संत कवि रैदास की वाणी में मानवतावाद

डॉ. मुकेश कुमार

ग्राम हथलाना, पो. मंजूरा, जिला करनाल। (हरियाणा)
चलभाष: +91 989 600 4680


शोध-पत्र सारांश -
  संत साहित्य रत्नगर्भ समुद्र है जो अपने गर्भ में अपार खज़ाने को समेटे हैं। इसकी शीतलता को अनुभूति गम्य बनाकर जो मुमुक्ष इसकी गहराई में उतरेगा वह रिक्त हस्त नहीं लौटेगा। भविष्य सदैव उन मुमुक्षुओं व अन्वेषकों की प्रतीक्षा में रहेगा जो ब्रह्म के आनंद के रस में डूबकर दिव्य चेतना के साथ तादात्म्य कर स्थापित कर साहित्य प्रेमियों को इसका आस्वादन करा सकें। शुद्ध-आहार द्वारा शुद्ध विचार निर्मित होते हैं तथा शुद्ध-विचार ही चरित्र निर्माण में सहयोगी होते हैं। चरित्र निर्माण ही समाज की सशक्तता है। अतः संत-कवि रैदास जी ने कथनी और करनी दोनों के द्वारा न्यायोपार्जित आजीविका एवं परमार्थ प्रयोजन हेतु उदार वृत्ति का आविर्भाव ही जीवन में समरसता और सरसता लाने में सहयोगी माना है और उन्होंने मानव कल्याण, जीवन चर्या का आदर्श दान, दया, परोपकारी बाह्य आडम्बर का विरोध, श्रम का महत्त्व आदि बिन्दुओं पर विचार किया।

बीज शब्द - परमार्थ, मुमुक्षाओं, समतावाद, श्रम पूंजी, शाकाहारी, आजीविका, निष्काम आदि।

प्रस्तावना -
  भारत की यह पवित्र भूमि प्राचीन काल से ही ऋषियों, तपस्वियों, तत्त्ववेताओं, दार्शनिकों, ज्ञानियों, मुनियों व चिन्तकों की तपोभूमि रही है। मानव जीवन के रहस्यों एवं काव्य की खोज में लगे ये महापुरुष इसे सुगमता से एवं व्यक्तित्व रूप से जीने में कभी ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम एवं सन्ंयासश्रम में विभाजित कर जीने की कला समझाते हैं तो कभी इसके लक्ष्यों की ओर उन्मुख कर मानव को उसके चार पुरुषार्थ काम, अर्थ, धर्म, मोक्ष की व्याख्या अवगत करवाते हैं।

  भारत भूमि आध्यात्म को मूर्ताकार करती है, इसमें कोई सन्देह नहीं। इस पवित्र धरा पर महान संत रैदास का प्रादुर्भाव हुआ। जिससे प्रकृति भी अपने पूर्ण वैभव के साथ झूम उठी। संत रविदास (रैदास) सहज सत्य के समीप पहुँचकर साधना की दिव्य अवस्था से अपनी वाणी निकाली जो इस प्रकार से है -
  ”प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी,
  जाकी अंग-अंग वास समानी,
  प्रभु जी तुम दीपक हम बाती,
  जाकी जोति बरै दिन राती।।“1

  संत रविदास जी ने दुर्लभ मानव जन्म में परमात्मा के नाम-सिमरण पर बल दिया है। क्योंकि मानव का अमूल्य जीवन व्यर्थ बीता जा रहा है। अर्थात् हे मानव! सांसारिक मोहमाया एवं अन्य सभी की आशा त्यागकर केवल उस प्रभु के रंग में रँग जा। तेरा जन्म से सुधार आ जाएगा। संत जी मानव को प्रेरणा देते हुए कहते हैं -
  ”जनम अमोल अकारथ जात रे।

  सुमख करौ कभउं नहि हरि कौ, ज्यो लौ नहि छरत गारत रे!
  ऐ सबु संगी दिवस चार के, धन द्वारा सुत पित मारत रे।
  बिछुरे मिलने बहुरि नह हैं हो, ज्यों तरवर छिज पात रे।।
  वै कैसे हरि नाम लहगे, गर अटकै कफ-पित बात रे।
  काल कराल भ्रमत फंदक ज्यू, करत अचानौ घात रे।।
  चेतै नहीं अनपु मति मूरखि, छांडि अम्रित विषु खात रे।
  कहि रविदास आस तज और श्री गोपालह रंग राच रे।।“2

  इस संदर्भ में संत रैदास ने नाम स्मरण रूपी अमृत पाने की और सांसारिक मोहमाया, विषय वासनारूपी विष को त्यागने की प्रेरणा दी है। जिससे मानव का जीवन सुखी बन सके।

  संत रविदास जी ने तत्कालीन सामाजिक विषमता के विरुद्ध संघर्ष कर मानवता के आधार पर समतावादी, समाजवादी शासन व्यवस्था पर बल दिया। वे कहते हैं कि मानव के कर्म का महत्त्व हो, वह अपनी मेहनत को जीवन में उतारे, वह मेहनत करे उसकी मेहनत का इस समाज में आदर हो, वे ऐसे राज्य की परिकल्पना करते हैं जहाँ पर कोई छोटा-बड़ा नहीं हो। सभी को उसकी आवश्यकता के आधार पर अन्न और धन की प्राप्ति हो। इसी प्रकार से संत रैदास जी ने अपनी वाणी में समतावादी, समाजवादी शासन व्यवस्था की कल्पना आज से छः सौ वर्ष पूर्व की थी। वे कहते हैं -
  ”ऐसा चाहौं राज मैं, जहाँ मिलै सबन कौ अन्न।
  छोटा बड़ो सभ सम बसै, रविदास रहै प्रसन्न।।“3

  संत रैदास (रविदास) जी मानवता को बहुत महत्त्व देते थे। उन्होंने मानव सेवा पर बल दिया। मानव सेवा जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है। संत रैदास जी अपनी वाणी में मानव को उपदेश देते हैं कि मानव को सदैव उस परमात्मा का अंश मानकर उसकी सेवा करनी चाहिए और वह अपने हृदय में संतोष रखे। जिससे जीवन में सुख मिलेगा। प्रत्येक प्राणी का आदर-भाव करना चाहिए। वे लिखते हैं -
  ”मन मंहि सत्त संतोष रखहू, सभ करि सेवा लाग।
  सेवा सब कछु देत है, रैदास सेवंहि मति त्याग।।“4

  संत रैदास तो दिन-रात मानव सेवा में लगे हुए हैं। दिन-रात मानव सेवा करने पर उसकी प्रभु भक्ति तो निश्चित होती है। वे मानव को संदेश देते हैं कि हे प्राणी सदा दीन-दुःखियों की सेवा कर तेरा कल्याण होगा। प्रत्येक पं्राणी के विचारों का हमें आदर करना चाहिए।
  ”दिन दुःखी करि सेव मंहि, लागि रहो रैदास।
  निसि बासर की सेव सौं, प्रभु मिलन की आस।।“5

  संत कवि रैदास जी ने मानव प्रेम पर अधिक बल दिया है। उन्होंने मानव प्रेम के महत्त्व को समझाते हुए कहा है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए वन में जाकर तप करना व्यर्थ है। इसके लिए हमें मानव से प्रेम करना चाहिए। क्योंकि वो परम पिता परमात्मा इस जगह में सदैव किसी न किसी रूप में प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। और वे कहते हैं -
  ”बन खोजइ पिअ न मिलहिं, बन मंह प्रीतम नांह।
  रविदास पिअ है बसि रहो, मानव प्रेमहि मांह।।“6

  संत रैदास (रविदास) जी ने कहा है कि किसी भी जीव की हत्या करना बहुत बड़ा पाप है। आपको क्या अधिकार है कि आप उस जीव की हत्या कर रहे हो यह मानवता के विरुद्ध है। जीव की हत्या करने वाला मनुष्य कभी परमात्मा को प्राप्त नहीं होता। इसी प्रकार से पीर-पैगम्बर, औलियों आदि ने किसी भी जीव की हत्या की बात मानव को नहीं समझायी। कहीं पर भी जीव हत्या करने से तो परमात्मा प्राप्त होता हो ऐसा कहीं भी नहीं लिखा हुआ है। संत रैदास जी अपनी वाणी के माध्यम से समाज को यह संदेश देते हैं कि लोग बाह्य पाखंडों में पड़कर जीव की हत्या कर देते हैं जिससे हमारे और पाप बढ़ जाते हैं। जीव की हत्या से वो परमेश्वर कहीं नहीं मिलता। वे कहते हैं -
  ”रैदास जीव कूं मारि कर, कैसो मिलहि खुदाय।
  पीर पैगंबर औलिया, कोउ न कहइ समुझाय।।“7

  संत भक्त कवि रैदास जी ने मनुष्य द्वारा जीव हत्या करते हुए उस पर करारा व्यंग्य किया है। वे कहते हैं कि जो मुसलमान अपने शरीर पोषण के लिए नित्य गाय और बकरी का मांस खाते हैं और दिन रात नमाज़ पढ़ते हैं उसे कभी स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती। क्योंकि संत रैदास ने कहा है कि जीव हत्या का त्याग कर उस परमात्मा का नाम जप तभी तेरा कल्याण होगा।
  ”रैदास जउ पोषणह हेत, गउ बकरी नित खाय।
  पढ़ई नमाजै रात दिन, तबहूँ भिस्त न पाय।।“8

  मानव को शाकाहारी जीवन जीना चाहिए। संत रैदास शाकाहारी जीवन के बारे में उपदेश देते हैं कि जो मांस खाने वाला मनुष्य है वह नरक का वासी है। इसी प्रकार हमें हमेशा शाकाहारी जीवन को जीते हुए उस परमात्मा को जपना चाहिए। वे कहते हैं -
  ”अपनह गीव कटाइहिं, जौ मांस पराया खाय।
  रैदास मांस जै खात हैं, ते नर नरकहिं जाए।।“9

  संत रैदास जी समाज को शिक्षा देते हैं कि जो व्यक्ति दूसरे जीव का मांस खाता है, वह तो अप्रत्यक्ष रूप से अपना ही गला काटता है। क्योंकि वह स्वयं का नाश करने लगा है। इसीलिए वह कहते हैं कि हे मानव जीव हत्या त्यागकर शाकाहारी जीवन जी जिससे तेरे हृदय में मानवता जागृत होगी। दया की भावना पैदा होगी, परोपकारी बनेगा।
  ”दया भाव हिरदै नहीं, भखहिं पराया मास।
  ते नर नरक मंह जाइहि, सत्त भाषैं ‘रैदास’।।“10

  संत रैदास जी श्रम को अधिक महत्त्व देते हैं। वे कहते हैं कि श्रम पूंजी ही मानवतावाद का महत्त्वपूर्ण अंग है। क्योंकि तत्कालीन अधिकतर जनता गरीबी और अभावों में पल रही थी। क्योंकि आजीविका के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता था। वे कहते हैं कि श्रम करके जो आप खाते हो उसका आनन्द ही आनन्द है। उस श्रम से किया हुआ दान भी फलदायक होता है। इसी प्रकार संत रैदास जी ने समाज को श्रम साधना की शिक्षा पर बल दिया। वे कहते हैं-
  ”जिह्वा सों ओंकार जप, हत्थन सों कर कार।
  राम मिंलहि घर आई कर, कहि रैदास विचार।।“11

  मानव जीवन में नेक कर्म पर बल देते हुए संत रैदास जी ने कहा है कि नेक कर्म करने से बुद्धि में संतुलित और सात्त्विकता आती रहती है और वह स्थायी बनी रहती है। जिससे गृह परिवार के प्रति न अनासक्ति होती है न आसक्ति। श्रम को ईश्वर का रूप माना जाता है। इसी संदर्भ में संत रैदास जी कहते हैं -
  ”नेक कमाई जउ करहि, ग्रह तजि बन नंहि जाय।
  रैदास हमारो राम राय, ग्रह मंहि मिलिहि आय।।“12

  ‘सत्यमेव जयते’ अर्थात् सच ही तप है, सत्य की ही हमेशा जीत होती है। सत में आंच है। आदि कथनों के मर्म को समझाते हुए सदाचरण पर बल देते हैं। झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं। छल, कपट, मिथ्या, झूठ, अहं, मानव के पतन का कारण है। ये मानव में एकाकीपन, असन्तोष, अवसाद आदि पैदा करते हैं। इसी प्रकार से रैदास जी मानव की सच्ची निष्ठा, उसकी ईमानदारी पर बल देते हैं और कहते हैं -
  ”दीन दुःखी के हैत जउ, बगारै अपने प्राण,
  रैदास उठ नर सूर को सांचा छत्री जान,
  हरिजन करि सेवा लागै, मन अहंकार न राखै,
  रविदास सूद सोई धन है, जउ असत्त न भाखै।।“13

  आज के इस आपाधापी, भौतिकवादी युग में मानव दिग्भ्रमित हो रहा है। वह जीवन के लक्ष्य एवं दिशा निर्धारण करने हेतु नाना मतानुयायियों के चंगुल में जकड़ा जा रहा है। वैज्ञानिक एवं सुपर तकनीकी युग का मानव भी दुःख की घड़ी का निर्वारण करने हेतु धर्म गुरुओं के वाग्ज़ाल में ऐसा उलझता है कि उभरने का अवसर नहीं मिलता वह उसे ऐसा बना देते हैं कि मानव अपने लक्ष्य को भी भटक जाता है। जैसे एक विद्यार्थी का उदाहरण मान लो वह पुस्तक खोलकर अध्ययन न करे और कोई धर्म गुरु उसे यह वचन दे कि तू पास हो जाएगा तो यह असंभव है और आज अधिकतर ऐसा ही हो रहा है। क्योंकि वह उन कर्मकांडो, पाखंडो, अन्धविश्वासों में अपनी ऊर्जा शक्ति को गंवा बैठता है। इसी प्रकार से संत रैदास जी कहते हैं कि उस ईश्वर का नाम वन्दन सहज रूप में भजो, कर्म करते रहो सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे।
  ”थोथा मन्दिर भोग विलासा, थोथी आन देव की आसा।
  साचा सुमिरन नाव विश्वासा, मन वचन कर्म का है रैदास।।
  सति बोले सोई सतवादी झूठी बात बची रे।
  पांडे कैसी पूज रही रे।।“14

  संत रैदास जी ने गीता के कर्म-सिद्धांत की व्यावहारिक व्याख्या करते हुए सत्कर्मों को ही धर्म माना है। वे निष्काम भाव से किए किसी भी काम को पूजा कर्म कहते हैं। व्यक्ति जिस भी स्थिति में है उसे उसी के अनुसार निरन्तर मेहनत करके आजीविका कमानी चाहिए। व्यक्ति को पाप कर्म छोड़कर कर्म के धर्म का पालन करना चाहिए -
  ”रविदास मनुष्य करम धरम है,
  करम करहि दिन-रात।।“15

  संत रैदास जी कहते हैं कि जाति-पाति का रोग मनुष्य को खोखला कर देता है। इससे मुक्ति दिलाने हेतु वह दया-धर्म रहित नीच कर्म करने वाले को ओछी जाति कहकर फटकारते हैं। वे मनोविकारों का त्याग कर संतों की शरण में रहते हुए सत्कर्म करने पर बल देते हैं।
  ”पंच दोस तजि जो रहई, संत चरण लव लीन।
  रविदास ते नर जानई, ऊँचह अरू कुलीन।।“16

निष्कर्ष -
  सारांश रूप में कहा जा सकता है कि संत रैदास (रविदास) जी के मानवतावाद का महत्त्वपूर्ण अंग लोकतांत्रिक समाजवाद है। उन्होंने समाज में ऐसे राज्य की परिकल्पना की है कि जहाँ पर कोई छोटा-बड़ा नहीं हो। मानवता की सेवा पर बल देते हुए कहा है कि मानव सेवा जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है। सेवा धर्म ही मानव को हमेशा सुख देता है, सफलता देता है। श्रम को भी ईश्वर का ही भजन माना है। जाति-पाति, जीव हत्या आदि का विरोध करते हुए वे लोक कल्याण, मानवतावाद, राम राज्य की परिकल्पना करते हैं और उनकी ये शिक्षा समाज को प्रेरणा देती है और दे रही है।

सन्दर्भ -
1. काशीनाथ उपाध्याय, गुरु रविदास, पृष्ठ 88
2. निशान साहिब, श्री गुरु रविदास दर्शन एवं मीरा पदावली, पृष्ठ 45
3. वही, पृष्ठ 115
4. वही, पृष्ठ 112
5. डॉ.प्रवीण कांबले, निर्गुण काव्य में सामाजिक चेतना और संत रविदास का योगदान, पृष्ठ 228
6. वही, पृष्ठ 229
7. वही, पृष्ठ 229
8. वही, पृष्ठ 230
9. वही, पृष्ठ 230
10. वही, पृष्ठ 230
11. वही, पृष्ठ 231
12. वही, पृष्ठ 231
13. डॉ.ज्ञानी देवी, संत श्री रविदास के दर्शन की प्रासंगिकता, 
 शोध आलेख, पृष्ठ 18
14. वही, पृष्ठ 18
15. वही, पृष्ठ 17
16. वही, पृष्ठ 17

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