लघुकथा: काकी

अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन

अच्छा सच-सच बता, तू मेरा बेटा है या काकी का?

क्या बात है माँ, क्यूँ पूछ रही तू इस तरह?

मुझे तुम्हारा उत्तर चाहिए।

ऑब्वियसली माँ, मैं तेरा ही बेटा हूँ। पर हुआ क्या?

काकी के पक्ष में बड़ा आया था बोलने।

काकी और मेरे बीच बहस हो रही थी तो तू चुप मुझे क्यूँ करा रहा था, काकी को शांत नहीं करा सकता था? माँ तुम भी हो न, बेचारी काकी तो चुप ही थी, लगातार तुम ही तो बड़बड़ाये जा रही थी।

देखा मैं बोल रही थी न, मेरी कोख से सिर्फ इसने जन्म लिया। बाद बाकी तो काकी ने ही किया। ऐसे नालायक बेटों से तो अच्छा था कि मैं ...

छोड़ो न सुनयना, छोटी-छोटी बातों पर भी तुम न ...

आप को भी नहीं भाती मैं। बेटा तो विरोध में है ही, आप भी मेरे ही विरोध में बोल रहे हो?

पिता समर्पण को देख रहे थे और समर्पण अपने पिता को। कुछ देर खामोशी छायी रही। अचानक दोनों हँस पड़े। बाप-बेटे को हँसते देख सुनयना का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। कहती थी न, दोनों बाप-बेटे एक सिक्के के दो पहलू हैं।

माँ तू इतनी गुस्सा क्यों हो रही, अपने लाड़ले पर इतना भी विश्वास नहीं?

तुम सब काकी से मिले हुए हो। क्या सुंघा दिया पता नहीं। बड़बड़ाती हुई सुनयना रसोई की ओर बढ़ गई। इधर काकी गुमसुम बैठी थी।

आप तो जानती ही हैं माँ को? मुँह में जो आया बोल देती हैं पर बाद में खुद पछताती हैं। समर्पण ने काकी से कहा। हुआ भी वैसा ही। घंटा-दो घंटा बाद गुस्सा शांत हुआ और सुनयना पहुँच गयी काकी के पास।

छोटी बुरा मान गई? कान पकड़ती हूँ, अब जो कुछ बोली। काकी चुप ही रही। सुनयना उसे समझाने का प्रयास करने लगी। आप से बुरा क्यों मानने लगी। आप सिर्फ जेठानी ही नहीं, मेरी माँ की तरह हैं। आप डाँटती हैं तो मुझे मेरी माँ याद आ जाती है। मुझे लाख भला-बुरा कहें, सह लूँगी। समर्पण पर बरसना अच्छी बात नहीं। उस बच्चे की मैं माँ नहीं? क्या जन्म देकर ही कोई स्त्री माँ कहला सकती है?

वर्षों शादी के हो गए थे छोटी के। उसकी कोख फिर भी सूनी थी। जन्म से लेकर अब तक समर्पण ही उसके लिये सबकुछ था। सुनयना की आँखें खुल गई। समझ चुकी थी, उसने कितनी बड़ी गलती कर दी। छोटी को बाँहों से भरते हुए सुनयना की आँखें अचानक डबडबा गईं।

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