सेतु अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा प्रतियोगिता 2017 प्रविष्टियाँ

सेतु अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा प्रतियोगिता 2017 के निर्णायकों द्वारा अधिकतम अंक पाने वाली प्रविष्टियाँ प्राप्तांकों के क्रम में नीचे दी गई हैं। धन्यवाद।

1. सीमा सिंह (मन का उजाला)
2. ज्योत्सना कपिल (मिठाई)
3. सुषमा गुप्ता (पूरी तरह तैयार)
4. राधेश्याम भारतीय (सम्मान)
5. किशोर श्रीवास्तव (दंगे का धर्म)
6. राजेश आहूजा (बॉसगिरी)
7. अनिता ललित (दहशत)
8. घनश्याम मैथिल "अमृत" (जड़ें)

मन का उजाला - सीमा सिंह

हारे जुआरी सा, पस्त कदमों से, मन ही मन एक क्रूर निर्णय कर जब वह घर में आया, रात गहरा चुकी थी।

पत्नी की असामयिक मृत्यु के शोक से उबर भी न पाया था, कि व्यवसायिक पार्टनर के हाथों धोखा खा गया। वह अर्श से फर्श पर आ गया था।

“मुन्ना, ओ मुन्ना! अरे सो गया क्या?” उसने बेटे को पुकारा, पर कोई प्रत्युत्तर न पा, कमरे में झाँका।

बच्चे सो चुके थे।

वह वहीं, उनके पास बैठ गया। कुछ ही देर में, मन की थकान से पस्त शरीर पलंग पर फैल चुका था। अंधेरे मे लगातार खुलती बन्द होती पलकों की, अबकी बार मुंदने की बारी थी, कि किसी पशु की गुर्राहट जैसी आवाज़ से क्रम तोड़कर आँखे पूरी खुल गईं।

आवाज कमरे के दूसरे सिरे पर सोए हुए बच्चे की दिशा से आई थी। उसने आँखें मसल कर घूरकर देखा, तो वहाँ किसी स्त्री की सी छाया थी।

वह कुछ बोल पाता तब तक उस स्त्री ने बड़े बच्चे को अपने आगोश में ले लिया, और दूसरे बच्चे की ओर बढ़ चली।

पिता अपनी सारी ताकत बटोर जोर से चिल्लाया, “कौन है! कौन है वहाँ?”

स्त्री ने उसकी आवाज़ पर ध्यान तक न दिया, और दूसरे बच्चे की ओर बढ़ गई। पिता ने उठना चाहा, मगर शरीर तो जैसे पलंग से बंध गया हो।

बिस्तर पर पड़े-पड़े पिता फिर छटपटाया, “हटो! दूर हटो, मेरे बच्चों को मत छुओ!”

स्त्री ने सिर उठाकर पिता की ओर देखा और बात को अनसुना कर बच्चे को अपनी ओर खींच लिया।

इस बार पिता ने अंधेरे में भी साफ-साफ देखीं उसकी लाल-लाल आँखें, बिखरे बाल और बढ़े हुए नाखून वाले हाथ, जो उसने अपनी ही जगह पर बैठे हुए छोटे बच्चे की ओर बढ़ा दिए थे।

पिता गिड़गिड़ा उठा, “इसको मत छुओ, इसने तो दुनिया में कुछ भी नहीं देखा है!”

स्त्री ने क्रूर हँसी हँसते हुए छोटे बच्चे का पांव पकड़कर घसीटना चाहा। पिता ने अपनी संपूर्ण शक्ति समेट कर अपने बंधन तोड़ दिए। बिजली की सी फुर्ती से वह अपने बच्चों और उस स्त्री के बीच आ खड़ा हुआ।

क्रोध से काँपते स्वर में उसने स्त्री से पूछा, “तू है कौन? और यहाँ मेरे घर में, मेरे बच्चों के पास क्या कर रही है? ” कहते हुए उसने स्त्री के बाल पकड़ लिए थे।

“मैं...  मैं भुखमरी हूँ।”

“मेरे घर में कैसे आ गई?”

“अपनी बहन गरीबी के साथ आई थी। हमने इस घर में निराशा और कायरता को आते देखा था... तो चुपके से हम भी घुस आए।”

“मगर तू मेरे बच्चों को क्यों छू रही थी?”

“मैं और मेरी बहन शिकार करते हैं। मैं बच्चों का और बहन बड़ों का।”

आश्चर्य और भय से पिता की पकड़ जैसे ही उसके बालों पर ढीली हुई, वह स्त्री दोनो हाथों से उसको परे धकेलकर भाग निकली।

धक्के से आँख खुली तो पसीने से लथपथ पिता पलंग पर पड़ा था। तीनों बच्चे अब भी गहरी नींद में थे।

भोर का उजाला पर्दे से छन कर कमरे में आ रहा था। उसनें जेब में रात भर से रखी ज़हर की पुड़िया सिंक में बहा दी, और पिता बच्चों के लिए सुबह की चाय बनाने लगा।

मिठाई - ज्योत्सना कपिल

मैच देखकर परेश उठा तो एक बार सोने से पहले घर के दरवाजे चैक किये। आश्वस्त होकर अपने शयनकक्ष की ओर बढ़ा ही था कि तभी सदा के नास्तिक बाबूजी को उसने चुपके से पूजाघर से निकलते देखा।

"बाबूजी, इतनी रात को?"

उसकी उत्सुकता जाग गई, और पुलिसिया मन शंकित हो उठा। वह चुपके से उनके पीछे चल पड़ा। वे दबे पाँव अपने कमरे में चले गए, फिर उन्होंने अपना छिपाया हुआ हाथ माँ के आगे कर दिया, "लो तुम्हारे लिये लड्डू लाया हूँ, खा लो। "

"यह कहाँ से लाए आप?"

"पूजा घर से" उन्होंने निगाह चुराते हुए कहा।

"पर इस तरह ... "

"क्या करूँ, जानता नहीं क्या कि तुम्हें बेसन के लड्डू कितने पसन्द हैं। परेश छोटा था तो हमेशा तुम अपने हिस्से का लड्डू उसे खिला दिया करती थीं। आज घर में मिठाइयाँ भरी पड़ी हैं पर बेटे को ख्याल तक नही आया कि माँ को उसकी पसन्द की मिठाई खिला दे।"

"ऐसे मत सोचिये, उस पर जिम्मेदारियों का बोझ है, भूल गया होगा" माँ ने उसका पक्ष लेते हुए कहा।

"तुम तो बस उसकी कमियाँ ही ढँकती रहो, लो अब खा लो "

"आप भी लीजिये न!"

"नहीं, तुम खाओ, जीवनभर अपने हिस्से का दूसरों को ही देती आयीं। तुम्हें इस तरह तरसते नही देख सकता मैं " कहते हुए बाबूजी ने जबरन लड्डू उन्हें खिला दिया।

उसकी आँखें भर आयीं अपनी लापरवाही पर। घर में सौगात में आये मिठाई के डिब्बों का ढेर मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था। वह तेजी से डिब्बों के पास आया और लड्डू का डिब्बा उठाकर माँ बाबूजी के कमरे की ओर चल दिया।

पूरी तरह तैयार - सुषमा गुप्ता


लड़का जी तोड़ मेहनत कर दफ्तर तक पहुँचा पर उसे दरवाज़े पर ही रोक दिया गया।
"कहाँ जाना है? " रोबीली आवाज़ ने पूछा।
"ऊपर जाना है।"
"क्यों जाना है ऊपर...  अभी तुम उसके लिए तैयार नहीं दिखते।"
"मैं पूरी तरह तैयार होकर आया हूँ ...  मेरे पास सारी डिग्रीयाँ हैं।"
"वे काफ़ी नहीं।" आवाज़ में हिकारत थी।
"डिग्रियाँ काफ़ी नहीं तो फिर और क्या चाहिये? " लड़का कन्फ़्यूज़ दिखने लगा।
"ऊपर जाने के लिए तुझे अपने कुछ हिस्से देने होंगे।" सपाट जवाब आया।
"हिस्से? मतलब?" लड़के की आँखें कुछ ज्यादा ही फैल गईं।
"अच्छा, ज़रा उचक कर दफ्तर के अंदर दाईं तरफ देखो और बताओ क्या हो रहा है?" उसने आदेश दिया।
लड़के ने पंजों पर सारा भार डाला और ध्यान से सुनने लगा, "अरे! वो दफ्तर का बाबू उस दूसरे आदमी से फ़ाइल आगे सरकाने के पैसे मांग रहा है।"
वह आग बबूला हो चिल्लाई "कान निकाल दोनों और रख यहाँ दहलीज़ पर। ये अंदर के माहौल के लायक नहीं हैं। "
लड़के ने सहम कर कान निकाल कर रख दिए।
आवाज़ एक बार फिर गूंजी, "अब बाईं तरफ़ देख कर बता कि वहाँ क्या हो रहा है? "
उसने भरसक प्रयत्न किया...  जो कुछ देखा उसे अवाक् करने के लिये काफ़ी था।
"बोल न क्या देखा?"
"वो बड़े साहब किसी आधी उम्र की युवती के साथ अश्लील ... "
"चुप, चुप, चुप जाहिल। तू तो बिल्कुल लायक नही अंदर जाने के। निकाल, अभी की अभी निकाल, ये आँखें और रख यहाँ पायदान के नीचे। अंदर बस बटन एलाउड हैं। "
"जी" उसने मिमयाते हुए कहा और आँखें निकाल कर दे दीं, "अब जाऊँ?"
"अभी कैसे? ये पैर भी काट कर रख।"
"फिर मैं चलूंगा कैसे?" अब वह लगभग बदहवास हो चला था।
"अंदर बैसाखियाँ दे दी जायेंगी। रैड-टेपिज़्म ब्रांड की। चल-चल, जल्दी कर, वरना और भी हैं लाइन में।"
लड़के ने पैर भी काट कर दे दिये।
गरीबी मुस्कुराते हुए दफ्तर के द्वार से हट गई और बोली "जा! अब तू पूरी तरह तैयार है।"


सम्मान - राधेश्याम भारतीय


वह साइकिल पर चला जा रहा था। उसके जेहन में पत्नी के कहे शब्द चक्करघिन्नी बनकर घूम रहे थे-आज आपको सम्मानित किया जायेगा। सम्मान में एक दुशाला तो मिलेगा ही,शायद साथ कुछ नकदी भी मिल जाए।
‘‘मुझे तो यह समझ नहीं आ रहा कि पानी पिलाने जैसे छोटे से काम के लिए मुझे क्यों सम्मानित किया जा रहा है? पानी तो कोई भी पिला सकता है?’’ उसने स्वयं से प्रश्न किया और स्वयं ही उतर दिया।

घरवाली भी कमाल की है मेरी तो कोई बात सुनी ही नहीं, अपनी ही सुनाती रही-‘‘हर किसी के पास कहाँ समय है इस तरह के परोपकारी काम करने का। आप तो रेलवे स्टेशन पर पागलों की तरह हर प्यासे यात्री को पानी पिलाने में लगे रहते हैं...। भाग-भागकर उनके हाथों में थमी खाली बोतल को पानी से भरते हैं, पानी से भरी थैलियाँ टैªन के अन्दर बैठे यात्रियों को थमाते हैं। किसी को पानी से भरे गिलास पकड़ाते हैं...  फिर उन द्वारा फैंके गए खाली गिलासों को इकट्ठा करते फिरते हैं। भला है सबके बस का यह खेल। ’’

इसी के साथ उसे याद आ आया कि कैसे एक दिन एक वृद्ध को जोर की खांसी उठी...  यदि वह दौड़कर उसे पानी ने पिलाता तो न जाने क्या हो जाता। उसके बाद वृद्ध ने उसके सिर पर ममता भरा हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। और कमाल तो तब हुआ जब ट्रैन में बैठे एक महात्मा ने उसे पास बुलाकर उसके हाथों को चूमा। यह पुण्य की पराकाष्ठा है
मेरे भगवन... देवदूत हो तुम इस धरा पर... ।’’
मैं तुच्छ प्राणी...

‘‘नहीं, ऐसा कहकर खुद को छोटा न कर। तुम जिंदगी बचाने वाले हो... । महात्मा जी ने उसे बीच में टोकते हुए बड़े ही शालीन शब्दों में कहा था।

सतनाम सिंह का ध्यान तब टूटा जब साइकिल सड़क से नीचे उतरी गई। वह गिरते-गिरते बचा। वह साइकिल से उतरा और सोचने लगा-अभी टैªन के आने का समय हो रहा है। कितनी गर्मी पड़ रही है... ।

‘‘नहीं, घरवाली ने कहा था कि कार्यक्रम में जाना है... ।’’पत्नी वाले विचार ने मन के विचार को पीछे धकेला।
वह थोड़ी देर तक किंकर्तव्यविमूढ़-सा खड़ा रहा। और फिर उसने साइकिल स्टेशन की ओर मोड़ दी।


दंगे का धर्म - किशोर श्रीवास्तव


‘ओह्ह! कल जो सांप्रदायिक दंगे में मारे गए क्या वो तुम दोनों के बाबा थे? ’
- ‘जी, हाँ।’
- ‘दोनों पास-पास ही रहते थे?’
- ‘हाँ जी।’
- ‘क्या नाम था उनका?’
- ‘मेरे बाबा का नाम रहीम था और इसके बाबा का नाम राम।’
-‘कितनी उम्र थी उनकी?’
- ‘मेरे बाबा की उम्र यही कोई 70-72 साल और इसके बाबा की 75 साल के करीब।’
- ‘और करते क्या थे दोनों? ’
- ‘जी, दोनों बाबा मिलकर ईद पर सेंवइयाँ, मोहर्रम के दिनों में ताजिया, होली पर पिचकारी, दीवाली पर दीये और गणेश पूजा तथा नवरात्रि के समय देवी माँ की मूर्तियाँ बना कर बेंचा करते थे।’


बॉसगिरी - राजेश आहूजा


सुधा की नज़रें बार-बार घड़ी की ओर जा रही थीं। चार बजने में कुछ मिनट बाक़ी थे।
उसने की-बोर्ड पर दौड़ती उंगलियों को एक पल के लिए रोका और दोनों हाथों पर सिर टिकाकर सोचने लगी, ‘आज दफ़्तर में कम-से- कम साढ़े-पाँच बज जाएँगे। छुट्टी का टाइम तो पाँच बजे का है लेकिन खड़ूस बॉस काम पूरा किए बिना जाने नहीं देगा। पहले भी कई बार सात-आठ बजे तक काम किया है। वैसे भी, छह महीने की मैटरनिटी-लीव के बाद आज पहली बार ऑफ़िस आई हूँ। अब अगले छह-सात महीने तक बुड्ढ़ा-खूसट कुछ ज़्यादा ही काम करवाएगा। अपनी बॉसगिरी दिखाएगा।’ एक लंबी साँस छोड़ते हुए उसने अपनी सोच को विराम दिया और काम जल्दी ख़त्म करने की कोशिश में फिर से तेज़-तेज़ हाथ चलाना शुरू कर दिए।
“कितना काम रह गया है?” अचानक उसके कानों में बॉस की आवाज़ पड़ी।
सुधा ने मन में सोचा, ‘शैतान को याद करो, शैतान हाज़िर। आ गया बॉसगिरी दिखाने।’
लेकिन चेहरे पर एक झूठी मुस्कराहट लाते हुए बोली, “बस, थोड़ा-सा सर।”
“कितनी देर में पूरा होगा?”
“डेढ़ घंटा तो लग ही जाएगा सर।”
“दिखाओ ज़रा क्या-क्या रहता है।”
“जी सर,” कहकर सुधा बुझे मन से सब बताने लगी।
“हूँ... ,” सारा काम समझने के बाद बॉस ने कहा, “तुम घर जाओ, इसे मैं पूरा कर दूँगा।”
“सर... ”
“ऐसे क्या देख रही हो? तुम्हें लगता है मैं नहीं कर पाऊँगा?”
“नहीं सर, मेरा वह मतलब नहीं था।”
“कंप्यूटर पर इतना काम करना तो मुझे आता है। तुम घर जाओ, अपनी बेटी को देखो। डिलीवरी के बाद आज पहली बार ऑफ़िस आई हो। तुम्हारे बिना वह ख़ुद भी परेशान हो रही होगी और अपनी दादी को भी तंग कर रही होगी।”
सुधा की आँखें भर आईं। उसने भर्राए हुए गले से ‘थैंक्यू सर’ कहा और अपना बैग उठाकर चल पड़ी।
“और सुनो, अगर कोई अर्जेंट काम न हो तो दो-तीन महीने, शाम को चार बजे चली जाया करो,” कहते-कहते बॉस उसकी सीट पर बैठ गया।
“जी।”

चलते-चलते सुधा सोच रही थी, ‘किसी इंसान के बारे में हम कितनी ग़लत राय बना लेते हैं। कभी-कभी ज़्यादा देर तक काम करवाने या डाँटने पर, जिन्हें मैं बुड्ढा, खूसट, खड़ूस, शैतान और न जाने क्या-क्या कहती थी, वे कितने अच्छे इंसान हैं।’ आज सुधा को अपनी सोच पर अफ़सोस हो रहा था। बाहर आकर वह रुक गई, जैसे अचानक कुछ याद आया हो। फिर लौटकर बॉस से बोली, “सर, जब आप इसे पूरा कर लें तो मुझे मेल कर दीजिएगा। मैं एक बार चैक कर लूँगी।”
“मेरा काम चैक करोगी,” बॉस ने बनावटी ग़ुस्सा लाते हुए कहा, “मतलब, तुम मेरी बॉस बनोगी।”
“यस सर, थोड़ी-सी बॉसगिरी मैं भी दिखाऊँगी। दो-तीन महीने के लिए... ” कहकर सुधा मुस्कराते हुए दरवाज़े से बाहर चल दी।


दहशत - अनिता ललित


सौ कि.मी. की रफ़्तार से कार दौड़ी जा रही थी! रवि का चेहरा एकदम तना हुआ था और रीना की भुनभुनाहट थी कि रुक ही नहीं रही थी - ‘आप भी न! जब गुस्से में आते हो तो सोचते ही नहीं हो, कुछ भी बोलते जाते हो! कितना कुछ सुना दिया बेचारे को! अरे! हो जाता है कभी-कभी, दिमाग़ साथ नहीं देता! कोई जानबूझकर तो पेपर ख़राब नहीं करता न! बेटा अट्ठारह वर्ष का हो रहा है, गर्म ख़ून है! भगवन न करे! कहीं कुछ उल्टा-सीधा कर बैठा तो... ” कहते-कहते रीना की आवाज़ भर्रा गई, आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे! किसी अनिष्ट की आशंका से उसका दिल व्यथित हो रहा था! चलचित्र की तरह मन के पटल पर एक के बाद एक अख़बार की
सुर्ख़ियाँ आती जा रही थीं –‘इम्तिहान में फ़ेल होने के कारण फलाँ बच्चे ने फाँसी लगा ली!’; ‘पिता की डाँट से आहत होकर फलाँ किशोर ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली!’; ‘निराशा में डूबकर युवक ने अपनी जान दे दी!’ ...  वह सिहर उठी, दहशत के मारे उसे कड़कती ठण्ड में भी पसीने छूट रहे थे!

उसने फिर से रिंकू को फ़ोन मिलाया मगर फ़ोन अभी भी स्विच ऑफ था!

भागती हुई सड़क पर नज़रें गड़ाए हुए रवि ने कहा, “उसके दोस्तों को मिलाओ!”

“मिला चुकी! सब यही कह रहे हैं कि दोपहर तक तो दिखा था मगर उसके बाद पता नहीं!” बेचैनी भरे स्वर में रीना बोली! “पता नहीं क्या हुआ, कहाँ होगा मेरा बच्चा! हे भगवान! मेरे लाल की रक्षा करना!” आँसू पोंछते हुए रीना बुदबुदाई!

“अब तुम ये रोना-धोना बंद करो प्लीज़!” चिढ़कर रवि बोले, “कुछ नहीं होगा उसे, कहीं बिज़ी होगा अपने दोस्तों के साथ, सब एक जैसे हैं –लापरवाह!” उसे स्वयं पर भी गुस्सा आया! नाहक ही उसने आज सुबह रिंकू को डाँट दिया! मगर रिंकू को भी तो समझना चाहिए कि यदि जीवन में कुछ बनना है, तो आलस और आरामतलबी तो छोड़नी पड़ेगी! ये आजकल के बच्चे -बातें तो ऊँची-ऊँची करते हैं मगर मेहनत बिल्कुल नहीं करना चाहते! ऊपर से माँ-बाप कुछ कह दें तो तुरंत बुरा मान जाते हैं! बड़े से बड़ा क़दम उठाने में भी नहीं हिचकते –अजीब है ये पीढ़ी! न धैर्य न ही सहनशीलता!

कार हॉस्टल के सामने पहुँची ही थी कि सामने से रिंकू एक बैग लिए हुए आता दिखा! रीना दौड़कर उसके पास पहुँची और उससे लिपट गई! रिंकू अचकचा गया! वह हैरान था माँ के इस अप्रत्याशित व्यवहार से -“क्या हुआ मॉम? आप लोग यहाँ? सब ठीक तो है?” आश्चर्य से वह बोला!

“कहाँ था तू? फ़ोन भी ऑफ किया हुआ है! कितना परेशान हुए हम! कोई ऐसे बुरा मानता है, अपने माँ-बाप की बात का क्या? अब क्या हम तुझे डाँट भी नहीं सकते? इतना भी हक़ नहीं है हमारा क्या?... ” रीना के सवालों की झड़ी को रोकते हुए रिंकू बोला, ‘ओफ़्फ़ोह! हुआ क्या आख़िर? मैं तो एक सेमिनार में गया था, इसलिए फ़ोन ऑफ था! अभी वहीं से वापस आ रहा हूँ! और मैंने ऐसा कब कहा? -आपको पूरा हक़ है, आप डाँटो भी, पिटाई भी करो मेरी ... ” हँसते हुए रिंकू आगे बोला, “और प्लीज़ मुझे छोड़ो तो, सब लोग देख रहे हैं!” रीना कुछ संभली और रिंकू से अलग होते हुए रुंधे गले से बोली, “तो... तो...  तूने पापा की डाँट का बुरा नहीं माना? और मुझे लगा...” इसके आगे रीना कुछ कह न सकी!

“बुरा? किस बात का बुरा?” हैरानी से रिंकू ने पापा की तरफ़ देखते हुए पूछा, जो नज़रें चुरा रहे थे! उसने उनकी डरी-सहमी आँखों में झाँका और आगे बढ़कर उनके गले लगकर बोला, “आय एम सॉरी पापा! आपका बेटा हूँ, कुछ ग़लत नहीं करूँगा! मुझपर भरोसा कीजिए!”

अब रवि ने अपनी डबडबाई आँखों को रिंकू से छिपाने की कोशिश न की और उसे अपनी बाहों में कस लिया!

जड़ें - घनश्याम मैथिल "अमृत"


उसने वृक्ष के सारे फूल -फल और पत्तियाँ नोंच डाले। पेड़ ने हंसते हुए उन्हें फिर से उगा दिया।

उसने फिर पेड़ की सारी डालियों -टहनियों को काट डाला। पेड़ ने मुस्कराते हुए उन्हें फिर हरा-भरा कर दिया।

उसने अगली बार पेड़ को तने सहित काट डाला। इस बार भी पेड़ कराहते हुए जमीन से नई कोंपलें लेकर फिर उठ खड़ा हुआ।

 अब इस बार उसने पेड़ को जड़ से खोद उखाड़ कर फेंक दिया। अब इस बार उसने पेड़ को नहीं खुद को जड़ से उखाड़ कर फेंका था।


9 comments :

  1. सभी रचनाएँ यहाँ उप्लब्ध कराने के लिए धन्यवाद।

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  2. बेहतरीन कथाएं।सीमा सिंह जी,ज्योत्स्ना कपिल जी,राजेश आहूजा जी,सुषमा गुप्ता जी,घनश्याम मैथिल 'अमृत'जी व अनिता ललित जी को हार्दिक बधाई।समस्त संपादक मंडल को बधाई।

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  3. राजेश आहूजाApril 16, 2018 at 4:08 AM

    अनुराग जी, मेरी लघुकथा, 'बॉसगिरी' जो यहाँ प्रस्तुत की गई है, अपूर्ण है।

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    1. राजेश आहूजाApril 16, 2018 at 12:14 PM

      अब ठीक है।

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  4. अनुराग जी इस पोस्‍ट के साथ लिखा गया स्‍टेटस भ्रम पैदा कर रहा है। आपने लिखा है कि सेतु अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा प्रतियोगिता 2017 के निर्णायकों द्वारा अधिकतम अंक पाने वाली प्रविष्टियाँ नीचे दी गई हैं। वैसे तो इन्हें सेतु के आगामी अंकों में प्रकाशित करने की योजना थी। प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार केवल मौलिक तथा पूर्णतः अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार्य थीं, लेकिन चूंकि इनमें से कुछ प्रविष्टियों के पूर्व-प्रकाशित होने की बात सामने आई है, सो इन सभी को समयपूर्व ही प्रकाशित किया जा रहा है। ( लेकिन आपने यह नहीं लिखा है कि समय से पूर्व प्रकाशित करने का उद्देश्‍य क्‍या है?) सम्पादक मण्डल तथा निर्णायकगण ने अपनी ओर से पूरा प्रयास किया है कि किसी भी रूप (प्रिंट, ऑनलाइन, सोशल मीडिया, दृश्य, श्रव्य, आदि) में पूर्व-प्रकाशित रचनाएँ प्रतियोगिता से बाहर रहें। फिर भी यदि अनजाने में हुई ऐसी कोई भूल आपको दृष्टिगोचर हो तो कृपया setuhindi@gmail.com पर यथाशीघ्र ईमेल करें। (पूर्व प्रकाशित रचनाओं के प्रतियोगिता में शामिल हो जाने की जिम्‍मेदारी आपने सम्‍पादक मण्‍डल तथा निर्णायकों पर डाल दी है। अनजाने में ऐसी कोई भूल हुई है तो उसके जिम्‍मेदारी सम्‍पादक या निर्णायक कैसे हुए ? जिम्‍मेदारी तो अंतत: लेखक की ही है। और उसे ही लेनी चाहिए। ) 2. यहॉं जो सूची आपने दी है, उसमें यह दर्ज नहीं है कि इनमें से दो रचनाऍं यहॉं भले ही प्रकाशित की जा रही हैं,पर वे अब पुरस्‍कृत या चयनित की श्रेणी में नहीं हैं। 3. आपके इस स्‍टेटस को कुछ लोग ऐसे प्रस्‍तुत कर रहे हैं, जैसे अब सारा विवाद सुलझ गया है। कृपया देखें।

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  5. सुरेंद्र कुमार अरोड़ाMay 14, 2018 at 1:46 PM

    " मन का उजाला " मन से लिखी गयी लघुकथा है और मन को छू लेती है .


    सुरेंद्र कुमार अरोड़ा

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