लघुकथाएँ: स्नेह लता गोस्वामी

स्नेह लता गोस्वामी

सलाह

"बेटा पढ़ लिया करो पूरा दिन मोबाइल से चिपके रहते हो" अध्यापक ने कक्षा में समझाते हुए कहा, "पढ़ाई बहुत ज़रूरी होती है। बिना पढ़े आदमी की ज़िन्दगी जानवर से भी गई बीती होती है। समझे?"

बच्चे सर झुकाए सुन रहे थे या कौन जाने सुन भी रहे थे या नहीं।  इतने में उनकी नजर सामने मंद मंद मुस्कुराते सुंदर पर पड़ी।  देखते ही पारा चढ़ गया। बेवकूफ कहीं के। मैं क्या फालतू बोल रहा हूँ? इन नालायकों पर कोई असर ही नहीं होता ... पर प्रत्यक्ष में आवाज को मिश्री जैसा मुलायम बनाने लगे। क्या करें मजबूरी है। इन्हें न मार सकते हैं न डाँट सकते हैं। ऊपर से विभाग की जवाबदेही। बच्चे फ़ेल हुए तो क्यों और मार्क्स कम आये तो क्यों?
ऐसे में प्यार से समझाने के अलावा चारा ही क्या है?

उन्होंने बड़े प्यार से सुंदर को अपने पास बुलाया, "बेटे! मेरी बात ध्यान से सुना
करो। अभी पन्द्रह दिन हैं पेपर में। अब मेहनत करोगे तो सारी जिन्दगी सुखी रहोगे, कहीं अच्छी नौकरी मिल जायेगी। फिर सारी जिन्दगी ऐश करना वरना अपने पापा की तरह छोटे-मोटे काम करते रह जाओगे। हाँ, पापा क्या करते हैं, सबको बताना" पता नहीं उन्होंने शर्मिंदा करने को पूछा था या समझाने को।

"जी, मधुमक्खियाँ पालते हैं और शहद बेचते हैं। वैसे उन्होंने एमएससी, बीएड किया हुआ है, फर्स्ट डिविजन में ... पर नौकरी नहीं मिली। अब एक लाख महीने का कमा लेते हैं जी" सुन्दर बैठ गया और उससे पहले वे स्वयं।

अधूरा ख़त

बन्ते का इंतजार करती सन्तो को नींद आने लगी थी।  उसका दिल किया कि सो जाये।  पर
अभी तो बन्ते को आना था फिर उन्होंने रोटी खानी थी।  उसके बाद बर्तन चौका... ये सब।
आज कल तो बारह बजना आम बात हो गयी है। उसने घडी देखी।  अभी तो सिर्फ साढे दस ही
बजे है।  बन्ते को आने में बहुत देर है।  वक्त काटने के लिए उसने सोचा, चलो माँ को खत ही
लिख लेती हूँ। बहुत दिनो से लिखने का सोच रही थी, आज ही सही। उसने खत लिखने के लिए कागज और पैन लिया और लिखने बैठ गयी।

"माँ,  मैं यहाँ बहुत खुश हूँ। तू फिकर न करना …"  उसकी आँखों से टप टप आँसू बह चले। धुंधलाई आँखों से अक्षर दिखाई नहीं दे रहे थे। उसने हौसला करके दुबारा लिखना शुरू किया ही था कि दरवाजा खटका।  पल्लू से आँसू पोंछ्ते हुए उसने दरवाजा खोला।  बन्ते ने मोटी सी गाली देकर पूछा, "इतनी देर से क्या कर रही थी?" बंता शराब के नशे से टुन्न हुआ लड़खड़ा रहा था। संतो सहारा दे कर बड़ी मुश्किल से कमरे तक ले कर आई। और खुद रसोई में चली गई रोटी लाने।

पहला कौर खाते ही बन्ते ने थाली फेंक दी, "यह, दाल बनाई है तूने। जा मैंने नहीं खानी तेरी रोटी।"

वह जवाब में कुछ बोल ही नहीं पाई। अंदर से छोटी ननद की आवाज सुनाई दी, "कुछ आता जाता हो तभी न बनाये।" सास अलग बड़बड़ा रही थी, "मेरी तो किस्मत ही ख़राब है।  सोचा था, ढंग की बहू आ जाएगी तो बेटा सुधर जाएगा।"

संतो परेशान है, उसे कौन बताए की ये जनाब तो अभी अभी फाइव स्टार में दावत उडा कर आ रहे है।
बंता जूतों समेत ही सो गया था।  उसने धीरे से उसके जूते उतारे।  रसोई में जा कर रसोई समेटी, एक गिलास पानी पिया और पलंग पर ढेर हो गई।

पास की मेज पर पड़ी चिट्ठी अधूरी ही पड़ी थी।

वह जो नहीं कहा

सुबह 6 बजे
सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है मैं आज सच्चे
अर्थो में घरवाली हूँ, वर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं, "सुनती हो चाय बनाओ,
जल्दी से खाना लाओ, चादर नहीं झाड़ी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोयी रहती हो और अब आधी रात तक
बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात को दोगी।" पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी
शान्ति है। आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई
नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होगे, फिर भी बाय!

सुबह, 10 बजे
सुनो जानू, मीटिंग शुरू हो गई क्या? पक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया।
बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे
समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनाया, चटखारे ले कर खाया। रोज-रोज आलू के पराँठे खा के उब गयी थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं पराँठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी.
पर कोई सीरियल देखूंगी। जब तुम घर होते हो तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं या फिर कोई मैच; वह
भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे वरना टी.वी. बंद। अरे, कोई अच्छा सा सीरियल शुरू हो गया है, इसलिए
बाय!

दोपहर, 3 बजे
जानू, आज मैंने कई दिनों बाद फिल्म देखी। लगा था, जिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं दिल अभी धड़क रहा है। पुरानी फिल्म थी, साहिब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी है; गरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली, और शराब से फुर्सत नहीं है। बीवी बेचारी सारी ज़िन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियाँ क्यों अच्छी लगती हैं? बेशक कोई बाहर वाली घास भी न डाले, पर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रखेंगे। अरे, आज सफाई तो की ही नहीं। चलो, अब थोड़ी सफाई कर ली जाय, फिर खाना सोचूंगी। बाय!

शाम, 7 बजे
जानू, शाम को सफाई में ही तीन घंटे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की
दरवाजा, रोशनदान झाड़ कर चमकाये। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलीं, सोफा-कवर
बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी
तो वही पड़ी थी जो रात तुम्हारे लिए बनाई थी, उसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ, ठीक! बाय !

रात, 11 बजे
सुनो जानू, शाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। खाया ही आठ बजे था, पर कॉफ़ी का एक कप
बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों
से देखे नहीं थे, पर लगा नहीं कि एक साल के अंतर के बाद देखे हैं। वही कहानी, वही करेक्टर, वही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाईट!

रात, दो बजे
सुनो जानू, तुम तो सो चुके होगे, पर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुबह से अब
तक नहीं सुनी। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटों के बिना सोने की आदत नहीं रही
इसलिए। कारण जो भी हो पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत हो कर
सोना चाहिये था न, फिर भी नहीं सोई। तुम से पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ
रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी।
क्योंकि जब तुम घर में रहोगे तो यह घर तुम्हारा ही होगा। तुम ही बोलोगे, तुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ, ‘जी, आई जी, जी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है।

०००

1 comment :

  1. तीनों ही अलग तेवर की हैं और अच्‍छी हैं।

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