पुस्तक समीक्षा: ‘गूगल बॉय’ उपन्यास


समीक्षा: लाजपत राय गर्ग

कृति: गूगल बॉय (किशोर उपन्यास)
लेखक: मधुकांत
प्रकाशक: एस. पी. कौशिक इंटरप्राइजेज, दिल्ली 
प्रकाशन वर्ष: 2020
मूल्य: ₹ 300/- (सजिल्द), पृष्ठ संख्या: 110

'सोद्देश्य साहित्य की उत्कृष्ट कृति'

मधुकांत
 हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा ‘बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सम्मान’ से पुरस्कृत, साहित्य की प्रत्येक विधा में सृजन करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार, डेढ़ सौ के लगभग साहित्यिक कृतियों के रचयिता डॉ. मधुकांत का सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘गूगल बॉय’ भी उनकी अन्य कृतियों की भाँति उनके जीवन के अहम उद्देश्य - स्वैच्छिक रक्तदान - को समाज में विशेषकर युवा वर्ग में लोकप्रिय बनाने का एक सेतु है। उपन्यास की भूमिका पढ़ते समय ही स्पष्ट हो जाता है कि किस तरह लेखक एक वास्तविक वस्तु - एक कबाड़ी की दुकान में रखी बहुत पुरानी कुर्सी जिसपर बहुत सुन्दर कारीगरी की हुई है तथा धूल जमी होने के कारण आम लोगों का ध्यान कभी उसपर नहीं पड़ा - को प्रायः प्रतिदिन देखता है तो उसकी कल्पना उड़ान भरने लगती है और परिणामस्वरूप प्रस्तुत रोचक कृति अस्तित्व ग्रहण करती है।

 आज जबकि बच्चों और युवाओं में कोर्स से इतर कथा-कहानियों की पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति का लोप होता जा रहा है, उपन्यास के पहले ही खण्ड में नायक - गूगल - का पिता गोपाल उसके लिये श्रीमती इन्द्रा स्वप्न द्वारा लिखित पुस्तक ‘दानवीर महापुरुषों की कहानियाँ’ लाकर देता है। बच्चे को संस्कारित करने में माँ की प्रथम तथा महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। गूगल की माँ ने भी उसको बचपन से महापुरुषों की कहानियाँ सुना-सुनाकर पाला-पोसा है। बचपन के संस्कार ही व्यक्ति के आगामी जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। 

 कट-थ्रोट कम्पीटिशन के इस युग में माता-पिता की बच्चों से अपेक्षाएँ इतनी बढ़ गयी हैं कि परीक्षा में एक-आध प्रतिशत नम्बर कम आने पर भी माता-पिता बच्चों को बुरा-भला कहने और कुछ केसों में प्रताड़ित करने में भी नहीं हिचकिचाते। परिणाम क्या होता है, नतीजे जब आते हैं तो समाचारपत्रों में बच्चों द्वारा आत्महत्या के अनेक समाचार पढ़ने को मिलते हैं। इस समस्या का निदान लेखक ने बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। एक, बच्चा जितने नम्बर लेकर पास हो गया, उसे उसके लिये शाबाशी दी जाय। गूगल दसवीं कक्षा में पास हो गया है। उसकी माँ यह समाचार उसके पापा को सुनाते हुए कहती है तो गूगल के पापा और माँ के बीच का संवाद ग़ौरतलब हैं:- 

 ‘अरे वाह, यह तो बहुत ख़ुशी का समाचार है... शाबाश बेटे गूगल, शाबाश।’
 ‘परन्तु नम्बर कुछ कम आये हैं...।’
 ‘कितने?’
 ‘साठ प्रतिशत...’
 ‘अरे भागवान्, साठ प्रतिशत क्या कम होते हैं! पास हो गया, मैं तो इसमें भी गूगल की बहादुरी मानता हूँ। मैं तो आठवीं पास भी नहीं कर पाया था...,’ गोपाल ने गूगल की पीठ थपथपायी।

 दूसरे, गूगल नौकरी दिलाने वाली पढ़ाई की बजाय पैतृक व्यवसाय को और अच्छे से चलाने के लिये कारपेंटर का शिक्षण लेने के लिये आई.टी.आई. में दाख़िला लेने की सोचता है, जिसे गोपाल भी पसन्द करता है। यदि सभी अभिभावकों की सोच गोपाल जैसी हो जाये तो नवांकुरों को मानसिक तनाव से छुटकारा मिल सकता है और उभरती प्रतिभाएँ असमय काल-क्वलित न होकर स्वाभाविक रूप में समाज के उत्थान और विकास में अपना योगदान दे सकती हैं। 

लाजपत राय गर्ग
 कहते हैं कि विपत्ति में ही आगे बढ़ने के अवसर छिपे होते हैं। गोपाल की एक्सीडेंट में आकस्मिक मृत्यु से ही गूगल को उत्तरदायित्व का बोध होता है और वह अपने उत्तरदायित्व को बख़ूबी निभाता ही नहीं, युवाओं के लिये आदर्श भी बनता है। निश्चय ही, उसकी माँ नारायणी का उसकी क़ाबिलियत में विश्वास तथा आशीर्वाद उसे आगे बढ़ने की आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं। अस्पताल में गोपाल की असमय मृत्यु का एक कारण रक्त का समय पर उपलब्ध न हो पाना था और यहीं से गूगल स्वैच्छिक रक्तदान की ओर प्रवृत्त हुआ। उसकी इस भावना को प्रश्रय मिला कॉलेज में सुभाष चन्द्र बोस की जयंती के अवसर पर आयोजित रक्तदान शिविर से पूर्व सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी द्वारा दिया गया भाषण, जिसमें सैन्य अधिकारी ने सुभाष चन्द्र बोस का उद्घोष दुहराया - ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।’ गूगल की मित्र अरुणा द्वारा रक्तदान करने के लिये अपना नाम लिखवाना गूगल के सारे संशय दूर कर देता है और एक बार रक्तदान-यज्ञ में आहुति डालने के बाद गूगल पीछे मुड़कर नहीं देखता, बल्कि अरुणा की भविष्यवाणी - ‘... तुम्हारा उत्साह देखकर तो मुझे लगता है कि एक दिन तुम रक्तदान के महानायक बनोगे....।’ - को अक्षरशः चरितार्थ करता है और महामहिम राज्यपाल महोदय गांधी जयंती के पावन अवसर पर उसे उसकी अद्वितीय रक्तदान सेवाओं के लिये सम्मानित करते हैं। इससे यह उक्ति प्रमाणित होती है कि हर सफल आदमी की सफलता के पीछे एक औरत होती है। यह बात अलग है कि गूगल की उपलब्धियों के पीछे दो स्त्रियों का सक्रिय सहयोग रहा - एक उसकी माँ, दूसरी उसकी मित्र अरुणा।

 सम्भवतः गूगल रक्तदान यज्ञ में इतना बड़ा योगदान न दे पाता यदि बाँके बिहारी जी की उस पर असीम कृपा न बरसती। कहते हैं कि ईश्वर जो करता है, उसका श्रेय स्वयं न लेकर अपने ही किसी अंश को उसका हक़दार बना देता है। यह उसी की कृपा का आशीर्वाद होता है कि निमित्त बना व्यक्ति पूरी कृतज्ञता से सौंपा गया उत्तरदायित्व निभाता है। गूगल की पारखी दृष्टि में कबाड़ी की कुर्सी चढ़ जाती है, किन्तु उसने दस-बीस हज़ार कमाने की सोची थी। उसे क्या पता था कि बाँके बिहारी जी उसे छप्पर फाड़ के देने वाले हैं। बढ़ई की छोटी-सी दुकान थोड़े से समय में ही गोपाल शॉपिंग मॉल में परिवर्तित हो जाती है। इसी तथ्य की ओर लेखक ने ‘भूमिका’ में संकेत किया है - ‘उपन्यास ‘गूगल बॉय’ लिखते हुए मुझे एक और विशेष अनुभूति हुई। वैसे तो कभी भी मैं कट्टर धार्मिक नहीं रहा, सभी देवी-देवताओं में मेरी आस्था रही है, परन्तु कोई विशेष देवता मेरा आराध्य नहीं रहा।....न जाने कैसे मेरे अन्तर्मन में ‘श्री बाँके बिहारी जी’ ने निवास कर लिया।’ लेखक की यही भावना उपन्यास के नायक के जीवन में उदित होती है।

 स्वैच्छिक रक्तदान को सामाजिक आन्दोलन में परिवर्तित करने की लेखक की परिकल्पना पूर्णतः व्यावहारिक है। लेखक ने रक्तदान को अपने जीवन का मिशन बनाया हुआ है और ठोस धरातल पर आशातीत सफलता भी पायी है। इसलिये यह उपन्यास पाठकों तथा समाज के लिये प्रेरणा का स्रोत सिद्ध होगा। 

 शिल्प की बात करें तो लेखक ने अरुणा और गूगल के प्रेम को बहुत मुखरता से अभिव्यक्त न करके भी कथानक को आगे बढ़ाने का माध्यम बनाया है। अरुणा रक्तनारायण कथा के आयोजन में अहम भूमिका निभाती है तथा रक्तदान के सार्थक संदेश को महिलाओं के ज़रिए हर परिवार तक पहुँचाने में गूगल की सबसे बड़ी सहायक बनती है। लेखक ने दो स्वप्न-दृश्यों का सृजन किया है। अपने जीवन में प्रथम रक्तदान करने के पश्चात् गूगल स्वप्न में अरुणा संग आकाश में उड़ान भरता है। गूगल के डील-डौल को देखकर नारायणी स्वप्न में अपने स्वर्गीय पति गोपाल के ख़्यालों में खो जाती है। दोनों ही स्वप्न-दृश्य स्वाभाविकता और रोचकता से परिपूर्ण हैं। 

 स्वैच्छिक रक्तदान के केन्द्रीय भाव के साथ लेखक ने सुबह की सैर (गूगल का सैर को जाना), सदैव कुछ नया करने की तमन्ना (गूगल द्वारा कृष्ण के विराट स्वरूप को लकड़ी पर उतारना), एक गाँव के लड़के-लड़की के विवाह सम्बन्धी अवधारणा को नकारना जैसे मुद्दों को भी रेखांकित किया है। भाषा पात्रानुकूल तथा संवाद कथानक को गति प्रदान करने के साथ-साथ चरित्र-चित्रण करने में भी सहायक सिद्ध हुए हैं।दृष्टांत के तौर पर निम्न संवाद ग़ौरतलब है:

 ‘पापा, लकड़ी के इस टुकड़े पर मैं भगवान कृष्ण के विराट स्वरूप का चित्र उकेरना चाहता हूँ जैसा कि उस कैलेंडर में बना हुआ है।’

 ‘...बेटे, विचार तो श्रेष्ठ है, परन्तु काम कठिन है...।’

 ‘पापा, आप ही तो कहते हो कि इंसान के लिये कुछ भी असंभव नहीं है। मुझे विश्वास है कि आपके आशीर्वाद से मैं इसको अवश्य बना लूँगा।’

 ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में सुशील कुमार फुल्ल लिखते हैं - ‘गूगल बॉय’ एक आदर्शपरक उपन्यास है, जो बनावट एवं बुनावट में कुशल शिल्पी का अहसास करवाता है।.... उपन्यास किशोरों एवं अन्य पाठकों के लिए भी रोचक एवं प्रेरणाप्रद तथा सदाशय से लिखी उपयोगी रचना है।’

 समग्रत: कहा जा सकता है कि प्रस्तुत उपन्यास अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल रहा है। युवावर्ग इससे प्रेरणा ग्रहण करके रक्तदान करने के लिये प्रेरित होगा और अपना जीवन सफल करेगा, क्योंकि रक्तदान ही महादान है।
लाजपत राय गर्ग
150, सेक्टर 15, पंचकूला-134113 (हरियाणा), भारत
चलभाष: +91 921 644 6527; ईमेल: blesslrg@gmail.com

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