कहानी: चांदी का वरक

आशा चौधरी

- आशा चौधरी

अभी कुछ ही दिनों पहले दोस्त बनी सहाय मेम ने माया के संग घर लौटते में उस दिन पूनम बाई के प्रसिद्ध मिठाई शॉप पर जरा कार रुकवाई और शुद्ध घी के बेसन के होममेड लड्डू का एक किलो का डब्बा खरीद कर बड़े ही अपनत्व से माया की कार के डेश बोर्ड पर धर दिया था, क्योंकि होली जो आ रही थी! और बस्! घर पहुँचते न पहुँचते माया का मन सहाय मेम से दोस्ती समाप्ति की पूर्व सूचना दे बैठा था।

उन बेचैन पलों में अपनी जिंदगी के बीते हुए अनेक ऐसे लमहों का ईमानदारी से ध्यान आता था उसे। अभी पिछले ही दिनों रायचैधरी मेम से भी उसकी दोस्ती का कुछ इसी तरह पटाक्षेप हुआ था। मेम व उन्हीं की तरह के कुछ सुलझे-सुथरे-संभ्रात लोग उसके इस प्रकार के ओछेपन पर चुप लगा उससे किनारा कर लेने में ही भलाई समझते थे। वह सब जानती थी किंतु उसके अंदर का खालीपन उसे मजबूर कर देता था कि आगे हो-हो कर बनाए अपने दोस्तों को बिलावजह जलील करे। इसी में वह अपने को महफूज समझती थी। इस तरह उसकी इमेज ही अस्थिर मनोवृत्ति वाली एक कुटनी की बन चुकी थी।

वैसे, पता था कि उसे दोस्त नहीं बल्कि अपने उचटते-भरभराते, गिरते-पड़ते मन को संभालने के लिये दोस्तनुमा टूल्स ही तो चाहिये होते थे। इसीसे, जैसे ही कोई उसे दोस्त समझने लगता, तो बस उस पर न जाने कैसी एक ओछी मानसिकता हावी हो जाती थी जिसके चलते उसकी पॉलिश कुछ ही दिनों में उतर ही जाती थी, क्योंकि पॉलिश तो पॉलिश ठहरी। और उसके द्वारा सप्रयास ओढ़े गए संभ्रांत चोले पर उसके भीतर का पीतल लाख छुपाने पर भी अपने पूरे सस्तेपन से आ पसरता था। उफ्! न जाने क्या देख कर पापा ने प्राइवेट जॉब वाले इस तोंदू-भोंदू जैसे आदमी से ब्याह दिया था।" माया मन ही मन उबलती थी अक्सर, "कितनी सुंदर हूँ, लोग सच ही तो कहते हैं कि कहीं किसी आईएएस, आईपीएस के बंगले की शोभा बनना था मुझे तो।" दाँत पीसती अपने आप ही से कहती थी, "उन्होंने तो गंगास्नान कर लिया मगर मेरा तो जनम ही बेकार हो गया।" युवावस्था में कभी किसी के संग प्रेम की पींगें बढ़ाते हुए देखे अपने तमाम सपनों की बलि चढ़ा चुकी माया अनेक अवसरों पर अपने पति व पिता को कोसने से बाज न आती थी। उसे हमेशा लगता था कि यदि वह जरा भी समर्थ होती तो अपनी बड़ी दीदी की ही तरह अलग हो रहती। मगर समर्थ कैसे नहीं थी वह? इतना अच्छा कमाती थी कि उसके पति को तो उसके जितना वेतन पूरे दो माह में देखना नसीब होता था। वो किस्मत का धनी मगर माया के वेतन की पाई-पाई ले कर घरेलू खर्चों के लिये भी उसे अपने मुँहताज रखता था। किसी प्रकार बचा कर, छिपा कर रखे गए ओवर टाइम वगैरह के पैसे से ही मायके वालों से लेनदेन कर पाती थी। ऑफिस में ऐसा खुशकिस्मत कोई तो हो जिसे माया ने कभी एक कट चाय भी कभी पिलाई हो! कोई मानेगा कि विवाह के समय की महंगी लिपस्टिक उसे तब तक चलानी पड़ी थी जब तक कि उससे इंफैक्शन न हो गया था। इतना कमाने के बाद भी अपने व बच्चों के अधिकांश खर्च के लिये उसे पति को तरह तरह से पटाना पड़ता था।

आखिर, कमाने भर से ही महिला स्वतंत्र होती है क्या? दीदी ने तो अपने चरित्रहीन पति से चुटकियों में तलाक ले ही लिया था वो भी पापा की पूरी देख-रेख में क्योंकि पापा को रिटायर होने के बाद जो पैसा मिला था उससे बाकी दोनों बेटियों के ब्याह निबटा कर वे ठनठन गोपाल हो चुके थे। सो, उन्होंने तो दीदी का स्थानांतरण भी फौरन अपने ही पास करा लिया था। अब बेटा न होने का कोई गम नहीं था उन्हें क्योंकि कमाने वाली बेटी जो घर आ बैठी थी। लोग इस तरह का न जाने क्या क्या कहते थे।

ऐसा होता है कि लोग न जाने क्या क्या कह-कह के आपको कितना-कितना तो डरा देते हैं। जो लोगों के कहे से मानव न डरे तो जिंदगी कुछ और ही हो। माया सोचती थी कभी कभी। सोचती तो बहुत ठीक थी किंतु उसमें उस ठीक को अपनाने का साहस न था। अपना आकलन लोगों के अनुसार करते करते ही उसकी उमर हो चली थी। अब क्या रक्खा था?

लेकिन, उसे लगता था कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। जितनी भी बची है जिंदगी शांति व सम्मान से जीना चाहती थी। इसीलिये अपने आसपास, कुछ अच्छे लोगों से बनते सहज संबंध उसमें उष्मा का संचार तो करते थे किंतु जब वे संबंध घर की दहलीज तक आने लगते तो उसे अपने घर के भीतर की घुटन का बाहर फैल जाने का डर बेतरह सताने लगता था और फिर वही होता था जो वह अब करने वाली थी मिसेज सहाय के साथ!

उस मिठाई के डब्बे ने माया को सचेत कर दिया था कि अभी तो ये मिठाई का डब्बा घर पहुँचा है, कल को मिसेज सहाय घर पहुँची कि तुम्हारे उस दिखाऊ खुशहाली के प्लास्टर की सारी परतें उतर जायेंगी। इसलिये, जिसने भी अपनापन बरतते हुए तुमसे घरोपा बनाने की कोशिश की, उसके साथ जो करती आई हो अब भी करना वही होगा, वरना जल्दी ही सारा भांडा फूट जाऐगा! उसे अंदर ही अंदर दुख सालता था कि कितनी आत्मीय, कितनी सुकोमल हैं मिसेज सहाय, जिनके साथ उसे अब पुनः अपनी चिर-परिचित क्रूरता अपनानी ही पड़ेगी!

वह अपने आप में अकेली होती जा रही थी, असहाय सी। सच ही तो पढ़ा था कहीं कि-
"जो दिल खोल लेते हैं औरों के साथ,
दिल उनके नहीं खुलते हैं औजारों के साथ।"

अगर किसीसे कुछ बाँट लिया होता तो आज वो अपने आप में सिमटी, सड़ियाती बंद गली सी न होती। उसके भीतर का वह बेबस सन्नाटा उसके समूचे जीवन पर, उसके सारे सांैदर्य पर तारी हो उसे निर्जीवता की मूर्ति में यूँ बदल चुका था कि उसे देख कर कोई यह कह सकता था कि वह बरसों से दिल खोल कर न हँसी होगी न रोई होगी! जैसे उसके जीवन में पतझड़ सदा को आ बिराजा था। क्या इसे ही आबादी कहते हैं कि एक दूसरे को नीचा दिखाते हुए एक छत के नीचे दुनिया को दिखाने को साथ रहा जाए? महीनों एक-दूसरे से बात भी न हो और दूसरों के सामने होंठों पर मुस्कुराहटों के स्टिकर चिपका लिये जाऐं फौरन से पेशतर। भीतर भीतर खाली-खटारे, बाहर से लोगों के सामने खुशियों का ढोंग करते रहो कि लोग जल जल कर मरें कि कितने खुशहाल हो आप, कितने खुशकिस्मत! किसी अपने के लिये मत सोचो, किसी अपने बड़े लक्ष्य के लिये मत जियो, केवल लोगों का ख्याल लिये जीते रहो। लोगों को दिखाने, जलाने से बढ़ कर कोई जिजीविषा ही नहीं मानो! सो, मन मसोस कर माया को लोकलाज निभानी पड़ रही थी। इस लोकलाज के चक्कर में कई बार पूरी शिद्दत से उसे लगता कि जैसे वह एक जिस्मफरोश में तब्दील हो गई है। मगर किसी जिस्मफरोश बदनसीब को अपना शरीर देने से पैसा मिलता है जबकि यहाँ उसे अपना सब कुछ देने के साथ अपना पैसा भी देना पड़ता है कि ले! अजीब बदकिस्मत से बदकिस्मत जिस्मफरोशी थी यह उसकी।

इस विवाह के क्या मायने थे? यह कैसा जनम-जनम का साथ था कि जिसमें उसे एक पल चैन- आराम नहीं। वह नींव में जिंदा दबा दी गई थी मानो। बाप रे! कई साल पहले, मालिनी को उसके घरैलू खस्ताहाल के बारे में किसी तरह पता चल गया था तो उसने कितना ना मजाक बना के रख दिया था उसका! ओह!

लेकिन इस प्रकार की बातों से पति को कब सरोकार था? ढिंढोरा पिटता है तो पिटे। किसे परवाह है? माया ही थी जो परवाह कर करके इतना मरी जाती थी कि अपने परिवार की इज्जत बचाने अपने आप को एक ऐसा टापू बना बैठी थी जिस तक कोई नहीं आ सके। यह दूर से दिखता टापू लोगों को लुभाता तो था किंतु इसमें जो वीरानापन था, कोई नजदीक आ कर इस वीरानेपन को, इसकी बदहाली को न पढ़ ले इसलिये माया हर उस नजदीक आते शख्स को किसी न किसी बहाने लज्जित कर के ही दम लेती थी। यह उसकी मजबूरी ही हो चुकी थी।

अनायास ही उसका ध्यान गया था मोबाइल की बजती रिंगटोन पर। रिंगटोन बता रही थी कि फोन किसका था। उसने फोन बजने दिया। पति और बच्चों के आने में अभी समय था जिसका सदुपयोग बाल रंगने, दाढ़ी के बाल खींचने जैसे कामों में माया को करना था। एक दो बार पूरी तरह बजने के बाद उसने आखिर फोन उठाया। दूसरी तरफ मिसेज सहाय ही तो थीं जो बड़ी ही सहजता व अपनेपन से जानना चाह रही थीं कि, "कल इंस्पैक्शन था सो ठीक कितने बजे निकलेंगे ऑफिस के लिये? तुम लंच की फिक्र मत करना, मैं सब बना लूंगी। तुम्हें राजस्थानी कढ़ी पसंद है न, मैं बना कर ला रही हूँ। कल हम साथ ही लंच लेंगे।" ओह, कितनी स्निग्धता!

माया ने सच ही आसन्न खतरा भाँप लिया था। उसने अनमनेपन से न जाने क्या जवाब दिया उन्हें और फिर जरा भी परवाह नहीं की कि उन्हें क्या जवाब दिया! क्योंकि अब कि जब उसने लोगों पर अपनी कार में किसीको लिफ्ट देने वाली रईसी का भरपूर दिखावा कर लिया था, ऑफिस और घर की अपनी बेरौनक जिंदगी में किसीको साथी बना कर कुछ पलों की रौनक हाँसिल कर ली थी। तो अब आगे संबंध बनाऐ रखने में खतरा था, अब पिंड तो छुड़ाना होगा न क्योंकि वे अब उससे घरैलू रूप से जुड़ने जा रही थीं। यह तो होने से रहा क्योंकि घर में घुटन- सड़न इतनी थी कि जिसे यदि बाहरी लोगों ने देख लिया तो माया का सारा तिलिस्म बिखर जाना था। उसे लगता था कि वह ऐसी सड़ चुकी, बेस्वाद मिठाई हो चुकी थी जिसे चांदी के वरक लगा लगा कर चलने योग्य बना रखा हो।

एक उसाँस ले कर माया उठ खड़ी हुई। कितने काम करने थे उसे कल को ध्यान में रख कर क्योंकि कल हेडऑफिस का इंस्पैक्शन था और कल वह अपना सेलफोन जानबूझ कर घर पर ही भूल कर रोज की अपेक्षा कुछ जल्दी ही निकल लेगी ताकि मिसेज सहाय उसे फोन कर-कर के, उसका इंतजार करती रह जाऐं। जब वे थकी-हारी भागती हुई सी किसी रिक्शे ऑटो में पहुँचेंगी, जरूर कुछ शिकायत जैसा करेंगी तो माया के लिये उचित रहेगा कि "भई इतने जरूरी समय पर भी आप इतनी लापरवाह! मैं भी क्या करती? सेल घर पर ही रह गया।" बड़ी मासूमियत से तब वह अपनी दरियादिली व रईसी की कानाफूसी औरों के साथ कर सकेगी कि किस प्रकार "मिसेज सहाय उसकी कार में रोजाने उसके साथ लद जाया करती हैं! " यह बात और थी कि माया द्वारा आए दिन "चलिये न, मैं वहाँ से आगे तक जाती हूँ।" कह-कह कर लिफ्ट देने के पहले बेचारी डाइबिटिक मिसेज सहाय अपना वाॅक करने की गरज में ही पैदल आया-जाया करती थीं। वे कईयों को इस बारे में समझा भी चुकी थीं किंतु माया ने तो आग्रह पर आग्रह करके आखिरकार अपना उल्लू सीधा कर ही लिया था।

जब मिसेज सहाय उसके झाँसे में आ गईं तो अपने को एलीट क्लास में शामिल करने का, और सबसे बढ़ कर अपने नीरव-बेरंग जीवन में कुछ दिनों के लिये ही सही, मानसिक संबल हासिल कर लेने का माया का आंतरिक उद्येश्य पूरा हो चुका था तो अब उन्हें यूज्ड टिश्यू पेपर की तरह फेंका जा सकता था न। अतः बड़े इतमीनान से रूपरेखा बना रही थी कि ऑफिस में नई आई ठसकदार सी दिखने वाली सहकर्मी यानि अपने नए शिकार को फाँसने की तैयारी में क्या क्या कहेगी वह? कुछ यही कि, "भई सब बराबर कमाते हैं कि नहीं! लेकिन मुझे तो लगता है इनके पति इनको आना-धेला नहीं देते हैं। बेचारी देखो न कैसे टक-टक करती आती-जाती थीं। एक दो बार मैंने बिठा क्या लिया कि रोज-रोज का धंधा बना लिया इन्होंने तो। भई आप कार खरीदो अपनी। और यदि कार है तो क्या शोकेस में सजा के रखने को है? चलाओ उसे। और अगर चलानी नहीं आती तो ड्रायवर रखो। जो ड्रायवर नहीं रख सकतीं तो रिक्शे-विक्शे में आओ। भई कब तक कोई किसीको ढोए? भई आज के जमाने में भी मोहतरमा न तो टूव्हीलर चलाती हैं न फोर व्हीलर! गजब है भई गजब है। मेरे हस्बैंड तो इतना चाहते हैं मुझे कि बिल्कुल पसंद नहीं करते कि मैं कभी किसीसे लिफ्ट लूँ। इसलिये अपनी कार में आती हूँ। अपने हिसाब से रहती हूँ। किसी पर डिपेंड नहीं करती।"

ऑफ़िस में सबसे अलग-थलग पड़ कर माया अब जिस नई मुर्गी को फाँसना चाह रही थी वह सहकर्मी ऐसे ही स्वभाव की दिखती थी, अपने आप में घिरी हुई सी, खुद में ही कहीं कैद सी। हाँ उससे माया की अच्छी छनेगी, जिसके भीतरी हाल उससे मिलते-जुलते होंगे, वही उससे अच्छी तरह निभा ले जाऐगी। क्योंकि दोनों को केवल ऑफिस में साथ चाहिये।

वह अपने आप से पूछती थी कि प्लान ठीक है न? सब सही फिट हो रहा है न? उसके भीतर के बचे-खुचे स्वस्थ उजले पक्ष को दबा-घोंट कर वहाँ एक लगातार सड़ता-गलता जा रहा पक्ष पूरी तसल्ली से जवाब देता था, "धन्य हो, धन्य हो मायारानी! एकदम ठीक! बिल्कुल ठीक कोटिंग है चांदी के वर्क की!

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