी में-

      जमीन से जुड़े एक राजनीतिज्ञ का सफरनामा, सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिङ की योगेंद्र बाली द्वारा लिखित जीवनी Daring to be Different का हिंदी अनुवाद, सह–अनुवादक पदम क्षेत्री, आत्माराम एण्ड सन्स, दिल्ली द्वारा 2009 में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके अलावा विभिन्न विधाओं में तीन दर्जन से ज्यादा सरकारी दस्तावेज व ग्रंथों का अंग्रेजी से नेपाली व हिन्दी तथा हिन्दी व नेपाली से अंग्रेजी में परस्पर अनुवाद मेरे द्वारा किया गया है। देश की शीर्ष हिंदी पत्रिकाओं में भारतीय नेपाली कहानियों और कविताओं के अनुवाद भी प्रमुखता से प्रकाशित होते रहे हैं।


प्रदीप त्रिपाठी: अपने समकालीनों कथाकारों के मध्य अपनी उपस्थिति को आप किस रूप में देखते हैं? हिंदी कथा-साहित्य में अपने समकालीन कथाकारों के बारे में कुछ बताइये।

सुवास दीपक: 1970-80 की अवधि में मेरे समकालीन कथाकारों में प्रमुख नाम हैं– लघुकथा के उल्लेखनीय हस्ताक्षर रमेश बतरा (निधनः 1999), नरेंद्र निर्मोही, सुरेंद्र मनन,  कमलेश भारतीय, शामलाल मेंहदीरत्ता प्रचंड,  प्रेम जनमेजय आदि। इन सभी से मेरा व्यक्तिगत परिचय था। 1973 से 1979 के बीच मैं हर साल चंडीगढ़ प्रवास में उनसे मिलता था। 1980 के बाद धीरे-धीरे इन सभी से संपर्क टूटता चला गया। कारण थे – इधर दार्जिलिंग पहाड़ में और उधर पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता जिसका एक दशक तक आवागमन पर बुरा प्रभाव पड़ा।

            मैं एक सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक पत्रकारिता में 1978 से जुड़ गया था। जिसमें अनेक समस्याएँ थीं। इस सबका एक प्रमुख प्रभाव मेरे मौलिक लेखन पर भी पड़ा। कविता-कहानी पीछे छूट गई – नेपाली में भी और हिंदी में भी। पूर्णकालिक पत्रकारिता – निजी प्रकाशन और मुद्रण व्यवसाय़ जिसमें आर्थिक अनिश्चितता की तलवार सिर पर हर वक्त लटकी रहती थी।

            यही कारण रहे कि मैं अपने समकालीन हिंदी कथाकारों से ही नहीं – मौलिक लेखन से भी अपदस्थ होता गया। इतना जरूर है कि मैं अपने समकालीनों की कृतियाँ मंगवाकर पढ़ता रहा। मेरे समकालीनों में कुछ तो लिखना ही छोड़ दिए। व्यक्तिगत तौर पर नहीं उनकी रचनात्मकता से जुड़ा रहा। इसके साथ-साथ भारतीय नेपाली कहानियों और कविताओं के नेपाली से हिंदी में इसी दौरान काफी अनुवाद किए जो ‘पहल’, ‘खास खबर’, ‘भाषा, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ तथा कुछ अन्य हिंदी पत्रिकाओं में छपते रहे।

            80 के दशक से हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन भी धीरे-धीरे बंद होते गए। ‘सारिका’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’, आदि का युग धीरे-धीरे समाप्त होता गया जिसका खामियाजा साहित्य को भुगतना पड़ा। जब मैंने लिखना शुरू किया था तो मेरे सामने हिंदी साहित्य के महारथियों और युवा रचनाकर्मियों का एक अति ऊर्जापूर्ण जमावड़ा था। वरिष्ठ साहित्यकारों में कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, शैलेश मटियानी,  नरेंद्र कोहली, काशीनाथ सिंह, सतीश जमाली, ज्ञानरंजन,  स्वदेश दीपक आदि की विरासत थी तो मेरे समकालीन रमेश बतरा, तरसेम गुजराल, बलराम, कमलेश भारतीय, सुरेन्द्र मनन, नरेन्द्र निर्मोही आदि का आत्मीय संसर्ग था। जहाँ तक प्रभावित होने का सवाल है तो यह प्रभाव प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों स्तरों पर पड़ा। मुझे इन प्रभावों से अपने लेखन में एक दिशा मिली। यह प्रभाव एकपक्षीय नहीं था बल्कि बहुपक्षीय और बहुआयामी था।

1950-70 की हिंदी कहानी-यात्रा

            आजादी के बाद 1950-70 के बीच के दो दशक हिंदी कहानी के क्षेत्र में आंदोलनात्मक गतिविधियों के रहे। यूरोप का ‘अस्तित्ववाद’ और अमेरिका का ‘हिप्पीवाद’ अपनी सीमाएँ लांघकर भारत के महानगरों के पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित अंग्रेजी पढ़-लिखे संभ्रांत युवाओं के लिए आकर्षण के केंद्र बन रहे थे। बहुत कम अंग्रेजी पढ़-लिखे हिंदी युवा लेखक ‘अस्तित्ववाद’ (Existentialism) की समझ रखते थे – बाकी केवल अनुकरण करने लगे। ‘हिप्पीवाद’ का असर वाराणसी और कलकत्ता के युवाओं तक ही सीमित रहा। आधुनिकता को आतंक से हिंदी साहित्य पर असर जरूर पड़ा परन्तु उसका कुछ ही वर्षों बाद पश्चिम से आया आधुनिकता का प्रभाव निष्कर्षहीन होता कमजोर अवश्य होता गया परन्तु विलुप्त नहीं हुआ, कहानी के कथ्य और शिल्प पर अवश्य प्रभाव पड़ा। ये ‘कलमी आन्दोलन’ और ‘अवधारणाएं’ इसलिए कमजोर पड़ती गईं क्योंकि उनसे भारतीय निम्न मध्यवर्ग की सामाजार्थिक वास्तविकता की पहचान नहीं हो पाई। कुछ उच्च शिक्षा प्राप्त शहरी युवाओं में सीमित ये कलमी आंदोलन शहरों की सीमाएँ लांघ नहीं पाए और यह महज एक अल्पजीवी (जिसे बंगाल की ‘भूखी पीढ़ी’ नाम दिया गया था, एक अ-साहित्यिक आंदोलन बन कर रह गाया और साहित्य के परिदृश्य से लोप हो गया।

            1966-67 तक यह लगभग समाप्त हो चुका था। लक्ष्मीकांत वर्मा (‘विकल्प’, नवंबर, 1967) में लिखते हैं- “भूखी पीढ़ी का आंदोलन अब समाप्तप्रायः है। जितनी तीव्रता से इसका जन्म हुआ था,  उतनी ही तीव्रता से उसका अंत भी हो गया।... तक बंगला की भूखी पीढ़ी का जितना भी अनूदित साहित्य पढ़ने को मिला, उससे यह पता नहीं चला कि इस आंदोलन ने अब तक साहित्यिक दृष्टि से या सौंदर्यात्मक दृष्टि से किसी भी प्रकार की सृजनात्मक उपलब्धि अर्जित की है। यह अ-साहित्यिक आंदोलन केवल एक संकट एवं संक्रमण का परिचय तो देता है, यह संक्रमण अभी इतना तरल है कि वास्तव में यह क्या है, कहना कठिन है। इसे ‘बीटनिक’ आंदोलन का छाया रूप भी नहीं कहा जा सकता। वह ‘एंग्री यंगमैन’ के समान भी नहीं है और न वह उस ‘एग्जिस्टेंशयलिज्म’ से ही प्रभावित है, जिसका अंत आज यूरोप में हो चुका है। केवल एक झीनी-सी झलक ‘जीन्सवर्ग’ की मिलती है, किंतु वह मात्र सहानुभूतिपरक है। उससे पूर्णतः यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह किसी भी प्रकार से बीटनिक आंदोलन की प्रतिच्छाया था। ... मेरा निश्चित मत है कि भूखी पीढ़ी का समूचा आंदोलन अभिव्यक्ति के नए माध्यमों की तलाश कर रहा था या ऐसा मिथ्याभास पैदा करता था। वह अर्थ के नए संवेगों को अनावरण संदर्भों में रख कर देखने का प्रयास कर रहा था। मगर उसकी अनुभूतिशीलता खण्डित और अतिवादी आग्रहों के कारण अपूर्ण रही। अनावरण-संदर्भों के प्रति आग्रह केवल घिसी-पिटी रीति, परंपरा, अंधविश्वास के प्रति एक अस्वीकृति और विद्रोह का परिणाम देता है। अंधविश्वास और ईश्वर के प्रति उसमें विद्रोह तो हो रहा है, किंतु जिस वेग और तीव्रता के साथ यह विद्रोह व्यक्त हुआ है, उसमें किसी भी प्रकार के सौंदर्यात्मक गठन की क्षमता नहीं आ पाई। मुझे कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि इस आंदोलन के प्रवर्तकों के हाथों ‘प्रदर्शन’ (Exhibition) ही ‘अभिव्यक्ति’ (Expression) बन गया है।... हिंदी की प्रकृति में वह अनुभूतियाँ कभी भी उस रूप में नहीं आ सकतीं, जिस रूप में वे बांग्ला में हैं, क्योंकि मैं मानता हूँ कि बांग्ला का अधिकांश मानसिक स्तर घोर रोमांटिक है और वह ‘भूखी पीढ़ी’ का आंदोलन भी उसी रोमांटिक वृत्ति की अभिव्यक्ति थी। हिंदी को रोमांटिक आंदोलन से मुक्त हुए आज काफी दिन हो चुके हैं।”

            धनंजय (‘आज की कहानीः यथार्थ के बदलते हुए वृत्त’, (विकल्प, नवंबर 1967)  में  लिखते हैं- “ सन् 1966-67 में असंतोष की एक तीव्र लहर चली थी। हड़तालें, जुलूस, जलसों की गहमागहमी में कई राजनीतिक, सामाजिक संस्थाएँ प्रकाश में आईं। समाज में असंतोष का पैमाना भर चुका था किंतु एक निश्चित आयाम न होने और राजनीतिक समझ के अभाव में यह लहर विद्रोह का रूप न धारण सकी और दूध का उफान बन कर रह गयी। यही दबा असंतोष सन् 1973-74 में और भी प्रचंड रूप में सामने आया जिसका सही उपयोग तब भी न हो सका और व्यवस्था ने भय व आतंक फैलाया और पूरे समाज को काले दौर से गुजरना पड़ा। ‘नई कहानी’ ने (समय और इतिहास के क्रम में) व्यक्ति को उसके समूचे संदर्भों के साथ पहचाना। मूल्यों के बदलाव को स्वीकारा। पिछली बन रही मान्यताओं, पद्धतियों, सार्थकताओं, संबंधों से या तो पूर्णतः इनकार किया या उन्हें नए संदर्भ देकर देखा। यही यथार्थ की बात भी सामने आती है। अपने सम्प्रेषण में अधिक से अधिक ईमानदार रहते हुए नई कहानी ने यथार्थ से अपने को केंद्रित किया। यह यथार्थ चाहे व्यक्ति का रहा हो या परिवेश का, सहजता का रहा हो या संश्लिष्टता का, जीवन के बाहर रहा हो या जीवन में से निकला हो, आदर्श से मुक्त खाँटी यथार्थ का था!”

            ‘हस्तक्षेप’ (सं. नरेन्द्र निर्मोही, निर्झर सहकार मंडल, 1979) में झवरीलाल पारख ने लिखा- “ दिनमान (टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन) में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने इस बात पर बल दिया कि समकालीन साहित्य का ‘जनवादी साहित्य’ की अपेक्षा ‘जन साहित्य’ ज्यादा सार्थक शब्द है, यह बिना ‘वादी’ हुए भी लिखा जा सकता है। ‘वादी’ होना एक आग्रह में बंधना है और दुराग्रही होना है। जनवादी कहना उस दुराग्रह के लिए रास्ता खोलना ही नहीं,  उसका स्वागत करना है। यहाँ सवाल आग्रह और दुराग्रह का नहीं है, न ही किसी विशिष्ट राजनीतिक पार्टी का। जनवाद का अर्थ मार्क्सवाद नहीं है। जनवाद साहित्यिक स्तर पर वह मोर्चा है जो पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और सामंतवाद के विरुद्ध है किंतु जिसके हित केवल सर्वहारा के हित नहीं हैं अपितु सर्वहारा सहित समस्त मध्यवर्ग के हित संरक्षित हैं क्योंकि वर्तमान व्यवस्था के शोषण का शिकार सर्वहारा वर्ग ही नहीं है अपितु मध्यवर्ग भी है। किंतु मध्यवर्ग की मानसिक बुनावट ऐसी है कि उसकी आकांक्षाएँ उच्चवर्ग के समकक्ष होती हैं तो परिस्थितियाँ निम्नवर्ग के समकक्ष। परिणामतः मध्यवर्ग इन दोनों वर्गों के बीच झूलता रहता है। जनवादी साहित्य का यह भी कार्य है कि मध्यवर्ग की वास्तविकता को उजागर करे, उसे सर्वहारा को नजदीक लाए, वह अपने हितों को सर्वहारा के साथ जोड़कर देखे।”

            मेरे समक्ष कोई प्रत्यक्ष रूप से कोई ऐसा लेखक–पत्रकार नहीं था जो हिंदी के माध्यम से मेरी रचनाओं पर अपने विचार व्यक्त करता – मेरे अंदर के लेखक को दिशा देने में तत्कालीन पत्रिकाओं में लिखने वाले लेखक थे– उन्हीं की रचनाओं से मैं उनसे रूबरू होता था और अपना रास्ता बनाता था।


प्रदीप त्रिपाठी: आपकी रचनाओं में आम-आदमी का संघर्ष एवं व्यवस्था विडंबना के सवाल प्रमुखता से उभरकर आए हैं। अपने कहानी संग्रह ‘चक्रव्यूह तथा अन्य कहानियाँ’ तथा उपन्यास ‘अरण्य रोदन’ की रचना-प्रक्रिया एवं विषयवस्तु के बारे में कुछ बताइये।  

सुवास दीपक: चक्रव्यूह तथा अन्य कहानियाँ विविधता से भरा हुआ कहानी संग्रह है जबकि अरण्य रोदन में शिक्षक, शिक्षण, शिक्षा-व्यवस्था और शासनतंत्र पर केन्द्रित मौजूदा व्यवस्था और राजनीति के अन्याय और अन्दरूनी कुचक्रों का बार-बार शिकार बनता है। कहानियों व उपन्यास का मुख्य पात्र वह सामान्य सहिष्णु व्यक्ति न होकर एक संवेदनशील जागरूक और जुझारु व्यक्ति है; अपने आस-पास अपने देश में चल रहे अन्याय, अत्याचार और सामान्य आदमी के खिलाफ साधन-सम्पन्न वर्ग के षड़्यंत्रों और राजनीतिक अवसरवाद द्वारा पैदा की जा रही विकृतियों से परिचित है और इसीलिए अन्याय-अत्याचार के हर प्रसंग में अपनी असहायता-असमर्थता के अहसास से, इस शोषण, उत्पीड़न और अपमान के शिकार वर्ग के खिलाफ एक तीव्र घृणा, कच्चे आम जैसी कड़वाहट और तल्ख आक्रोश से भर जाता है। वह जूझता भी है, परास्त भी होता है क्योंकि आम आदमी की तरह उसके पास उस निरंकुश तंत्र व व्यवस्था से लड़ने के साधन नहीं हैं।

            कहानियों का रचना संसार किन्हीं विशिष्ट, महत्वपूर्ण घटनाओं-पात्रों-स्थितियों द्वारा निर्मित नहीं होता लेकिन अपने स्वरूप के उदघाटन में कहानीकार की संवेदनात्मक और वैचारिक भागीदारी से विशिष्ट तथा महत्वपूर्ण बन जाता है। ये आम आदमी के खण्डित सपनों की कहानियाँ हैं। इस संग्रह में निम्नलिखित बिन्दु प्रमुखता से देखे जा सकते हैं-

- सामान्यजन की संघर्षशील वृत्ति, आशा-आकांक्षा के निरन्तर बाधित होते जाने की मानसिकता, तथा प्रतिरोधी शक्तियों के तीव्रतर होते दुराग्रहों का उद्घाटन।

- यह एक ऐसी रचना-यात्रा है जो जीवन के समानांतर चलती हुई चुकने की नियति का निषेध करने की क्षमता रखती है।

-  रचना निश्चित ही उन दबावों के द्वंद्व से होती है जिनकी सत्ता से मानव-सापेक्षता को खतरा महसूस होता है। रचनाकार का धर्म है कि तमाम द्वंद्व के बीच मानव जिजीविषा को नया तर्क देकर प्रमाणित करता रहे।

- बदलते संदर्भों का यथार्थ, वस्तुपरक यथार्थ का कलात्मक रूपान्तरण।

      सामान्यजन की संघर्षशील वृत्ति, आशा-आकांक्षा के निरन्तर बाधित होते जाने की मानसिकता, तथा प्रतिरोधी शक्तियों के तीव्रतर होते दुराग्रहों का उद्घाटन करती यह एक ऐसी रचना-यात्रा है जो जीवन के समानांतर चलती हुई चुकने की नियति का निषेध करने की क्षमता रखती तो रखती है लेकिन उसे निरंतरता नहीं दे पाती।

      ‘चक्रव्यूह’ कहानी शोषण के विरुद्ध दम भरने वाले किस तरह खुद शोषण का शिकार होते हैं, उसका भोगा हुआ यथार्थ है। आज के परिप्रेक्ष्य में एक अदने से रिपोर्टर व संपादक के जिंदा रहने की नियति, समाज के जड़, संवेदनशील, निर्लिप्त, उदासीन, और पलायनवादी होने की वजह से अपने कर्तव्य का नैतिक निर्वहन न कर पाने की लाचारी, घुटनेटेक विवशता! ‘स्व’ के मृत होने की त्रासदी है चक्रव्यूह... कहानी। ये कहानियाँ युवा मन को, बिना किसी लाग-लपेट के, अपने असली रूप में, रचनात्मक स्तर पर पड़तालने में प्रयासरत हैं। कहानियों के अंदर छुपे महीन सूत्र इस तथ्य की ओर इशारा हैं।

            आज के परिप्रेक्ष्य में एक अदने से रिपोर्टर व संपादक के जिंदा रहने की जद्दोजहद, समाज के जड़, असंवेदनशील, निर्लिप्त, उदासीन, और पलायनवादी होने की वजह से अपने कर्तव्य का नैतिक निर्वहन न कर पाने की लाचारी, घुटनेटेक विवशता! ‘स्व’ के मृत होने की त्रासदी। रचनाकार अपने समय को देखता है –तटस्थता से- शोषण-उत्पीड़न को स्वयं भोगता है – भोगा हुआ यथार्थ उसकी रचना को प्रामाणिकता प्रदान करता है।


प्रदीप त्रिपाठी: आपकी रचनाओं में हास्य-व्यंग्य के चित्र प्रमुखता से उभरकर आए हैं। मेरे ख़याल से व्यंग्य विषयवस्तु के अनुसार भाषा में सहज रूप में ढल गया है, इस पर आपका क्या मंतव्य है?

सुवास दीपक: मेरी कहानियों की प्रमुख प्रवृत्ति व्यंग्य रही। मेरे स्वभाव में, मेरे संस्कारों में व्यंग्य का एक संतुलित ‘कोटा’ है। व्यंग्य का एक स्थायी-भाव, एक ‘अंडरकरंट’ (अंतर्भाव) मेरे अंदर निरंतर प्रवाहित होता रहता है। बड़े से बड़े संकट में भी यह धारा बाधित नहीं होती। मेरी बातचीत की भाषा में भी हास्य-व्यंग्य का स्वतः प्रस्फुटित हो जाता है। यह मुझे संस्कारों से मिला है। मेरे पिताजी हर बात चाहे बच्चों को डांटना हो, प्यार-दुलार करना हो, सीख-उपदेश देना हो तो वे सीधे शब्दों में नहीं बल्कि व्यंग्यात्मक लोकोक्तियों या मुहावरों का सहारा लेते थे।

            आज मैं इसकी व्याख्या इस प्रकार से कर सकता हूँ – मेरी मातृभाषा डोगरी-पहाड़ी में वार्तालाप के दौरान आम पढ़े-लिखे हों या निरक्षर किसी भी स्थिति (प्यार-दुलार, डांट-फटकार, सीख-उपदेश) पर अपने दैनिक व्यवहार में हास-परिहास, हास्य-व्यंग्य का प्रयोग करते हैं। पहाड़ी जीवन की कठिन जीवन -परिस्थितियों में भी लोग प्रसन्नतापूर्वक जीवन-यापन करते हैं। पहाड़ों में एक बात प्रचलित है कि “अगर साथी हंसमुख (पहाड़ी बोली में ‘गप्पिया’- गप्पाड़) हो तो मीलों का रास्ता बिना थके पार हो जाता है।”

व्यंग्यकारों का प्रभाव एवं सृजन-

1) नरेंद्र कोहली के एब्सर्ड उपन्यास,

2)  व्यंग्य और एब्सर्ड शैली का अवलंबन,

3)  समूचे लेखन में व्यंग्य, विद्रूप और एब्सर्ड की अंतरधारा का प्रवाह

4)  1970 के उत्तरार्द्ध में नरेंद्र कोहली ने एब्सर्ड उपन्यास लिखे थे, जिनमें मैंने एक-दो पढ़े थे, उनकी समीक्षाएँ भी। उनकी इस शैली का प्रभाव अरण्य रोदन और मेरी कुछ कहानियों में अवश्य पड़ा है।

            हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी, फिक्र तौंसवी, के.पी. सक्सेना की व्यंग्य रचनाएँ आकर्षित करती थीं। जिनसे तात्कालिक समाज के पाखंड को समझने का रास्ता साफ हुआ। उनका लेखन समाज के समूचे विद्रूप को अनावृत कर देता। इससे तत्कालीन सामाजिक अनुभव की विशिष्टता और उसके वास्तविक कलात्मक प्रतिफलन की आवश्यकता को भी स्पष्ट किया।

            मेरी कहानियों और उपन्यास में व्यंग्य, विद्रूप, फंतासी और एब्सर्ड का एक मिश्रण पाया जाता है। लगभग सभी कहानियाँ लेखक के अनुभव क्षेत्र की देन हैं। आत्मकथा शैली का प्रयोग भले कम मिले परंतु लेखक कहानी की हर स्थिति में उपस्थित है। यह उसका भोगा हुआ यथार्थ है। युवा स्वप्नभंगता, आर्थिक अस्थिरता और विभीषिकाएँ, असफलताएँ, चरित्रों का पराजय बोध, एक परिस्थिति से जूझते परास्त हो जाने के बाद फिर नई स्थिति से जूझने की अदम्य इच्छाशक्ति, हर पराजय से अगले युद्ध से लिए लड़ने के लिए फिर उठ खड़े होने की अनवरत उत्तरजीविता।

‘चक्रव्यूह एवं अन्य कहानियाँ’ की अधिकांश कहानियों में व्यंग्य की स्पष्ट धार मौजूद है। (1) बिल्ली के गले में घण्टी, (2) चक्रव्यूह... (3) पड़ोस (4) जाना एक मास्टर का परीक्षा अध्यक्ष बनकर... आदि में यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप में उपस्थित है।

            ये कहानियाँ आज के युवा मन को, बिना किसी लाग-लपेट के, अपने असली रूप में, रचनात्मक स्तर पर पड़तालने में प्रयासरत हैं। साधारण आदमी की मानसिक और दैहिक सक्रियता की हुंकार इस चुप्पी में ही उगेगी, कहानियों के अंदर छुपे महीन सूत्र इस तथ्य की ओर इशारा है।

            70 के दशक का कहानीकार एक विशेष प्रकार के रचनात्मक तनाव के बीच जी रहा था। यह तनाव केवल रचना की समस्या के स्तर पर न उभर कर जीवन से घूम-फिर कर आने वाले प्रश्नों से उत्पन्न होता है और फिर उसका विस्तार रचना के धरातल पर होता है। अर्थात रचना और जीवन दोनों में रचनाकार की समस्या है दोहराते संदर्भों में नई पहचान बनाती है।


प्रदीप त्रिपाठी: समय सापेक्ष लेखन में आप अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को किस रूप में देखते हैं? बतौर रचनाकार आप किन-किन लेखकों से प्रभावित हैं?

सुवास दीपक: मेरे निर्माण-ध्वंस का कालखण्ड-

            मैं तीव्र आवेग से आक्रान्त रहता था, यह मेरा रचनात्मक उर्वरकाल था। मेरे हिंदी लेखनकाल की परिस्थिथियाँ ही ऐसी थीं कि केवल प्राप्त पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएँ ही मेरी पथ-प्रदर्शक थीं। सिक्किम में हिंदी साहित्य का परिवेश नहीं था – (अब भी कहाँ है!) हिंदी पुस्तकें डाक से मंगवानी पड़ती थीं – प्रमुख पत्रिकाएँ जरूर यहाँ समाचार बिक्रेताओं से मिल जाती थीं।

            हिंदी में मेरा केवल स्कूली पाठ्य पुस्तकों से ही वास्ता रहा। कॉलेज का दो वर्ष का अध्ययन विज्ञान और गणित का। फिर 7 वर्ष के अंतराल के बाद 1973 से तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम और दो वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम 1977 में पत्राचार के माध्यम से पूरा किया – हिंदी में द्वितीय श्रेणी में पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की।

            यह कहना मेरे लिए लगभग कठिन है कि मैं किस लेखक से प्रभावित हुआ। यह प्रभाव एकपक्षीय नहीं होता क्योंकि एक रचनाकार की एक विशाल कैनवास पर अन्य रचनाकारों के वैचारिक मुठभेड़ होती है। दूसरों से कितने कम या ज्यादा प्रभावित होने में किसी रचनाकार के लिए उसके संस्कार भी महती भूमिका निभाते हैं। विभिन्न वैचारिक धाराओं के अंधड़ों में भी एक संवेदनशील और सजग रचनाकार कुछ-न-कुछ अपने लिए रख लेता है जो उसके तंतुओं को छूता हो – नहीं तो वह उस तीव्र बहाव में बह जाएगा।

            मेरी बौद्धिकता स्वाध्याय से स्वयं को ऊपर उठाने में प्रयत्नरत स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य में पनपी प्रगतिशील विचारधारा और लेखनशैली से प्रभावित है। मैं किन्हीं सिद्धांतों या खेमों से परे संघर्षों से उपजी जीवन-दृष्टि की अनिवार्यता को स्वीकार करता हूँ।

            मैंने उस कालखण्ड में लिखना शुरू किया था जब यह उपमहाद्वीप एक नई वैचारिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। आजादी के बाद स्वतंत्र भारत अपनी युवावस्था में प्रवेश कर रहा था जिसके आगे राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक नेतृत्व का एक अति कमजोर, अनिश्चित और दिशाहीन माहौल था। 1962 में सम्पन्न तीसरे आम चुनाव में कांग्रेस ने भले ही चुनाव जीत कर सरकार बना ली हो, लेकिन उसका वोट शेयर खिसक कर 44.72 प्रतिशत रह गया था। दूसरी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने दूसरे स्थान पर (29 सीटें और वोट शेयर 9.94 प्रतिशत) अपनी उपस्थिति दर्ज की। इसके बाद ‘स्वतन्त्र पार्टी’ (मुक्त बाजार पार्टी) ने 18 सीटें जीतीं (वोट शेयर 7.89 प्रतिशत)। राष्ट्रीय राजनीति में जनसंघ ने 14 सीटें जीतीं तथा ‘पीएसपी’ (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी) ने 12 और पहली बार दक्षिण से एक नव विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टी – ‘डीएमके’ (द्रबिड़ मुणेत्र कड़गम) का उभार सामने आया जिसने 7 सीटें जीतीं। दक्षिण भारत से डीएमके का अवतरण भारतीय राजनीति में एक अलग सोच का उभार था। नेहरू का यह आखिरी चुनाव था।


प्रदीप त्रिपाठी: ‘अरण्य रोदन’ की प्रासंगिकता के संदर्भ में आपका क्या ख्याल है?

सुवास दीपकः जहाँ तक ‘अरण्य रोदन’ की प्रासंगिकता का प्रश्न है, मुझे लगता है कि मैकाले द्वारा 1835 में थोपी गई अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली केवल अंग्रेजी बोलने वाले और दफ्तरों में उनके लिए प्रशासन में काम करने वाले क्लर्क पैदा करने तक ही सीमित नहीं थी। यह तो हमारी सदियों पुरानी भाषाओं, परंपराओं, चिकित्सा, विज्ञान, सामाजिक ज्ञान-अनुशासनों आदि पर एक ऐसी कुल्हाड़ी थी जिसके प्रहारों से हम आज अपनी परंपराओं, भाषाओं, कलाओं और ज्ञान-विज्ञान के कटे-गिराए पेड़ों के केवल ठूंठ भर रह गए हैं। कुछ भी नहीं बचा है मैकाले की कुल्हाड़ी से। अंदर से खोखले बना दिए गए हम उसी के बनाए मार्ग पर कठपुतलियों के तरह नाच रहे हैं। आजादी के बाद स्वदेशी शासकों को चाहिए था कि इस स्थिति में परिवर्तन लाते। लेकिन सात दशक बीत चुके हैं। क्या हुआ? इस अवधि में तीन-चार पीढ़ियाँ जन्म ले चुकी हैं। आज भी मैकाले ही सर्वत्र मौजूद है। वह मरा नहीं है बल्कि जिंदा है। और हमें तिल-तिल मार रहा है।

      ‘अरण्य रोदन’ काल्पनिक उड़ान नहीं है, एक ऐसी व्यवस्था पर व्यंग्य-प्रहार है जो देश को घुन की तरह खाती हुई खोखला बना चुकी है। ‘अरण्य रोदन’ इसी पीड़ा की अभिव्यक्ति है। इसे कोई अप्रासंगिक कैसे घोषित कर सकता है?


प्रदीप त्रिपाठी: हिंदी का वर्तमान परिदृश्य विमर्शों का है। आज जिस प्रदेश में रहकर लेखन कर रहे हैं, जनजातीय क्षेत्र के रूप में भी इसकी विशिष्ट पहचान है। आपकी रचनाओं में आदिवासी जीवन के प्रश्न बहुत कम दिखाई देते हैं, इसके बारे में आपकी क्या राय है? 

सुवास दीपकः मेरी रचनाओं में आदिवासी जीवन के प्रश्नों का समावेश न हो पाने के पीछे प्रमुख कारण यह है कि स्थानीय भाषाएँ जैसे लेप्चा, भूटिया, लिंबू भाषाओं में जो साहित्य लिखा जा रहा है, वह नेपाली, हिंदी या अंग्रेजी में अनुवाद के माध्यम से उपलब्ध नहीं है। जो कुछ हो रहा होगा वह अकादमिक स्तर पर हुआ होगा। हमारे लिए उनके साहित्य से परिचित होने का जरिया केवल अनुवाद है। मूल भाषाओं की जानकारी न होने और अन्य भाषाओं में भी आदिवासी साहित्य की विभिन्न विधाओं की अनुपलब्धता के चलते कैसे किसी भाषाई समुदाय के विमर्श को अपनी रचनाओं में शामिल किया जा सकता है? दूसरी बात यह रही कि मेरा रचना क्षेत्र पहले कविता और फिर कहानी और उपन्यास लेखन के अतिरिक्त अनुवाद का क्षेत्र रहा जो इन विमर्शों पर केंद्रित नहीं था।


प्रदीप त्रिपाठी: शुरुआती दिनों में आपका एक कविता-संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। आपने नेपाली भाषा के कई महत्वपूर्ण रचनाकारों की कविताओं का अनुवाद किया है/कर भी रहे हैं। बाद के दिनों में आपने कविताएँ लिखनी बंद कर दीं, इसका क्या कारण है?

सुवास दीपकः ‘खुला दरवाजा और पेड़’ (1995) कविता संग्रह भी नेपाली कविताओं के संग्रह ‘आधारशिला’ (1993) की तरह  हिंदी में रचित मेरे प्रारंभिक दौर की रचनाओं के संग्रह हैं।  पुस्तक रूप में छपने के लिए इन दोनों संग्रहों को 26-27 सालों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। ‘खुला दरवाजा और पेड़’ मेरी स्मृतियों का एक तरह का सफर है। यह मेरा अपनी जड़ों से कटने और मेरे किशोर-प्राण मूक कवि को बाहर निकालने का एक माध्यम था।

      इन कविताओं के संदर्भ में कहते हुए किसी लेखक की एक पंक्ति का स्मरण हो उठता है जिसमें उसने कहा है – “भाषा मनुष्य की संवेदना और उसके चैतन्य के बीच का सेतु है।” इस दृष्टि से सोचूं तो ‘मेरी संवेदना और चैतन्य के बीच का छंद, मेरी अस्मिता का छंद’ कहीं गड़बड़ा गया है। मैं खड़ा अनवरत अपने को कुरेदता, अपनी पहचान को मिटाता, फिर बनाता पपीहे में परिवर्तित होकर आकाश की ओर मुंह ताके रहता हूँ। स्मृतियों के आतंक के बीच अनवरत चलते रहने की जिजीविषा व्यक्त करती हैं ये कविताएं। अपनी कविताओं के जरिए स्वयं को उद्घाटित करने का यह एक असफल प्रयास है। जीवन के गड़बड़ाए छंद को संजोने का सफल प्रयास।

      बाद की परिस्थितियाँ इतनी क्रूर और जटिल थीं कि वहाँ मेरी संवेदना के गड़बड़ाए छंद पूरी तरह से बिखर चुके थे। कविता मुझसे जैसे रूठ गई – बिल्कुल वैसे ही जैसे मेरा कंठ।  मेरा कंठ बहुत सुरीला था लेकिन जब जिंदगी के इस खुरदरे धरातल पर पैर रखे तो वहाँ मेरा सुरीलापन शनैः शनैः लोप होता गया।  यह खुरदरा धरातल न जाने कब मेरे सुरीले कंठ को निगल गया, पता ही नहीं चला! यह कंठ मैंने अपने पिता से पाया था। मैंने जब से होश संभाला तो उन्हें गाते हुए सुना। उस जमाने में गाँव में रेडियो नहीं पहुंचा था। आजादी के बाद गाँव में आने वाली भजन, नाटक और रामलीला मंडलियों से भजन या उस अवधि के सिनेमा के गीत सुने। हम बच्चों को कोई पता नहीं था कि वह किसके गीत गाते हैं। बाद में जब गाँव में रेडियो आया तो कुंदनलाल सहगल के गीत, खास तौर पर अवध के नवाब वाजिद अली शाह विरचित और फणि मजूमदार द्वारा 1938 में निर्मित हिंदी फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ (Street Singer) में अमर गायक कुंदनलाल सहगल द्वारा गाया गया ‘राग भैरवी’ पर आधारित गीत ‘बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए..’ बजने पर चौंक पड़ता – लगता कि मेरे पिता गा रहे हैं। उनका कंठ खतरनाक हद तक कुंदनलाल सहगल से मिलता था। विभाजन से पहले रावलपिंडी और लाहौर में पिताजी ने काफी समय बिताया था। उन्हें शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ थी। अधिकारपूर्वक कह सकता हूँ कि मेरे पिता सहगल की नकल नहीं करते थे – वह उनका सहज प्रस्फुटित स्वर था। आज भी कुंदनलाल सहगल को सुनता हूँ तो यही लगता है कि दूसरे कमरे में मेरे पिता ही गा रहे हैं। यह कह कर मैं अपने पिता को उन अमर गायक सहगल से बेहतर गायक प्रमाणित करने की गुस्ताखी नहीं कर रहा हूँ। न ही मैं आज इसे किसी भी तरह से प्रमाणित ही कर सकता हूँ। यह तो केवल मेरे हिस्से का सत्य है जिसे केवल अनुभूति के स्तर पर मैं ही अनुभूत कर सकता हूँ और कोई नहीं। बचपन में मैं स्वयं इस गीत को गाता था। यह गीत मुझे कुंदनलाल सहगल और मेरे पिता से जोड़ता था। आज भी सहगल को सुनता हूँ तो मेरे सामने मेरे दिवंगत पिता जीवंत हो उठते हैं और मैं बच्चों की तरह रोने लग जाता हूँ। अपने पिता से पाया हुआ वह कंठ आज मुझसे रूठ चुका है। इतनी पीड़ा होती है कि उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता। कविता और कंठ दोनों ने मुझे बड़ा कष्ट दिया है।


प्रदीप त्रिपाठी: जाहिर है, सिक्किम में हिंदी का विकास तीव्र गति से नहीं हो पा रहा है। क्या आपको लगता है कि इसके पीछे कोई भाषाई अस्मिता का संकट या भाषाई राजनीति जैसी शक्तियाँ काम कर रही हैं? सिक्किम में हिंदी के विकास को आप किस रूप में देखते हैं, निकट भविष्य में सिक्किम प्रदेश में हिंदी भाषा के विकास की क्या संभावनाएँ दिख रही हैं?

सुवास दीपकः मेरे निजी विचार में किसी जनजातीय क्षेत्र में उस क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों को प्राथमिकता दी जानी आवश्यक है। 1975 तक सिक्किम एक राजतंत्र था। अन्य राज्यों की तुलना में भौगोलिक क्षेत्रफल हो या जनसंख्या की तुलना में सिक्किम क्षेत्रफल में भले ही छोटे राज्यों में गिना जाता हो, भाषाई संदर्भ में यह अति समृद्ध है। राज्य सरकार द्वारा राज्य में बोली जाने वाली हर बोली-भाषा को राजकीय मान्यता दी है और उसके विकास के लिए वित्तीय प्रावधान सुनिश्चित किए हैं।

      सिक्किम में हिंदी के संदर्भ में ‘भाषाई अस्मिता’ जैसा कोई संकट मुझे नहीं दिखता। हिंदी राज्य के स्कूलों में पढ़ाई जा रही है, विश्वविद्यालयों में इसके अध्ययन-अध्यापन के अध्ययन-अध्यापन और शोध की शुरुआत हो चुकी है। युवा पीढ़ी हिंदी की ओर आकर्षित हो रही है, यह एक शुभ संकेत है। इस विषय को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं होना चाहिए। सिक्किम में हिंदी का विकास हो – इसमें किसी तरह के विवाद की गुंजाइश नहीं है।

      सिक्किम में हिंदी के विकास की प्रबल संभावनाएँ हैं। किंतु मेरा मानना है कि हिंदीतर राज्यों में यह प्रक्रिया सहज-स्वाभाविक रूप से होनी चाहिए। किसी तरह का ऐसा प्रयास न हो जो स्थानीय भावनाओं को आहत करे। यह सहज-स्वाभाविक रूप से भारत में संभव हुआ है। उदाहरण के रूप में हम हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश को ले सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में कठिन भौगोलिक स्थिति के चलते हर दस कोस पर स्थानीय बोली में परिवर्तन आ जाता है। अरुणाचल प्रदेश में दर्जनों जनजाति समूह हैं जिनकी अपनी-अपनी बोलियाँ हैं। ये दोनों राज्य आज हिंदी भाषा को संपर्क भाषा के रूप में अपना चुके हैं। मुझे नहीं लगता है कि इसमें कहीं से किसी तरह से भाषा थोपने की बात है।

      सिक्किम में नेपाली भाषा यह भूमिका दो शताब्दी पहले से ही सशक्त रूप से निभाती आ रही है। सिक्किम में नेपाली भाषा विभिन्न भाषाई समूहों के बीच संपर्क-सूत्र और सांप्रदायिक सद्भावना की सुदृढ़ आधारशिला का निर्माण कर चुकी है। इस संदर्भ हिंदी की भूमिका सिक्किम में लागू नहीं हो सकती। हिंदी के विकास में सिक्किम अपनी भूमिका निश्चित रूप से आने वाले दशकों में संभावनाओं से भरी होगी। हिंदी में स्थानीय संस्कृतियों और भाषाओं पर शोध की परंपरा सुदृढ़ हो रही है।


प्रदीप त्रिपाठी: पूर्वोत्तर भारत का हिंदी लेखन हमेशा से हिंदी साहित्य के इतिहास में हाशिए पर रहा है। इसकी मुख्य वजह क्या है?

सुवास दीपकः  इस बात से मैं भी सहमत हूँ, यह सवाल मेरे मन में भी कौंधता रहता है। सिक्किम तो बहुत  बाद में पूर्वोत्तर परिषद का हिस्सा बना 2000 के दशक में, किंतु पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के हिंदी में लिखने वाले लेखक दशकों पहले से लगातार मौलिक लेखन के साथ-साथ अनुवाद के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद-स्थापन का महती कार्य कर रहे हैं। आज क्या वे हिंदी साहित्य में वह स्थान पा सके हैं, जिसके वे हकदार हैं? विश्वविद्यालयों का काम है कि वे उन्हें पहचानें और उनके व्यक्तित्व व कृतित्व का सही परिप्रेक्ष्य में मूल्याँकन करें।

 

प्रदीप त्रिपाठी: लंबे अरसे तक आपने सिक्किम में सक्रिय रूप से पत्रकारिता की है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे।

सुवास दीपकः सिक्किम में वर्षों पहले से ‘जमाना सदाबहार’ (हिंदी साप्ताहिक) का प्रकाशन हो रहा था, जो इस साप्ताहिक की व्यवस्थापिका और संपादक संतोष निराश के निधन से इसी साल से बंद हो चुका है। पिछले दशक से सिक्किम में हिंदी दैनिक ‘अनुगामिनी’ के प्रकाशन से हिंदी पत्रकारिता का सूत्रपात हुआ। इसके बाद एक अन्य हिंदी दैनिक ‘नित्य समय’ (2012-2019) का प्रकाशन हो रहा था जिसका प्रकाशन जुलाई 2019 से स्थगित है। मुख्यतः इन पत्रों की शक्ल समाचार पत्र के रूप ही रही है, यह साहित्यिक पत्रिकाएँ नहीं हैं। डिजीटल मीडिया के अवतरण से ही प्रिंट मीडिया अनेक संकटों से जूझ रहा था। आज वैश्विक महामारी ने तो इसकी कमर ही तोड़ दी है। अब इस संकटमय परिस्थिति में प्रिंट मीडिया का भविष्य अनिश्चित ही कहा जाएगा।


सुवास दीपक

    सुवास दीपक सिक्किम प्रांत के प्रथम हिंदी कथाकार हैं। डोगरी-नेपाली और विशेष रूप से नेपाली-हिंदी भाषाओं के अनुवाद के क्षेत्र में सुवास दीपक का एक प्रतिष्ठित नाम है। सिक्किम में नेपाली पत्रकारिता के उत्थान में सुवास दीपक की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ‘अरण्य रोदन’ सिक्किम प्रांत का अब तक का पहला और अंतिम हिंदी उपन्यास है।  

प्रदीप त्रिपाठी

    प्रदीप त्रिपाठी सिक्किम प्रांत से प्रकाशित हिंदी की प्रथम साहित्यिक पत्रिका कंचनजंघा के संपादक हैं। वर्तमान में सिक्किम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में बतौर सहायक प्रोफेसर कार्यरत हैं।

सेतु, अक्टूबर 2020

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