काव्य: राम निवास बाँयला

केन्द्रीय विद्यालय, भारतीय नौसेना पोत, वलसुरा
राम निवास बाँयला
1. वह ही मरता है

मरता वह ही है
हाँ
वह ही मरता है

बिल्डिंग गिरे तो 
आसमाँ झरे तो 

अकाल आये तो 
बाढ़ खाये तो 

बीमार पड़े तो 
भूख अड़े तो 

महँगाई मारे तो 
नियति दुत्कारे तो 

गटर धँसे तो 
दबंग डसे तो 

ग़रीबी मारे तो 
मालिक पुकारे तो 

मरता तो वह ही है

खेत जोते तो 
मकान पोते तो 

मिल के चक्के में
साहूकार के रुक्के में

सड़क बने तो 
तम्बू तने तो 

आढ़त चढ़े तो 
मंडी बढ़े तो 

चूल्हा जले तो 
नेकी चले तो 

ज़ुबाँ खोले तो 
आन तोले तो 

मरता तो वही है
हाँ!
वह ही मरता है।
***


2. मैं घोर लड़ूँगा 

मैं जीवट, मैं ज़ोर करूँगा, मैं घोर लड़ूँगा

मैं जीवट, मैं ज़ोर करूँगा, मैं घोर लड़ूँगा 
कोरोना के इस गढ़ से, मैं बेठोर अड़ूँगा।

बिजली की लोरी सुन, ले तूफ़ानों की घुट्टी 
झंझाओं में झूला, औ’ सेज़ सजाई मिट्टी 
खुरपी से नाल कटी, तसले ने झूल झुलाई 
अपने पैरों आप खड़ा हूँ, ले, ले अँगड़ाई 
मर कर ही जीया हूँ, क्यों तुझ से यार डरूँगा।

बैलों के भी साथ जुता, पैठा मगन गटर में 
देख! पहाड़ पसीने से हिलता एक नज़र में
कल पुरजों में नित पिल कर मौत सदा सिर राखी
लाश मिरी मेरे काँधों पे, अरथी बैशाखी 
यम रखता रोज़ सिराने, तेरी लाज़ धरूँगा?

छाले तो पैरों के अलता, सड़क रिझाने को 
भूख हमारी सहचर, निस दिन साथ निभाने को 
तपता सूरज नज़र उतारे, धूसर राई से 
मार न पाया जिसको जग, अपनी सरमाई से 
तू तो परजीवी तुच्छ, तुझसे रोज़ भिड़ूँगा।

मैं जीवट, मैं ज़ोर करूँगा, मैं घोर लड़ूँगा 
कोरोना के इस गढ़ से, मैं बेठोर अड़ूँगा।
***


3. आप घर में हैं 

आप घर में हैं 

इस काल में 
रहना भी चाहिए। 

आप घर में हैं 

सामने की दीवार पर टंगी स्क्रीन से 
दिख रहा है 
पूरे परिवार का अंताक्षरी खेलना 
कि
आप घर में हैं, घर वालों के साथ 
जिसे 
फ्लाई ओवर वाले 
शेल्टर होम से 
देखता आ रहा हूँ कई दिनों से 
कई बे-परिवारियों के साथ 

मैं देख रहा हूँ 
आप घर में हैं 
और 
आपका तीन साल का बच्चा 
टेलीविजन पर दे रहा है ज्ञान -
'कैसे रहना है सुरक्षित इस काल में '
जिसे देख 
अनायास बिलबिला उठता है थैले में से 
दबा पड़ा 
बबलू के लिए ख़रीदा झुनझुना 

इस काल में 
आप घर में हैं 
और रहना भी चाहिए 

मैं देख रहा हूँ 

कि 
सड़क पर झाड़ू लगाने वाली वृद्धा 
ताड़ती है 
नगरपालिका के मुख्य द्वार पर 
तोरण सी टंगी टी वी स्क्रीन पर 
आपका झाड़ू निकालते का वीडियो 
तो 
निश्चल सीखने लगती है 
झाड़ू लगाने में 'अदाएँ'

आप घर में हैं 

चूंकि रहना भी चाहिए घर में 
और आप घर में हैं भी 

नतीजतन 
आज फिर दिखा आपका वीडियो 
कि 
आपको 
हासिल हो चुकी है महारत 
बीवी की चोटी गूँथने में 
जो 
द्रवित कर रही है
बगल रखी 
लक्ष्मी की दवाइयाँ। 

आप घर में हैं 

आपके घर होने की गवाह है 
टी वी की चिमनी से निकलती 
आपके बनाए 
नवोढ व्यंजनों की महक 
जो बढ़ा के भोग-व्यग्रता 
बना रही है उग्र 
कि
तोड़ के लाइन 
झपट लूँ फ़ूड पैकेट 

आप तो घर में हैं ना 
आपको होना भी चाहिए 
इस काल में। 

मेरा क्या? 
जो रह सकते हैं 
उन्हें तो रहना ही चाहिए घर में 
इस काल में अपनों के साथ 
काल से बचने

कल को बचाने।
***


4. बाकी सब बचा लिए गए 

संसार में 
जब भी 
जहाँ भी 
खड़े किए गए
जितने भी 
सुदृढ और सुरक्षित किले 

नींव में गढ़ने से शिखर तक 
मेरे लहू ने लिपट कर पत्थरों से 
जोड़ी दीवार 
और 
पसीने के पलस्तर ने दी फौलादी 

कि 
बच सकें, बचा सकें

किन्तु 
जब भी 
बारी बचने की आई 
छोड़ कर मुझे 
बाकी सब बचा लिए गए। 
***


5. तुम काहे के कवि 

जो तुमने लिखा –
सच को सच 
भ्रम को भ्रम 
प्यार को प्यार 
पीड़ को पीड़ 
उजले को उजला 
काले को काला 
और 
जो 
सहज को लिखा सहज 

तो?

ये तो 
सब जानते भी हैं 
और मानते भी हैं 
फिर 
तुमने क्या नया किया?
तुम काहे के कवि? 

यदि 
तुम कहलवाना ही चाहते हो 
कवि, महाकवि 
तो 
लिखो 
उद्वेलन, उन्माद 
महिमा, मुगालते 
या 
कुछ ऐसा हवा-हवाई ...

मसलन –
रात को 
सूरज के पहरे में 
जब 
तुम संगीनों पर 
सपने सँजो रहे थे 
तभी 
सागर ने तुम्हें भाले से सहलाया 
और 
तुम्हारी नींद नाराज।

नतीजन -
तुमने 
क्षितिज टेबल बिछा 
धरा दराज़ से निकाल 
पानी पर पीड़ उगाई 
तो 
ख़ला खलबलाया 
आसमाँ दरका 
मछलियाँ उड़ीं 
ऊँट तैरने लगे 
भैंस ने गाया
बीन नाची 
गीदड़ दहाड़े 
मच्छर कुलांचे।

फिर देखो 
पाठकों का 
अतिरेक-रंजन
और 
उद्वेलन वाह-वाही 
तुम्हें 
उछाल देगी 
काव्य-कलगी से भी ऊपर 
कविराज तक।

नहीं?

तो काहे के कवि।
***

दोहे 

धन सुत टीवी झोंकता, सब कोरोना ज्ञान।
मज़दूर सुता ढो रही, नयन नमी की खान॥ 

धन पिशाच की बाँसुरी, बाजे काल अकाल।
या रब! मुझ मजदूर का, सब दिन हाल-मुहाल॥

कौन अधिक मुझसे बता, इस धरती का ख़ास।
जो विपद परदेस भगे, या जो आवे पास॥

आपद विपदा भागते, वे जन तो परदेश।
मैं मज़दूर वतन धुरी, कैसे छोड़ूँ देश॥

घर पावण की भूख में, दिन दीखे ना रात।
आँतों तक छाले पड़े, पैरों की क्या जात॥

जीने को तो जूझ है, मरने को है छूट।
वादों की दावागिरी, रही ज़िंदगी लूट॥

ज़िंदा भी लुटते रहे, भूख न पाई छूट।
मरने पर मज़मा लगा, रहे मदारी लूट॥

धाये जन ही ध्याँवते, रास, विलासी-राग।
‘ग़ुरबत’ को तो सालती, सतत जठर की आग॥

राजपथों पर हो रही, मयुरी रेलमपेल। 
दम्म मनुज का तोड़ता, कोरोना का खेल॥

राजपथों के शीश पर, पिक शुक खेलें खेल।
कोरोना ने डाल दी, सब जन नाक नकेल॥

जीवट विकट मजूर मैं, भूख प्यास की सींच।
मरने को ही जी रहा, काल गाल में भींच॥

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