काव्य रचनाएँ: ज्योत्स्ना प्रदीप

1. हरी-भरी धरा करें (प्रमाणिका छन्द)

हिमाद्रि जो व्यथा सहे।
किसे वही कथा कहे॥
हरी-भरी नहीं धरा।
विहंग का हिया भरा॥

न छाँव है न ठौर है।
न पेड़ है न बौर है॥
न हास है न नीर है।
बयार भी अधीर है॥

चली नही उसाँस है।
भला कहाँ विकास है? 
नदी लुटी पिटी घटी।
कहाँ-कहाँ नहीं बँटी॥

तरंग गंग अंग की।
रही नहीं भुजंग सी॥
मिटी नदी, वसुंधरा।
इन्हें कभी नहीं तरा॥

दया नहीं तजें कभी |
न ज्ञान ही न मान ही ||
सुधा भरें उसे तरें ।
हरी-भरी धरा करें॥



2. माहिया

1
ये कैसे नाते हैं?
गठबंधन पर भी
सब बंध न पाते हैं।

2
बंधन तो हैं मन के
बादल के आँसू
जीवन हैं हर तन के।

3
सरिता भी प्यार करे
मिलकर सागर में
इसका इज़हार करे।

4
सागर में हैं मोती
लहरें भी इसकी
नित मुख इनके धोती।

5
फूलों ने प्यार किया
धरती के तन का
जीभर शृंगार किया।

6
पाहन में बहुत अगन
चोट न दो उसको
झुलसा देगी कानन।

7
दिल मानव का रीता
भू ने रोकर ही
आँचल में ली सीता।

8
हाँ, प्रीत यही होती
पर की पीड़ा में
आँखें तेरी रोती।

 9
धरती का है सपना
रवि के ले फेरे
करले उसको अपनाl


3. हाइकु

1
जब से पिता
छोड़ चले हैं घर
माँ है सावन।

2
भरी कलाई
सूनी सड़क बन
ताके मौसम!

3
हमारा दर्द
आपमें बसता था
दर्द यही है।

4
ऐसा बाबुल
किसका होगा भला
इतना भला!

5
चुप लेटी हैं
मायके की गलियाँ
कुछ दिनों से।

6
आँखों का पानी
कह रहा माँ की
एक कहानी।

7
बहा न सके
दर्द मन का सारा
बहते आँसू।

8
उमर भर
बदलते सपने
चूड़ियों जैसे।

9
पावन मन
ये निष्पाप नयन
फिर भी आँसू!

10
माँ और बाप
वात्सल्य का अनन्त 
पूर्ण आलाप।

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