‘कस्य निमित्तम्’ नाटक में जन-कल्याण की भावना

अरुण कुमार निषाद

अरुण कुमार निषाद

साहित्य समग्र रूप से मानवता का चिन्तन करता है। जन-कल्याण ही साहित्य का मूल होता है। साहित्य हमेशा जन-कल्याण की बात करता है। उसे समझना होता है है कौन सी बात समाज के हित में है, कौन नहीं। इसी जन-कल्याण की भावना को केन्द्रबिन्दु बनाकर डॉ.राजकुमारी त्रिखा ने अपने नाटक ‘कस्य निमित्तम्’ की रचना की है।

आत्मवृत्त-
डा. राजकुमारी त्रिखा का जन्म 9 अप्रैल सन् 1944 ई. को हुआ। आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से वर्ष 1964 ई. में स्नातक की परीक्षा (प्रथम श्रेणी), वर्ष 1966 ई. में परास्नातक की परीक्षा (प्रथम श्रेणी) तथा वर्ष 1973 ई. में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

अध्यापन कार्य-
क. दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित मैत्रेयी कालेज में लगभग 40 वर्षों (16 जुलाई, 1969 ई. से 08 अप्रैल 2009 ई.) तक बी.ए. प्रोग्राम तथा बी.ए.आनर्स संस्कृत की कक्षाओं में अध्यापन किया ।
ख. दिल्ली विश्वविद्याल में एम.ए. संस्कृत फाइनल की कक्षाओं में बाणभट्ट के ग्रन्थ कादम्बरी और हर्षचरितम् का लगभग 25 वर्ष अध्यापन किया ।
ग. दिल्ली विश्वविद्यालय के आठ छात्र / छात्राओं का शोध कार्य में सफल मार्ग दर्शन किया जिससे उन्हें एम.फिल. / पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त हुई ।

रचनाएँ-

 क. पुस्तकें पाँच
1.कस्य निमित्तम् मौलिक संस्कृत नाट्य रचना (बाल समस्याओं तथा उनके सम्भावित समाधानों पर प्रकाश डालने वाले स्वरचित चार लघु संस्कृत नाटकों का संकलन) चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010 ई.।
2.महाभारत में विज्ञान दर्शन और समाज, अभिषेक प्रकाशन, दिल्ली 2008 ई.।
3.महाभारत में योग विद्या, जे.पी पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 2004 ई.।
4.महाभारत की बोध कथाएँ, अभिषेक प्रकाशन, दिल्ली, 2007 ई.।
5.Alamkaras in the works of Bana Bhatta, परिमल प्रकाशन, दिल्ली, 1982 ई.।

 ख. शोध पत्र और अन्य शैक्षणिक गतिविधियाँ
देश की प्रतिष्ठित और अन्ताराष्ट्रिय मूल्यांकित शोध पत्रिकाओँ, राष्ट्रिय/ अन्ताराष्ट्रिय संस्कृत कांफ्रेसों, और विद्वानों के स्मृति-ग्रन्थों में लगभग 68 शोध पत्र प्रकाशित हैं ।
हिन्दी दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तानमें संस्कृत तथा नैतिक मूल्यों की आधुनिक सन्दर्भ में व्याख्या और महत्त्व को रेखांकित करने वाले लेखों का प्रकाशन ।
वेदों के प्रचार में संलग्न दिल्ली स्थित वेद संस्थानकी त्रैमासिक पत्रिका वेद-सविता में योग सुधा शीर्षक से योग सम्बन्धी लेख-माला का नियमित लेखन ।
दिल्ली संस्कृत अकादमी की बाल पत्रिका संस्कृत चन्द्रिकामें अनेक बाल कथाओं का लेखन ।
वरिष्ठ नागरिक मिशन की पत्रिका कुशल क्षेम में अनेक लेखों का लेखन ।

 (ग) संस्कृत सम्मेलनों में सहभागिता
1.दिल्ली और देश के अन्य नगरों में 39 संस्कृत सम्मेलनों में शोध पत्र वाचन । उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ द्वारा बनारस में आयोजित व्यास सम्मेलन में शोध पत्र वाचन ।
2.कुछ सम्मेलनों में अध्यक्ष और कुछ में संयोजन का कार्य किया ।
9.संस्कृत के प्रचार एवम् प्रसार में योगदान।
1.दिल्ली दूर दर्शन पर युव वाणी में अनेक वार्ताएँ प्रसारित ।
2.संस्कृत के महत्त्व और उस में उपलब्ध ज्ञान को, विशेषतः नैतिक मूल्यों और योग के लाभों का पब्लिक लेक्चर्स के माध्यम से प्रचार करती रही हूँ ।
3.दिल्ली के स्कूलों के संस्कृत टीचरों के इन-सर्विस प्रोग्रामों में रिसोर्स पर्सन के रूप में अनेक बार लेक्चर्स दिये हैं ।
4.दिल्ली के अनेक कालेजों में संस्कृत विषयक व्याख्यान दिये हैं ।
5.राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली, दिल्ली संस्कृत अकादमी और दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों द्वारा आयोजित विभिन्न संस्कृत प्रतियोगिताओं में निर्णायक का कार्य किया है ।

पुरस्कार और सम्मान-
अब तक 7 पुरस्कार मिले हैं।
1.शिक्षक पुरस्कार 2005 ई.। दिल्ली संस्कृत अकादमी ।
2.लघु संस्कृत नाटक लेखन पुरस्कार तीन बार । दिल्ली संस्कृत अकादमी ।
3.लघु संस्कृत कथा लेखन पुरस्कार । दिल्ली संस्कृत अकादमी ।
4.संस्कृत समाराधक पुरस्कार , दो बार । दिल्ली संस्कृत अकादमी ।
भारतीय संस्कृति, संस्कृत साहित्य, दर्शन, विशेषतः योग में अगाध श्रद्धा, गहन निष्ठा और विश्वास है। अतः सेवा निवृत्ति के पश्चात् भी संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन और योग विषयक चिन्तन चलता रहता है। सम्प्रति, आप कुण्डलिनी योग वर्णित शरीरस्थ चक्रों के चिकित्सकीय महत्त्व पर शोध कर रही हैं ।
‘कस्य निमित्तम्’ डॉ.राजकुमारी त्रिखा द्वारा प्रणीत का नाट्य संग्रह है। जिसमें चार नाटक हैं- 1.जीवन्भद्राणिपश्यति 2.श्रेष्ठा: राष्ट्रसम्पद: 3.कस्य निमित्तम् 4.जयतु जगति संस्कृतवाणी।
‘जीवन्भद्राणिपश्यति’ नाटक में रामदास नामक बारह वर्षीय एक किशोर की कथा है। जिसके माता-पिता (गंगा प्रसाद और पार्वती) चिकित्सक हैं और वे रामदास को भी चिकित्सक बनाना चाहते हैं। परन्तु उसका मन चिकित्सक बनने में नहीं लगता है।
रामदास:- (आत्मगतम्)आह! अहम् तू अस्यां पृथिव्यामत्यन्तं निरुपयोगी मन्दबुद्धि: लक्ष्यविहीनश्च व्यक्तिरस्मि। मातापितरौ मां चिकित्सकपदाधिरुढमिच्छत:, परं किं कुर्याम् ? चिकित्साविषयाणामध्ययनं मह्यं कदापि न रोचते........।[1]

गंगाप्रसाद कहते हैं कि- मैंने तुम्हारे परीक्षक को तुम्हें पास करने के लिए आधुनिक मोबाइल फोन दे दिया फिर भी तुम्हारे अंक क्यों कम आये हैं।
गंगाप्रसाद- परं विज्ञानप्रयोगात्मकपरीक्षायां किमभवत्? अहं तव परीक्षकम् आधुनिकतमं मोबाइलफोनं दत्त्वा तुभ्यं शत प्रतिशतांक-प्रदानाय निश्चितवान्, परं त्वं तु मूषकदेहेन क्षुरिकाया: स्पर्शमपि न कृतवान्, दूरे नाम मूषककर्तनम्।[2]

समाज में प्राय: यह भी दृष्टिगोचर होता है कि- बालक या बालिका पर उनके माता-पिता अपना अधिकार जबरदस्ती थोपते हैं। कुछ बच्चे तो माता-पिता के डर से अपने पसंद का विषय भी नहीं चयनित कर पाते हैं-
रामदास:- (आत्मगतम्) कथं चिकित्सको भविष्यामि। अस्मिन् क्षेत्रे मम रुचिरेव नास्ति। न जाने किमर्थं मम माता-पिता च मां चिकित्सकमेव द्रष्टुमिच्छ्त:।...............मम जीवनं सत्यमेव व्यर्थं निरुपयोगि चास्ति। को लाभोऽनेन जीवनेन? मरणमेव श्रेस्यकरम्। अपमानपूर्णजीवनात् मुक्ति: तु भविष्यति। केन प्रकारेण आत्महत्यां कुर्याम् .........।[3]

जीवन में असफल होने पर अधिकांश व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेते हैं। रामदास भी अपना कदम उसी तरफ बढ़ाता है। वह कहता है-
रामदास- गुरुदेव। अयमाशीर्वादो मत्कृते नोपपन्न:। मादृश: असफलो जनो जीवित्वा किं करिष्यति। अहं स्वमातापित्रो: आशापूर्तिमपि न कृतवान्। अहम् तेषां दुःखकारणभूत:, अत: स्वजीवनलीलां समापयितुमिच्छामि। कृपया देहि मे आशीर्वादं यदहं स्वात्महत्याभियाने सफलो भवेयम्। अहं दर्शयितुमिच्छामि, यदहं नास्मि कायर:, अपितु वीरोऽस्मि, मरणादपि न बिभेमि च।[4]

‘श्रेष्ठा: राष्ट्रसम्पद:’ नामक दूसरे नाटक की कथावस्तु मुकुल नामक एक सोलह वर्षीय बालक के आस-पास घूमती है। इस नाटक में डॉ.त्रिखा ने दिखाया है कि- किस प्रकार से लोग खुद आगे बढने के लिए दूसरे को धक्का दे दे रहे हैं। इस भागदौड़ में लोग किस तरह सारे नियम कानून तोड़ रहे हैं। किस प्रकार से कामकाजी माता-पिता अपने बच्चे को समय नहीं दे पा रहे हैं। स्नेह के अभाव में किस प्रकार से बच्चों में वीडियोगेम जैसी खतरनाक आदत बच्चों में लग जा रही है। जो ब्लूह्वेल जैसे जानलेवा खेल तक बच्चों को पहुँचा रही है, इस खेल में बच्चे अपनी जन तक गवां दे रहे हैं। बच्चे इस प्रकार के खतरनाक खेलों से दूर रहें इसके लिए जरुरी है की माता-पिता समय-समय पर अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें।

मुकुल किस प्रकार से वीडियोगेम का आदती हो गया है। इसका पता इस बात से चलता है कि- घर में कम्प्यूटर खाली न होने पर वह अपने दादा जी के कम्प्यूटर पर जाकर वीडियोगेम खेलने का निवेदन करता है।
मकुल-(पितामहीं प्रति) भो: परमपूज्यमाताश्री:! मम पिताश्री: प्रथमतलस्थ-संगणकेन स्वकार्यालयस्य अत्यावश्यकं कार्यं कुर्वन्नास्ते। अतोऽहं तत्र संगणकेन क्रीडितुं न शक्नोमि। किम् अहमनेन संगणकेनात्र किञ्चितकालं क्रीडेयम् ?[5]

आज प्रतिस्पर्धा के इस युग में मानव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए अनुचित कार्य करने से भी नहीं हिचकिचाता है। मुकुल भी प्रकाश-संकेतक-स्तम्भ का ध्यान नहीं रखता है।
मुकुल:- भो दुष्ट ! किं करोषि? मम मार्गमवरुणत्सि। पार्श्वतो भव ...किं ...न गच्छसि त्वं पार्श्वम्...पश्यामि त्वाम् .... (इत्युक्त्वा एकां कुञ्जिकामापीड्य प्रतिस्पर्धिनं पादेन प्रहृत्य पातयति .... कथयति च, अहा! अधुना त्वं मदग्रे आगन्तुं न शक्नोषि। तदैव एक: चतुष्पथ: दृश्यते यत्र यातायातनियामक : लोहित-पीत-हरित-प्रकाश-संकेतक-स्तम्भोऽपि दृश्यते।[6]

जन-कल्याण की बातों को समझाते हुए मुकुल की दादी (सरस्वती) कहती हैं की रस्ते में चलते हुए अन्य व्यक्तियों की भी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना परमावश्यक है।[7]
अन्यत्र भी-
सरस्वती-परं किमर्थं पादप्रहार: ........ उत्तरं ददाति......[8]
सरस्वती-.............युवाव स्थायाम् अपि .......।[9]
सरस्वती- ........जीवने आत्यान्तिक सफलताया .......।[10]

‘श्रेष्ठा राष्ट्रसम्पद:’ नामक इस नाटक में न्यायाधीश ने जन कल्याण की भावना को ध्यान में रखते हुए मुकुल को ऐसी सजा सुनाता है कि-उसके जीवन में सुधार हो जाए।
न्यायाधीश:- (स्वासने तिष्ठन् निर्णयं श्रावयति) प्रस्तुतप्रमाणानां, साक्षिणां व्यक्तव्यस्य च, आधारे मम निर्णयोऽस्ति यत् अपराधिनि नवयुवकेऽस्मिन् उपद्रव-कलहापराध: सिध्यति। परं नास्ति अस्य विगतजीवने कोऽपि अपराधेतिहास:। न्यायमण्डपोऽयम् इदं तथ्यं प्राधान्येन विचिन्त्य इयं षण्मासपर्यन्तं सश्रमजीवनयापनं दण्डयति। अयम् इमामवधिं कस्मिन्नपि कारागरे न, अपितु स्वधार्मिकमान्यतानुसारं कस्मिश्चित् गुरूद्वारे, यवनोपासनालये, हिन्दुदेवमन्दिरे, योगाश्रमे, चर्च इति क्राइस्टोपासनालये, वा संयम-तपस्यापूतं परिश्रमबहुलञ्च जीवनं यापयतु। अयं यत्र कुत्रापि निवसेत्, तस्या: संस्थाया: प्रमुखेन अस्याचरणव्यवहारसंबन्धिपूर्णविवरणं प्रतिमासं न्यायमण्डपे प्रेषितव्यम्। एवमस्य नवयुवकस्य जीवनचन्द्रोंऽपि कारागाराकलंकात् निर्मुक्त: भविष्यति, अस्य आत्मपरिष्कारश्च अपि भविष्यन्ति। आचारवन्त: शुद्धात्मान: नवयुवका: एव श्रेष्ठा: राष्ट्रसंपद: भवन्ति इति निश्चित्य मया एष: दण्ड: विहित:।[11]

‘कस्य निमित्तम्’ नामक तृतीय नाटक में यह बताया गया है कि-किस प्रकार से माता-पिता के प्रेम के अभाव में कोई बालक उद्दण्ड हो जाता है।

डॉ.त्रिखा ने इस नाटक में दिखाया है कि- किस प्रकार से इस भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में अपने लिए समय नहीं निकाल पाते हैं और इसका दुष्परिणाम यह होता है कि-हम समय से पहले बीमार कमजोर हो जाते हैं। रंजना के इसी भाग-दौड़ के कारण ही उसका बच्चा शल्यचिकित्सा (सिजेरियन डिलीवरी) से पैदा होता है।
चिकित्सिका-श्रीमान्! पश्य, आसन्नायामपि अष्टमाससमासौ गर्भ: अतिदुर्बल: अपरिपुष्टश्च अस्ति। रंजनाया: स्वास्थ्यदृष्ट्या शल्यप्रसव (सिजेरिजन डिलीवरी) एव समीचीन:। अपरञ्च गर्भस्य निर्बलतया अहं तावत्कालपर्यन्तं शल्यक्रियां न विधास्यामि, यावद् गर्भ: सामान्यरूपेण विकसित: न भवेत्। पूर्णविकसितगर्भ जन्मान्तरं यन्त्रसाहाय्यं विनैव जीवनं धारयितुं शक्नोति। अत अहम् अष्टमे मासे समाप्तेऽपि कतिचितद्दिनानि प्रतीक्षां करिष्यामि।[12]
(नवमासस्य दशसु दिवसेषु समतिक्रामत्सु बालक: शल्यचिकित्सा उत्पन्न: अभवत्। रंजना शल्यप्रसवेन अतिनिर्बला संजाता। तृतीये दिने बालक: पाण्डुरोगेण आक्रान्त: भवति, भृशं रोदिति च। रंजनामाता प्रसूतिसेवया, नवजातशिशोश्च रोदनेन क्षणमपि विश्रामं न लभते, रात्रौ अपि निद्राभंगेन पीडिता भवति। सा निद्राविश्रामाभावात् अतीव श्रान्ता सती अपि, यथाकथञ्चित् आवश्यककार्याणि, प्रसूतिकासेवाञ्च करोति। सप्तमे अह्नि सा प्रसूतिका-बालकसहिता गृहं प्रत्यागच्छति।)[13]

डाक्टर बताती है कि-असन्तुलित भोजन और अधिक कार्य के कारण ही उसका बच्चा कमजोर है।
चिकित्सिका-सन्तुलितभोजनस्य उपेक्षा, प्रवृद्धगुरुतरकार्यभार: विश्रामस्य अभावश्च।
सरस्वती- सुष्ठु भवती भणति प्राय: गृहप्रबन्धकार्य-कारणात्, कार्यालयस्य गुरुतरकार्यवशाच्च अस्या, सम्पूर्णदिवस: व्यस्ततया व्यतीयते स्म। भोजनायापि अवकाश: न प्राप्यते स्म। अधुनाहम् आगता, अत: इयं सन्तुलितभोजनं पर्याप्तविश्रामञ्च प्राप्स्यति।[14]

प्राय: यह देखने को मिलता है कि-जिस बच्चे के माता-पिता उस पर ध्यान नहीं दे पाते वह बच्चा बचपन में ही उग्र स्वभाव का हो जाता है। उनका खेल और अध्ययन में मन नहीं लगता। जैसा कि हेमन्त के कथन से स्पष्ट होता है।
हेमन्त:- पाठशाला मह्यं न रोचते। अहमत्र न पठिष्यामि। गृहं प्रेषय माम्।[15]
और भी-
अपमानं प्राप्य,उपेक्षितो भूत्वा स: गृहमागत्य सेविकां ताडयति, पुस्तकानि चित्रपुस्तकाञ्च विदारयति।[16]

और भी
बालमनोचिकित्सक:- प्रिय! किं नाम भवत:?
हेमन्त:- अहं हेमन्तोऽमि।
 बालमनोचिकित्सक:- शोभनम्! मनोहरं नाम। कस्मिन् विद्यालये पठति भवान्?
हेमन्त:- विद्यालयस्य तु नामापि न गृहीतव्यम्। स तु कारागार: एवास्ति .......।[17]

बालमनोचिकित्सक के यह पूछने पर कि- आप दोनों किसके लिए यह धन इकट्ठा कर रहे हैं तो रञ्जना और अपूर्व कहते है कि- अपने बच्चे (हेमन्त ) के लिए। तब डाक्टर कहता है कि- पैसा से अधिक बच्चे को प्रेम की आवश्यकता होती है।
बालमनोचिकित्सक:- पश्य, युवामुभौ अपि, कस्य निमित्तं धनोपार्जनं कुरुत:?
दम्पती- निस्सन्देहं हेमन्तार्थमेव।
बालमनोचिकित्सक:- अधुना हेमन्त: मानसिकरूपेण व्यग्र: अस्ति, परम् यदि अस्य उपेक्षा क्रियते, तदा आगामिनि कालेऽयम् अवसादग्रस्तोऽपि भवेत्। यदि अयमेव स्वस्थ: न स्यात्, यदि च अस्य मन: बाल्यकाले एव प्रफुल्लितम्, चिन्तामुक्तञ्च न स्यात्, तदा किमयं भवताम् धनमुपभोक्तुं शक्ष्यति? नहि नहि, कृपया एतादृशीं भयावहस्थितिं निवारय।
दम्पती- तदा अस्माभि: किं कर्तव्यम् ?
बालमनोचिकित्सक:- सर्वप्रथमन्तु, प्रारब्धेऽस्य विद्यालयीये ग्रीष्मावकाशे, भवन्तौ कार्यालयादवकाशं गृहीत्वा अनेन सह मासपर्यन्तं समयं कुत्रापि सुरम्यपर्वतीयस्थले यापयताम्। अस्मै शतप्रतिशतं ध्यानं दातव्यम्। अनेन सह भ्रमताम्, आलपताम्, भोजनं खादताम्, परिहासं कुरुताम् च ..............अपि दृढीभविष्यन्ति।
दम्पती- यथा आह भवान्, तथैव करिष्याव:।[18]

बालमनोचिकित्सक के कहते पर रञ्जना अपने पुत्र की पढाई-लिखाई के लिए अपनी नौकरी तक त्याग देती है।
रञ्जना- न हि पुत्र, न हि। अहम् कार्यालयं न गमिष्यामि। यदि अहं कार्यालयं गच्छेयम्, तदा त्वमुपेक्षितो भविष्यसि। तव भोजन-शयन-पठनादिकार्याणि एपीआई तदा प्रभावितानि भविष्यन्ति। अत: मम कार्यालयगमनपरिहार: एव कल्याणकारी अस्ति।
हेमन्त:- मात:! भवत्याम् कार्यालयं गतायामपि, अहं स्वकार्यं तथैव निरन्तरं, निष्ठया च करिष्यामि, यथा भवत्या: समक्षं करोमि। कार्यालयगमनेन भवत्या: वेतनमपि प्राप्स्यते, येन भवती मह्यं क्रीडनक-वस्त्रादिकं क्रेतुं शक्ष्यति। अत: भवति कृपया श्व: एव स्वकार्यालयम् गच्छ।
रञ्जना- एपीआई सत्यमेतत्? पुत्र ! कथय, अपि अस्ति तव इयम्, एवेच्छा?
हेमन्त:- आम् ! सत्यं वदामि। पश्य अहं, तव शिरसा शपामि।[19]

‘जयतु जगति संस्कृत’ नाटक में सुरभारती संस्कृत भाषा को लेकर अत्यन्त चिन्तित है। वह आर्य संस्कृति से कहती है कि- भौतिकता और धन लोलुपता के चक्कर में फँसकर व्यक्ति अपनी पुरानी संस्कृति को विस्मृत कर दे रहा है।
सुरभारती- सत्यम् भणसि त्वम् ।[20]

‘आर्यसंस्कृति’ ‘सुरभारती’ से कहती है कि-तुम मानसिक पीड़ा को त्याग कर जन-कल्याण के लिए कार्य करो, लोगों को तुमसे यही अपेक्षा है।
आर्यसंस्कृति:- मानसिकसन्तापेन नास्ति कोऽपि लाभ:। सम्पूर्णविश्वमिदं, सुखं शान्तिश्च प्राप्तुं त्वाम् आशापूर्णनेत्राभ्यां पश्यति। त्वं मानवताया: पथप्रदर्शिका भव, समाजे च व्याप्तदोषान् दूरीकर्तुं योगसाधनाया: प्रचारं कुरु[21]

सारांशत: हम कह सकते हैं कि- संसार के सभी मनुष्य को दूसरों की सुख-सुविधाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। परिवार के बड़े-बुजुर्गों को भी समय-समय पर भाच्चों को नैतिक शिक्षा प्रदान करते रहना चाहिए। इस प्रकार हम देखते हैं कि- डॉ. राजकुमारी त्रिखा हमारे सम्मुख एक सफल नाटककार के रूप में उपस्थित हुई हैं। साहित्यकार वही है, जिसकी रचना में समाज के लिए कुछ-न-कुछ संदेश हो।


संदर्भ:



[1]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 2      
[2] ‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 3
[3]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 4  
[4]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 5
[5]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 14   
[6]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 15    
[7]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 17  
[8]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 18-19  
[9]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 19  
[10]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 19  
[11]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 23  
[12]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 43-44    
[13]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 45  
[14]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 4 4   
[15]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 50  
[16]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 51    
[17] ‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 55-56
[18]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 58-59   
[19]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 67-68   
[20]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 79  
[21]‘कस्य निमित्तम्’, डॉ.राजकुमारी त्रिखा, चिन्तन प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2010 ई., पृष्ठ संख्या 81  

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