नारी जीवन की भयानक त्रासदी एवं संघर्ष का दर्पण: छँटते हुए चावल

समीक्षक: आचार्य नीरज शास्त्री

34/2 गायत्री निवास, लाजपत नगर, एन.एच.-2, मथुरा-281004, चलभाष: +91 925 914 6669


पुस्तक: छँटते हुए चावल
ISBN: 978-93-86077-97-4
रचनाकार: नीतू सुदीप्ति 'नित्या'
प्रकाशक: ए बी एस पब्लिकेशन सारनाथ
मूल्य: ₹ 199.00 रुपये, प्रकाशन वर्ष: 2019

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 हिंदी कहानी साहित्य की चर्चित लेखिका नीतू सुदीप्ति 'नित्या ' जी का नव प्रकाशित कहानी संग्रह छँटते हुए चावल' करस्थ हुआ। संग्रह को आद्योपांत पढ़ने के उपरांत मैंने उनके द्वारा किए गए आग्रह '' संग्रह की समीक्षा आप अवश्य लिखें'' का स्मरण होने के कारण समीक्षा करना मेरा परम कर्तव्य बन गया। यह संग्रह नारी जीवन की भयानक त्रासदी एवं संघर्ष से जुड़ी कहानियों का संग्रह है।यह भी कहा जा सकता है कि यह संग्रह वह दर्पण है, जिसमें नारी जीवन की त्रासदी और उसके संघर्ष स्पष्ट दिखाई देते हैं। यही कारण है कि पुस्तक का आवरण भी विचारमग्ना स्त्री के चित्र से सुसज्जित है। यह पुस्तक लेखिका द्वारा श्रेष्ठ जनों के साथ-साथ स्वर्गीय माँ और पिता जी को समर्पित की गई है। इस प्रकार लेखिका ने अपने पुत्री-धर्म की पूर्ति भी की है। भूमिका में श्री सिद्धेश्वर जी (कवि, लेखक और चित्रकार) ने भी इस कृति को स्त्री विमर्श को विस्तार देती कृति कहा है। दस विशिष्ट कथाकारों ने इस कृति के प्रकाशन से पूर्व ही लेखिका को इस कृति हेतु शुभकामनाएँ प्रदान की हैं। इसके बाद आत्म- संवाद के अंतर्गत लेखिका ने स्त्रियों के प्रतिनिधि के रूप में स्वयं के भीषण जीवन संघर्ष का शब्दारेख खींचा है। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि लेखन विषम परिस्थितियों में उनके जीने का साधन बना है। पूरे संग्रह में कुल चौदह कहानियां हैं। 

 पहली कहानी छँटते हुए चावल' ही इस संग्रह का शीर्षक बनी है। बिहार में 'चावल छंटना' और' चावल छांटना' मुहावरे हैं जो स्त्रियों द्वारा की जाने वाली दूसरों की चर्चा की ओर संकेत करते हैं। इस कहानी में भी कहानी की नायिका 'सबीना ' स्त्री- चर्चा का विषय बनती है। यह कहानी स्त्री द्वारा स्त्री को शक की दृष्टि से देखने व उसके विषय में अनुचित चर्चा कर स्त्रियों द्वारा ही आनंदित होने की कहानी है।

 दूसरी कहानी है 'खोईछा'। यह एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपनी पुत्री के प्रेम प्रसंग को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करती कि उसके द्वारा किसी दूसरी स्त्री का परिवार टूट रहा था। लेखिका ने इसे आदर्श माना है, इसलिए वह बहू के माध्यम से कहती है -"सिक्के के दूसरे पहलू की सच्चाई जानकर मैं मन ही मन बुआ जी के चरणों में नतमस्तक हो गई।"

'शीतल छांव' कहानी में लेखिका ने दर्शाया है कि प्राय: माता-पिता अपनी पुत्री के सुख के लिए उसके हृदय की बात न सुनकर अपनी इच्छाएँ उस पर थोपते हैं और अनहोनी होने पर उसे किसी दूसरे को सौंप देना चाहते हैं। इस कहानी की इशिता भरत से प्रेम करती है किंतु उसके पापा एक खूंटे से बंधने वाली गाय की तरह नरेन से उसकी शादी कर देते हैं लेकिन जब नरेन एक्सीडेंट में अपाहिज हो जाता है,तब वह उसकी शादी भरत से करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में वह नरेन के साथ उसकी सेवा करते हुए जीने का आदर्श प्रस्तुत करती है। वह अपने पिता से कहती है, "वाह! पापा वाह! आप जैसा तो मैंने पिता ही नहीं देखा, जब मैं भरत को चाहती थी तो आपने जबरदस्ती मेरी शादी नरेन से करवाई और आज जब वह अपाहिज हो गए हैं तो उन्हें छोड़ने के लिए रोज-रोज मुझ पर दबाव डाल रहे हैं।"
 
 ' बिछावन' इस कहानी संग्रह की चौथी कहानी है। यह कहानी भी लेखिका की अन्य कहानियों की तरह ही मर्मस्पर्शी है। इस कहानी में लेखिका ने बताया है कि औरत शराबी, जुआरी पति के लात घूँसे और ज्यादती सहकर भी अपना धर्म निभाती है, लेकिन जब वह अपनी ही पुत्री को अपनी बदनीयती और हवस का शिकार बनाता है तो वही दबी-कुचली अबला चंडी बन जाती है और उस कामुक दरिंदे का वध करती है। उस औरत को कामुक नजरों में पड़ने से बेहतर तो जेल की सलाखें लगती हैं। कहानी की नायिका विमली के शब्दों में देखिए, "दीदी, कोई वकील खड़ा करने की जरूरत नहीं। हम छूटकर बाहर आ जाएँगे तो लोग हमको गीध की नजरों से देखेंगे हर कामुक आदमी हमको सड़क पर का बिछौना ही समझेगा। 

 'काला अध्याय' कहानी में बताया गया है कि औरत अपने सगे संबंधियों के साथ भी सुरक्षित नहीं है। इस कहानी की नायिका प्रेरणा के साथ उसका मामा ही बलात्कार करता है और वह भी तब जबकि वह मात्र नौ वर्ष की बालिका थी। इस कहानी में लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि आज भी ऐसे सत्पुरुष हैं जो स्त्री के अतीत और उसके रंग- रूप पर ध्यान न देकर उसे पूरा सम्मान देते हैं। इस कहानी को पत्र शैली में लिखा गया है।

 ' हम बोझ नहीं 'कहानी स्त्रियों को शारीरिक विकृति के कुचिंतन से बाहर निकाल कर नए भोर के स्वागत की प्रेरणा देती है।

 ' डे नाईट' कहानी अभावग्रस्त लोगों के अर्थोपार्जन और दैनिक ढर्रे में खोते स्त्री- पुरुष प्रेम, श्रृंगार एवं यौवन की दुखद परिस्थितियों को उजागर करती है। 

 'आस भरा इंतजार ' कहानी में विदुषी लेखिका ने बताया है कि नशेबाज पति अपनी पत्नी और बच्चों के सुख की परवाह न करके अपने व्यसन में ही डूबा रहता है। पत्नी और बच्चे त्यौहार मनाने के लिए तरस जाते हैं। लेखिका के शब्दों में देखें -"लीला के सब्र का बांध टूट गया। आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। हां मुनिया अगले साल में खीर पूरी बनाने की कोशिश करूंगी। तब तेरे पियक्कड़ बाप के भरोसे नहीं बैठी रहूंगी।"

 ' खुल गई आंखें' कहानी में इंद्र के माध्यम से लेखिका ने बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ कहलवाया है, "बहन भाइयों को संभालने में उसकी उम्र निकल जाएगी तो फिर उससे शादी कौन करेगा? इसलिए सही समय पर उसने सही फैसला लिया था। अपनी सोच के कारण अपनी जिंदगी और अपने भाई - बहन के लिए उसने बेहतर प्लान बनाया था।'
 इस तरह लेखिका नीतू सुदीप्ति 'नित्या 'जी उन लड़कियों के जीवन को शब्दांकित करती हैं जो अपने माता-पिता अथवा अपने भाई - बहनों के लिए अपने जीवन के स्वर्णिम बसंती वर्षों को गंवाकर जीवनभर पतझड़ की मार झेलती हैं।

आचार्य नीरज शास्त्री
 स्त्री के लिए सोना- चांदी आकर्षण हैं, लेकिन सच्ची प्रेमिका के लिए उसका प्रेमी, पत्नी के लिए उसका पति, उसका जीवन धन ही सबसे बड़ा खजाना है। वह उसे नहीं खोना चाहती और उसके लिए अपना सर्वस्व दाव पर लगा देती है। इसी भाव पर केंद्रित कहानी है-' माफ करना 'इस कहानी की नायिका साल्या यह स्पष्ट कहती है, "दादी! एक बार आपकी दस तोले की सोने की हंसली खो गई थी तो आप कितनी रोती थीं और करीब छह-सात महीने के बाद जब वह धान की भूसी में मिली थी तो आप कितनी खुश हुई थीं! आज मेरा खोया हुआ पीयूष जब मुझे मिल रहा है तो यह सोने और हीरे से भी बढ़कर एक अनमोल रत्न है मुझे उसे गाजे- बाजे के साथ अपनाना चाहिए।"

 'एक कथा ऐसी भी' कहानी में भी एक पुरुष जो कि परिवार का मुखिया है, अपनी जिद के लिए अपनी नातिन 'मानवी' के प्रेम का गला घोट देता है परंतु जब उसे पता लगता है कि उसके गलत निर्णय के कारण मानवी का जीवन यातना की दास्तां बन गया है तो वह उसकी शादी उसके प्रेमी बासु के साथ करना चाहता है, जिसे वह अस्वीकार कर देती है तथा अपने छोटे भाई - बहनों के साथ ऐसा ना हो, इसके लिए सफेद साड़ी पहनकर अपने ही परिवार में रहती है। 

 'रिश्तों का ताना-बाना' में टूटते हुए रिश्तों को मनोवैज्ञानिक ढंग से जोड़ने का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। 

 'बंद आंखों का बंदर' में 'नित्या' जी बताती हैं कि किस तरह व्यक्ति अपनी मजबूरी के कारण सब कुछ देखते हुए भी बंद आंखों का बंदर बनकर रह जाता है जबकि उसकी अंतरात्मा भी उसे धिक्कारती है। 

 'चीरहरण' इस संग्रह की अंतिम कहानी है। इस कहानी में बताया गया है कि किस तरह पुरुष अपनी सनक के कारण स्त्री समस्या को अनदेखा कर स्वयं ही अपनी पुत्री- बहन आदि का चीर हरण करता है। इस तरह कथानक, पात्र एवं चरित्र चित्रण की दृष्टि से सभी कहानियाँ उत्कृष्ट कहानियाँ हैं। भाषा खड़ी बोली है जिसमें आंचलिकता झलकती है। संग्रह की सभी कहानियाँ चित्रात्मक शैली में लिखी गई हैं। संवाद योजना पात्रों के अनुसार तथा देश- काल-परिस्थिति के अनुरूप पूर्णत: उपयुक्त एवं पाठकों के लिए उत्कृष्ट है। सभी संवाद पाठक के मन पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। यह सभी कहानियाँ सामाजिक विद्रूपताओं के कारण स्त्री संघर्ष को उजागर करती हैं। अत: सामाजिक विद्रूपताओं का अंत ही इस संग्रह की कहानियों का विशिष्ट उद्देश्य है। संभवतः उसी उद्देश्य की पूर्ति विदुषी लेखिका का मंतव्य है।

 मैं आशा करता हूँ कि स्त्री विमर्श की कहानियों का यह अद्भुत कहानी संग्रह हिंदी जगत में अपनी पहचान बनाते हुए 'नित्या' जी के सुयश में और भी वृद्धि करेगा साथ ही मैं माँ वागीश्वरी से प्रार्थना करता हूँ कि वह बहन नीतू सुदीप्ति 'नित्या' जी को निरंतर लेखन की शुभ प्रेरणा देती रहें।


3 comments :

  1. समीक्षा प्रकाशन हेतु हार्दिक आभार।

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  2. आदरणीय श्री आचार्य नीरज शास्त्री जी अपने आप में एक अनूठे मंझे हुए कवि कहानीकार राष्ट्रीय स्तर के विद्वान समीक्षकों में एक है जिन्होंने नारी जीवन की भयावह त्रासदी पर लिखित आदरणीया नीतू सुदीप्ती 'नित्या' की कहानी संग्रह 'छंटते चावल'कहानी की समीक्षा बहुत ही उत्तम निष्पक्ष निरलेप स्पष्ट रूप से की है सादर अभिवादन सहृदय साधुवाद एवं लेखिका की अप्रत्याशित भाव प्रकट करने की मीमांसा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद सादर सहृदय अभिवादन करते हैं। राम सिंह'साद'मथुरा 9760035037.

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  3. सुंदर समीक्षा, आप दोनों को बहुत बहुत बधाई

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