हिंसा का उत्पादन एवं अहिंसा की सभ्यता

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


हिंसा का उत्पादन जिस मात्रा में पूरे संसार में हो रहा है उससे यह पता चलता है कि हम हिंसा की सभ्यता में ज्यादा जिए हैं। लेकिन यह बात पूरी तरीके से सच नहीं है। बल्कि सच्चाई यह है की हिंसा के मुकाबले अहिंसक सभ्यता का उत्पादन कहीं ज्यादा है। कुछ चीजें दृश्य होती हैं कुछ अदृश्य होती हैं। जो अदृश्य होती हैं, उसका सही आकलन हम नहीं कर पाते। उसका सही आकलन तो प्रकृत करती है। प्रकृति मापतोल कर उसी पैमाने में हमें हमारे अनुकूल वातावरण प्रदान करने की कोशिश करती है। किंतु विडंबना यह है कि हम प्राणी जगत के लोग प्रकृति के साथ उतने अच्छे व्यवहार नहीं करते जितना हमें करना चाहिए। प्रकृति ने ही हमें उष्मा दी, सर्दी का एहसास कराया और उसी पैमाने पर हमें जल-जंगल-जमीन, पहाड़ और नाना प्रकार के जीव-जंतुओं को दिया। कोई इस प्रकार रखने का इंतजाम किया इतने सारे तत्वों-एलीमेंट्स को? किंतु हम सही तरीके से अपनी प्रकृति के साथ न्याय नहीं कर सके। हिंसा का उत्पादन हमेशा करते रहे। यह कहना गलत ना होगा कि दुनिया के तमाम देशों में अहिंसक आचरण वाले कम लोग चिन्हित किए जा सकेंगे और हिंसक प्रवृत्ति वाले अधिक लोग देखने को मिल जाया करेंगे। यह एक कोशिश है की सभ्यता के साथ हिंसा की सभ्यता को लोग पहचाने, और अहिंसक होने की  कोशिश करें। यह कोशिश इस प्रकार से होनी चाहिए कि हमारी सभ्यता ही स्वयं इसका निरूपण इस प्रकार करे की हम सभी प्राणियों से प्रेम कर रहे हों। प्रेम- आसक्ति से किया गया हो तो प्रेम नहीं होता, प्रेम के लिए त्याग आवश्यक है, और त्याग के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, और समर्पण।

हिंसा की सभ्यता इन्हीं त्याग और दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में हमारे सामने ज्यादा विद्रूप होती गई। इससे मनुष्य की जो सभ्यता है, वह कहीं न कहीं उसके मूल स्वरूप की व्याख्या ही नहीं कर पाई। जिसका परिणाम है कि मनुष्य एक हिंसक प्राणी के रूप में ज्यादा जाना गया और यह उसकी नकारात्मक छवि, इस रूप में आज भी हमारे सामने विद्यमान है। अन्यथा अगर हमारे देश के कुछ साधु-संत ऋषि-महर्षि अपने आचरण और अपनी सभ्यता से अहिंसक सभ्यता के शिरोमणि बन सकते हैं, तो भारत या दुनिया के सभी मनुष्य क्यों नहीं अहिंसक हो सकते? वह निसंदेह अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हो सकते हैं, और उसके संवाहक भी हो सकते हैं। ऐसे में सवाल है कि यह पशुता की सभ्यता आई कहाँ से? क्या मनुष्य से? नहीं। फिर कौन सभ्यता के मूल्यों को दरकिनार किया? उन सभ्यता के साथ जीने से स्वयं को अलग किया जो उसके लिए हितकारी न थी?

आज मिस्र की सभ्यता, मेसोपोटामिया की सभ्यता, हड़प्पा की सभ्यता और दुनिया में विकसित हुई अन्य सभ्यताओं का अगर हम अवलोकन करें तो पता चलता है कि मनुष्य का स्वभाव और उसके द्वारा निर्वहन किए गए जीवन आचरण उसके सृजनात्मक पक्ष को ज्यादा रेखांकित करते हैं। यह सृजन का उज्ज्वल पक्ष अगर हिंसा पर आधारित नहीं रहा तो, उसके भी अवशेष हमारे पास उपलब्ध हैं। यदि इसके नकारात्मक पक्ष रहे तो उसके भी अवशेष इन सभ्यताओं में मिलते हैं। इतिहास की खूबसूरती यही है कि वह मनुष्य के उन्हीं पक्षों को रेखांकित करके आने वाली पीढ़ियों को संवाद करने का अवसर देता है, कि हम अपने भविष्य को किस प्रकार आगे ले जाएँ। तो आने वाली पीढ़ियाँ हमारा मूल्यांकन किस प्रकार करेंगी, सोचें जरा! लेकिन सबसे बड़ी चिंताजनक स्थिति तब होती है जब इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया जाता है। इतिहास को अपने मुताबिक लिखवाया जाता है। इतिहास को अपने मुताबिक व्याख्यायित किया जाता है। तब सही बातें हमारे समक्ष नहीं आ पातीं। तब सभ्यता का विमर्श चाहे वह किसी भी सभ्यता का विमर्श हो, सही रूप में हमारे समक्ष सही-सही नहीं आ पाता। ऐसे में, वास्तविकता कुछ और होती है और तथ्य हमारे सामने लिखित रूप से कुछ और आ जाते हैं। लेकिन प्राचीन इतिहास को समझने के लिए जब हमारे पुरातत्वविद प्राप्त अवशेषों के आधार पर अनुमान करते हैं, तो सत्य का उद्घाटन हो ही जाता है। ऐसे तथ्य जिसमें मनुष्य के हिंसक होने की कथा-व्यथा है, वह हमारे अवशेषों में भी पुरातत्वविद या इतिहास के विद्वानों ने प्राप्त किया है, और यह भी उनका एक अच्छा अवदान माना जाएगा कि उन लोगों ने गलत तरीके से प्रस्तुत किए गए इतिहास को नकारा और सत्य का अनुमान हमारे सामने लाने का प्रयास किया। इन अनुमानों के आधार पर भी यह पता चलता है कि दुनिया में हिंसक सभ्यता की एक लंबी परिपाटी है। जिसमें युद्ध, संघर्ष, गोरिल्ला की भांति आक्रमण और दूसरे अन्य प्रकार की जो हिंसा के उपक्रम हो सकते थे, उस समय के मनुष्य करते रहे हैं। लेकिन इससे उनको मिला कुछ नहीं, और हिंसा की सभ्यता और हिंसा का उत्पादन मनुष्य के विनाश का कारण रहा है। ये अनुमान और आंकड़े इतिहास व हमारे लिए काला अध्याय हैं, और इस काले अध्याय से हम कोई प्रेरणा नहीं ले सकते। किंतु विडंबना यह है कि आज भी हम हिंसा के ही सभ्यता पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जो कि हमारे पतन का कारण होगा। क्या यह मनुष्य का स्वभाव कभी पूर्णतया हिंसक से अहिंसक सभ्यता की ओर लौट सकने में सक्षम हो पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।

हिंसा का उत्पादन मनुष्य के सभ्यता का दमन करने लगे तो उसे ऐसी सभ्यता से चिढ़ होनी चाहिए। मनुष्य का स्वयं का इस सभ्यता से नकार आ पाना थोड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि अकूत पूंजी के खेल से सूचना तकनीकी द्वारा निर्मम हिंसा के लिए अब उत्पादन होने लगे हैं। यह उत्पादन मनुष्यों द्वारा किये जा रहे हैं, यह बात मैं इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि राज्य जैसी व्यवस्था भी मनुष्य ही संचालित कर रहे हैं या मनुष्यों का समुच्चय द्वारा ही किया जा रहा है। फिर उसकी सोच क्या अब डूब गयी है? वह सही और गलत का फर्क नहीं कर प् रहा है? मैं ऐसा नहीं मानता बल्कि इसके उलट मैं यह कहना उचित समझता हूँ कि कंठ तक अब मनुष्य अपने विनाश के लिए तैयारी कर चुका है। चाहे हथियारों का उत्पादन हो या विषैले रसायन का उत्पादन, किसी वन क्षेत्र की कटाई हो या ऐश्वर्य की इच्छा, सभी तो मनुष्य को असहज बनाने के ही कोई न कोई रूप हैं। इसके विरुद्ध जो आता है वह भी किसी न किसी हिंसा का शिकार होता है और जो इसमें आकंठ डूबा है वह तो आत्महंता बन ही रहा है। इस पर से एक बात समझ में आती है कि मनुष्य की सहजताबोध पर जो मनुष्य ने स्वयं आघात किया, उसकी वजह से यह हिंसा का उत्पादन बढ़ा है। इससे न मनुष्य के भीतर की शांति बची, न उसके बाहर की शांति बची। इससे प्रकृति और नया प्राणी भी खतरे में आ गए।

प्रकृति से पृथक्क होकर, अपने सहजता से पृथक्क होकर और अपनी पुरानी परम्परा, रीति-रिवाजों से टूटकर कभी भी मनुष्य सभ्य नहीं हो सकता। इसके लिए उसे अपनी जड़ों की ओर लौटना ही पड़ता है। सबसे बड़ा जो परिवर्तन इस असहज ज़िन्दगी से यह हुआ कि लोग अपने ही परिवार में आत्मीयता को किनारे कर कर अपनों से दूर जाने लगे। मनुष्य की मशीनीकृत और लालची सोच से यह पृथक्करण हुआ है। बड़े पैमाने पर हिंसा की उपस्थिति तो परिवारों के मध्य है। यह हिंसा अंतर्कलह है। अंतर्कलह से अनिश्चितता और भय की व्याप्ति हुई है। असुरक्षाबोध बढ़ा है और अविश्वास भी। सभ्यता की यह एक विद्रूप अवस्था है। इससे हम किस संस्कृति का विकास कर सकेंगे? अमानवीय संस्कृति से एक भयावह मनुष्य समाज का उत्पादन होना तय है। जब मनुष्य को ही हिंसा के टूल्स के रूप में समझा जाने लगा तो यह भयावहता एक न एक दिन आनी ही थी। हिंसा का विचार आना ही मनुष्य के भीतर के प्रकाश का बुझ जाना है। यानी इसका मतलब यह है कि व्यक्ति मन और आत्मा को अलग-अलग करके सोच रहा है तभी तो एक व्यक्ति को वह टूल्स के रूप में या अपने जरूरत के साधन के रूप में वह सोच पा रहा है वरना वह ऐसा नहीं करता। यह हिंसा पूरी की पूरी सभ्यता में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन का कारण बनती है। परन्तु एक बात स्पष्ट कर दें कि ऐसी स्थिति मनुष्य के हित में नहीं होती। उपभोगवाद को अधिकांश लोग जीवन-शैली के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, जो सभी प्रकार की हिंसा का और राष्ट्रों के बीच युद्ध का भी कारण है। अहिंसक आर्थिकी की मांग यह रही है कि उपभोगवाद की संपदा की लालसा को नियंत्रित किया जाना चाहिए। इससे न केवल मनुष्य प्रभावित होते हैं अपितु प्रकृति का प्रभावित होना तय होता है।

पुस्तकें यह बताती है कि हिंसा का कोई रूप कोई भी धर्म स्वीकार नहीं करता फिर भी अगर हिंसा की बढ़ोतरी हो रही है तो लगभग सभी धर्म प्रश्नांकित होते हैं। इसके लिए पर्याप्त सुधर की आवश्यकता है। मनुष्य के भीतर सुधर की अनेक संभावनाएँ हैं। वह अपनी इच्छाशक्ति से अपने भीतर और अपने आसपास के समाज को बदल सकता है। वह सोचने-समझने वाला संवेदनशील प्राणी है। लेकिन विचित्र बात यह है कि वह अपने आपको अनुशासित करके इस पृथ्वी की रक्षा के लिए और मनुष्यता के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ रहा है। हमारा भारतीय मानस तो मनीषियों के सर्व-कल्याणकारी सोच से भी अनभिज्ञ नहीं है। लेकिन सबकुछ जान-समझकर अगर ऐसी स्थितियाँ यदि बनी हुई हैं कि हिंसा बढ़ रही है तो ज्यादा चिंता की बात है। क्या हम मनुष्य होकर अपनी सभ्यता के ही मानवीय पक्ष को पुनर्स्थापित नहीं कर सकते? दूर आकाश में टिमटिमाते तारे भी अपनी पहचान अपने प्रकाश से स्थापित करते हैं। फिर मनुष्य तो ब्रह्माण्ड के चौदहों भुवनों में व्याप्त प्रकाश का पुंज है, उससे तो कोई भी उम्मीद की जा सकती है फिर नकारात्मकता ही उस पर क्यों सवार है? हिंसा का गणित इसलिए हम मनुष्यों को समझना आवश्यक है क्योंकि इससे एक स्वस्थ भविष्य या अवसर की उम्मीद नहीं की जा सकती। 


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश), 
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com  

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