रिश्तों की सुगंध से महकती कृति: रिश्तों की सुगंध

समीक्षक: आचार्य नीरज शास्त्री

34/2 गायत्री निवास, लाजपत नगर, एन.एच.-2, मथुरा-281004, चलभाष: +91 925 914 6669


पुस्तक: रिश्तों की सुगंध
ISBN: 978-93-86077-97-4
रचनाकार: श्रीमती शशि पाठक
प्रकाशक: गणपति पब्लिशर्स, दिल्ली 110006
मूल्य: ₹ 199.00 रुपये, प्रकाशन वर्ष: 2019
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वरिष्ठ लेखिका श्रीमती शशि पाठक द्वारा रचित एवं गणपति पब्लिशर्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह है- रिश्तों की सुगंध। इस संग्रह की समीक्षा का आदेश पाकर मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ। संग्रह का आवरण चित्र देखते ही बनता है क्योंकि अस्सी पृष्ठों की इस पेपर बैक पुस्तक का आवरण फूलों की झूमर से सुशोभित है।

 अपनी बात शीर्षक के अंतर्गत विदुषी लेखिका ने लिखा है, "रिश्ते समाज में हर तरफ विद्यमान हैं। पति-पत्नी, माँ- बेटा, भाई-बहन, पिता-पुत्र आदि। विभिन्न रूपों में प्रत्येक का आपस में कोई न कोई रिश्ता है। रिश्तों की अपनी अलग ही सुगंध होती है। कुछ लोग या परिस्थितियाँ इन रिश्तों में कड़वाहट भरने का प्रयत्न करती हैं।" (पृष्ठ 3)

 इस संग्रह में लेखिका की कुल पंद्रह कहानियाँ, पंद्रह लघु कथाएँ तथा पंद्रह प्रेरक प्रसंग भी संग्रहीत हैं।

 'सहारे' इस संग्रह की पहली कहानी है। इस कहानी में सावित्री देवी के पति की मौत के बाद उन्होंने अपने पुत्र सुधीर को अकेले पाला और वह बैंक में मैनेजर हो गया। उनकी बहन का पुत्र प्रशांत अपनी पढ़ी -लिखी पत्नी के कहने पर अपनी माँ से अलग हो गया था, इसलिए उन्होंने सुधीर को अनपढ़ लड़की से विवाह की हिदायत दी। शादी के बाद सुधीर के साथ जीप दुर्घटना हुई तो वह विचलित हो गईं किंतु मरने से पहले स्वयं सुधीर ने उन्हें सच बता दिया, "माँ", होश आते ही सुधीर ने उसे पुकारा तो वह दौड़ पड़ी, "बेटा! यह क्या हुआ तुझे?"

"माँ! मेरे पास अब समय नहीं है। आपसे मैंने एक बार झूठ बोला था, उसके लिए क्षमा कर देना।

"माँ" कराहते हुए सुधीर ने कहा तो वह रो पड़ी। 

 "हाँ, मैंने झूठ बोला था कि तेरी बहू अनपढ़ है। वह तो मेरे बराबर ही पढ़ी लिखी है।" कहने के साथ ही सुधीर की गर्दन एक और झूल गई। (पृष्ठ10)

'मकड़जाल ' कहानी में लेखिका ने स्पष्ट किया है कि सदैव लड़की के ससुराल वाले कि दहेज नहीं मांगते। कई बार लड़की स्वयं लालचवश अपने माँ-बाप की नजर में अपने पति और सास-ससुर की छवि बिगाड़ कर दहेज के नाम पर कुछ न कुछ मांगती रहती है। कई बार इसकी बहुत बड़ी कीमत उसे चुकानी पड़ती है। यद्यपि लेखिका की इस कहानी की नायिका अंतत: अपने तलाक के कागजात को फाड़ कर अपने परिवार को ध्वंस से बचा लेती है। यथा, "अचानक जाने कहाँ से मुझे शक्ति मिली कि मैंने फुर्ती के साथ पापा के हाथ से तलाक के कागज छीन लिए और दूसरे ही पल बिजली की सी फुर्ती से कागजों के टुकड़े-टुकड़े करके अपने पति के पैरों से लिपट कर रोने लगी।" (पृष्ठ 14)

'अतीत के दंश' कहानी में बताया गया है कि ममता जब उमड़ती है तो संतान विहीन स्त्री अथवा पुरुष के द्वारा किसी अनाथ को अपनाने का साहसिक निर्णय लिया जाता है,जो कि नया इतिहास रचता है। यथा, "जी हाँ, डॉक्टर साहब, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। डॉक्टर साहब मैंने निर्णय लिया है कि मैं उस बच्ची को अपना ममत्व दूंगी; पालूंगी उसे।" कहते कहते उसकी आँखों में आँसू छलक आए। (पृष्ठ 18)

 'अनूठा प्रयोग 'कहानी में विदुषी लेखिका ने सौतेली माँ क्या वास्तव में बुरी होती है? यह समझाने के लिए एक प्रयोग किया है, जिससे पता चलता है कि माँ की पवित्रता सौतेलेपन को बहुत पीछे छोड़ देती है।

 'समय' कहानी में स्पष्ट हुआ है कि अमीरी पर अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि समय बदलने में देर नहीं लगती।

आचार्य नीरज शास्त्री
'अंधेरे के बाद' कहानी बताती है कि समय बदलने पर परिस्थितियाँ बदलती हैं। विदेश गए हुए बेटे और बहू भी वापस लौट आते हैं। तब हमें सत्य पर विश्वास नहीं होता। यथा-"अरे तुम लोग!खुशी के मारे उसके शब्द उसके गले में अटक कर रह गए।

 हाँ, माँ! कहकर दोनों पैरों पर झुक गए। दूसरे ही क्षण अतीत का दंश घायल कर गया मन को और मैं आशंकित सी पूछ बैठी-"क्यों होटल में ठहरने का प्रबंध नहीं किया बहू के लिए?"

"नहीं माँ! अब हम यहीं अपना क्लीनिक खोलेंगे, आपके पास ही। देखो न, मैंने अब हिंदी बोलना भी सीख लिया है।" विदेशी बहू के मुँह से हिंदी में बोले गए ये शब्द जैसे मिश्री घोल गए और प्यार की उमड़ती बाढ़ को मैंने अपनी पोती पर उड़ेल दिया। (पृष्ठ 29)

इसी तरह 'भूल का अहसास', 'परिवर्तन', 'रिश्तों की सुगंध', 'अपने-अपने दायरे', 'अमावस के बाद', 'समाधान', 'धूप- छांव' तथा 'सुबह का भूला' कहानी भी कथावस्तु, पात्र एवं चरित्र चित्रण, कथोकथन तथा उद्देश्य के स्तर पर श्रेष्ठ कहानियाँ हैं। उन सभी कहानियों में लेखिका के मनोविज्ञान एवं कथा साहित्य में उनकी महारत की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। 

 इस संग्रह की लघु कथाओं में 'अनपढ़', 'बोझ', 'बलात्कार', 'राखी', 'विकल्प' आदि बहुत ही उत्तम लघु कथाएँ हैं, जो व्यंजना एवं मारक क्षमता के कारण पूर्ण सशक्त हैं। 'मौका' लघुकथा दूसरों की पीड़ा में अपना स्वार्थ खोजने की ओर संकेत करती है।यथा- "उसकी आंखों में चमक आ गई। कड़ाके की सर्दी होते हुए भी वह बिस्तर छोड़कर, चीख-पुकार की दिशा में चल पड़ा। कई वर्ष बाद ऐसा मौका दोबारा मिला था, उसे।" (पृष्ठ 67)

भाग्य कहीं ना कहीं व्यक्ति के जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ता ही है। यही समझाती है लघुकथा- 'अपना अपना भाग्य'। इसी प्रकार 'संस्कार', 'चिंता' व 'कृतज्ञता' भी बेजोड़ लघुकथाएँ हैं। 

 कहानी व लघुकथाओं की तरह ही इस संग्रह में लेखिका ने प्रेरक प्रसंगों को स्थान दिया है। ये सभी प्रेरक प्रसंग व्यक्ति को श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। भाषा सरल एवं शैली विषय के अनुकूल है। इस तरह यह संग्रह कहानी, लघुकथा एवं प्रेरक प्रसंगों का गुलदस्ता है, जिसमें रिश्तों की सुगंध महकती अनुभव होती है।

 मैं इस उत्कृष्ट पुस्तक की रचना हेतु विदुषी लेखिका श्रीमती शशि पाठक जी को सादर प्रणाम करते हुए उन्हें बधाई देता हूँ। आशा है या पुस्तक उनके यश में श्री वृद्धि करेगी।
 अनंत शुभकामनाओं के साथ।

1 comment :

  1. समीक्षा प्रकाशन हेतु बहुत बहुत आभार।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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