शुभकामनाएँ

अनुराग शर्मा
सेतु के हर अंक के साथ हम अपने पाठकों, लेखकों, और हितैषियों के लिये अपना आभार तो भेजते ही हैं, इस अवसर पर कभी-कभार कुछ आँकड़े भी साझा कर लेते हैं। इस अंक के आगमन के साथ सेतु के लेखकों की संख्या 600 से अधिक हो गई है। प्रसन्नता की बात है कि सेतु के लेखक संसार भर में बिखरे हुये हैं और हिंदी तथा अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अनेक अन्य भाषाओं में सम्वाद कर सकते हैं। इस अंक से हम कैनेडा के भारतवंशी लेखक श्री धर्मपाल जैन का व्यंग्य-स्तम्भ 'बिंदास' आरम्भ कर रहे हैं। ऐतिहासिक जानकारी तथा  दुर्लभ चित्रों को प्रस्तुत करते आलेख किसकी हार-किसकी जीत के साथ, शौर्य गाथाएँ की अमेरिका निवासी लेखिका शशि पाधा जी भी सेतु के हर अंक में नियमित लिखने का दायित्व ले रही हैं। इसके पहले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से डॉ. गोविंद माधव स्वास्थ्य सम्बंधी उपयोगी जानकारी सरल हिंदी में निरंतर प्रदान कर रहे हैं। कैनेडा से श्री समीर लाल की समीक्षा और पाक-विधियाँ भी नियमित हो चली हैं। इन महानुभावों के अतिरिक्त अनुज मेहेर वान विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिकों तथा गणितज्ञों के जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को सेतु के प्रवेशांक से ही आपके सामने लाते रहे हैं। उनका आलेख 'मैं तुम्हें अब भी बहुत प्यार करता हूँ' अब तक साढ़े तीन हज़ार बार पढ़ा जा चुका है।

आगामी मास अगस्त 2018 में मॉरिशस में ग्यारहवाँ 'विश्व हिन्दी सम्मेलन' मनाया जा रहा है। सभी हिन्दीप्रेमियों को इस त्रैवार्षिक पर्व की मंगलकामनाएँ। हिंदी की बात चलने पर अक्सर उसके सरलीकरण की बात भी सुनाई देती है। हिन्दी का प्रबल पक्षधर होने के नाते मैं एक बार फिर यह कहूँगा कि सबसे सरल बोलियाँ सबसे पहले नष्ट होती हैं। अंग्रेज़ी की शक्ति उसकी सरलता में नहीं, बल्कि उसके विराट रूप में है। हिंदी को भी सरलीकरण जैसे लुभावने और आत्मघाती नारों से दूर हटकर विस्तार का प्रयास करना चाहिये। सरल सम्वाद के लिये भाषा सरल हो, लेकिन एक आधुनिक भाषा जटिल विषयों को अभिव्यक्त करने में समर्थ होनी चाहिये और साहित्य, संगीत, कला के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ चलने में सक्षम होनी चाहिये। 

लगभग 50 रचनाएँ समेटे इस अंक का सम्पादकीय लिखते समय सेतु के पृष्ठ 412,201 बार पढ़े जा चुके हैं। छोटी सी संख्या है, लेकिन हमें गर्व है कि हमारा लक्ष्य संख्या नहीं बल्कि गुणवत्ता और प्रामाणिकता है। हमारे लेखकों, विशेषकर आलेख, शोधपत्र आदि के लेखकों से हमारा विशेष आग्रह है कि प्रकाशन के लिये प्रस्तुत जानकारी की प्रामाणिकता अवश्य जाँचें। पूर्वप्रकाशित रचनाएँ न भेजें, जो भी भेजें यूनिकोड में ही भेजें, और इस आशय की घोषणा रचना भेजने वाली ईमेल में अवश्य करें। रचना भेजते समय लेखकों से निवेदन (विस्तृत नियम) पढकर कृपया उनसे सहमति भी दें। यदि आप पत्रिका के सम्पादन, संचालन, विस्तार आदि में सहयोग करना चाहते हैं तो भी आपका स्वागत है।

जुलाई 2018 को हिन्दी साहित्य ने नीरज जैसे महारथी को खोया है।  मॉरिशस की हिंदी प्रचारिणी सभा के संस्थापक सदस्य श्री ब्रजलाल धनपत का इसी माह देहांत हुआ है। दोनों को सेतु की ओर से श्रद्धांजलि!

शुभाकांक्षी,
अनुराग शर्मा

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